मेरी भरतपुर यात्रा

2 अक्तुबर (2009), शुक्रवार को छुट्टी थी. तीन दिनों का ल‌बा सप्ताहांत. हम तीन दोस्त मै, रमेश और महेन्द्र ने झटपट घूमने का प्रोग्राम बनाया. कहां जाया जाये – यह सोचना हमेशा की तरह मेरे हिस्से मे‌ ही आया. हरिद्वार, ऋषिकेष, मंसूरी, शिमला घूम-घूम कर हम बोर हो चुके थे. भरतपुर जाने का हमारा प्रोग्राम कई बार रद्द हो चुका था इसलिये इस बार वहीं जाने का एलान कर दिया.

जाने की टिकिट बुक नहीं थी. निजामुद्दीन से ताज एक्सप्रैस पकडकर हम पहले मथुरा जंकश्न तक गये (टिकिट 50 रूपय). दिल्ली से मथुरा तक करीब दो घंटे लगते हैं. वहां से निजामुद्दीन से ही आने वाली गोलडन टैम्पल में भरतपुर का जनरल टिकिट लेकर स्लीपर कोच मे‌ सवार हो लिये (टिकिट 28 रूपय).  भरतपुर मथुरा से अगला स्टेशन ही है और दूरी है करीब तीस किलोमीटर है .केवल आधा घंटा लगता है. ट्रेन में सवार होते ही सबसे पहले मुलाकात हुई टी. टी. साहब से जिसका अंदेशा मुझे पहले से ही था. टी. टी. साहब ने जनरल टिकिट लेकर स्लीपकर में यात्रा करने के उपलक्ष में जुर्माने की ईनामी राशि 1200 रूपय घोषित कर दी. बाद मे‌ केवल एक व्यक्ती का जुर्माना – तीन सौ पचास रूपय देने पर बात बन गयी. जुर्माना देने के बाद थोडी शांती मिली. हालांकि रिश्व्त देने की नाकाम कोशिश भी की गई लेकिन कुछ फायदा ना हो सका. सिविल ड्रैस के टी. टी. को देख कर एक बार तो लगा की नीरज जाट जी की तर्ज पर इससे आई-कार्ड पूछ ही लूं. लेकिन फिर 1200 रूपय का ध्यान आते ही विचार बदल गया.

पौने ग्यारह बजे हम भरतपुर के स्टेशन की शोभा बढा रहे थे. यह पांच प्लेटफार्म वाला एक छोटा सा स्टेशन है. प्यास बहुत जोर से लग रही थी. ठंडे पानी का कूलर स्टेशन पर लगा हूआ था. पानी पिया तो बहुत ही खारा था पानी पिया ही नही‌ गया. स्टेशन से बाहर निकले तो बहुत से ओटो वाले खडे हुए थे. भरतपुर में रस्सी से स्टार्ट होने वाले ओटो बहुत हैं.

हमने चालीस रूपय में केवलादेव पार्क के लिये ओटो किया. भरतपुर मे‌ सडकों की हालत बहुत खस्ता है. जगह-जगह गढ्ढे और टूटी सडक के ही दर्शन होते हैं. स्टेशन से बाहर निकलते ही हलवाई की दुकानें नजर आईं जहाँ खजला बिक रहा था. खजला एक तरह का पकवान है जो मैदे से बनता है. यह फीका और मीठा दोनो तरह का होता है. देखने मे‌ यह एक बडे आकार का भठुरे जैसा दिखता है.

खजला
खजला

बारह बजे हमने केवलादेव पार्क के सामने बने होटल “द पार्क रिजैन्सी” में प्रवेश किया.

Hotel The Park Bharatpur
Hotel The Park Bharatpur

बाहर से देखने में यह होटल बहुत ही शानदार दिखता है. यहां हमे‌ एक एसी डबल बैडरूम कमरा 850 रूपय मे‌ मिल गया. हम तीन लोग थे सो ज्यादा मंहगा नहीं लगा. होटल में घुसते ही तबीयत प्रसन्न हो गेई. रूम बहुत ही खुला और बडा था. रूम के सामने बहुत बडा पार्क था जिसमें बहुत सी टेबल और चेयर लगी हुई थीं. अक्तुबर से मार्च तक यहां सीजन रहता है शायद इसीलिये होटल को रैनोवेट भी किया जा रहा था. रूम मे‌ एक बडा सा टीवी और छोटा सा फ्रिज भी था. हमारे होटल के बिल्कुल सामने था होटल प्रताप पैलेस.

Hotel Pratap Palace Bharatpur
Hotel Pratap Palace Bharatpur

भूख बहुत लगी थी इसलिये फटाफट बटर चिकन (160 रूपय हाफ) और बटर नान (25 रूपय) आर्डर कर दिया. बटर चिकन लजवाब था और नान भी बहुत सौफ्ट थे. दोपहर का खाना खा कर हमने सबसे पहले केवलादेव पार्क जाने का निश्चय किया. लेकिन वेटर ने हमें बताया कि वहां जाने का यह सही समय नहीं है. वहां सुबह-सुबह जाना चाहिये. सुबह पक्षी खाने की तलाश में बाहर निकलते हैं. लेकिन हमें उसकी बात पसंद नहीं आयी और हम सीधा निकल लिये पार्क की तरफ. इस पार्क को यहां घना (dense) के नाम से ज्यादा जाना जाता है.

होटल से बाहर निकलते ही रिक्शे वाले पीछे पड गये. लेकिन हम रिक्शा केवल पार्क के बाहर से ही लेना चाहते थे. मुझे पता था कि सरकार द्वारा लाइसेंस शुदा रिक्शे केवल पार्क के बाहर से ही मिलते हैं. लेकिन बाद में पता चला कि यहां 123 रिक्शे वालों का ग्रुप है जो तीन भागों में बंटा हुआ है. एक ग्रुप पार्क के बाहर, एक पार्क के अंदर चैक पोस्ट पर और एक ग्रुप पार्क के बाहर बने होटलों पर सैलानीयों का इंतजार करता है. अपने रिक्शे चालक राजू और इन्दर से पूछने पर पता चला की इनकी कार्य प्रणाली बहुत ही साधारण है. ये सुबह पांच बजे पार्क के गेट पर इक्ठ्ठा होते हैं और 1 से लेकर 123 नम्बर तक की पर्चीयां बनाते हैं. जिसके हिस्से जो पर्ची आती है बस वही उसका नम्बर होता है.

राजू और ईन्दर हमें लेकर पार्क में चल दिये. यहाँ बीडी-सिगरेट पीने पर सख्त मनाही है. बीडी-सिगरेटे से जंगल में आग का खतरा बना रहता है. लेकिन फिर भी कुछ लोग ईधर-उधर छुप कर सिगरेट पी रहे थे. राजू और ईन्दर हमें बार-बार दूरबीन किराये पर दिलवाने की जिद कर रहे थे. लेकिन हमने साफ मना कर दिया.

बातों-बातों में पता चला कि ईन्दर दिल्ली में मेरे घर के पास त्रिलोक पुरी का रहने वाला था. और 84 के दंगों में परिवार के साथ यहाँ आ गया था. ये पता चलने के बाद ईन्दर ने हमें अपने रिक्शे में रखी गयी दूरबीन फ्री में दे दी. दोनों रिक्शे वालों ने हमें बताया कि उनकी यहाँ ट्रेनिंग होती है और उन्हें ईंग्लिश के साथ-साथ बहुत सी यूरोपीयन भाषाओं की जानकारी भी दी जाती है. उन्होंने हमें ईंग्लिश, जर्मनी, स्पैनिश, जापानी आदि भाषाओं में बहुत सी बातें बोल कर भी बताईं. सुनने में यह सब अच्छा लग रहा था. लेकिन बाहर के सैलानीयों से टिप लेने का ये अच्छा साधन है. यहाँ एक बात और देखी कि लोकल टूरिस्ट के आने पर रिक्शे वाले ज्यादा खुश नहीं होते. क्योंकि उन्हें उनसे टिप नहीं मिलती.

बहुत प्यास लगी है
बहुत प्यास लगी है
बन्दर फोन की तार ठीक कर रहा है
बन्दर फोन की तार ठीक कर रहा है

राजू और ईन्दर ने हमें पार्क में एक मन्दिर भी दिखाया. उस मन्दिर में हमें एक तालाब में बहुत बडे-बडे कछुए दिखे उन्हें हमने आटे की बडी-बडी गोलीयाँ भी खिलायीं. वो कछुए बिल्कुल आदमखोर लग रहे थे. मन्दिर के पुजारी ने हमें बताया कि एक बार एक नील गाय इस तालाब में गिर गयी तो ये कछुए आधे घंटे में उसे चट कर गये.

कछुए
कछुए
आदमखोर कछुए
आदमखोर कछुए
पार्क में सूर्यास्त
पार्क में सूर्यास्त

शाम को करीब सात बजे तक हम पार्क घूम चुके थे. वापस आते समय रास्ते में हमें दो सियार भी दिखे. राजू और ईन्दर ने हमें होटल छोडा दिया. हमने उन्हें रू. 600/- दिये जिसमें रिक्शे का किराया और टिप भी शामिल थी.

Raju aur Inder Bharatpur
Raju aur Inder Bharatpur

अगले दिन हम भरतपुर के लोहागढ किले को देखने गये. यह किला भरतपुर जाट शासकों द्वारा निर्मित किया गया था. दुनिया में यह किला अभी तक अभेद है. इसे अभी तक जीता नहीं जा सका है. इस किले में एक म्यूसियम भी है जिसमें जाट शासकों के चित्र, पांडुलिपी, हथियार बंदूकें आदि रखीं हैं.

करीब चार बजे हम वापिस होटल पहुँच चुके थे. होटल आते ही हमें वापसी की टिकीट बुक करवानी थी. होटल में इंटरनैट की सुविधा नहीं थी और आस-पास कोई साईबर कैफे भी नहीं मिला. तब हमने दिल्ली के एक मित्र को फोन करके कोटा जनशताब्दी 2059 (अब 12059) में तीन सीट बुक करवादी. और बडी मुश्किल से एक साईबर कैफे से टिकीट का प्रिंट निकाला.

अब वापसी कि चिंता खत्म थी. शाम को किसी ने हमें बताया कि पास में ही दशहरा-मेला लगा हुआ है. हमने एक ट्रैक्टर रोका और बिना पूछे ही उस पर चढ गये. उसने हमें बताया कि वो भी मेले में ही जा रहा है. बस सुनकर मजा आ गया. मेले में सबसे पहले हम पहुँचे मौत का कुँआ देखने. हालत खराब हो गयी. कितना रिस्क है उसमें. लेकिन रोजी-रोटी के लिये लोग सब कुछ करते हैं.

आप मेले की कुछ फोटो देखीये.

ट्रैक्टर की फ्री सवारी
ट्रैक्टर की फ्री सवारी
दशहरा मेला भरतपुर
दशहरा मेला भरतपुर
मेले में भी खजला ही खजला था
मेले में भी खजला ही खजला था
दशहरा मेला भरतपुर
दशहरा मेला भरतपुर
मेले का मजा
मेले का मजा

अगले दिन हमने कोटा जनशताब्दी पकडी जो करीब डेढ घंटा लेटे थी. जन शताब्दी में पहली बार सफर किया था मुझे अच्छा लगा. लेकिन वहाँ हिजडे लोगों से खुले आम पैसे मांग रहे थे. लेकिन हम लोगों ने उन्हें पैसे नहीं दिये. हालांकि उन्होंने बहुत कोशिश की लेकिन हम सख्ती से पेश आये और उनकी दाल नहीं गलने दी. करीब डेढ बजे हम निजामुद्दीन पहुँच चुके थे.

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क्रोध से नुकसान

अहं नामक व्यक्ति को बहुत गुस्सा आता था। वह जरा – जरा सी बात पर क्रोधित हो जाता था। वह उच्च शिक्षित और उच्च पद पर आसीन था। उसके क्रोध को देखकर एक सज्जन ने उसे सुदर्शन नामक ऋषि के आश्रम में जाने को कहा। अहं ने उस सज्जन की यह बात सुनते ही उसे गुस्से से घूरा और बोला , ‘मैं क्या पागल हूं जो सदुर्शन ऋ षि के आश्रम में जाऊं?

मैं तो सर्वश्रेष्ठ हूं और मेरे आगे कोई कुछ नहीं है। ‘ उसकी इस बात को सुनकर सज्जन वहां से चला गया। धीरे – धीरे सभी अहं से दूर – दूर रहने लगे। उसे भी इस बात का अहसास हो गया था। एक दिन वह बेहद क्रोध में सुदर्शन ऋ षि के आश्रम में जा पहुंचा। सुदर्शन ऋषि ने अहं के क्रोध के बारे में सुन रखा था। उन्होंने उसके क्रोध को दूर करने की मन में ठानी। वह जानबूझकर बोले , ‘ कहो नौजवान कैसे हो ? तुम्हें देखकर तो प्रतीत होता है कि तुममें दुर्गुण ही दुर्गुण भरे हुए हैं। ‘

सुदर्शन ऋषि की बात सुनकर अहं को बेहद क्रोध आया । क्रोध में उसकी मुट्ठियां भिंच गईं और वह दांत पीसते हुए सुदर्शन ऋ षि के साथ सबको अनाप – शनाप बकने लगा। क्रोध में उसकी उल्टी – सीधी बातें सुनकर आश्रम में अनेक लोग एकत्रित हो गए किंतु किसी ने भी उसे कुछ नहीं कहा । बोल – बोलकर जब वह थक गया तो चुपचाप नीचे बैठ गया।

बेवजह क्रोध में बोलकर उसका सिर दर्द हो गया था और गला भी सूख गया था। उसकी ऐसी स्थिति देखकर सुदर्शन ऋ षि बोले ,’ कहो नौजवान क्त्रोध ने तुम्हारे सिवाय किसी और का अहित किया है। सभी दुर्गुण पहले स्वयं को विनाश के कगार पर लेकर आते हैं। तुम्हारे क्रोध ने तुमको सबसे दूर कर दिया है जबकि तुम अत्यंत ज्ञानी एवं शिक्षित व्यक्ति हो। ‘ ऋ षि की सारी बातें अहं ने सुनी और उसे अपनी गलती का पश्चाताप् हुआ। उसने उसी दिन से अपने व्यक्तित्व में से क्रोध को दूर करने का निश्चय कर लिया।

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अमरत्व का फल

एक दिन एक किसान बुद्ध के पास आया और बोला, ‘महाराज, मैं एक साधारण किसान हूं। बीज बोकर, हल चला कर अनाज उत्पन्न करता हूं और तब उसे ग्रहण करता हूं । किंतु इससे मेरे मन को तसल्ली नहीं मिलती। मैं कुछ ऐसा करना चाहता हूं जिससे मेरे खेत में अमरत्व के फल उत्पन्न हों। आप मुझे मार्गदर्शन दीजिए जिससे मेरे खेत में अमरत्व के फल उत्पन्न होने लगें।’

बात सुनकर बुद्ध मुस्कराकर बोले, ‘भले व्यक्ति, तुम्हें अमरत्व का फल तो अवश्य मिल सकता है किंतु इसके लिए तुम्हें खेत में बीज न बोकर अपने मन में बीज बोने होंगे?’ यह सुनकर किसान हैरानी से बोला, ‘प्रभु, आप यह क्या कह रहे हैं? भला मन के बीज बोकर भी फल प्राप्त हो सकते हैं।’

बुद्ध बोले, ‘बिल्कुल हो सकते हैं और इन बीजों से तुम्हें जो फल प्राप्त होंगे वे वाकई साधारण न होकर अद्भुत होंगे जो तुम्हारे जीवन को भी सफल बनाएंगे और तुम्हें नेकी की राह दिखाएंगे।’ किसान ने कहा , ‘प्रभु, तब तो मुझे अवश्य बताइए कि मैं मन में बीज कैसे बोऊं?’ बुद्ध बोले, ‘तुम मन में विश्वास के बीज बोओ, विवेक का हल चलाओ, ज्ञान के जल से उसे सींचो और उसमें नम्रता का उर्वरक डालो। इससे तुम्हें अमरत्व का फल प्राप्त होगा। उसे खाकर तुम्हारे सारे दु:ख दूर हो जाएंगे और तुम्हें असीम शांति का अनुभव होगा।’ बुद्ध से अमरत्व के फल की प्राप्ति की बात सुनकर किसान की आंखें खुल गईं। वह समझ गया कि अमरत्व का फल सद्विचारों के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।

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गुरु का संदेश

छत्रपति शिवाजी ने अपने पराक्रम से अनेक लड़ाइयां जीतीं। इससे उनके मन में थोड़ा अभिमान आ गया। उन्हें लगता था कि उनके जैसा वीर धरती पर और कोई नहीं है। कई बार उनका यह अभिमान औरों के सामने भी झलक पड़ता। एक दिन शिवाजी के महल में उनके गुरु समर्थ रामदास पधारे। शिवाजी वैसे तो रामदास का काफी आदर करते थे लेकिन उनके सामने भी उनका अभिमान व्यक्त हो ही गया, ‘गुरुजी अब मैं लाखों लोगों का रक्षक और पालक हूं। मुझे उनके सुख-दुख और भोजन-वस्त्र आदि की काफी चिंता करनी पड़ती है।’

रामदास समझ गए कि उनके शिष्य के मन में राजा होने का अभिमान हो गया है। इस अभिमान को तोड़ने के लिए उन्होंने एक तरकीब सोची। शाम को शिवाजी के साथ भ्रमण करते हुए रामदास ने अचानक उन्हें एक बड़ा पत्थर दिखाते हुए कहा, ‘शिवा, जरा इस पत्थर को तोड़कर तो देखो।’ शिवाजी ने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए तत्काल वह पत्थर तोड़ डाला। किंतु यह क्या, पत्थर के बीच से एक जीवित मेंढक एक पतंगे को मुंह में दबाए बैठा था।

इसे देखकर शिवाजी चकित रह गए। समर्थ रामदास ने पूछा, ‘पत्थर के बीच बैठे इस मेंढक को कौन हवा-पानी दे रहा है? इसका पालक कौन है? कहीं इसके पालन की जिम्मेदारी भी तुम्हारे कंधों पर तो नहीं आ पड़ी है?’ शिवाजी गुरु की बात का मर्म समझकर लज्जित हो गए। गुरु ने उन्हें समझाया, ‘पालक तो सबका एक ही है और वह परम पिता परमेश्वर। हम-तुम तो माध्यम भर हैं। इसलिए उस पर विश्वास रखकर कार्य करो। तुम्हें सफलता अवश्य मिलेगी।’

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कर्त्तव्य की भावना

यह काफी पुरानी घटना है। मद्रास प्रांत के एक स्टेशन के निकट एक पॉइंटमैन अपना पॉइंट (वह उपकरण जिससे गाड़ियों का ट्रैक बदला जाता है) पकड़े खड़ा था। दोनों ओर से दो गाड़ियां अपनी पूरी गति से दौड़ी चली आ रही थीं। उस दिन मौसम खराब था और वह आंधी-तूफान का संकेत दे रहा था। ऐसे भयावह मौसम में रोशनी के भी भरपूर साधन नहीं थे। पॉइंटमैन अपने काम के लिए मुस्तैदी से तैयार था। तभी उसे अपने पैरों पर कुछ रेंगता हुआ महसूस हुआ। उसने देखा तो दंग रह गया। एक सांप उसके पैरों से लिपट रहा था। पॉइंट उसके हाथ में था।

डर के कारण उसकी घिग्घी बंध गई। किंतु तभी उसने सोचा कि यदि वह पॉइंट हाथ से छोड़ देगा तो ऐसे में दोनों गाडि़यां परस्पर भिड़ जाएंगी और असंख्य लोगों की मृत्यु हो जाएगी। सांप के काटने से तो अकेले सिर्फ उसकी जान जाएगी लेकिन असंख्य लोगों की जान बच जाएगी। कम से कम मरते-मरते वह असंख्य लोगों की जान बचाने का पुण्य तो अजिर्त कर ही लेगा। यह सोचकर वह बिना हिला-डुले पॉइंट को पकड़े खड़ा रहा। कुछ ही देर में दोनों रेलगाडि़यों की घड़घड़ाहट तेज हुई और रेलगाडि़यां आराम से पॉइंट मैन के द्वारा पकड़े गए पॉइंट की सहायता से अलग-अलग ट्रैक पर निकल गईं। उधर सांप रेलगाडि़यों की घड़घड़ाहट सुनकर पॉइंटमैन का पैर छोड़कर चला गया। रेलगाडि़यों के जाने के बाद जब पॉइंटमैन का ध्यान अपने पैरों की ओर गया तो वह यह देखकर दंग रह गया कि वहां कुछ न था।

यह देखकर उसके मन से स्वत: ही निकला, ‘सच ही है, जो इंसान सच्चे मन से लोगों की मदद करते हैं उनकी सहायता ईश्वर स्वयं करते हैं। ‘बाद में जब इस घटना का पता अधिकारियों को चला तो उन्होंने न सिर्फ पॉइंट मैन को शाबासी दी अपितु उसे पुरस्कार देकर सम्मानित भी किया।

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किताबी ज्ञान

पुराने जमाने की बात है। एक व्यक्ति अध्ययन करने काशी गया। विभिन्न शास्त्रों की जानकारी प्राप्त करने में उसे बारह वर्ष लग गए। जब वह लौटा तो घर के लोग काफी प्रसन्न हुए। पत्नी ने उसके स्नान के लिए गर्म पानी तैयार किया। वह उस बर्तन को लेकर स्नान गृह गई। उसने देखा कि वहां हजारों चींटियां हैं। उसने सोचा कि कहीं वे बेचारी बेमौत न मर जाएं, इसलिए उसने गर्म पानी के बर्तन को दूसरे स्थान पर रख दिया। पति आया और बर्तन को उठाकर फिर पहले वाले स्थान पर ले गया और वहीं स्नान करने लगा।

पत्नी ने देखा तो वह परेशान हो गई। उसने कहा, ‘मैंने गर्म पानी का यह बर्तन वहां रखा था, यहां कैसे आ गया?’ पति ने कहा, ‘तुम भी अजीब बात करती हो। स्नान का स्थान यही है। मैं यहीं नहाऊंगा न। मैं ही उस बर्तन को यहां उठा लाया।’ इस पर पत्नी बोली, ‘मैं भी पहले यहीं रखना चाह रही थी, लेकिन यहां चींटियां बहुत हैं।

आपके स्नान के पानी से वे सब मर जाएंगी। इसलिए मैंने इसे दूसरे स्थान पर रखा था।’ पति बोला, ‘यह तो अजीब मूर्खतापूर्ण बात है। क्या मैं चींटियों को जिलाने के लिए ही जनमा हूं? अगर मैं इसी तरह हर किसी की चिंता करता रहा तो जीना मुश्किल हो जाएगा।’ इस बात से पत्नी दुखी हो गई। उसने कहा, ‘बारह वर्ष तक आपने विद्याध्ययन किया। काशी में रहे। लेकिन समझ में नहीं आता कि आपने क्या हासिल किया। ऐसे किताबी ज्ञान से क्या लाभ, जो आपके भीतर संवेदना न पैदा कर सके। क्या आप इतना भी नहीं समझ सके कि किसी प्राणी को अकारण पीड़ा नहीं पहुंचानी चाहिए। ज्ञान का सार तो संवेदनशीलता है। यदि हमारे मन में दूसरों के प्रति सहानुभूति नहीं जागी तो बहुत बड़ा बौद्धिक ज्ञान भी उपयोगी नहीं है।’ यह सुनकर पति लज्जित हो गया और वहां से निकलकर दूसरी जगह नहाने लगा।

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मनुष्यता का पाठ

यह घटना उस समय की है, जब क्रांतिकारी रोशन सिंह को काकोरी कांड में मृत्युदंड दिया गया। उनके शहीद होते ही उनके परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। घर में एक जवान बेटी थी और उसके लिए वर की तलाश चल रही थी। बड़ी मुश्किल से एक जगह बात पक्की हो गई। कन्या का रिश्ता तय होते देखकर वहां के दरोगा ने लड़के वालों को धमकाया और कहा कि क्रांतिकारी की कन्या से विवाह करना राजद्रोह समझा जाएगा और इसके लिए सजा भी हो सकती है।

किंतु वर पक्ष वाले दरोगा की धमकियों से नहीं डरे और बोले, ‘यह तो हमारा सौभाग्य होगा कि ऐसी कन्या के कदम हमारे घर पड़ेंगे, जिसके पिता ने अपना शीश भारत माता के चरणों पर रख दिया।’ वर पक्ष का दृढ़ इरादा देखकर दरोगा वहां से चला आया पर किसी भी तरह इस रिश्ते को तोड़ने के प्रयास करने लगा।

जब एक पत्रिका के संपादक को यह पता लगा तो वह आगबबूला हो गए और तुरंत उस दरोगा के पास पहुंचकर बोले, ‘मनुष्य होकर जो मनुष्यता ही न जाने वह भला क्या मनुष्य? तुम जैसे लोग बुरे कर्म कर अपना जीवन सफल मानते हैं किंतु यह नहीं सोचते कि तुमने इन कर्मों से अपने आगे के लिए इतने कांटे बो दिए हैं जिन्हें अभी से उखाड़ना भी शुरू करो तो अपने अंत तक न उखाड़ पाओ। अगर किसी को कुछ दे नहीं सकते तो उससे छीनने का प्रयास भी न करो।’ संपादक की खरी-खोटी बातों ने दरोगा की आंखें खोल दीं और उसने न सिर्फ कन्या की मां से माफी मांगी, अपितु विवाह का सारा खर्च भी खुद वहन करने को तैयार हो गया।

विवाह की तैयारियां होने लगीं। कन्यादान के समय जब वधू के पिता का सवाल उठा तो वह संपादक उठे और बोले, ‘रोशन सिंह के न होने पर मैं कन्या का पिता हूं। कन्यादान मैं करूंगा।’ वह संपादक थे- महान स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी

संकलन: रेनू सैनी
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

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विश्वास की रक्षा

बात तब की है जब अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल पकड़ लिए गए। उन्हें कोतवाली लाया गया। कोतवाली में निगरानी रखने वाला सिपाही सो रहा था। बिस्मिल के पास भागने का पूरा मौका था। उन्होंने देखा कि वहां केवल बुजुर्ग मुंशीजी जागे हुए हैं। बूढ़े मुंशी ने भांप लिया कि बिस्मिल भागने की सोच रहे हैं। वह तुरंत बिस्मिल के पैरों पर गिर गए और बोले, ‘ऐसा न करना। नहीं तो मैं बंदी बना लिया जाऊंगा और मेरे बच्चे भूखों मर जाएंगे।’

बिस्मिल को उन पर दया आ गई और उन्होंने भागने का विचार तत्काल त्याग दिया। संयोगवश दो दिनों के बाद ही ऐसा मौका उन्हें फिर मिला। उन्हें जब शौचालय ले जाया गया तो उनके साथ दो सिपाही थे। एक ने दूसरे से कहा कि इनके हाथों में बंधी रस्सियां हटा दो। मुझे विश्वास है कि ये भागेंगे नहीं। इसके बाद जब बिस्मिल शौचालय गए तो पाया कि शौचालय की दीवार ज्यादा ऊंची नहीं है। बस हाथ बढ़ाते ही वह दीवार के ऊपर हो जाते और क्षण भर में बाहर निकल जाते।

उन्होंने देखा कि बाहर सिपाही कुश्ती देखने में मगन हैं। वह भागने ही वाले थे कि उन्हें विचार आया कि जिस सिपाही ने विश्वास कर इतनी स्वतंत्रता दी उससे विश्वासघात कैसे करूं। उन्होंने भागने का विचार तुरंत त्याग दिया। उन्होंने अपनी आत्मकथा में जेलर पंडित चंपालाल की भी काफी बड़ाई की है। उन्हें भागने के कई मौके हासिल हुए लेकिन उन्होंने सोचा कि इससे पंडित चंपालाल के ऊपर आफत आ जाएगी। बिस्मिल के लिए विश्वास की रक्षा सबसे बड़ी चीज थी।

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महारानी का हार

 एक बार वीरगढ़ राज्य की महारानी का हार कहीं खो गया। महारानी को हार बहुत प्रिय था। उन्होंने हार ढूंढने की बहुत कोशिश की पर वह नहीं मिला। हार के लिए महारानी को बहुत परेशान देखकर राजा ने घोषणा करवा दी कि जिस व्यक्ति को भी हार मिला हो, वह तीन दिनों के भीतर उसे वापस कर दे अन्यथा उसे मृत्युदंड का भागी होना पड़ेगा।

यह संयोग था कि हार एक संन्यासी को मिला था। उसके मन में हार के प्रति कोई आकर्षण नहीं था, फिर भी उसने यह सोचकर रख लिया कि कोई ढूंढता हुआ आएगा तो उसे दे देगा। उसने अगले दिन राजा की घोषणा सुनी, पर वह हार देने नहीं गया। वह अपनी साधना में लीन रहा। तीन दिन बीत गए।

चौथे दिन संन्यासी हार लेकर राजा के पास पहुंचा। राजा को जब पता चला कि तीन दिनों से हार उसके पास था, तो उसने क्रोधित होकर पूछा, ‘क्या तुमने मेरी घोषणा नहीं सुनी थी?’ संन्यासी ने जवाब दिया ‘सुनी थी, पर यदि मैं कल हार लौटाने आ जाता तो लोग कहते कि एक संन्यासी होकर मृत्यु से भयभीत हो गया।’ इस पर राजा ने पूछा, ‘तो आज चौथे दिन क्यों लाए?’ इस पर संन्यासी ने कहा, ‘मुझे मौत का भय नहीं है। पर मैं किसी दूसरे की संपत्ति को अपने पास रखना पाप समझता हूं। हार जैसी तुच्छ चीज से मुझे कोई लगाव नहीं।’ यह उत्तर सुनकर राजा लज्जित हो गया। महारानी को भी अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने हार बेचकर वह राशि गरीबों में बंटवा दी।

संकलन: लखविन्दर सिंह
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

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संपूर्ण सुंदरता

एक बार कुदरत के सातों रंगों के बीच बहस छिड़ गई। प्रत्येक रंग यह साबित करने में लगा था कि वही सब से श्रेष्ठ है। सबसे पहले हरे रंग ने कहा कि वह जीवन और हरियाली का प्रतीक है, इसलिए ईश्वर ने उसका चयन खास तौर पर पत्तों के रंग के लिए किया है।

धरती का एक बड़ा भाग हरियाली से ढका हुआ है। नीले रंग ने उसकी बात काटते हुए कहा, ‘आकाश व समुद का रंग नीला है। जल ही जीवन है। नीला जल नीले आकाश के बादलों से होकर नीले समुद्र में समा जाता है। बिना इस चक्र के विकास संभव नहीं, इसलिए मैं तुम सबसे श्रेष्ठ हूं।’

तब पीला रंग बोला, ‘पीला खुशहाली का प्रतीक है। सूरज पीला है। पीली सूरजमुखी सारी दुनिया में हंसी व खुशी देती है। इसलिए मैं ही सर्वश्रेष्ठ स्थान का अधिकारी हूं।’ तभी नारंगी रंग ने कहा, ‘मैं मिठास और स्वास्थ्य का प्रतीक हूं। सभी मीठे व लाभकारी फलों पपीता, गाजर, आम व संतरा की छटा नारंगी है।’ तभी जामुनी रंग ने कहा, ‘श्रेष्ठ तो मैं हूं क्योंकि मैं पानी की गहराई व मन की शांति का प्रतीक हूं।’

वर्षा ऋतु रंगों की इस सारी बहस को ध्यान से सुन रही थी। वह पास आकर बोली, ‘तुम सभी श्रेष्ठ हो। सभी को ईश्वर ने किसी न किसी खास कारण से बनाया है। लेकिन सर्वश्रेष्ठ है तुम सबका एक साथ होना। रंगों को यह उपदेश जैसी बात अच्छी नहीं लगी, वे तो सिर्फ अपनी तारीफ सुनना चाहते थे। तभी आकाश में जोर से बिजली कड़की। सभी रंगों ने डर कर एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया और आकाश में बड़ा-सा इंद्रधनुष दिखाई देने लगा। रंगों ने देखा, सभी उनकी छटा निहार रहे थे। वर्षा ऋतु ने हंस कर समझाया, ‘तुम सबके अलग-अलग प्रशंसक हैं, लेकिन तुम्हारा एक साथ होना संपूर्ण जगत के लिए सुंदरता और जीवन का संदेश है।’ इसके बाद रंगों ने कभी एक-दूसरे से झगड़ा नहीं किया।

संकलन : अनामिका कौशिक
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

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