Tag Archives: भगवान राम

गंगा का उद्गम – 3

अब तक आपने पढा

अलका और उर्वशी भगीरथ के तप को नहीं तोड पायीं। दोनों हारीं और लौट गई। उनके लौटते ही ब्रह्मा पसीज गये। वह सामने आये और बोले, “बेटा, वर मांगो! वर मांगो!”

अब आगे पढिये –

भागीरथ ने ब्रह्माजी को प्रणाम किया और बोले, “यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो गंगाजी को धरती पर भेजिये।”

भागीरथ की बात सुनकर ब्रह्माजी ने क्षणभर सोचा, फिर बोले, “ऐसा ही होगा, भगीरथ।”

ब्रह्माजी के मुंह से यह वचन निकले कि उनके हाथ का कमण्डल बड़े जोर से कांपने लगा। ऐसा लगता था जैसे कि वह फटकर टुकड़े-टुकड़े हो जायगा।

थोड़ी देर बाद उसमें से एक स्वर सुनाई दिया, “ब्रह्मा, ये तुमने क्या किया? तुमने भागीरथ को क्या वर दे डाला?”

ब्रह्मा बोले, “मैंने ठीक ही किया है, गंगा!”

गंगा चौंकीं। बोलीं, “तुम मुझे धरती पर भेजना चाहते हो और कहते हो कि तुमने ठीक ही किया है!”

“हां, देवी!” ब्रह्मा ने कहा।

“कैसे?” गंगा ने पूछा।

ब्रह्मा ने बताया, “देवी, आप संसार का दु:ख दूर करने के लिए पैदा हुई हैं। आप अभी मेरे कमण्डल में बैठी हैं। अपना काम नहीं कर रही हैं।”

गंगा ने कहा, “ब्रह्मा, धरती पर पापी रहते है, पाखंडी रहते हैं, पतित रहते हैं। तुम मुझे उन सबके बीच भेजना चाहते हो! बताओ, मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?”

ब्रह्मा बोले, “देवी, आप बुरे को भला बनाने के लिए बनी हैं। पापी को उबारने के लिए बनी हैं। पाखंड मिटाने के लिए बनी हैं। पतित को तारने के लिए बनी हैं। कमजोरों को सहारा देने के लिए बनी हैं और नीचों को उठाने के लिए बनी हैं।”

गंगा ने कहा, “ब्रह्मा!”

ब्रह्मा बोले, “देवी, बुरों की भलाई करने के लिए तुमकों बुरों के बीच रहना होगा। पापियों को उबारने के लिए पापियों के बीच रहना होगा। पाखंड को मिटाने के लिए पाखंड के बीच रहना होगा। पतितों को तारने के लिए पतितों के बीच रहना होगा। कमजोरों को सहारा देने के लिए कमजोरों के बीच रहना होगा और नीचों को उठाने के लिए नीचों के बीच निवास करना होगा। तुम अपने धरम को पहचानो, अपने करम को जानो।”

गंगा थोड़ी देर चुप रहीं। फिर बोलीं, “ब्रह्मा, तुमने मेरी आंखें खोल दी हैं। मैं धरती पर जाने को तैयार हूं। पर धरती पर मुझे संभालेगा कौन?”

ब्रह्मा ने भगीरथ की ओर देखा।

भगीरथ ने उनसे पूछा, “आप ही बताइये।”

ब्रह्मा बोले, “तुम भगवान शिव को प्रसन्न करो। यदि वह तैयार हो गये तो गंगा को संभाल लेंगे और गंगा धरती पर उतर आयंगी।”

ब्रह्मा उपाय बताकर चले गये। भगीरथ अब शिव को रिझाने के लिए तप करने लगे।

भगवान शिव को कौन नहीं जानता? गांव-गांव में उनके शिवाले हैं, वह भोले बाबा हैं। उनके हाथ में त्रिशूल है, सिर पर जटा है, माथे पर चांद है। गले में सांप हैं। शरीर पर भभूत है। वह शंकर हैं। महादेव हैं। औढर-दानी है। वह सदा देते रहते है। और सोचते रहते हैं कि लोग और मांगें तो और दें। भगीरथ ने बड़े भक्ति भाव वे विनती की। हिमालय के कैलास पर निवास करने वाले शंकर रीझ गये। भगीरथ के सामने आये और अपना डमरु खड़-खड़ाकर बोले, “मांग बेटा, क्या मांगता है?”

भगीरथ बोले, “भगवान, शंकर की जय हो! गंगा मैया धरती पर उतरना चाहती हैं, भगवन! कहती हैं…..”

शिव ने भगीरथ को आगे नहीं बोलने दिया। वह बोले, “भगीरथ, तुमने बहुत बड़ा काम किया है। मैं सब बातें जानता हूं। तुम गंगा से विनती करो कि वह धरती पर उतरें। मैं उनको अपने माथे पर धारण करुंगा।”

भगीरथ ने आंखें ऊपर उठाई, हाथ जोड़े और गंगाजी से कहने लगे, “मां, धरती पर आइये। मां, धरती पर आइये। भगवान शिव आपको संभाल लेंगे।”

भगीरथ गंगाजी की विनती में लगे और उधर भगवान शिव गंगा को संभालने की तैयार करने लगे।

गंगा ने ऊपर से देखा कि धरती पर शिव खड़े हैं। देखने में वह छोटे से लगते हैं। बहुत छोटे से। वह मुस्कराई। यह शिव और मुझे संभालेंगे? मेरे वेग को संभालेंगे? मेरे तेज को संभालेंगे? इनका इतना साहस? मैं इनको बता दूंगी कि गंगा को संभालना सरल काम नहीं है।

भगीरथ ने विनती की। शिव होशियार हुए और गंगा आकाश से टूट पड़ीं। गंगा उतरीं तो आकाश सफेदी से भर गया। पानी की फहारों से भर गया। रंग-बिरंग बादलों से भर गया। गंगा उतरीं तो आकाश में शोर हुआ। घनघोर हुआ, ऐसा कि लाखों-करोड़ों बादल एक साथ आ गये हों, लाखों-करोड़ों तूफान एक साथ गरज उठे हों। गंगा उतरीं तो ऐसी उतरीं कि जैसे आकाश से तारा गिरा हो, अंगारा गिरा हो, बिजली गिरी हो। उनकी कड़क से आसमान कांपने लगा। दिशाएं थरथराने लगी। पहाड़ हिलने लगे और धरती डगमगाने लगी। गंगा उतरीं तो देवता डर गये। काम थम गये। सबने नाक-कान बंद कर लिये और दांतों तले उंगली दबा ली। गंगा उतरीं तो भगीरथ की आंखें बंद हो गई। वह शांत रहे। भगवान का नाम जपते रहे। थोड़ी देर में धरती का हिलना बंद हो गया। कड़क शांत हो गई और आकाश की सफेदी गायब हो गई।

भगीरथ ने भोले भगवान की जटाओं में गंगाजी के लहराने का सुर सुना। भगीरथ को ज्ञान हुआ कि गंगाजी शिव की जटा में फंस गई हैं। वह उमड़ती हैं। उसमें से निकलने की राह खोजती हैं, पर राह मिलती नहीं है। गंगाजी घुमड़-घुमड़कर रह जाती हैं। बाहर नहीं निकल पातीं।

भगीरथ समझ गये। वह जान गये कि गंगाजी भोले बाबा की जटा में कैद हो गई है। भगीरथ ने भोले बाबा को देखा। वह शांत खड़े थे। भगीरथ ने उनके आगे घुटने टेके और हाथ जोड़कर बैठ गये और बोले, “हे कैलाश के वासी, आपकी जय हो! आपकी जय हो! आप मेरी विनती मानिये और गंगाजी को छोड़ दीजिये!”

भगीरथ ने बहुत विनती की तो शिव शंकर रीझ गये। उनकी आंखें चमक उठीं। हाथ से जटा को झटका दिया तो पानी की एक बूंद धरती पर गिर पड़ी।

बूंद धरती पर शिलाओं के बीच गिरी, फूली और धारा बन गई। वह उमड़ी और बह निकली। उसमें से कलकल का स्वर निकलने लगा। उसकी लहरें उमंग-उमंगकर किनारों को छूने लगीं। गंगा धरती पर आ गई। भगीरथ ने जोर से कहा, “गंगामाई की जय!”

गंगामाई ने कहा, “भगीरथ, रथ पर बैठो और मेरे आगे-आगे चलो।”

भगीरथ रथ पर बैठे। आगे-आगे उनका रथ चला, पीछे-पीछे गंगाजी बहती हुई चलीं। वे हिमालय की शिलाओं में होकर आगे बढ़े। घने वनों को पार किया और मैदान में उतर आये। ऋषिकेश पहुंचे और हरिद्वार आये। आगे बढ़े तो गढ़मुक्तेश्वर पहुंचे।

आगे चलकर गंगाजी ने पूछा, “क्यों भगीरथ, क्या मुझे तुम्हारी राजधानी के दरवाजे पर भी चलना होगा?”

भगीरथ ने हाथ जोड़कर कहा, “नहीं माता, हम आपको जगत की भलाई के लिए धरती पर लाये हैं। अपनी राजधानी की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं।”

गंगा बहुत खुश हुई। बोलीं, “भगीरथ, मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं। आज से मैं अपना नाम भी भागीरथी रखे लेती हूं।”

भगीरथ ने गंगामाई की जय बोली और वह आगे बढ़े। सोरो, इलाहाबाद, बनारस, पटना होते हुए कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचे। साठ हजार राख की ढेरियां उनके पवित्र जल में डूब गई। वह आगे बढ़ीं तो उनको सागर दिखाई दिया। सागर को देखते ही खिलखिलाकर हंस पड़ीं और बोलीं, “बेटा भगीरथ, अब तुम लौट जाओ। मैं यहीं सागर में विश्राम करुंगी।”

तबसे गंगा आकाश से हिमालय पर उतरती हैं। सत्रह सौ मील धरती सींचती हुई सागर में विश्राम करने चली जाती हैं। वह कभी थकमती नहीं, अटकती नहीं। वह तारती हैं, उबारती हैं और भलाई करती हैं। यही उनका काम है। वह इसमें सदा लगी रहती हैं।

समाप्त!

पिछले अंक
गंगा का उद्गम
गंगा का उद्गम – 2

आभार: विकिसोर्स

गंगा का उद्गम, भगवान राम, राजा सगर, अश्वमेध यज्ञ, राजा इंद्र, राख की ढेरियां, गंगा नदी, गंगा, भागीरीथी, ganga ka udgam, bhagwan ram, raja sagar, ashwmegh yagya, raja indra, raakh ki dheriyan, ganga river, ganga nadi, ganga, bhagirithi, pryas, yah bhi khoob rahi, प्रयास, यह भी खूब रही

Advertisements

गंगा का उद्गम – 2

अब तक आपने पढा

भगवान राम के कुल में एक राजा थे राजा सगर. राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया. राजा इंद्र ने घोड़े को चुरा लिया और कपिल मुनि की गुफा में जाकर बांध दिया। राजा ने अपने साठ हजार बेटों से घोड़े का पता लगाने को भेजा। ढुंढते-ढुंढते वो कपिल मुनि की गुफा में पहुँचे. वहाँ उन्होंने घोडा बंधा देखा. उन्होंने मुनि को पकडना चाहा तो वो सब मुनि कि तेज से राख के ढेर हो गये.

अब आगे पढिये –

साठ हजार राजकुमारों को गये बहुत दिन हो गये। उनकी कोई खबर न मिली। राजा सगर की चिंता बढ़ने लगी। तभी एक दूत ने आकर बताया कि बंगाल से कुछ मछुवे आये हैं, उनसे मैंने अभी-अभी सुना है कि उन्होंने राजकुमारों को एक गुफा में घुसते देखा और वे अभी तक उस गुफा से निकलकर नहीं आये।

सगर सोच में पड़ गये। हो न हो, राजकुमार किसी बड़ी मुसीबत में फंस गये हैं। उनको विपत से उबारने का उपाय करना चाहिए। राजा ने ऊंच-नीच सोची, आगा-पीछा सोचा और अपने पोते अंशुमान को बुलाया।

अंशुमान के आने पर सगर ने उसका माथा चूमकर उसे छाती से लगा लिया और पिर कहा, “बेटा, तुम्हारे साठ हजार चाचा बंगाल में सागर के किनारे एक गुफा में घुसते हुए देखे गये हैं, पर उसमें से निकलते हुए उनको अभी तक किसी ने नहीं देखा है।”

अंशुमान का चेहरा खिल उठा। वह बोला, ” बस! यही समाचार है। यदि आप आज्ञा दें तो मैं जाऊं और पता लगाऊं।”

सगर बोले, “जा, अपने चाचाओं का पता लगा।”

जब अंशुमान जाने लगा तो बूढ़े राजा सगर ने उसे फिर छाती से लगाया, उसका माथा चूमा और आशीष देकर उसे विदा किया।

अंशुमान इधर-उधर नहीं घूमा। उसने पता लगाया और उसी गुफा के दरवाजे पर पहुंचा। गुफा के दरवाजे पर वह ठिठक गया। उसने कुल के देवता सूर्य को प्रणाम किया और गुफा के भीतर पैर रखा। अंधेरे से उजाले में पहुंचा तो अचानक रुककर खड़ा हो गया। उसने जो देखा, वह अदभुत था। दूर-दूर तक राख की ढेरियां फैली हुई थीं। ऐसी कि किसी ने सजाकर फैलद दी हों। इतनी ढेरियां किसने लगाई? क्यों लगाई? वह उन ढेरियों को बचाता आग बढ़ा। थोड़ा ही आगे गया था कि एक गम्भीर आवाज उसे सुनाई दी, “आओ, बेटा अंशुमान, यह घोड़ा बहुत दिनों से तुम्हारी राह देख रहा है।”

अंशुमान चौंका। उसने एक दुबले-पतले ऋषि हैं, जो एक घोड़े के निकट खड़े है। इनको मेरा नाम कैसे मालूम हो गया? यह जरुर बहुत पहुंचे हुए हैं। अंशुमान रुका। उसने धरती पर सिर टेककर ऋषि को नमस्कार किया

आओ बेटा, अंशमान, यह घोड़ा तुम्हारी राह देख रहा है।”

ऋषि बोले, “बेटा अंशुमान, तुम भले कामों में लगो। आओ मैं कपिल मुनि तुमको आशीष देता हूं।”

अंशुमान ने उन महान कपिल को बारंबार प्रणाम किया।

कपिल बोले, “जो होना था, वह हो गया।”

अंशुमान ने हाथ जोड़कर पूछा, “क्या हो गया, ऋषिवर?”

ऋषि ने राख की ढेरियों की ओर इशारा करके कहा, “ये साठ हजार ढेरियां तुम्हारे चाचाओं की हैं, अंशुमान!”

अंशुमान के मुंह से चीख निकल गई। उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बह चली।

ऋषि ने समझाया, “धीरज धरो बेटा, मैंने जब आंखें खोलीं तो तुम्हारी चाचाओं को फूस की तरह जलते पाया। उनका अहंकार उभर आया था। वे समझदारी से दूर हट गये थे। उन्होंने सोच-विचार छोड़ दिया था। वे अधर्म पर थे। अधर्म बुरी चीज है। पता नहीं, कब भड़क पड़े। उनका अधर्म भड़का और वे जल गये। मैं देखता रह गया। कुछ न कर सका।”

अंशुमान ने कहा, “ऋषिवर!”

कपिल बोले, “बेटा, दुखी मत होओ। घोड़े को ले जाओ और अपने बाबा को धीरज बंधाओ। महाप्रतापी राजा सगर से कहना कि आत्मा अमर है। देह के जल जाने से उसका कुछ नहीं बिगड़ता।”

अंशुमान ने कपिल के सामने सिर झुकाया और कहा, “ऋषिवर! मैं आपकी आज्ञा का पालन करुंगा। पर मेरे चाचाओं की मौत आग में जलने से हुई है। यह अकाल मौत है। उनको शांति कैसे मिलेगी?”

कपिल ने कुछ देर सोचा और बोले, “बेटा, शांति का उपाय तो है, पर काम बहुत कठिन है।”

अंशुमान ने सिर झुकाकर कहा, “ऋषिवर! सूर्यवंशी कामों की कठिनता से नहीं डरते।”

कपिल बोले, “गंगाजी धरती पर आयें और उनका जल इन राख की ढेरियों को छुए तो तुम्हारे चाचा तर जायंगे।”

अंशुमान ने पूछा, ” गंगाजी कौन हैं और कहां रहती है?”

कपिल ने बताया, “गंगाजी विष्णु के पैरों के नखों से निकली हैं और ब्रह्मा के कमण्डल में रहती हैं।”

अंशुमान ने पूछा, ” गंगाजी को धरती पर लाने के लिए मुझे क्या करना होगा?”

ऋषि ने कहा, ” तुमको ब्रह्मा की विनती करनी होगी। जब ब्रह्मा तप पर रीझ जायंगे तो प्रसन्न होकर गंगाजी को धरती पर भेज देंगे। उससे तुम्हारे चाचाओं का ही भला नहीं होगा, और भी करोंड़ों आदमी तरह-तरह के लाभ उठा सकेंगे।”

अंशुमान ने हाथ उठाकर वचन दिया कि जबतक गंगाजी को धरती पर नहीं उतार लेंगे, तब तक मेरे वंश के लोग चैन नहीं लेंगे।

कपिल मुनि ने अपना आशीष दिया।

अंशुमान सूरज के वंश के थे। इसी कुल के सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र को छोटे बड़े सब जानते हैं। अंशुमान ने ब्रह्माजी की विनती की। बहुत कड़ा तप किया। तप में अपना शरीर घुला दिया। अपनी जान दे दी, पर ब्रह्माजी प्रसन्न नहीं हुए।

अंशुमान के बेटे हुए राजा दिलीप। दिलीप ने पिता के वचन को अपना वचन समझा। वह भी तप करने में जुट गये। बड़ा भारी तप किया। ऐसा तप किया कि ऋषि और मुनि चकित हो गये। उनके सामने सिर झुका दिया। पर ब्रह्मा उनके तप पर भी नही रीझे।

दिलीप के बेटे थे भगीरथ। भगीरथ के सामने बाबा का वचन था, पिता का तप था। उन्होंने मन को चारों ओर से समेटा और तप में लगा दिया। वह थे और था उनका तप।

सभी देवताओं को खबर लगी। देवों ने सोचा, “गंगाजी हमारी हैं। जब वह उतरकर धरती पर चली जायेंगी तो हमें कौन पूछेगा?”

देवताओं ने सलाह की। ऊंच-नीच सोची और फिर उर्वशी तथा अलका को बुलाया गया। उनसे कहा गया कि जाओ, राजा भगीरथ के पास जाओ और ऐसा यतन करो कि वह अपने तप से डगमगा जाय। अपनी राह से विचलित हो जाय और छोटे-मोटे सुखों के चंगुल में फंस जाय।

अलका और उर्वशी को देखा। उर्वशी ने भगीरथ को देखा। एक सादा सा आदमी अपनी धुन में डूबा हुआ था।

उन दोनों ने अपनी माया फैलाई। भगीरथ के चारों ओर बसंत बनाया। चिड़ियां चहकने लगीं। कलियां चटकने लगी। मंद पवन बहने लगा। लताएं झूमने लगीं। कुंजे मुस्कराने लगीं। दोनों अप्सराएं नाचीं। माया बखेरी। मोहिनी फैलाई और चाहा कि भगीरथ के मन को मोड़ दें। तप को तोड़ दें।

पर वह नहीं हुआ।

जब उर्वशी का लुभावबढ़ा तो भगीरथ के तप का तेज बढ़ा। दोनों हारीं और लौट गई।

उनके लौटते ही ब्रह्मा पसीज गये। वह सामने आये और बोले, “बेटा, वर मांगा! वर मांग!”

क्रमश:

गंगा का उद्गम, भगवान राम, राजा सगर, अश्वमेध यज्ञ, राजा इंद्र, राख की ढेरियां, गंगा नदी, गंगा, भागीरीथी, ganga ka udgam, bhagwan ram, raja sagar, ashwmegh yagya, raja indra, raakh ki dheriyan, ganga river, ganga nadi, ganga, bhagirithi, pryas, yah bhi khoob rahi, प्रयास, यह भी खूब रही

आभार: विकिसोर्स

गंगा का उद्गम

भगवान राम के कुल में राजा हुए हैं, सगर, राम से बहुत पहले। वह बड़े वीर थे। बड़े साहसी थे। उनका दबदबा चारों ओर फैला हुआ था। राज जब बहुत दूर-दूर तक फैल गया तो राजा ने यज्ञ किया।

पुराने समय में अश्वमेध यज्ञ का रिवाज था। इस यज्ञ में होता यह था कि एक घोड़ा पूजा करके छोड़ दिया जाता। घोड़ा जिधर मरजी हो, जाता। उसके पीछे राजा की सेना रहती। अगर किसी ने उस घोड़े को पकड लिया तो सेना उसे छुड़ा लेती। जब घोड़ा चारों ओर घूमकर वापस आ जाता तो यज्ञ किया जाता और वह राजा चक्रवर्ती माना जाता।

राजा सगर इसी प्रकार का यज्ञ कर रहे थे। भारतवर्ष के सारे राजा सगर को चक्रवर्ती मानते थे, पर देवों के राजा इंद्र को सगर की बढ़ती देखकर बड़ी जलन होती थी। जब उसे मालूम हुआ कि सगर अश्वमेध यज्ञ करने जा रहे हैं तो वह चुपके से सगर के पूजा करके छोड़े हुए घोड़े को चुरा ले गया और बहुत दूर कपिल मुनि की गुफा में जाकर बांध दिया।

दूसरे दिन जब घोड़े को छोड़ने की घड़ी पास आई तो पता चला कि अश्वशाला में घोड़ा नहीं है। सबके चेहरे उतर गये। यज्ञ-भूमि में शोक छा गया।

पहरेदारों ने खोजा, सिपाहियों ने खोजा, उनके अफसरों ने खोजा, पास खोजा और दूर खोजा पर घोड़ा न मिला तो महाराज के पास समाचार पहुंचा। महाराज ने सुना और सोच में पड़ गये। रातोंरात घोड़े को इतनी दूर निकाल ले जाना मामूली चोर का काम नहीं हो सकता था।

राजा सगर की बड़ी रानी का एक बेटा था। उनका नाम था असमंजस। असमंजस बालकों को दुखी करता था और उनको मार डालता था। सगर ने लोगों की की पुकार सुनी और अपने बेटे असमंजस को देश से निकाल दिया। असमंजस का पुत्र था अंशुमान।

राजा सगर की छोटी रानियों के बहुत से बेटे थे। कहा जाता है कि ये साठ हजार थे। सगर के ये पुत्र बहुत बलवान थे, बहुत चतुर थे और तरह-तरह की विद्याओं को जानने वाले थे। जो चाहते थे, कर सकते थे।

जब सिपाही घोड़े का पता लगाकार हार गये तो महाराज ने अपने साठ हजार पुत्रों को बुलाया और कहा, “पुत्रो चोर ने सूर्यवंश का अपमान किया है। तुम सब जाओ और घोड़े का पता लगाओ।”

राजकुमारों ने घोड़े को खोजना शुरु किया। उसे झोंपड़ियों में खोजा, महलों में खोजा, खेड़ों में खोजा, नगलों में खोजा, गांवों और कस्बों में खोजा, नगरों और राजधानियों में खोजा। साधुओं के आश्रमों में गये, तपोवनों में गये और योगियों की गुफाओं में पहुंचे। पर्वतों के बरफीले सफेद शिखरों पर पहुंचे और नीचे उतर आये। वन-वन घूमे, पर यज्ञ का घोड़ाउनको कहीं नहीं दिखाई दिया।

खोजते-खोजते वे धरती के छोर तक जा पहुंचे। अब आगे समुद्र था। पर राजकुमार घबराये नहीं। वे पानी में उतर गये। डुबकी लगाकर वे किनारे गुफाओं में देख आये। तैरकर वे दूर-दूर वे दूर-दूर तक की खबर ले आये। जहां उनको गुफा का संदेह हुआ वहां खोद-खोदकर देखा। पर घोड़ा वहां भी नहीं मिला। चूंकि सगर के पुत्रों ने समुद्र की इतनी खोजबीन की, इसलिए समुद्र ‘सागर’ भी कहलाने लगा।

घोड़ा नहीं मिला, फिर भी राजकुमार हारे नहीं। खोजने की धुन में लगे रहे। वे बंगाल के किनारे सागर से निकले और फिर थल पर खोजना शुरु किया।

वे आगे बढ़ रहे थे कि हवा चल पड़ी। एक लता हिली और वे ठिठक गये। लता के पीछे कुछ था, जिसने उनको रोक लिया। लता हटाई। एक शिला दिखाई पड़ी। शिला को परखा गया। मालूम हुआ कि उसे किसी ने ने वहां जमा दिया है। शिला हटाई जाने लगी। देखते-देखते शिला के पीछे एक गुफा का मुंह निकल आया। राजकुमार गुफा में घुस गये। थोड़ी दूर अंधेरे में चले और पिर उजाले में आ पहुंचे। यहां जो देखा तो चकित हो गये।

उन्होंने देखा कि एक बहुत पुराना पेड़ है। उसके नीचे एक दुबला-पतला ऋषि बैठा है। वह अपनी समाधि में लीन मालूम होता है। ऋषि के पीछे कुछ दूर पर एक और पेड़ है। उसके तने से एक घोड़ा बंधा है। कुछ राजकुमार दोड़कर घोड़े के पास गये। घोड़ा पहचान लिया गया। यह वही घोड़ा था। घोड़े को पाया, ऋषि को देखा, तो उनका क्रोध भड़क उठा।

राजकुमारों ने बहुत शोर मचाया। उनमें से एक ऋषि को खींच लेने के लिए आगे बढ़ गया। उसने अपना हाथ बढ़ाया। उसका हाथ ऋषि के शरीर पर पड़ा कि ऋषि की देह कांपी और वह समाधि से जागे।

उनकी आंखें खुलीं। उनकी आंखों में तेज भरा था। वह तेज राजकुमारों के ऊपर पड़ा तो गजब हो गया। महाबलवान राजकुमार भकभकाकर जल उठे। जब ऋषि की आंखें पूरी तरह से खुलीं तो उन्होंने अपने सामने बहुत सी राख की ढेरियां पड़ी पाई। ये राख की ढेरियां साठ हजार थी।

क्रमश:

गंगा का उद्गम, भगवान राम, राजा सगर, अश्वमेध यज्ञ, राजा इंद्र, राख की ढेरियां, गंगा नदी, गंगा, भागीरीथी, ganga ka udgam, bhagwan ram, raja sagar, ashwmegh yagya, raja indra, raakh ki dheriyan, ganga river, ganga nadi, ganga, bhagirithi, pryas, yah bhi khoob rahi, प्रयास, यह भी खूब रही

आभार: विकिसोर्स

हे राम, जवाब दो…

हाँ, हाँ सुने हैं…
…सुने हैं तेरे बडप्पन के चर्चे,
बनता है तू मर्यादा पुरूषोत्तम,
और ये भी सुना है कि तूने,
ली थी अग्नि परिक्षा,
एक पतिव्रता स्त्री की.

तुझे आदर्श मान कर,
सुना है कलियुग में,
लोग अनुसरण करते है तेरा,
पर तूने किसका अनुसरण किया था,
उसे घर से निकाल कर?

तूने क्या पाप किया था, बता?
जो लडनी पडी थी, तुझे,
अपने ही बच्चों से लडाई,
और हाँ, ये भी सच है,
कि तूने मुँह की खाई थी, नन्हों से.

और उस भाई का क्या?
जिसने जिन्दगी गुजार दी,
तेरी ही सेवा में,
उसको भी मार दिया,
केवल एक प्रतिज्ञा के लिये.

न जाने किन मर्यादाओं के लिये,
बना है तू पुरूषोत्तम,
कभी सामना होगा तो पुछूँगा,
मैं…राम,
इन सवालों के जवाब,
क्या तुम दे पाओगे?