Tag Archives: प्रयास

बलिदानी पुत्र देवायत

जूनागढ़ का पतन हो रहा था। राजा वीरता से युद्ध करते हुए रणक्षेत्र में सो चुके थे। महल में हाहाकार मच रहा था, किन्तू फिर भी पट्टन की सेनाएं दुर्ग को घेरे हुए थीं। सेना अंदर घुसकर राजा के पुत्र युवराज नौघड़ को पकड़कर मार डालना चाहती थी।

राजमंत्री ने दुर्ग का गुप्त द्वार खोला और रानी को राजकुमार के साथ बाहर निकाल दिया। रात्रि के घने अंधकार में अपने पुत्र को शत्रु के सैनिकों की आंखों से बचाती हुई रानी एक गरीब अहीर के द्वार पर खड़ी थी। उसका नाम देवायत था।
‘मुझे पहचानते हो भैया!’ रानी ने गृहपति से पूछा।
‘अपनी रानी माता को कौन नहीं पहचानेगा?’देवायत ने उत्तर दिया।
‘और इसे?’ रानी ने नौघड़ की ओर संकेत करते हुए देवायत से प्रश्न किया।
‘हां-हां क्यों नहीं?’ युवराज हैं न। कहिए, कैसे आगमन हुआ मेरी झोंपड़ी में? क्या आज्ञा है मेरे लिए? उसने हाथ जोड़कर प्रश्न किया।
‘हम तुम्हारी शरण में आए हैं भैया!’ रानी ने उत्तर दिया, ‘यह तो तुम्हें मालूम ही होगा कि जूनागढ़ का पतन हो चुका है और तुम्हारे महाराज मारे जा चुके हैं। अब शत्रु तुम्हारे इस युवराज की जान के ग्राहक हैं, वे इसकी खोज में हैं।’
‘आप चिंता न करें रानी माता!’ देवायत ने कहा, ‘अंदर आइए। मेरे घर में जो भी रूखा-सूखा है, वह सब कुछ आपका दिया हुआ ही तो है।’
देवायत ने रानी को अपने घर में आश्रय दिया। वह जानता था कि जूनागढ़ पर शत्रुओं का अधिकार हो चुका है और इसलिए राजवंश के किसी भी व्यक्ति का पक्ष लेना उसके लिए महान संकट का कारण बन सकता है, किन्तु वह राजपूत था और शरणागत के प्रति राजपूत के कर्तव्य को निभाना भी जानता था, और यही कारण था कि वह पहले रानी और युवराज को खिलाकर स्वयं पीछे खाता और उन्हें शैय्या पर सुलाकर स्वयं धरती पर सोता।
पर बात कब तक छिपती। आखिर शत्रु को अपने गुप्तचरों द्वारा पता लग ही गया कि जूनागढ़ की रानी और उनका पुत्र देवायत के घर में मेहमान हैं। अगले ही दिन पट्टन की सेनाओं ने देवायत के मकान को घेर लिया।
‘देवायत!’ सेनापति ने कड़ककर पूछा, ‘कहां है राजकुमार नौघड़?’
‘मुझे क्या पता अन्नदाता!’ देवायत ने हाथ जोड़कर नम्रता से उत्तर दिया।
‘झूठ न बोलो देवायत!’ सेनापति ने आंखें तरेरते हुए कहा, ‘नहीं तो कोड़ों की मार से शरीर की चमड़ी उधेड़ दी जाएगी।’
‘जो चाहे करो मालिक!’ देवायत ने उत्तर दिया,’ तुम्हारी इच्छा क्या है?’
‘अच्छा।’ सेनापति ने अपने सैनिकों की ओर देखते हुए कहा, ‘इसे बांध दो इस पेड़ से और देखो की घर में कौन-कौन हैं?’
देवायत को पेड़ से बांध दिया गया। सैनिक घर में घुसकर उसकी तलाशी लेने को तैयार होने लगे।
‘अब क्या होगा?’ देवायत मन ही मन सोचने लगा,’सामने ही तो बैठे हैं राजकुमार। कैसे बच पाएंगे वे इन यमदूतों के हाथों से।’
और दूसरे ही क्षण उसने एक मार्ग खोज लिया।
‘ठहरो।’ वह पेड़ से बंधा बंधा ही चिल्ला उठा, ‘ मैं ही बुलवाए देता हूं राजकुमार को।’
घर में घुसने वालों के कदम रुक गए। देवायत ने पत्नी को पास बुलाया और उसे संकेत से कुछ समझाया और फिर बोला, ‘जा, देख क्या रही है? नौघड़ को लाकर सेनापति के सामने खड़ा कर दे।’
पत्नी अंदर गई। नौघड़ और उसका पुत्र घर में एक साथ खेल रहे थे। उसने अपने पुत्र को उठाया,’ उसे छाती से लगाया, उसका मुख चूमा, उसे कुछ समझाया और फिर नौघड़ के वस्त्र पहनाकर वह सेनापति के सामने उसे बाहर ले आई।
‘क्या नाम है तुम्हारा?’ सेनापति ने पूछा। ‘ नौघड़।’ अहीर के पुत्र ने निर्भयता के साथ उत्तर दिया। और दूसरे ही क्षण सेनापति की तलवार से उसका सिर कटकर पृथ्वी पर जा गिरा।
शत्रु की सेनाएं देवायत को वृक्ष से खोलकर लौट गईं तो तब तक अपने आंसुओं को अपने नयनों में दबाए हुए अहीर दंपति बिलख उठे। रानी भी बाहर निकली और नौघड़ भी, किंतु वहां उन्होंने जो कुछ भी देखा उसे देखकर वे सबकुछ समझ गए।
‘यह तुमने क्या किया भैया!’ रानी चीख उठी।
‘वही, जो मुझे करना चाहिए था रानी माता! देवायत ने रोते हुए उत्तर दिया, मैं गरीब हूं तो क्या, हूं तो राजपूत ही।’ शरणागत के लिए बलिदान की ऐसी गाथाएं भारत के इतिहास की अपनी एक विशेषता है।

, , , , , , , , ,,

 

विश्वास

मेरे आफिस के नीचे कोई 70-75 साल का एक बुढा अक्सर भीख माँगता है. आज आफिस पहुँचा तो भीग चुका था, सुबह से ही बारिश हो रही थी. जल्दी-जल्दी सीढियाँ चढते हुए उस भिखारी पर नजर पडी. एक अजीब सी मायूसी झलक रही थी चेहरे पर. बारिश के चलते लोगों की आवाजाही कम थी शायद इस लिये उदास था. तभी मेरी नजर कुछ बच्चों पर पडी जो बारिश में भीगे थे. वो दौड कर उस भिखारी के पास आये और उससे बातें करने लगे. कुछ उत्सुकता सी हुई, मैं रुक गया और उनकी बातें सुनने लगा. उन बच्चों के हाथों में पैन के बंडल थे और वो भिखारी को पैन दिखाने लगे. भिखारी ने मुस्कुरा कर कहा, “मुझे नहीं चाहिये”. नहीं बाबा हम तुम्हें ये पैन बेचने नहीं आए. तुम बस इन पर हाथ रख दो तो ये हमारे सभी पैन बिक जायेंगे, बच्चे ने बडे विश्वास के साथ कहा. वो बुढा भिखारी आँखों में आँसू लिये अपलक उस बच्चे को निहारता रहा और पैन के बंडल पर हाथ रख कर आशिर्वाद दिया. वो बच्चे खुश होकर सिग्नल की तरफ दौडे.

बुढे के चेहरे पर मायूसी की जगह अब एक चमक थी. पता नहीं क्यों? कुछ मिला तो नहीं था उसे. हाँ, कुछ ले गये थे वो बच्चे उससे. कुछ मैंने भी महसूस किया था अपने चेहरे पर. कुछ बारिश जैसी ही तो थीं वो आँसूं की बूँदें.

(ये घटना दिल्ली के क्नाट प्लेस, जनपथ की है)

 

दिल्ली, क्नाट प्लेस, प्रयास, प्रयास का ब्लौग, हिन्दी कहानियाँ, विश्वास, delhi, connaught place, pryas, pryas ka blog, hindi kahaniyan

हम चिल्लाते क्यों हैं गुस्से में?

एक बार एक संत अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। अचानक उन्होंने सभी शिष्यों से एक सवाल पूछा। बताओ जब दो लोग एक दूसरे पर गुस्सा करते हैं तो जोर-जोर से चिल्लाते क्यों हैं?

शिष्यों ने कुछ देर सोचा और एक ने उत्तर दिया : हम अपनी शांति खो चुके होते हैं इसलिए चिल्लाने लगते हैं।

संत ने मुस्कुराते हुए कहा : दोनों लोग एक दूसरे के काफी करीब होते हैं तो फिर धीरे-धीरे भी तो बात कर सकते हैं। आखिर वह चिल्लाते क्यों हैं?

कुछ और शिष्यों ने भी जवाब दिया लेकिन संत संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने खुद उत्तर देना शुरू किया। वह बोले : जब दो लोग एक दूसरे से नाराज होते हैं तो उनके दिलों में दूरियां बहुत बढ़ जाती हैं। जब दूरियां बढ़ जाएं तो आवाज को पहुंचाने के लिए उसका तेज होना जरूरी है। दूरियां जितनी ज्यादा होंगी उतनी तेज चिल्लाना पड़ेगा। दिलों की यह दूरियां ही दो गुस्साए लोगों को चिल्लाने पर मजबूर कर देती हैं। वह आगे बोले, जब दो लोगों में प्रेम होता है तो वह एक दूसरे से बड़े आराम से और धीरे-धीरे बात करते हैं। प्रेम दिलों को करीब लाता है और करीब तक आवाज पहुंचाने के लिए चिल्लाने की जरूरत नहीं। जब दो लोगों में प्रेम और भी प्रगाढ़ हो जाता है तो वह खुसफुसा कर भी एक दूसरे तक अपनी बात पहुंचा लेते हैं। इसके बाद प्रेम की एक अवस्था यह भी आती है कि खुसफुसाने की जरूरत भी नहीं पड़ती। एक दूसरे की आंख में देख कर ही समझ आ जाता है कि क्या कहा जा रहा है।

शिष्यों की तरफ देखते हुए संत बोले : अब जब भी कभी बहस करें तो दिलों की दूरियों को न बढ़ने दें। शांत चित्त और धीमी आवाज में बात करें। ध्यान रखें कि कहीं दूरियां इतनी न बढ़े जाएं कि वापस आना ही मुमकिन न हो।

उत्तराखण्ड त्रासदी पर

शिव को दोष मत दे रे ऐ बेगैरत इंसान
दुषकर्मों का मिल रहा है ये तुझको ईनाम…1

uttarakhand flood 2013

शीश झुका मैं कर रहा था अपने शिव का ध्यान
तब चुपके से आया था वो नरभक्षी हैवान…2

आफत में जब पडी हुई थी उन लोगों की जान
मानवता को कुचल रहे थे तब भी कुछ शैतान…3

पर्वत नदीयाँ वृक्ष धरा ही हैं असली भगवान
इनकी रक्षा करके ही अब बच सकती है जान…4

उत्तराखण्ड त्रासदी 2013, उत्तराखण्ड बाढ 2013, बादल फटना, उत्तराखण्ड में बादल फटा, प्रयास, प्रयास का ब्लौग, नरेश का ब्लौग, पुरानी कहानियाँ, विक्रम बेताल की कहानी, Uttarakhand trasdi 2013, uttarakhand flood 2013, baadala fatna, uttarakhana baadal, pryas, pryas ka blog, naresh ka blog, purani kahaniyan, vikram vaital ki kahani

मेरा वैलैंटाइन – हास्य कविता

इस बार हमने सोचा
हम भी वैलैंटाईन डे मनायेंगे
अपनी मैडम को पिक्चर दिखायेंगे
हमारा भी तो दोस्तों में रुतबा बढेगा
घरेलू लडका है फिर कोई नहीं कहेगा
बस कर लिये दो टिकट ऐडवांस में बुक
श्रीमति जी के चेहरे का देखने लायक था लुक
मुस्कुराते हुए बोलीं कार्नर की ली हैं ना
हमने कहा हाँ एक दाहिना एक बाहिना.

तो हम भी पहुँच गये मैडम के संग
देखने सलमान की लेटेस्ट फिल्म दबंग
ये फिल्म देखना का मेरा पहला टैस्ट था
मैडम का सलमान में कुछ ज्यादा ही इंट्रस्ट था
वो बाहर से तो हम पर ही मर रही थी
पर तारिफ सलमान की ही कर रही थी

फिल्म का जैसे ही हुआ इंटरवल
मैडम जी के माथे पर आ गये बल
गुस्से में बोली, “आज के दिन भी भूखा मारोगे”
जेब में रखे पैसों की क्या आरती उतारोगे
पूरा सिनेमा हाल हमें लानत भेज रहा था
फिल्म के इंटरवल में हमारा ट्रेलर देख रहा था

हम फौरन कैंटीन की तरफ दौडे
ना ब्रैड दिखे ना ही पकौडे
चारों तरफ बस माल ही माल दिख रहा था
हर काउंटर पर पापकार्न और पिज्जा ही बिक रहा था
कुछ देर तक आँखें सेकीं और दिल ठंडा किया
फिर धर्मपत्नी जी के लिये एक ठंडा लिया

ठंडा लेकर हाल में हम जैसे ही पहुँचे
श्रीमति जी पिल पडी बिना कुछ सोचे
बडे प्यार से मुझे डांट कर बोली
अभी तक ठंडे की बोतल भी नहीं खोली
हम बोले सलमान खान से ध्यान हटाओ
बोतल खुली है अब इस पर ध्यान लगाओ

ठंडा पीते ही मैडम गुर्राई
ये ठंडा है या गर्म मेरे भाई
लो जी अब तो कमाल हो गया
सलमान के सामने मैं भाई हो गया
मैंने चुपचाप से सौरी का सहारा लिया
गर्म होते मामले का वहीं निपटारा किया

जैसे तैसे सलमान की दबंगई हुई खत्म
हमारे अंदर भी आ गया थोडा सा दम
धर्मपत्नी बोली अब क्या दिलवाओगे
हम बोले अभी तक क्या दिलवाया है?
वो बोली ज्यादा मजाक नहीं चलेगा
घर जाकर धोऊं या यहीं पिटेगा?

हमने चुपचाप चुप्पी साध ली
सीधे अपने घर की राह ली
आज हमें एक शिक्षा मिली थी
कि वैलंटाईन हो या करवा चौथ
रक्षा बंधन हो या भैया दौज
सब प्यार मौहब्बत ही फैलाते हैं
और इनका मजा तब ही आता है
जब आप इन्हें घर पर ही मनाते हैं

घर पर ना होगी सलमान की दबंगाई
और ना होगी बाजार में आपकी पिटाई

 

दिल्ली पुलिस – जाँच का तरीका

पूर्वी दिल्ली में एक डी.डी.ए. की कालोनी है मयूर विहार, फेज-1. यूं तो मयूर विहार, फेज-2 और  3 भी हैं. लेकिन फेज-1 इनमें सबसे पुरानी कालोनी है. इस मयूर विहार में एक छोटा सा नर्सिंग होम है कुकरेजा नर्सिंग होम. यहाँ 24 घंटे बीमार लोगों की आवाजाही लगी रहती है.

यह नर्सिंग होम थाना पांडव नगर के अन्तृगत आता है. पिछले कुछ दिनों से मैंने यहाँ एक अजीब बात देखी. वैसे पूरी दिल्ली में दिल्ली पुलिस ने बाईकर्स के खिलाफ जंग छेड रखी है. कागज पूरे ना पाये जाने पर या तो उन्हें बंद किया जा रहा है या उनका चालान किया जा रहा है. अच्छी बात है, अपराधी तत्व इन बाईकों पर बैठ कर राहजनी, लूटपाट और चेन छपटने में उस्ताद हो गये हैं.

लेकिन जो नजारा मैंने कुकरेजा नर्सिंग होम पर देखा वह अद्भुत पाया. वाहन चेकिंग के लिये दिल्ली पुलिस बैरिकेटिंग करके वाहन चैक करती है. लेकिन यहाँ पुलिस को इतनी मेहनत भी नहीं करनी पडती. यह नर्सिंग होम एक मोड पर बना हुआ है और सामने ही एक डिसपैन्सरी भी है. पुलिस की मिलीभगत से यहाँ बहुत से ठेले वाले खडे रहते हैं. और इसके अतिरिक्त मयूर विहार, फेज-1 के पाकेट-5 पर जाने के लिये एक मुख्य सडक भी है. कुल मिला कर यहाँ बहुत ही भीड रहती है और आपको अपनी गाडी की स्पीड ना चाहते हुए भी धीरे करनी ही पडेगी. और हाँ यहाँ दिनभर एमबुलैन्स की आवाजाही भी लगी रहती है.

तो जी, अब पुलिस वालों को ये मोड जंच गया. अब वो यहाँ वाहन चैकिंग के लिये कोई बैरिकेटिंग नहीं करते और ना ही यहाँ 4-5 पुलिस वालों की आवश्यकता पडती. केवल दो पुलिस वाले चुप-चाप बाईक में यहाँ आते हैं और एक चाय वाले के यहाँ बीडी व चायपान करते हैं. इस खास नाश्ते के बाद इनकी फुर्ती देखने लायक होती है.

ये चुप-चाप चाय की दुकान में खडे रहते हैं और जैसे ही कोई मरीज आता है तो जाहिर सी बात है कि दो-चार लोग और साथ में आते हैं. और यदि ये लोग स्कूटर या बाईक पर होते हैं तो पुलिस वाले चुपचाप उनके पास चले आते हैं और फिर आवश्यक कागज और हेलमेट क्यों नहीं पहना से जेब गर्म करने की भूमिका बनाई जाती है. अब बेचारे लोग आपातस्तिथी के कारण हेलमेट ना पहनपाने या कागज ना लापाने की बात समझाने की नाकाम कोशिश करते हैं. लेकिन पुलिस वालों के कान तो भर्ती के समय ही बंद कर दिये जाते हैं. केवल बोलना है ही सिखाया जाता है इन्हें, और बोलना क्या बल्कि डांटना या धमकाना कहिये जनाब!

अब जो जैसा मिल जाये उसी के हिसाब से अस्पताल के बाहर ही उन तिमारदारों का ईलाज कर दिया जाता है. अब तिमारदार भी कुछ ले-देकर मामला रफा-दफा करने को प्राथमिकता देते हैं. अपने मरीज को भर्ती जो करवाना है. और यदि कोई व्यक्ति फुरसत में हो और पैसे देने में आनाकानी करे तो बस सीधा कोर्ट का चालान.

यह पूरी कार्यवाही सुरक्षा की दृष्टि से की गई हो ऐसा समझने का मैने भरसक प्रयास किया लेकिन सफल ना हो सका. यकीन मानिये मैंने एक दिन हिम्म्त करके उनसे पूछा कि आप सीधी तरह से सडक पर खडे होने के स्थान पर चाय वाले के पास क्यों खडे रहते हैं. तो उनका जवाब था कि लोग हमें देख कर भाग जाते हैं. और इसीलिये आप रोगीयों के रिश्तेदारों को निशाना बना रहे हैं – मैंने झट से कहा. क्यों इब तू काम सिखायगा हमैं. लिकड ले यहाँ सै. अर नहीं तो तेरेई पडलैगा एक-आधा. आया रोगीयन का ठेकेदार – जैसी लताड सुनने को मिली.

अब ये क्या तरीका है. सुरक्षा के नाम पर वाहन चैकिंग करते पुलिस वालों को देखकर जहाँ मैं सुरक्षित महसूस करता था, वहीं उनके इस रैवैये को देखकर मेरे मन में दिल्ली पुलिस की रही सही छवि और भी खराब हो गयी.

दिल्ली पुलिस, प्रयास, वाहन चैकिंग दिल्ली, 

जीवन की नाव

एक संत थे। उनके कई शिष्य उनके आश्रम में रहकर अध्ययन करते थे। एक दिन एक महिला उनके पास रोती हुए आई और बोली, ‘बाबा, मैं लाख प्रयासों के बाद भी अपना मकान नहीं बना पा रही हूं। मेरे रहने का कोई निश्चित ठिकाना नहीं है। मैं बहुत अशांत और दु:खी हूं। कृपया मेरे मन को शांत करें।’

उसकी बात पर संत बोले, ‘हर किसी को पुश्तैनी जायदाद नहीं मिलती। अपना मकान बनाने के लिए आपको नेकी से धनोपार्जन करना होगा, तब आपका मकान बन जाएगा और आपको मानसिक शांति भी मिलेगी।’ महिला वहां से चली गई। इसके बाद एक शिष्य संत से बोला, ‘बाबा, सुख तो समझ में आता है लेकिन दु:ख क्यों है? यह समझ में नहीं आता।’

उसकी बात सुनकर संत बोले, ‘मुझे दूसरे किनारे पर जाना है। इस बात का जवाब मैं तुम्हें नाव में बैठकर दूंगा।’ दोनों नाव में बैठ गए। संत ने एक चप्पू से नाव चलानी शुरू की। एक ही चप्पू से चलाने के कारण नाव गोल-गोल घूमने लगी तो शिष्य बोला, ‘बाबा, अगर आप एक ही चप्पू से नाव चलाते रहे तो हम यहीं भटकते रहेंगे, कभी किनारे पर नहीं पहुंच पाएंगे।

उसकी बात सुनकर संत बोले, ‘अरे तुम तो बहुत समझदार हो। यही तुम्हारे पहले सवाल का जवाब भी है। अगर जीवन में सुख ही सुख होगा तो जीवन नैया यूं ही गोल-गोल घूमती रहेगी और कभी भी किनारे पर नहीं पहुंचेगी। जिस तरह नाव को साधने के लिए दो चप्पू चाहिए, ठीक से चलने के लिए दो पैर चाहिए, काम करने के लिए दो हाथ चाहिए, उसी तरह जीवन में सुख के साथ दुख भी होने चाहिए।

जब रात और दिन दोनों होंगे तभी तो दिन का महत्व पता चलेगा। जीवन और मृत्यु से ही जीवन के आनंद का सच्चा अनुभव होगा, वरना जीवन की नाव भंवर में फंस जाएगी।’ संत की बात शिष्य की समझ में आ गई।

 

प्रयासप्रयास का ब्लौगनरेश का ब्लौगयह भी खूब रही, पुरानी कहानियाँ, pryaspryas ka , blog, naresh ka blog, yah bhi khoob rahi, purani kahaniyan,जीवन की नाव

पेशे की इज्जत

यह घटना उन दिनों की है जब फ्रांस में विद्रोही काफी उत्पात मचा रहे थे। सरकार अपने तरीकों से विद्रोहियों से निपटने में जुटी हुई थी। काफी हद तक सेना ने विद्रोह को कुचल दिया था , फिर भी कुछ शहरों में स्थिति खराब थी। इन्हीं में से एक शहर था लिथोस। लिथोस में विद्रोह पूर्णतया दबाया नहीं जा सका था , लिहाजा जनरल कास्तलेन जैसे कड़े अफसर को वहां नियंत्रण के लिए भेजा गया। कास्तलेन विद्रोहियों के साथ काफी सख्ती से पेश आते थे।

इसलिए विद्रोहियों के बीच उनका खौफ भी था और वे उनसे चिढ़ते भी थे। इन्हीं विद्रोहियों में एक नाई भी था , जो प्राय : कहता फिरता – जनरल मेरे सामने आ जाए तो मैं उस्तरे से उसका सफाया कर दूं। जब कास्तलेन ने यह बात सुनी तो वह अकेले ही एक दिन उसकी दुकान पर पहुंच गया और उसे अपनी हजामत बनाने के लिए कहा। वह नाई जनरल को पहचानता था। उसे अपनी दुकान पर देखकर वह बुरी तरह घबरा गया और कांपते हाथों से उस्तरा उठाकर जैसे – तैसे उसकी हजामत बनाई।

काम हो जाने के बाद जनरल कास्तलेन ने उसे पैसे दिए और कहा – मैंने तुम्हें अपना गला काटने का पूरा मौका दिया। तुम्हारे हाथ में उस्तरा था , मगर तुम उसका फायदा नहीं उठा सके। इस पर नाई ने कहा – ऐसा करके मैं अपने पेशे के साथ धोखा नहीं कर सकता था। मेरा उस्तरा किसी की हजामत बनाने के लिए है किसी की जान लेने के लिए नहीं। वैसे मैं आपसे निपट लूंगा जब आप हथियारबंद होंगे। लेकिन अभी आप मेरे ग्राहक हैं। कास्तलेन मुंह लटकाकर चला गया।

प्रयास, प्रयास का ब्लौग, नरेश का ब्लौग, यह भी खूब रही, पुरानी कहानियाँ, pryas, pryas ka blog, naresh ka blog, yah bhi khoob rahi, purani kahaniyan

सदाचरण से सम्मान

प्राचीन समय में वाराणसी के राज पुरोहित हुआ करते थे- देव मित्र। राजा को राज पुरोहित की विद्वता और योग्यता पर बहुत भरोसा था। राजा इसलिए उनकी हर बात मानते थे। प्रजा के बीच भी राज पुरोहित का काफी आदर था। एक दिन राज पुरोहित के मन में सवाल उठा कि राजा और दूसरे लोग जो मेरा सम्मान करते हैं, उसका कारण क्या है? राज पुरोहित ने अपने इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए एक योजना बनाई।

अगले दिन दरबार से लौटते समय उन्होंने राज कोषागार से एक स्वर्ण मुद्रा चुपचाप ले ली, जिसे कोष अधिकारी ने देखकर भी नजरंदाज कर दिया। राज पुरोहित ने दूसरे दिन भी दरबार से लौटते समय दो स्वर्ण मुद्राएं उठा लीं। कोष अधिकारी ने देखकर सोचा कि शायद किसी प्रयोजन के लिए वे ऐसा कर रहे हैं, बाद में अवश्य बता देंगे। तीसरे दिन राज पुरोहित ने मुट्ठी में स्वर्ण मुद्राएं भर लीं। इस बार कोष अधिकारी ने उन्हें पकड़कर सैनिकों के हवाले कर दिया। उनका मामला राजा तक पहुंचा। न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठे राजा ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि राज पुरोहित द्वारा तीन बार राजकोष का धन चुराया गया है। इस दुराचरण के लिए उन्हें तीन महीने की कैद दी जाए ताकि वह फिर कभी ऐसा अपराध न कर सकें।

राजा के निर्णय से राज पुरोहित को अपने सवाल का जवाब मिल चुका था। राज पुरोहित ने राजा से निवेदन किया, ‘राजन मैं चोर नहीं हूं। मैं यह जानना चाहता था कि आपके द्वारा मुझे जो सम्मान दिया जाता है, उसका सही अधिकारी कौन है, मेरी योग्यता, विद्वता या मेरा सदाचरण। आज सभी लोग समझ गए हैं कि सदाचरण को छोड़ते ही मैं दंड का अधिकारी बन गया हूं। सदाचरण और नैतिकता ही मेरे सम्मान का मूल कारण थी।’ इस पर राजा ने कहा कि वह उनकी बात समझ रहे हैं मगर दूसरों को सीख देने के लिए उनका दंडित होना आवश्यक है।

राज पुरोहित, वाराणासी, देव मित्र, विद्वता, योग्यता, सदाचरण, नैतिकता, कोषागार, स्वर्ण मुद्रा, प्रयास, हिन्दी ब्लौग, यह भी खूब रही, पुरानी कहानीयाँ, प्रयास का ब्लौग, नरेश का ब्लौग, raaj purhoit, varanasi, dev mitra, vidhwata, yogyata, sadacharan, naitikta, koshagar, swarn mudra, pryas, hindi blog, yah bhi khoob rahi, purani kahaniyan, pryas ka blog, naresh ka blog

मेरी भरतपुर यात्रा

2 अक्तुबर (2009), शुक्रवार को छुट्टी थी. तीन दिनों का ल‌बा सप्ताहांत. हम तीन दोस्त मै, रमेश और महेन्द्र ने झटपट घूमने का प्रोग्राम बनाया. कहां जाया जाये – यह सोचना हमेशा की तरह मेरे हिस्से मे‌ ही आया. हरिद्वार, ऋषिकेष, मंसूरी, शिमला घूम-घूम कर हम बोर हो चुके थे. भरतपुर जाने का हमारा प्रोग्राम कई बार रद्द हो चुका था इसलिये इस बार वहीं जाने का एलान कर दिया.

जाने की टिकिट बुक नहीं थी. निजामुद्दीन से ताज एक्सप्रैस पकडकर हम पहले मथुरा जंकश्न तक गये (टिकिट 50 रूपय). दिल्ली से मथुरा तक करीब दो घंटे लगते हैं. वहां से निजामुद्दीन से ही आने वाली गोलडन टैम्पल में भरतपुर का जनरल टिकिट लेकर स्लीपर कोच मे‌ सवार हो लिये (टिकिट 28 रूपय).  भरतपुर मथुरा से अगला स्टेशन ही है और दूरी है करीब तीस किलोमीटर है .केवल आधा घंटा लगता है. ट्रेन में सवार होते ही सबसे पहले मुलाकात हुई टी. टी. साहब से जिसका अंदेशा मुझे पहले से ही था. टी. टी. साहब ने जनरल टिकिट लेकर स्लीपकर में यात्रा करने के उपलक्ष में जुर्माने की ईनामी राशि 1200 रूपय घोषित कर दी. बाद मे‌ केवल एक व्यक्ती का जुर्माना – तीन सौ पचास रूपय देने पर बात बन गयी. जुर्माना देने के बाद थोडी शांती मिली. हालांकि रिश्व्त देने की नाकाम कोशिश भी की गई लेकिन कुछ फायदा ना हो सका. सिविल ड्रैस के टी. टी. को देख कर एक बार तो लगा की नीरज जाट जी की तर्ज पर इससे आई-कार्ड पूछ ही लूं. लेकिन फिर 1200 रूपय का ध्यान आते ही विचार बदल गया.

पौने ग्यारह बजे हम भरतपुर के स्टेशन की शोभा बढा रहे थे. यह पांच प्लेटफार्म वाला एक छोटा सा स्टेशन है. प्यास बहुत जोर से लग रही थी. ठंडे पानी का कूलर स्टेशन पर लगा हूआ था. पानी पिया तो बहुत ही खारा था पानी पिया ही नही‌ गया. स्टेशन से बाहर निकले तो बहुत से ओटो वाले खडे हुए थे. भरतपुर में रस्सी से स्टार्ट होने वाले ओटो बहुत हैं.

हमने चालीस रूपय में केवलादेव पार्क के लिये ओटो किया. भरतपुर मे‌ सडकों की हालत बहुत खस्ता है. जगह-जगह गढ्ढे और टूटी सडक के ही दर्शन होते हैं. स्टेशन से बाहर निकलते ही हलवाई की दुकानें नजर आईं जहाँ खजला बिक रहा था. खजला एक तरह का पकवान है जो मैदे से बनता है. यह फीका और मीठा दोनो तरह का होता है. देखने मे‌ यह एक बडे आकार का भठुरे जैसा दिखता है.

खजला

खजला

बारह बजे हमने केवलादेव पार्क के सामने बने होटल “द पार्क रिजैन्सी” में प्रवेश किया.

Hotel The Park Bharatpur

Hotel The Park Bharatpur

बाहर से देखने में यह होटल बहुत ही शानदार दिखता है. यहां हमे‌ एक एसी डबल बैडरूम कमरा 850 रूपय मे‌ मिल गया. हम तीन लोग थे सो ज्यादा मंहगा नहीं लगा. होटल में घुसते ही तबीयत प्रसन्न हो गेई. रूम बहुत ही खुला और बडा था. रूम के सामने बहुत बडा पार्क था जिसमें बहुत सी टेबल और चेयर लगी हुई थीं. अक्तुबर से मार्च तक यहां सीजन रहता है शायद इसीलिये होटल को रैनोवेट भी किया जा रहा था. रूम मे‌ एक बडा सा टीवी और छोटा सा फ्रिज भी था. हमारे होटल के बिल्कुल सामने था होटल प्रताप पैलेस.

Hotel Pratap Palace Bharatpur

Hotel Pratap Palace Bharatpur

भूख बहुत लगी थी इसलिये फटाफट बटर चिकन (160 रूपय हाफ) और बटर नान (25 रूपय) आर्डर कर दिया. बटर चिकन लजवाब था और नान भी बहुत सौफ्ट थे. दोपहर का खाना खा कर हमने सबसे पहले केवलादेव पार्क जाने का निश्चय किया. लेकिन वेटर ने हमें बताया कि वहां जाने का यह सही समय नहीं है. वहां सुबह-सुबह जाना चाहिये. सुबह पक्षी खाने की तलाश में बाहर निकलते हैं. लेकिन हमें उसकी बात पसंद नहीं आयी और हम सीधा निकल लिये पार्क की तरफ. इस पार्क को यहां घना (dense) के नाम से ज्यादा जाना जाता है.

होटल से बाहर निकलते ही रिक्शे वाले पीछे पड गये. लेकिन हम रिक्शा केवल पार्क के बाहर से ही लेना चाहते थे. मुझे पता था कि सरकार द्वारा लाइसेंस शुदा रिक्शे केवल पार्क के बाहर से ही मिलते हैं. लेकिन बाद में पता चला कि यहां 123 रिक्शे वालों का ग्रुप है जो तीन भागों में बंटा हुआ है. एक ग्रुप पार्क के बाहर, एक पार्क के अंदर चैक पोस्ट पर और एक ग्रुप पार्क के बाहर बने होटलों पर सैलानीयों का इंतजार करता है. अपने रिक्शे चालक राजू और इन्दर से पूछने पर पता चला की इनकी कार्य प्रणाली बहुत ही साधारण है. ये सुबह पांच बजे पार्क के गेट पर इक्ठ्ठा होते हैं और 1 से लेकर 123 नम्बर तक की पर्चीयां बनाते हैं. जिसके हिस्से जो पर्ची आती है बस वही उसका नम्बर होता है.

राजू और ईन्दर हमें लेकर पार्क में चल दिये. यहाँ बीडी-सिगरेट पीने पर सख्त मनाही है. बीडी-सिगरेटे से जंगल में आग का खतरा बना रहता है. लेकिन फिर भी कुछ लोग ईधर-उधर छुप कर सिगरेट पी रहे थे. राजू और ईन्दर हमें बार-बार दूरबीन किराये पर दिलवाने की जिद कर रहे थे. लेकिन हमने साफ मना कर दिया.

बातों-बातों में पता चला कि ईन्दर दिल्ली में मेरे घर के पास त्रिलोक पुरी का रहने वाला था. और 84 के दंगों में परिवार के साथ यहाँ आ गया था. ये पता चलने के बाद ईन्दर ने हमें अपने रिक्शे में रखी गयी दूरबीन फ्री में दे दी. दोनों रिक्शे वालों ने हमें बताया कि उनकी यहाँ ट्रेनिंग होती है और उन्हें ईंग्लिश के साथ-साथ बहुत सी यूरोपीयन भाषाओं की जानकारी भी दी जाती है. उन्होंने हमें ईंग्लिश, जर्मनी, स्पैनिश, जापानी आदि भाषाओं में बहुत सी बातें बोल कर भी बताईं. सुनने में यह सब अच्छा लग रहा था. लेकिन बाहर के सैलानीयों से टिप लेने का ये अच्छा साधन है. यहाँ एक बात और देखी कि लोकल टूरिस्ट के आने पर रिक्शे वाले ज्यादा खुश नहीं होते. क्योंकि उन्हें उनसे टिप नहीं मिलती.

बहुत प्यास लगी है

बहुत प्यास लगी है

बन्दर फोन की तार ठीक कर रहा है

बन्दर फोन की तार ठीक कर रहा है

राजू और ईन्दर ने हमें पार्क में एक मन्दिर भी दिखाया. उस मन्दिर में हमें एक तालाब में बहुत बडे-बडे कछुए दिखे उन्हें हमने आटे की बडी-बडी गोलीयाँ भी खिलायीं. वो कछुए बिल्कुल आदमखोर लग रहे थे. मन्दिर के पुजारी ने हमें बताया कि एक बार एक नील गाय इस तालाब में गिर गयी तो ये कछुए आधे घंटे में उसे चट कर गये.

कछुए

कछुए

आदमखोर कछुए

आदमखोर कछुए

पार्क में सूर्यास्त

पार्क में सूर्यास्त

शाम को करीब सात बजे तक हम पार्क घूम चुके थे. वापस आते समय रास्ते में हमें दो सियार भी दिखे. राजू और ईन्दर ने हमें होटल छोडा दिया. हमने उन्हें रू. 600/- दिये जिसमें रिक्शे का किराया और टिप भी शामिल थी.

Raju aur Inder Bharatpur

Raju aur Inder Bharatpur

अगले दिन हम भरतपुर के लोहागढ किले को देखने गये. यह किला भरतपुर जाट शासकों द्वारा निर्मित किया गया था. दुनिया में यह किला अभी तक अभेद है. इसे अभी तक जीता नहीं जा सका है. इस किले में एक म्यूसियम भी है जिसमें जाट शासकों के चित्र, पांडुलिपी, हथियार बंदूकें आदि रखीं हैं.

करीब चार बजे हम वापिस होटल पहुँच चुके थे. होटल आते ही हमें वापसी की टिकीट बुक करवानी थी. होटल में इंटरनैट की सुविधा नहीं थी और आस-पास कोई साईबर कैफे भी नहीं मिला. तब हमने दिल्ली के एक मित्र को फोन करके कोटा जनशताब्दी 2059 (अब 12059) में तीन सीट बुक करवादी. और बडी मुश्किल से एक साईबर कैफे से टिकीट का प्रिंट निकाला.

अब वापसी कि चिंता खत्म थी. शाम को किसी ने हमें बताया कि पास में ही दशहरा-मेला लगा हुआ है. हमने एक ट्रैक्टर रोका और बिना पूछे ही उस पर चढ गये. उसने हमें बताया कि वो भी मेले में ही जा रहा है. बस सुनकर मजा आ गया. मेले में सबसे पहले हम पहुँचे मौत का कुँआ देखने. हालत खराब हो गयी. कितना रिस्क है उसमें. लेकिन रोजी-रोटी के लिये लोग सब कुछ करते हैं.

आप मेले की कुछ फोटो देखीये.

ट्रैक्टर की फ्री सवारी

ट्रैक्टर की फ्री सवारी

दशहरा मेला भरतपुर

दशहरा मेला भरतपुर

मेले में भी खजला ही खजला था

मेले में भी खजला ही खजला था

दशहरा मेला भरतपुर

दशहरा मेला भरतपुर

मेले का मजा

मेले का मजा

अगले दिन हमने कोटा जनशताब्दी पकडी जो करीब डेढ घंटा लेटे थी. जन शताब्दी में पहली बार सफर किया था मुझे अच्छा लगा. लेकिन वहाँ हिजडे लोगों से खुले आम पैसे मांग रहे थे. लेकिन हम लोगों ने उन्हें पैसे नहीं दिये. हालांकि उन्होंने बहुत कोशिश की लेकिन हम सख्ती से पेश आये और उनकी दाल नहीं गलने दी. करीब डेढ बजे हम निजामुद्दीन पहुँच चुके थे.

भरतपुर स्टेशन, भरतपुर में ओटो, केवलादेव पार्क, खजला, खजला फीका और मीठा,द पार्क रिजैन्सी, घना (dense), रिक्शा, लाइसेंस शुदा रिक्शे, बडे-बडे कछुए, सियार, दशहरा मेला भरतपुर, मौत का कुँआ, रोजी-रोटी, प्रयास, प्रयास ब्लौग, bharatpur station, bharatpur auto, kevladev park, khajla, khajla fika mitha, the park regencey, riksha, licence, turtle, siyar, dussera mela, maut ka kuan, roji roti, pryas, pryas blog.