Tag Archives: राजा

मुनि की क्षमाशीलता

एक बार राजा श्रोणिक शिकार करने जंगल में गए। वहां उन्हें यशोधर मुनि तपस्या करते हुए दिखे। राजा को लगा कि उनकी वजह से उन्हें शिकार करने को नहीं मिलेगा। तभी सामने एक लंबा सांप आता दिखाई दिया। राजा ने गुस्से में उस सांप की गर्दन काट कर सांप को मुनि के गले में डाल दिया और महल लौट आए। जब उन्होंने रानी चेलना से इस घटना का जिक्र किया तो वह बहुत दुखी हुईं और बोलीं, ‘यह तो आपने बहुत गलत काम किया है।’

रानी उन्हें साथ लेकर वहां पहुंचीं जहां, मुनि तपस्या कर रहे थे। उस मरे हुए सांप की वजह से ढेर सारी चींटियां मुनि के शरीर पर चढ़ गईं थीं। रानी ने नीचे जमीन पर चीनी डाल दी, तो धीरे-धीरे सारी चींटियां नीचे उतर आईं। फिर उन्होंने उस मरे हुए सांप को दूर फेंका और शरीर को आहिस्ता-आहिस्ता स्वच्छ करके वहां चंदन का तेल लगा दिया, जहां पर चींटियों ने काट लिया था।

फिर राजा-रानी हाथ जोड़कर खड़े हो गए। मुनि ने आंखें खोलीं और पहले राजा श्रेणिक और फिर रानी चेलना को आशीर्वाद दिया। राजा श्रोणिक रोने लगे। उन्होंने साफ-साफ बता दिया कि उन्होंने मुनि के साथ क्या किया था। उन्होंने यह भी कहा कि वह आशीर्वाद के पात्र नहीं हैं, उसकी असल हकदार तो चेलना है। मुनि मुस्कराते हुए बोले, ‘चेलना तो है ही, पर तुम भी इसके पात्र हो क्योंकि तुमने अपनी गलती स्वीकार कर ली है।’

संकलन: ऋचा जैन
साभार: नवभारत टाइम्स

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अधिकार की रोटी

बहुत पुरानी बात है। एक राजा था। उसके पास एक दिन एक संत आए। उन्होंने कई विषयों पर चर्चा की। राजा और संत में कई प्रश्नों पर खुलकर बहस भी हुई। अचानक बातों ही बातों में संत ने अधिकार की रोटी की चर्चा की। राजा ने इसके बारे में विस्तार से जानना चाहा तो संत ने उसे एक बुढ़िया का पता दिया और कहा कि वही उसे इसकी सही जानकारी दे सकती है।

राजा तत्काल बुढ़िया की तलाश में राजमहल से निकल पड़ा। काफी देर ढूंढने के बाद वह बुढ़िया राजा को मिल गई। राजा बहुत खुश हुआ। वह दौड़ कर उसकी झोपड़ी में जा पहुंचा, जहां बैठी वह चरखा कात रही थी। राजा उसके सामने खड़ा हो गया और बोला, ‘माई , मैं एक विचित्र सवाल का जवाब खोज रहा हूं, क्या आप मेरी मदद करेंगी?’

बुढ़िया ने एकटक राजा को देखा फिर हां कर दी। राजा ने पूछा, ‘माई, अधिकार की रोटी क्या होती है? मैं आज आप से वही लेने आया हूं।’ बुढ़िया ने राजा को पहचान कर कहा, ‘मेरे पास एक रोटी है। उसमें आधी अधिकार की है और आधी बिना अधिकार की।’

राजा की समझ में कुछ नहीं आया। उसने आश्चर्य से बुढ़िया की ओर देखा और कहा, ‘यह आप क्या कह रही हैं। साफ-साफ बताएं।’ बुढ़िया बोली, ‘कल मैं यहां बैठी चरखा कात रही थी। दिन ढल गया था। अंधेरा फैल गया था। तभी सड़क पर एक जलूस आया। उसमें मशालें जल रही थीं। मैं अपना चिराग न जलाकर आधी सूत उन मशालों की रोशनी में कातती रही।

आधी पहले कात चुकी थी। उस सूत को बेच कर आटा खरीद लाई। आटे की रोटी बनाई। इस तरह आधी रोटी मेरे अधिकार की है और आधी बिना अधिकार की। उस पर मेरा नहीं, जुलूस वालों का अधिकार है।’ बुढ़िया की बात सुनकर राजा चकित रह गया। उसकी धर्म-बुद्धि पर उसका सिर झुक गया।

संकलन: विजय कुमार सिंह
साभार: नवभारत टाइम्स

राज्य की शोभा

एक राज्य का राजा बेहद कठोर और जिद्दी था। वह एक बार जो निर्णय ले लेता था, उसे बदलने को तैयार नहीं होता था। एक बार उसने प्रजा पर भारी कर लगाने की योजना मंत्रिमंडल के सामने रखी। मंत्रियों को यह प्रस्ताव अन्यायपूर्ण लगा। उसने इससे अपनी असहमति जताई। राजा क्रोधित हो उठा। उसने मंत्रिपरिषद को समाप्त करने का फैसला किया। यही नहीं, उसने सारे मंत्रियों के देश निकाले का आदेश दे दिया। मंत्री घबराए। वे समझ नहीं पा रहे थे कि इस स्थिति का सामना कैसे किया जाए।

तभी उन्हें विक्रम नाई की याद आई। वह राजा का प्रिय था। उसने पहले भी कई मौकों पर राजा का क्रोध शांत किया था। उसे बुलाया गया। मंत्रियों ने उसे सारी स्थिति समझाई और प्रार्थना की कि वह ऐसा कुछ करे जिससे राजा को सद्बुद्धि आए। विक्रम ने यह चुनौती स्वीकार कर ली। वह राजा के पास उनके नाखून काटने गया। राजा ने अपनी अंगुलियां आगे कर दीं।

विक्रम ने नखों पर गुलाब जल छिड़का और धीरे-धीरे नख काटने लगा। फिर उसने कहा, ‘महाराज, शरीर में इन नखों की आवश्यकता ही क्या है। वे बढ़ते रहते हैं और उन्हें बार-बार काटना पड़ता है। इनमें रोगों के कीटाणु भी रहते हैं। क्यों न इन्हें जड़ से उखाड़ कर फेंक दिया जाए?’

राजा ने मुस्कराते हुए कहा, ‘वो तो है, लेकिन इन्हें उखाड़कर मत फेंक देना। ये तो हाथ-पैरों की शोभा हैं। भले ही इनका अधिक उपयोग न हो, पर ये आभूषण तुल्य हैं।’ इस पर विक्रम ने कहा, ‘महाराज रोगों का घर होते हुए भी ये हाथ-पैरों की शोभा हैं। ठीक उसी तरह मंत्रिपरिषद राज्य की शोभा है। मंत्री भले ही आपके किसी कार्य का विरोध करें, पर आपकी शोभा उन्हीं से है।’

यह सुनते ही राजा की भृकुटी तन गई। विक्रम ने विनम्रतापूर्वक कहा, ‘राज्य की सेवा में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। उनके बगैर राज्य बिना नखों के हाथ की तरह हो जाएगा।’ राजा समझ गया। उसने अपना आदेश वापस लेकर मंत्रियों को फिर से उनका दायित्व सौंप दिया।

संकलन: त्रिलोक चंद्र जैन
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

परोपकार की भावना

पुराने जमाने की बात है। एक राजा ने दूसरे राजा के पास एक पत्र और सुरमे की एक छोटी सी डिबिया भेजी। पत्र में लिखा था कि जो सुरमा भिजवा रहा हूं, वह अत्यंत मूल्यवान है। इसे लगाने से अंधापन दूर हो जाता है। राजा सोच में पड़ गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि इसे किस-किस को दे। उसके राज्य में नेत्रहीनों की संख्या अच्छी-खासी थी, पर सुरमे की मात्रा बस इतनी थी जिससे दो आंखों की रोशनी लौट सके।

राजा इसे अपने किसी अत्यंत प्रिय व्यक्ति को देना चाहता था। तभी राजा को अचानक अपने एक वृद्ध मंत्री की स्मृति हो आई। वह मंत्री बहुत ही बुद्धिमान था, मगर आंखों की रोशनी चले जाने के कारण उसने राजकीय कामकाज से छुट्टी ले ली थी और घर पर ही रहता था। राजा ने सोचा कि अगर उसकी आंखों की ज्योति वापस आ गई तो उसे उस योग्य मंत्री की सेवाएं फिर से मिलने लगेंगी। राजा ने मंत्री को बुलवा भेजा और उसे सुरमे की डिबिया देते हुए कहा, ‘इस सुरमे को आंखों में डालें। आप पुन: देखने लग जाएंगे। ध्यान रहे यह केवल 2 आंखों के लिए है।’ मंत्री ने एक आंख में सुरमा डाला। उसकी रोशनी आ गई। उस आंख से मंत्री को सब कुछ दिखने लगा। फिर उसने बचा-खुचा सुरमा अपनी जीभ पर डाल लिया।

यह देखकर राजा चकित रह गया। उसने पूछा, ‘यह आपने क्या किया? अब तो आपकी एक ही आंख में रोशनी आ पाएगी। लोग आपको काना कहेंगे।’ मंत्री ने जवाब दिया, ‘राजन, चिंता न करें। मैं काना नहीं रहूंगा। मैं आंख वाला बनकर हजारों नेत्रहीनों को रोशनी दूंगा। मैंने चखकर यह जान लिया है कि सुरमा किस चीज से बना है। मैं अब स्वयं सुरमा बनाकर नेत्रहीनों को बांटूंगा।’

राजा ने मंत्री को गले लगा लिया और कहा, ‘यह हमारा सौभाग्य है कि मुझे आप जैसा मंत्री मिला। अगर हर राज्य के मंत्री आप जैसे हो जाएं तो किसी को कोई दुख नहीं होगा।’

संकलन: त्रिलोक चंद्र जैन
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

ईश्वर का प्रमाण

एक दिन एक राजा ने अपने सभासदों से कहा, ‘क्या तुम लोगों में कोई ईश्वर के होने का प्रमाण दे सकता है?’ सभासद सोचने लगे, अंत में एक मंत्री ने कहा, ‘महाराज, मैं कल इस प्रश्न का उत्तर लाने का प्रयास करूंगा।’ सभा समाप्त होने के बाद उत्तर की तलाश में वह मंत्री अपने गुरु के पास जा रहा था। रास्ते में उसे गुरुकुल का एक विद्यार्थी मिला। मंत्री को चिंतित देख उसने पूछा, ‘सब कुशल मंगल तो है? इतनी तेजी से कहां चले जा रहे हैं?’

मंत्री ने कहा, ‘गुरुजी से ईश्वर की उपस्थिति का प्रमाण पूछने जा रहा हूं।’ विद्यार्थी ने कहा, ‘इसके लिए गुरुजी को कष्ट देने की क्या आवश्यकता है ? इसका जवाब तो मैं ही दे दूंगा।’ अगले दिन मंत्री उस विद्यार्थी को लेकर राजसभा में उपस्थित हुआ और बोला, ‘महाराज यह विद्यार्थी आपके प्रश्न का उत्तर देगा।’ विद्यार्थी ने पीने के लिए एक कटोरा दूध मांगा। दूध मिलने पर वह उसमें उंगली डालकर खड़ा हो गया। थोड़ी-थोड़ी देर में वह उंगली निकालकर कुछ देखता, फिर उसे कटोरे में डालकर खड़ा हो जाता। जब काफी देर हो गई तो राजा नाराज होकर बोला, ‘दूध पीते क्यों नहीं? उसमें उंगली डालकर क्या देख रहे हो?’ विद्यार्थी ने कहा, ‘सुना है, दूध में मक्खन होता है, वही खोज रहा हूं।’ राजा ने कहा, ‘क्या इतना भी नहीं जानते कि दूध उबालकर उसे बिलोने से मक्खन मिलता है।’ विद्यार्थी ने मुस्कराकर कहा, ‘हे राजन, इसी तरह संसार में ईश्वर चारों ओर व्याप्त है, लेकिन वह मक्खन की भांति अदृश्य है। उसे तप से प्राप्त किया जाता है।’ राजा ने संतुष्ट होकर पूछा, ‘अच्छा बताओ कि ईश्वर करता क्या है?’

विद्यार्थी ने प्रश्न किया, ‘गुरु बनकर पूछ रहे हैं या शिष्य बनकर?’ राजा ने कहा, ‘शिष्य बनकर।’ विद्यार्थी बोला, ‘यह कौन सा आचरण है ? शिष्य सिंहासन पर है और गुरु जमीन पर।’ राजा ने झट विद्यार्थी को सिंहासन पर बिठा दिया और स्वयं नीचे खड़ा हो गया। तब विद्यार्थी बोला, ‘ईश्वर राजा को रंक और रंक को राजा बनाता है।’

संकलन: चतर सिंह ‘लुप्त’ पारसौली
साभार : नवभारत टाइम्स