Tag Archives: नरेश दिल्ली

डॉक्टर की पहचान

रसायनशास्त्री नागार्जुन एक राज्य के राज वैद्य थे। एक दिन उन्होंने राजा से कहा, ‘मुझे एक सहायक की जरूरत है।’ राजा ने उनके पास दो कुशल युवकों को भेजा और कहा कि उनमें से जो ज्यादा योग्य लगे उसे रख लें। नागार्जुन ने दोनों की कई तरह से परीक्षा ली पर दोनों की योग्यता एक जैसी थी। नागार्जुन दुविधा में पड़ गए कि आखिर किसे रखें।

अंत में उन्होंने दोनों युवकों को एक पदार्थ दिया और कहा, ‘इसे पहचान कर कोई भी एक रसायन अपनी इच्छानुसार बनाकर ले आओ। हां, तुम दोनों सीधे न जाकर राजमार्ग के रास्ते से जाना।’ दोनों राजमार्ग से होकर अपने-अपने घर चले गए। दूसरे दिन दोनों युवक आए। उनमें से एक युवक रसायन बना कर लाया था जबकि दूसरा खाली हाथ आया था।

आचार्य ने रसायन की जांच की। उसे बनाने वाले युवक से उसके गुण-दोष पूछे। रसायन में कोई कमी नहीं थी। आचार्य ने दूसरे युवक से पूछा, ‘तुम रसायन क्यों नहीं लाए?’ उस युवक ने कहा, ‘मैं पहचान तो गया था मगर उसका कोई रसायन मैं तैयार नहीं कर सका। जब मैं राजमार्ग से जा रहा था तो देखा कि एक पेड़ के नीचे एक बीमार और अशक्त आदमी दर्द से तड़प रहा है। मैं उसे अपने घर ले आया और उसी की सेवा में इतना उलझ गया कि रसायन तैयार करने का समय ही नहीं मिला।’

नागार्जुन ने उसे अपना सहायक रख लिया। दूसरे दिन राजा ने नागार्जुन से पूछा, ‘आचार्य। जिसने रसायन नहीं बनाया उसे ही आपने रख लिया। ऐसा क्यों?’ नागार्जुन ने कहा, ‘महाराज दोनों एक रास्ते से गए थे। एक ने बीमार को देखा और दूसरे ने उसे अनदेखा कर दिया। रसायन बनाना कोई जटिल नहीं था। मुझे तो यह जानना था कि दोनों में कौन मानव सेवा करने में समर्थ है। बीमार व्यक्ति चिकित्सक की दवा से ज्यादा उसके स्नेह और सेवा भावना से ठीक होता है, इसलिए मेरे काम का व्यक्ति वही है जिसे मैंने चुना है।’

संकलन: सुरेश सिंह 
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

रसायनशास्त्री नागार्जुन, रसायन, गुण-दोष, आचार्य नागार्जुन, मानव सेवा, राजमार्ग, naresh seo, pryas ka blog, pryas wordpress, seo delhi, naresh seo delhi, purani kahaniya, singhasan battissi, betal pachisi, hindi kavita, नरेश का ब्लौग, नरेश दिल्ली, प्रयास का ब्लौग, पुरानी कहानियाँ, सिंहासन बत्तीसी, बेताल पच्चीसी, rasayana shashtri, naagarjun, rasayana, gun dosh, acharya nagarjun, manav seva, raajmarg

Advertisements

नम्रता का पाठ

एक बार अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन नगर की स्थिति का जायजा लेने के लिए निकले। रास्ते में एक जगह भवन का निर्माण कार्य चल रहा था। वह कुछ देर के लिए वहीं रुक गए और वहां चल रहे कार्य को गौर से देखने लगे। कुछ देर में उन्होंने देखा कि कई मजदूर एक बड़ा-सा पत्थर उठा कर इमारत पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। किंतु पत्थर बहुत ही भारी था, इसलिए वह इतने मजदूरों के उठाने पर भी उठ नहीं आ रहा था।

ठेकेदार उन मजदूरों को पत्थर न उठा पाने के कारण डांट रहा था पर खुद किसी भी तरह उन्हें मदद देने को तैयार नहीं था। वॉशिंगटन यह देखकर उस ठेकेदार के पास आकर बोले, ‘इन मजदूरों की मदद करो। यदि एक आदमी और प्रयास करे तो यह पत्थर आसानी से उठ जाएगा।’ ठेकेदार वॉशिंगटन को पहचान नहीं पाया और रौब से बोला, ‘मैं दूसरों से काम लेता हूं, मैं मजदूरी नहीं करता।’

यह जवाब सुनकर वॉशिंगटन घोड़े से उतरे और पत्थर उठाने में मजदूरों की मदद करने लगे। उनके सहारा देते ही पत्थर उठ गया और आसानी से ऊपर चला गया। इसके बाद वह वापस अपने घोड़े पर आकर बैठ गए और बोले, ‘सलाम ठेकेदार साहब, भविष्य में कभी तुम्हें एक व्यक्ति की कमी मालूम पड़े तो राष्ट्रपति भवन में आकर जॉर्ज वॉशिंगटन को याद कर लेना।’

यह सुनते ही ठेकेदार उनके पैरों पर गिर पड़ा और अपने दुर्व्यवहार के लिए क्षमा मांगने लगा। ठेकेदार के माफी मांगने पर वॉशिंगटन बोले, ‘मेहनत करने से कोई छोटा नहीं हो जाता। मजदूरों की मदद करने से तुम उनका सम्मान हासिल करोगे। याद रखो, मदद के लिए सदैव तैयार रहने वाले को ही समाज में प्रतिष्ठा हासिल होती है। इसलिए जीवन में ऊंचाइयां हासिल करने के लिए व्यवहार में नम्रता का होना बेहद जरूरी है।’ उस दिन से ठेकेदार का व्यवहार बिल्कुल बदल गया और वह सभी के साथ अत्यंत नम्रता से पेश आने लगा।

संकलन: रेनू सैनी
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

नम्रता का पाठ, अमेरिका के राष्ट्रपति, जॉर्ज वॉशिंगटन, मजदूरों की मदद, सलाम ठेकेदार साहब, मेहनत, व्यवहार में नम्रता, namrata ka paath, americal ke rashtrapati, George Washington, mazdoron ki madad, salam thekedar sahib, mehnat, vayvhar main namrta, naresh seo, pryas ka blog, pryas wordpress, seo delhi, naresh seo delhi, purani kahaniya, singhasan battissi, betal pachisi, hindi kavita, नरेश का ब्लौग, नरेश दिल्ली, प्रयास का ब्लौग, पुरानी कहानियाँ, सिंहासन बत्तीसी, बेताल पच्चीसी

स्वतंत्रता का सुख

पुराने जमाने की बात है। एक सम्राट गहरी चिंता में डूबा रहता। कहने को तो वह शासक था पर वह अपने को अशक्त, परतंत्र और पराजित अनुभव करता था। एक दिन वह अपनी चिंताओं से पीछा छुड़ाने के लिए बहुत दूर एक जंगल में निकल पड़ा। उसे वहां बांसुरी के स्वर सुनाई पड़े। एक झरने के पास वृक्षों की छाया तले एक युवा चरवाहा बांसुरी बजा रहा था। उसकी भेड़ें पास में ही विश्राम कर रही थीं। सम्राट ने चरवाहे से कहा, ‘तुम तो ऐसे आनंदित हो जैसे तुम्हें कोई साम्राज्य मिल गया है।’

चरवाहे ने कहा, ‘आप ठीक कहते हैं। मैं सम्राट हूं।’ राजा ने आश्चर्य से पूछा, ‘तुम्हारे पास ऐसा क्या है, जिसके कारण तुम अपने को सम्राट कहते हो?’ चरवाहा मुस्कराया और बोला, ‘व्यक्ति संपत्ति और ताकत के कारण नहीं स्वतंत्रता के कारण सम्राट होता है। मेरे पास तो कुछ भी नहीं है सिवा स्वयं के। मैं इसे ही अपनी संपदा मानता हूं। सौंदर्य को देखने के लिए मेरे पास आंखें हैं। प्रेम करने के लिए मेरे पास हृदय है। सूर्य जितना प्रकाश मुझे देता है उससे ज्यादा सम्राट को नहीं देता।

चंद्रमा जितनी चांदनी मुझ पर बरसाता है उससे ज्यादा सम्राट पर नहीं बरसाता। सुंदर फूल जितने सम्राट के लिए खिलते हैं उतने ही मेरे लिए भी खिलते हैं। सम्राट पेट भर खाता है और तन भर पहनता है। मैं भी वहीं करता हूं। फिर सम्राट के पास ऐसा क्या है जो मेरे पास नहीं है। कई मामलों में तो मेरे पास एक सम्राट से ज्यादा ही कुछ है जैसे मेरी स्वतंत्रता। मैं जब चाहता हूं संगीत का सुख लेता हूं जब चाहता हूं सो जाता हूं, जबकि एक सम्राट चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकता।’

सम्राट हतप्रभ उस चरवाहे को देखता रहा। फिर उसने कहा, ‘प्यारे भाई। तुम एकदम ठीक कहते हो। जाओ अपने गांव में सबसे कह दो कि इस राज्य का सम्राट भी यही कह रहा था।’

संकलन: त्रिलोक चंद जैन
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

शुद्ध अनाज का असर

महर्षि कणाद परम विरक्त तथा स्वाभिमानी थे। वह फसल की कटाई के बाद खेतों से अन्न के दाने चुनते और उन्हें भगवान को भोग लगाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण करते थे। अन्न के कण चुन-चुन कर खाने के कारण ही उनका नाम कणाद पड़ा। वह हर समय उपासना और अध्ययन-लेखन में लगे रहते थे। एक राजा को जब उनके बारे में पता चला तो उसने रथ पर अनाज लदवाकर अपने मंत्री को उनके पास भेजा।

महर्षि कणाद ने अनाज वापस करते हुए कहा, ‘मैं अपना जीवन निर्वाह जिस रूप में कर रहा हूं, उससे मैं संतुष्ट हूं। कृपया इस अन्न को गरीबों में बंटवा दें।’ राजा ने जब यह बात सुनी तो वह बेहद प्रभावित हुआ और दूसरे दिन स्वयं उनके दर्शन करने पहुंच गया। राजा ने उन्हें प्रणाम कर कहा कि वह उनके लिए हर तरह की सुख-सुविधाएं जुटाएगा ताकि वह निश्चिंत होकर साधना कर सकें।

इस पर कणाद ने कहा, ‘त्याग-तपस्या व्यक्ति की पूंजी होती है। मैं गाय की सेवा करके दूध प्राप्त करता हूं। भूमि की सेवा करके अनाज इकट्ठा करता हूं। इस शुद्ध अनाज से ही मेरे मस्तिष्क में धर्मशास्त्रों का भाष्य लिखने की प्रेरणा प्राप्त होती है। राजकोष का अन्न खाकर वह लुप्त हो जाएगी।’ राजा उन्हें दंडवत कर लौट गया।

साभार: नवभारत टाइम्स

हे राम, जवाब दो…

हाँ, हाँ सुने हैं…
…सुने हैं तेरे बडप्पन के चर्चे,
बनता है तू मर्यादा पुरूषोत्तम,
और ये भी सुना है कि तूने,
ली थी अग्नि परिक्षा,
एक पतिव्रता स्त्री की.

तुझे आदर्श मान कर,
सुना है कलियुग में,
लोग अनुसरण करते है तेरा,
पर तूने किसका अनुसरण किया था,
उसे घर से निकाल कर?

तूने क्या पाप किया था, बता?
जो लडनी पडी थी, तुझे,
अपने ही बच्चों से लडाई,
और हाँ, ये भी सच है,
कि तूने मुँह की खाई थी, नन्हों से.

और उस भाई का क्या?
जिसने जिन्दगी गुजार दी,
तेरी ही सेवा में,
उसको भी मार दिया,
केवल एक प्रतिज्ञा के लिये.

न जाने किन मर्यादाओं के लिये,
बना है तू पुरूषोत्तम,
कभी सामना होगा तो पुछूँगा,
मैं…राम,
इन सवालों के जवाब,
क्या तुम दे पाओगे?