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उत्तराखण्ड त्रासदी पर

शिव को दोष मत दे रे ऐ बेगैरत इंसान
दुषकर्मों का मिल रहा है ये तुझको ईनाम…1

uttarakhand flood 2013

शीश झुका मैं कर रहा था अपने शिव का ध्यान
तब चुपके से आया था वो नरभक्षी हैवान…2

आफत में जब पडी हुई थी उन लोगों की जान
मानवता को कुचल रहे थे तब भी कुछ शैतान…3

पर्वत नदीयाँ वृक्ष धरा ही हैं असली भगवान
इनकी रक्षा करके ही अब बच सकती है जान…4

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मेरा वैलैंटाइन – हास्य कविता

इस बार हमने सोचा
हम भी वैलैंटाईन डे मनायेंगे
अपनी मैडम को पिक्चर दिखायेंगे
हमारा भी तो दोस्तों में रुतबा बढेगा
घरेलू लडका है फिर कोई नहीं कहेगा
बस कर लिये दो टिकट ऐडवांस में बुक
श्रीमति जी के चेहरे का देखने लायक था लुक
मुस्कुराते हुए बोलीं कार्नर की ली हैं ना
हमने कहा हाँ एक दाहिना एक बाहिना.

तो हम भी पहुँच गये मैडम के संग
देखने सलमान की लेटेस्ट फिल्म दबंग
ये फिल्म देखना का मेरा पहला टैस्ट था
मैडम का सलमान में कुछ ज्यादा ही इंट्रस्ट था
वो बाहर से तो हम पर ही मर रही थी
पर तारिफ सलमान की ही कर रही थी

फिल्म का जैसे ही हुआ इंटरवल
मैडम जी के माथे पर आ गये बल
गुस्से में बोली, “आज के दिन भी भूखा मारोगे”
जेब में रखे पैसों की क्या आरती उतारोगे
पूरा सिनेमा हाल हमें लानत भेज रहा था
फिल्म के इंटरवल में हमारा ट्रेलर देख रहा था

हम फौरन कैंटीन की तरफ दौडे
ना ब्रैड दिखे ना ही पकौडे
चारों तरफ बस माल ही माल दिख रहा था
हर काउंटर पर पापकार्न और पिज्जा ही बिक रहा था
कुछ देर तक आँखें सेकीं और दिल ठंडा किया
फिर धर्मपत्नी जी के लिये एक ठंडा लिया

ठंडा लेकर हाल में हम जैसे ही पहुँचे
श्रीमति जी पिल पडी बिना कुछ सोचे
बडे प्यार से मुझे डांट कर बोली
अभी तक ठंडे की बोतल भी नहीं खोली
हम बोले सलमान खान से ध्यान हटाओ
बोतल खुली है अब इस पर ध्यान लगाओ

ठंडा पीते ही मैडम गुर्राई
ये ठंडा है या गर्म मेरे भाई
लो जी अब तो कमाल हो गया
सलमान के सामने मैं भाई हो गया
मैंने चुपचाप से सौरी का सहारा लिया
गर्म होते मामले का वहीं निपटारा किया

जैसे तैसे सलमान की दबंगई हुई खत्म
हमारे अंदर भी आ गया थोडा सा दम
धर्मपत्नी बोली अब क्या दिलवाओगे
हम बोले अभी तक क्या दिलवाया है?
वो बोली ज्यादा मजाक नहीं चलेगा
घर जाकर धोऊं या यहीं पिटेगा?

हमने चुपचाप चुप्पी साध ली
सीधे अपने घर की राह ली
आज हमें एक शिक्षा मिली थी
कि वैलंटाईन हो या करवा चौथ
रक्षा बंधन हो या भैया दौज
सब प्यार मौहब्बत ही फैलाते हैं
और इनका मजा तब ही आता है
जब आप इन्हें घर पर ही मनाते हैं

घर पर ना होगी सलमान की दबंगाई
और ना होगी बाजार में आपकी पिटाई

 

दिल्ली पुलिस – जाँच का तरीका

पूर्वी दिल्ली में एक डी.डी.ए. की कालोनी है मयूर विहार, फेज-1. यूं तो मयूर विहार, फेज-2 और  3 भी हैं. लेकिन फेज-1 इनमें सबसे पुरानी कालोनी है. इस मयूर विहार में एक छोटा सा नर्सिंग होम है कुकरेजा नर्सिंग होम. यहाँ 24 घंटे बीमार लोगों की आवाजाही लगी रहती है.

यह नर्सिंग होम थाना पांडव नगर के अन्तृगत आता है. पिछले कुछ दिनों से मैंने यहाँ एक अजीब बात देखी. वैसे पूरी दिल्ली में दिल्ली पुलिस ने बाईकर्स के खिलाफ जंग छेड रखी है. कागज पूरे ना पाये जाने पर या तो उन्हें बंद किया जा रहा है या उनका चालान किया जा रहा है. अच्छी बात है, अपराधी तत्व इन बाईकों पर बैठ कर राहजनी, लूटपाट और चेन छपटने में उस्ताद हो गये हैं.

लेकिन जो नजारा मैंने कुकरेजा नर्सिंग होम पर देखा वह अद्भुत पाया. वाहन चेकिंग के लिये दिल्ली पुलिस बैरिकेटिंग करके वाहन चैक करती है. लेकिन यहाँ पुलिस को इतनी मेहनत भी नहीं करनी पडती. यह नर्सिंग होम एक मोड पर बना हुआ है और सामने ही एक डिसपैन्सरी भी है. पुलिस की मिलीभगत से यहाँ बहुत से ठेले वाले खडे रहते हैं. और इसके अतिरिक्त मयूर विहार, फेज-1 के पाकेट-5 पर जाने के लिये एक मुख्य सडक भी है. कुल मिला कर यहाँ बहुत ही भीड रहती है और आपको अपनी गाडी की स्पीड ना चाहते हुए भी धीरे करनी ही पडेगी. और हाँ यहाँ दिनभर एमबुलैन्स की आवाजाही भी लगी रहती है.

तो जी, अब पुलिस वालों को ये मोड जंच गया. अब वो यहाँ वाहन चैकिंग के लिये कोई बैरिकेटिंग नहीं करते और ना ही यहाँ 4-5 पुलिस वालों की आवश्यकता पडती. केवल दो पुलिस वाले चुप-चाप बाईक में यहाँ आते हैं और एक चाय वाले के यहाँ बीडी व चायपान करते हैं. इस खास नाश्ते के बाद इनकी फुर्ती देखने लायक होती है.

ये चुप-चाप चाय की दुकान में खडे रहते हैं और जैसे ही कोई मरीज आता है तो जाहिर सी बात है कि दो-चार लोग और साथ में आते हैं. और यदि ये लोग स्कूटर या बाईक पर होते हैं तो पुलिस वाले चुपचाप उनके पास चले आते हैं और फिर आवश्यक कागज और हेलमेट क्यों नहीं पहना से जेब गर्म करने की भूमिका बनाई जाती है. अब बेचारे लोग आपातस्तिथी के कारण हेलमेट ना पहनपाने या कागज ना लापाने की बात समझाने की नाकाम कोशिश करते हैं. लेकिन पुलिस वालों के कान तो भर्ती के समय ही बंद कर दिये जाते हैं. केवल बोलना है ही सिखाया जाता है इन्हें, और बोलना क्या बल्कि डांटना या धमकाना कहिये जनाब!

अब जो जैसा मिल जाये उसी के हिसाब से अस्पताल के बाहर ही उन तिमारदारों का ईलाज कर दिया जाता है. अब तिमारदार भी कुछ ले-देकर मामला रफा-दफा करने को प्राथमिकता देते हैं. अपने मरीज को भर्ती जो करवाना है. और यदि कोई व्यक्ति फुरसत में हो और पैसे देने में आनाकानी करे तो बस सीधा कोर्ट का चालान.

यह पूरी कार्यवाही सुरक्षा की दृष्टि से की गई हो ऐसा समझने का मैने भरसक प्रयास किया लेकिन सफल ना हो सका. यकीन मानिये मैंने एक दिन हिम्म्त करके उनसे पूछा कि आप सीधी तरह से सडक पर खडे होने के स्थान पर चाय वाले के पास क्यों खडे रहते हैं. तो उनका जवाब था कि लोग हमें देख कर भाग जाते हैं. और इसीलिये आप रोगीयों के रिश्तेदारों को निशाना बना रहे हैं – मैंने झट से कहा. क्यों इब तू काम सिखायगा हमैं. लिकड ले यहाँ सै. अर नहीं तो तेरेई पडलैगा एक-आधा. आया रोगीयन का ठेकेदार – जैसी लताड सुनने को मिली.

अब ये क्या तरीका है. सुरक्षा के नाम पर वाहन चैकिंग करते पुलिस वालों को देखकर जहाँ मैं सुरक्षित महसूस करता था, वहीं उनके इस रैवैये को देखकर मेरे मन में दिल्ली पुलिस की रही सही छवि और भी खराब हो गयी.

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जीवन की नाव

एक संत थे। उनके कई शिष्य उनके आश्रम में रहकर अध्ययन करते थे। एक दिन एक महिला उनके पास रोती हुए आई और बोली, ‘बाबा, मैं लाख प्रयासों के बाद भी अपना मकान नहीं बना पा रही हूं। मेरे रहने का कोई निश्चित ठिकाना नहीं है। मैं बहुत अशांत और दु:खी हूं। कृपया मेरे मन को शांत करें।’

उसकी बात पर संत बोले, ‘हर किसी को पुश्तैनी जायदाद नहीं मिलती। अपना मकान बनाने के लिए आपको नेकी से धनोपार्जन करना होगा, तब आपका मकान बन जाएगा और आपको मानसिक शांति भी मिलेगी।’ महिला वहां से चली गई। इसके बाद एक शिष्य संत से बोला, ‘बाबा, सुख तो समझ में आता है लेकिन दु:ख क्यों है? यह समझ में नहीं आता।’

उसकी बात सुनकर संत बोले, ‘मुझे दूसरे किनारे पर जाना है। इस बात का जवाब मैं तुम्हें नाव में बैठकर दूंगा।’ दोनों नाव में बैठ गए। संत ने एक चप्पू से नाव चलानी शुरू की। एक ही चप्पू से चलाने के कारण नाव गोल-गोल घूमने लगी तो शिष्य बोला, ‘बाबा, अगर आप एक ही चप्पू से नाव चलाते रहे तो हम यहीं भटकते रहेंगे, कभी किनारे पर नहीं पहुंच पाएंगे।

उसकी बात सुनकर संत बोले, ‘अरे तुम तो बहुत समझदार हो। यही तुम्हारे पहले सवाल का जवाब भी है। अगर जीवन में सुख ही सुख होगा तो जीवन नैया यूं ही गोल-गोल घूमती रहेगी और कभी भी किनारे पर नहीं पहुंचेगी। जिस तरह नाव को साधने के लिए दो चप्पू चाहिए, ठीक से चलने के लिए दो पैर चाहिए, काम करने के लिए दो हाथ चाहिए, उसी तरह जीवन में सुख के साथ दुख भी होने चाहिए।

जब रात और दिन दोनों होंगे तभी तो दिन का महत्व पता चलेगा। जीवन और मृत्यु से ही जीवन के आनंद का सच्चा अनुभव होगा, वरना जीवन की नाव भंवर में फंस जाएगी।’ संत की बात शिष्य की समझ में आ गई।

 

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पेशे की इज्जत

यह घटना उन दिनों की है जब फ्रांस में विद्रोही काफी उत्पात मचा रहे थे। सरकार अपने तरीकों से विद्रोहियों से निपटने में जुटी हुई थी। काफी हद तक सेना ने विद्रोह को कुचल दिया था , फिर भी कुछ शहरों में स्थिति खराब थी। इन्हीं में से एक शहर था लिथोस। लिथोस में विद्रोह पूर्णतया दबाया नहीं जा सका था , लिहाजा जनरल कास्तलेन जैसे कड़े अफसर को वहां नियंत्रण के लिए भेजा गया। कास्तलेन विद्रोहियों के साथ काफी सख्ती से पेश आते थे।

इसलिए विद्रोहियों के बीच उनका खौफ भी था और वे उनसे चिढ़ते भी थे। इन्हीं विद्रोहियों में एक नाई भी था , जो प्राय : कहता फिरता – जनरल मेरे सामने आ जाए तो मैं उस्तरे से उसका सफाया कर दूं। जब कास्तलेन ने यह बात सुनी तो वह अकेले ही एक दिन उसकी दुकान पर पहुंच गया और उसे अपनी हजामत बनाने के लिए कहा। वह नाई जनरल को पहचानता था। उसे अपनी दुकान पर देखकर वह बुरी तरह घबरा गया और कांपते हाथों से उस्तरा उठाकर जैसे – तैसे उसकी हजामत बनाई।

काम हो जाने के बाद जनरल कास्तलेन ने उसे पैसे दिए और कहा – मैंने तुम्हें अपना गला काटने का पूरा मौका दिया। तुम्हारे हाथ में उस्तरा था , मगर तुम उसका फायदा नहीं उठा सके। इस पर नाई ने कहा – ऐसा करके मैं अपने पेशे के साथ धोखा नहीं कर सकता था। मेरा उस्तरा किसी की हजामत बनाने के लिए है किसी की जान लेने के लिए नहीं। वैसे मैं आपसे निपट लूंगा जब आप हथियारबंद होंगे। लेकिन अभी आप मेरे ग्राहक हैं। कास्तलेन मुंह लटकाकर चला गया।

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सदाचरण से सम्मान

प्राचीन समय में वाराणसी के राज पुरोहित हुआ करते थे- देव मित्र। राजा को राज पुरोहित की विद्वता और योग्यता पर बहुत भरोसा था। राजा इसलिए उनकी हर बात मानते थे। प्रजा के बीच भी राज पुरोहित का काफी आदर था। एक दिन राज पुरोहित के मन में सवाल उठा कि राजा और दूसरे लोग जो मेरा सम्मान करते हैं, उसका कारण क्या है? राज पुरोहित ने अपने इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए एक योजना बनाई।

अगले दिन दरबार से लौटते समय उन्होंने राज कोषागार से एक स्वर्ण मुद्रा चुपचाप ले ली, जिसे कोष अधिकारी ने देखकर भी नजरंदाज कर दिया। राज पुरोहित ने दूसरे दिन भी दरबार से लौटते समय दो स्वर्ण मुद्राएं उठा लीं। कोष अधिकारी ने देखकर सोचा कि शायद किसी प्रयोजन के लिए वे ऐसा कर रहे हैं, बाद में अवश्य बता देंगे। तीसरे दिन राज पुरोहित ने मुट्ठी में स्वर्ण मुद्राएं भर लीं। इस बार कोष अधिकारी ने उन्हें पकड़कर सैनिकों के हवाले कर दिया। उनका मामला राजा तक पहुंचा। न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठे राजा ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि राज पुरोहित द्वारा तीन बार राजकोष का धन चुराया गया है। इस दुराचरण के लिए उन्हें तीन महीने की कैद दी जाए ताकि वह फिर कभी ऐसा अपराध न कर सकें।

राजा के निर्णय से राज पुरोहित को अपने सवाल का जवाब मिल चुका था। राज पुरोहित ने राजा से निवेदन किया, ‘राजन मैं चोर नहीं हूं। मैं यह जानना चाहता था कि आपके द्वारा मुझे जो सम्मान दिया जाता है, उसका सही अधिकारी कौन है, मेरी योग्यता, विद्वता या मेरा सदाचरण। आज सभी लोग समझ गए हैं कि सदाचरण को छोड़ते ही मैं दंड का अधिकारी बन गया हूं। सदाचरण और नैतिकता ही मेरे सम्मान का मूल कारण थी।’ इस पर राजा ने कहा कि वह उनकी बात समझ रहे हैं मगर दूसरों को सीख देने के लिए उनका दंडित होना आवश्यक है।

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विश्वास की रक्षा

बात तब की है जब अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल पकड़ लिए गए। उन्हें कोतवाली लाया गया। कोतवाली में निगरानी रखने वाला सिपाही सो रहा था। बिस्मिल के पास भागने का पूरा मौका था। उन्होंने देखा कि वहां केवल बुजुर्ग मुंशीजी जागे हुए हैं। बूढ़े मुंशी ने भांप लिया कि बिस्मिल भागने की सोच रहे हैं। वह तुरंत बिस्मिल के पैरों पर गिर गए और बोले, ‘ऐसा न करना। नहीं तो मैं बंदी बना लिया जाऊंगा और मेरे बच्चे भूखों मर जाएंगे।’

बिस्मिल को उन पर दया आ गई और उन्होंने भागने का विचार तत्काल त्याग दिया। संयोगवश दो दिनों के बाद ही ऐसा मौका उन्हें फिर मिला। उन्हें जब शौचालय ले जाया गया तो उनके साथ दो सिपाही थे। एक ने दूसरे से कहा कि इनके हाथों में बंधी रस्सियां हटा दो। मुझे विश्वास है कि ये भागेंगे नहीं। इसके बाद जब बिस्मिल शौचालय गए तो पाया कि शौचालय की दीवार ज्यादा ऊंची नहीं है। बस हाथ बढ़ाते ही वह दीवार के ऊपर हो जाते और क्षण भर में बाहर निकल जाते।

उन्होंने देखा कि बाहर सिपाही कुश्ती देखने में मगन हैं। वह भागने ही वाले थे कि उन्हें विचार आया कि जिस सिपाही ने विश्वास कर इतनी स्वतंत्रता दी उससे विश्वासघात कैसे करूं। उन्होंने भागने का विचार तुरंत त्याग दिया। उन्होंने अपनी आत्मकथा में जेलर पंडित चंपालाल की भी काफी बड़ाई की है। उन्हें भागने के कई मौके हासिल हुए लेकिन उन्होंने सोचा कि इससे पंडित चंपालाल के ऊपर आफत आ जाएगी। बिस्मिल के लिए विश्वास की रक्षा सबसे बड़ी चीज थी।

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महारानी का हार

 एक बार वीरगढ़ राज्य की महारानी का हार कहीं खो गया। महारानी को हार बहुत प्रिय था। उन्होंने हार ढूंढने की बहुत कोशिश की पर वह नहीं मिला। हार के लिए महारानी को बहुत परेशान देखकर राजा ने घोषणा करवा दी कि जिस व्यक्ति को भी हार मिला हो, वह तीन दिनों के भीतर उसे वापस कर दे अन्यथा उसे मृत्युदंड का भागी होना पड़ेगा।

यह संयोग था कि हार एक संन्यासी को मिला था। उसके मन में हार के प्रति कोई आकर्षण नहीं था, फिर भी उसने यह सोचकर रख लिया कि कोई ढूंढता हुआ आएगा तो उसे दे देगा। उसने अगले दिन राजा की घोषणा सुनी, पर वह हार देने नहीं गया। वह अपनी साधना में लीन रहा। तीन दिन बीत गए।

चौथे दिन संन्यासी हार लेकर राजा के पास पहुंचा। राजा को जब पता चला कि तीन दिनों से हार उसके पास था, तो उसने क्रोधित होकर पूछा, ‘क्या तुमने मेरी घोषणा नहीं सुनी थी?’ संन्यासी ने जवाब दिया ‘सुनी थी, पर यदि मैं कल हार लौटाने आ जाता तो लोग कहते कि एक संन्यासी होकर मृत्यु से भयभीत हो गया।’ इस पर राजा ने पूछा, ‘तो आज चौथे दिन क्यों लाए?’ इस पर संन्यासी ने कहा, ‘मुझे मौत का भय नहीं है। पर मैं किसी दूसरे की संपत्ति को अपने पास रखना पाप समझता हूं। हार जैसी तुच्छ चीज से मुझे कोई लगाव नहीं।’ यह उत्तर सुनकर राजा लज्जित हो गया। महारानी को भी अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने हार बेचकर वह राशि गरीबों में बंटवा दी।

संकलन: लखविन्दर सिंह
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

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संपूर्ण सुंदरता

एक बार कुदरत के सातों रंगों के बीच बहस छिड़ गई। प्रत्येक रंग यह साबित करने में लगा था कि वही सब से श्रेष्ठ है। सबसे पहले हरे रंग ने कहा कि वह जीवन और हरियाली का प्रतीक है, इसलिए ईश्वर ने उसका चयन खास तौर पर पत्तों के रंग के लिए किया है।

धरती का एक बड़ा भाग हरियाली से ढका हुआ है। नीले रंग ने उसकी बात काटते हुए कहा, ‘आकाश व समुद का रंग नीला है। जल ही जीवन है। नीला जल नीले आकाश के बादलों से होकर नीले समुद्र में समा जाता है। बिना इस चक्र के विकास संभव नहीं, इसलिए मैं तुम सबसे श्रेष्ठ हूं।’

तब पीला रंग बोला, ‘पीला खुशहाली का प्रतीक है। सूरज पीला है। पीली सूरजमुखी सारी दुनिया में हंसी व खुशी देती है। इसलिए मैं ही सर्वश्रेष्ठ स्थान का अधिकारी हूं।’ तभी नारंगी रंग ने कहा, ‘मैं मिठास और स्वास्थ्य का प्रतीक हूं। सभी मीठे व लाभकारी फलों पपीता, गाजर, आम व संतरा की छटा नारंगी है।’ तभी जामुनी रंग ने कहा, ‘श्रेष्ठ तो मैं हूं क्योंकि मैं पानी की गहराई व मन की शांति का प्रतीक हूं।’

वर्षा ऋतु रंगों की इस सारी बहस को ध्यान से सुन रही थी। वह पास आकर बोली, ‘तुम सभी श्रेष्ठ हो। सभी को ईश्वर ने किसी न किसी खास कारण से बनाया है। लेकिन सर्वश्रेष्ठ है तुम सबका एक साथ होना। रंगों को यह उपदेश जैसी बात अच्छी नहीं लगी, वे तो सिर्फ अपनी तारीफ सुनना चाहते थे। तभी आकाश में जोर से बिजली कड़की। सभी रंगों ने डर कर एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया और आकाश में बड़ा-सा इंद्रधनुष दिखाई देने लगा। रंगों ने देखा, सभी उनकी छटा निहार रहे थे। वर्षा ऋतु ने हंस कर समझाया, ‘तुम सबके अलग-अलग प्रशंसक हैं, लेकिन तुम्हारा एक साथ होना संपूर्ण जगत के लिए सुंदरता और जीवन का संदेश है।’ इसके बाद रंगों ने कभी एक-दूसरे से झगड़ा नहीं किया।

संकलन : अनामिका कौशिक
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

आकाश व समुन्द्र, नीला रंग, पीला रंग, नारंगी रंग, जामुनी रंग, आम व संतरा, हरा रंग, संतरी रंग, सभी श्रेष्ठ हो,
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परोपकार का रास्ता

बहुत पुरानी बात है। फिलाडेल्फिया में फ्रैंकलिन नामक एक गरीब युवक रहता था। उसके मोहल्ले में हमेशा अंधेरा रहता था। वह रोज यह देखता था कि अंधेरे में आने-जाने में लोगों को बहुत दिक्कत होती है।

एक दिन उसने अपने घर के सामने एक बांस गाड़ दिया और शाम को उस पर एक लालटेन जला कर टांग दिया। लालटेन से उसके घर के सामने उजाला हो गया। लेकिन मोहल्ले के लोगों ने इसके लिए उसका मजाक उड़ाया। एक व्यक्ति बोला, ‘फ्रैंकलिन, तुम्हारे एक लालटेन जला देने से कुछ नहीं होगा। पूरे मोहल्ले में तो अंधेरा ही रहेगा।’

उसके घर वालों ने भी उसके इस कदम का विरोध किया और कहा, ‘तुम्हारे इस काम से फालतू में पैसा खर्च होगा।’ फ्रैंकलिन ने कहा, ‘मानता हूं कि एक लालटेन जलाने से ज्यादा लोगों को फायदा नहीं होगा मगर कुछ लोगों को तो इसका लाभ मिलेगा ही।’ कुछ ही दिनों में इसकी चर्चा शुरू हो गई और फ्रैंकलिन के प्रयास की सराहना भी होने लगी। उसकी देखादेखी कुछ और लोग भी अपने-अपने घरों के सामने लालटेन जला कर टांगने लगे।

एक दिन पूरे मोहल्ले में उजाला हो गया। यह बात शहर भर में फैल गई और म्युनिसिपल कमेटी पर चारों तरफ से यह दबाव पड़ने लगा कि वह उस मोहल्ले में रोशनी का इंतजाम अपने हाथ में ले। कमेटी ने ऐसा ही किया। इस तरह फ्रैंकलिन की शोहरत चारों तरफ फैल गई। एक दिन म्युनिसिपल कमेटी ने फ्रैंकलिन का सम्मान किया। इस मौके पर जब उससे पूछा गया कि उसके मन में यह खयाल कैसे आया, तो फ्रैंकलिन ने कहा, ‘मेरे घर के सामने रोज कई लोग अंधेरे में ठोकर खाकर गिरते थे। मैंने सोचा कि मैं ज्यादा तो नहीं लेकिन अपने घर के सामने थोड़ा तो उजाला कर ही सकता हूं। हर अच्छे काम के लिए पहल किसी एक को ही करना पड़ती है। अगर हर कोई दूसरे के भरोसे बैठा रहे तो कभी अच्छे काम की शुरुआत होगी ही नहीं।’

संकलन: सुरेश सिंह
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

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