एक पेच कसने की कीमत

एक बार एक कारखाने के मालिक की मशीन ने काम करना बंद कर दिया. कई दिनों की मेहनत के बाद भी मशीन ठीक नहीं हो पायी. मालिक को रोज लाखों का नुकसान हो रहा था.

तभी वहाँ एक कारीगर पहुँचा और उसने दावा किया की वो मशीन को ठीक कर सकता है. मालिक  फौरन ही उसे कार्यशाला में ले गया. मशीन ठीक करने से पहले कारीगर ने मालिक से कहा कि वो मशीन तो ठीक कर देगा लेकिन मेहनताना अपनी मर्जी से तय करेगा. मालिक का तो रोज लाखों का नुकसान रोज हो रहा था इसलिये वो मान गया.

कारीगर ने पूरी मशीन का मुआयाना किया और एक पेच को कस दिया. मशीन को चालू किया गया. मशीन ने कार्य करना शुरू कर दिया था. मालिक बहुत खुश हु़आ. कारीगर ने दस हजार रूपया मेहनताना मांगा. मालिक को बहुत आश्चर्य हुआ. केवल एक पेच कसने के दस हजार रूपय! लेकिन उसने अपना वादा निभाया और दस हजार रूपय कारीगर को देते हुये पूछा कि एक पेच कसने के दस हजार रूपय कुछ ज्यादा नहीं हैं?

कारीगर ने तुरंत जवाब दिया – साहब पेच कसने का तो केवल मैंने एक रूपया लिया है बाकि 9999 रूपय तो कौन सा पेच कसना है यह पता करने के लिये हैं.

मालिक उसका जवाब सुनकर बहुत खुश हुआ और उसे अपने कारखाने में एक उच्चपद पर नौकरी पर रख लिया.

पेशे की इज्जत

यह घटना उन दिनों की है जब फ्रांस में विद्रोही काफी उत्पात मचा रहे थे। सरकार अपने तरीकों से विद्रोहियों से निपटने में जुटी हुई थी। काफी हद तक सेना ने विद्रोह को कुचल दिया था , फिर भी कुछ शहरों में स्थिति खराब थी। इन्हीं में से एक शहर था लिथोस। लिथोस में विद्रोह पूर्णतया दबाया नहीं जा सका था , लिहाजा जनरल कास्तलेन जैसे कड़े अफसर को वहां नियंत्रण के लिए भेजा गया। कास्तलेन विद्रोहियों के साथ काफी सख्ती से पेश आते थे।

इसलिए विद्रोहियों के बीच उनका खौफ भी था और वे उनसे चिढ़ते भी थे। इन्हीं विद्रोहियों में एक नाई भी था , जो प्राय : कहता फिरता – जनरल मेरे सामने आ जाए तो मैं उस्तरे से उसका सफाया कर दूं। जब कास्तलेन ने यह बात सुनी तो वह अकेले ही एक दिन उसकी दुकान पर पहुंच गया और उसे अपनी हजामत बनाने के लिए कहा। वह नाई जनरल को पहचानता था। उसे अपनी दुकान पर देखकर वह बुरी तरह घबरा गया और कांपते हाथों से उस्तरा उठाकर जैसे – तैसे उसकी हजामत बनाई।

काम हो जाने के बाद जनरल कास्तलेन ने उसे पैसे दिए और कहा – मैंने तुम्हें अपना गला काटने का पूरा मौका दिया। तुम्हारे हाथ में उस्तरा था , मगर तुम उसका फायदा नहीं उठा सके। इस पर नाई ने कहा – ऐसा करके मैं अपने पेशे के साथ धोखा नहीं कर सकता था। मेरा उस्तरा किसी की हजामत बनाने के लिए है किसी की जान लेने के लिए नहीं। वैसे मैं आपसे निपट लूंगा जब आप हथियारबंद होंगे। लेकिन अभी आप मेरे ग्राहक हैं। कास्तलेन मुंह लटकाकर चला गया।

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मेरे ब्लौग प्रयास का वार्षिक विवरण (2011)

The WordPress.com stats helper monkeys prepared a 2011 annual report for this blog.

Here’s an excerpt:

The Louvre Museum has 8.5 million visitors per year. This blog was viewed about 190,000 times in 2011. If it were an exhibit at the Louvre Museum, it would take about 8 days for that many people to see it.

Click here to see the complete report.

सदाचरण से सम्मान

प्राचीन समय में वाराणसी के राज पुरोहित हुआ करते थे- देव मित्र। राजा को राज पुरोहित की विद्वता और योग्यता पर बहुत भरोसा था। राजा इसलिए उनकी हर बात मानते थे। प्रजा के बीच भी राज पुरोहित का काफी आदर था। एक दिन राज पुरोहित के मन में सवाल उठा कि राजा और दूसरे लोग जो मेरा सम्मान करते हैं, उसका कारण क्या है? राज पुरोहित ने अपने इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए एक योजना बनाई।

अगले दिन दरबार से लौटते समय उन्होंने राज कोषागार से एक स्वर्ण मुद्रा चुपचाप ले ली, जिसे कोष अधिकारी ने देखकर भी नजरंदाज कर दिया। राज पुरोहित ने दूसरे दिन भी दरबार से लौटते समय दो स्वर्ण मुद्राएं उठा लीं। कोष अधिकारी ने देखकर सोचा कि शायद किसी प्रयोजन के लिए वे ऐसा कर रहे हैं, बाद में अवश्य बता देंगे। तीसरे दिन राज पुरोहित ने मुट्ठी में स्वर्ण मुद्राएं भर लीं। इस बार कोष अधिकारी ने उन्हें पकड़कर सैनिकों के हवाले कर दिया। उनका मामला राजा तक पहुंचा। न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठे राजा ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि राज पुरोहित द्वारा तीन बार राजकोष का धन चुराया गया है। इस दुराचरण के लिए उन्हें तीन महीने की कैद दी जाए ताकि वह फिर कभी ऐसा अपराध न कर सकें।

राजा के निर्णय से राज पुरोहित को अपने सवाल का जवाब मिल चुका था। राज पुरोहित ने राजा से निवेदन किया, ‘राजन मैं चोर नहीं हूं। मैं यह जानना चाहता था कि आपके द्वारा मुझे जो सम्मान दिया जाता है, उसका सही अधिकारी कौन है, मेरी योग्यता, विद्वता या मेरा सदाचरण। आज सभी लोग समझ गए हैं कि सदाचरण को छोड़ते ही मैं दंड का अधिकारी बन गया हूं। सदाचरण और नैतिकता ही मेरे सम्मान का मूल कारण थी।’ इस पर राजा ने कहा कि वह उनकी बात समझ रहे हैं मगर दूसरों को सीख देने के लिए उनका दंडित होना आवश्यक है।

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आओ शिमला चलें

शिमला रेल मोटर कार

शिमला रेल मोटर कार

शिमला

शिमला

शिमला रिज

शिमला रिज

शिमला चर्च

शिमला चर्च

शिमला गार्ड

शिमला गार्ड

शिमला बाजार

शिमला बाजार

शिमला बाजार

शिमला बाजार

शिमला फौग

शिमला फौग

शिमला का मस्त मौसम

शिमला का मस्त मौसम

शिमला का मस्त मौसम

शिमला का मस्त मौसम

शिमला हैलीपैड पर जबर्दस्त ठंड

शिमला हैलीपैड पर जबर्दस्त ठंड

शिमला सैंट एडवर्ड स्कूल

शिमला सैंट एडवर्ड स्कूल

शिमला पार्किंग

शिमला पार्किंग

क्लार्कस होटल शिमला

क्लार्कस होटल शिमला

शिमला साईनबोर्ड

शिमला साईनबोर्ड

शिमला बाजार

शिमला बाजार

शिमला रिज

शिमला रिज

होटल शिंगार शिमला

होटल शिंगार शिमला

ईंदिरा गाँधी राज्य खेल परिसर शिमला

ईंदिरा गाँधी राज्य खेल परिसर शिमला

अब वापिस घर चलें

अब वापिस घर चलें

बाय बाय शिमला

बाय बाय शिमला

 

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मेरी भरतपुर यात्रा

2 अक्तुबर (2009), शुक्रवार को छुट्टी थी. तीन दिनों का ल‌बा सप्ताहांत. हम तीन दोस्त मै, रमेश और महेन्द्र ने झटपट घूमने का प्रोग्राम बनाया. कहां जाया जाये – यह सोचना हमेशा की तरह मेरे हिस्से मे‌ ही आया. हरिद्वार, ऋषिकेष, मंसूरी, शिमला घूम-घूम कर हम बोर हो चुके थे. भरतपुर जाने का हमारा प्रोग्राम कई बार रद्द हो चुका था इसलिये इस बार वहीं जाने का एलान कर दिया.

जाने की टिकिट बुक नहीं थी. निजामुद्दीन से ताज एक्सप्रैस पकडकर हम पहले मथुरा जंकश्न तक गये (टिकिट 50 रूपय). दिल्ली से मथुरा तक करीब दो घंटे लगते हैं. वहां से निजामुद्दीन से ही आने वाली गोलडन टैम्पल में भरतपुर का जनरल टिकिट लेकर स्लीपर कोच मे‌ सवार हो लिये (टिकिट 28 रूपय).  भरतपुर मथुरा से अगला स्टेशन ही है और दूरी है करीब तीस किलोमीटर है .केवल आधा घंटा लगता है. ट्रेन में सवार होते ही सबसे पहले मुलाकात हुई टी. टी. साहब से जिसका अंदेशा मुझे पहले से ही था. टी. टी. साहब ने जनरल टिकिट लेकर स्लीपकर में यात्रा करने के उपलक्ष में जुर्माने की ईनामी राशि 1200 रूपय घोषित कर दी. बाद मे‌ केवल एक व्यक्ती का जुर्माना – तीन सौ पचास रूपय देने पर बात बन गयी. जुर्माना देने के बाद थोडी शांती मिली. हालांकि रिश्व्त देने की नाकाम कोशिश भी की गई लेकिन कुछ फायदा ना हो सका. सिविल ड्रैस के टी. टी. को देख कर एक बार तो लगा की नीरज जाट जी की तर्ज पर इससे आई-कार्ड पूछ ही लूं. लेकिन फिर 1200 रूपय का ध्यान आते ही विचार बदल गया.

पौने ग्यारह बजे हम भरतपुर के स्टेशन की शोभा बढा रहे थे. यह पांच प्लेटफार्म वाला एक छोटा सा स्टेशन है. प्यास बहुत जोर से लग रही थी. ठंडे पानी का कूलर स्टेशन पर लगा हूआ था. पानी पिया तो बहुत ही खारा था पानी पिया ही नही‌ गया. स्टेशन से बाहर निकले तो बहुत से ओटो वाले खडे हुए थे. भरतपुर में रस्सी से स्टार्ट होने वाले ओटो बहुत हैं.

हमने चालीस रूपय में केवलादेव पार्क के लिये ओटो किया. भरतपुर मे‌ सडकों की हालत बहुत खस्ता है. जगह-जगह गढ्ढे और टूटी सडक के ही दर्शन होते हैं. स्टेशन से बाहर निकलते ही हलवाई की दुकानें नजर आईं जहाँ खजला बिक रहा था. खजला एक तरह का पकवान है जो मैदे से बनता है. यह फीका और मीठा दोनो तरह का होता है. देखने मे‌ यह एक बडे आकार का भठुरे जैसा दिखता है.

खजला

खजला

बारह बजे हमने केवलादेव पार्क के सामने बने होटल “द पार्क रिजैन्सी” में प्रवेश किया.

Hotel The Park Bharatpur

Hotel The Park Bharatpur

बाहर से देखने में यह होटल बहुत ही शानदार दिखता है. यहां हमे‌ एक एसी डबल बैडरूम कमरा 850 रूपय मे‌ मिल गया. हम तीन लोग थे सो ज्यादा मंहगा नहीं लगा. होटल में घुसते ही तबीयत प्रसन्न हो गेई. रूम बहुत ही खुला और बडा था. रूम के सामने बहुत बडा पार्क था जिसमें बहुत सी टेबल और चेयर लगी हुई थीं. अक्तुबर से मार्च तक यहां सीजन रहता है शायद इसीलिये होटल को रैनोवेट भी किया जा रहा था. रूम मे‌ एक बडा सा टीवी और छोटा सा फ्रिज भी था. हमारे होटल के बिल्कुल सामने था होटल प्रताप पैलेस.

Hotel Pratap Palace Bharatpur

Hotel Pratap Palace Bharatpur

भूख बहुत लगी थी इसलिये फटाफट बटर चिकन (160 रूपय हाफ) और बटर नान (25 रूपय) आर्डर कर दिया. बटर चिकन लजवाब था और नान भी बहुत सौफ्ट थे. दोपहर का खाना खा कर हमने सबसे पहले केवलादेव पार्क जाने का निश्चय किया. लेकिन वेटर ने हमें बताया कि वहां जाने का यह सही समय नहीं है. वहां सुबह-सुबह जाना चाहिये. सुबह पक्षी खाने की तलाश में बाहर निकलते हैं. लेकिन हमें उसकी बात पसंद नहीं आयी और हम सीधा निकल लिये पार्क की तरफ. इस पार्क को यहां घना (dense) के नाम से ज्यादा जाना जाता है.

होटल से बाहर निकलते ही रिक्शे वाले पीछे पड गये. लेकिन हम रिक्शा केवल पार्क के बाहर से ही लेना चाहते थे. मुझे पता था कि सरकार द्वारा लाइसेंस शुदा रिक्शे केवल पार्क के बाहर से ही मिलते हैं. लेकिन बाद में पता चला कि यहां 123 रिक्शे वालों का ग्रुप है जो तीन भागों में बंटा हुआ है. एक ग्रुप पार्क के बाहर, एक पार्क के अंदर चैक पोस्ट पर और एक ग्रुप पार्क के बाहर बने होटलों पर सैलानीयों का इंतजार करता है. अपने रिक्शे चालक राजू और इन्दर से पूछने पर पता चला की इनकी कार्य प्रणाली बहुत ही साधारण है. ये सुबह पांच बजे पार्क के गेट पर इक्ठ्ठा होते हैं और 1 से लेकर 123 नम्बर तक की पर्चीयां बनाते हैं. जिसके हिस्से जो पर्ची आती है बस वही उसका नम्बर होता है.

राजू और ईन्दर हमें लेकर पार्क में चल दिये. यहाँ बीडी-सिगरेट पीने पर सख्त मनाही है. बीडी-सिगरेटे से जंगल में आग का खतरा बना रहता है. लेकिन फिर भी कुछ लोग ईधर-उधर छुप कर सिगरेट पी रहे थे. राजू और ईन्दर हमें बार-बार दूरबीन किराये पर दिलवाने की जिद कर रहे थे. लेकिन हमने साफ मना कर दिया.

बातों-बातों में पता चला कि ईन्दर दिल्ली में मेरे घर के पास त्रिलोक पुरी का रहने वाला था. और 84 के दंगों में परिवार के साथ यहाँ आ गया था. ये पता चलने के बाद ईन्दर ने हमें अपने रिक्शे में रखी गयी दूरबीन फ्री में दे दी. दोनों रिक्शे वालों ने हमें बताया कि उनकी यहाँ ट्रेनिंग होती है और उन्हें ईंग्लिश के साथ-साथ बहुत सी यूरोपीयन भाषाओं की जानकारी भी दी जाती है. उन्होंने हमें ईंग्लिश, जर्मनी, स्पैनिश, जापानी आदि भाषाओं में बहुत सी बातें बोल कर भी बताईं. सुनने में यह सब अच्छा लग रहा था. लेकिन बाहर के सैलानीयों से टिप लेने का ये अच्छा साधन है. यहाँ एक बात और देखी कि लोकल टूरिस्ट के आने पर रिक्शे वाले ज्यादा खुश नहीं होते. क्योंकि उन्हें उनसे टिप नहीं मिलती.

बहुत प्यास लगी है

बहुत प्यास लगी है

बन्दर फोन की तार ठीक कर रहा है

बन्दर फोन की तार ठीक कर रहा है

राजू और ईन्दर ने हमें पार्क में एक मन्दिर भी दिखाया. उस मन्दिर में हमें एक तालाब में बहुत बडे-बडे कछुए दिखे उन्हें हमने आटे की बडी-बडी गोलीयाँ भी खिलायीं. वो कछुए बिल्कुल आदमखोर लग रहे थे. मन्दिर के पुजारी ने हमें बताया कि एक बार एक नील गाय इस तालाब में गिर गयी तो ये कछुए आधे घंटे में उसे चट कर गये.

कछुए

कछुए

आदमखोर कछुए

आदमखोर कछुए

पार्क में सूर्यास्त

पार्क में सूर्यास्त

शाम को करीब सात बजे तक हम पार्क घूम चुके थे. वापस आते समय रास्ते में हमें दो सियार भी दिखे. राजू और ईन्दर ने हमें होटल छोडा दिया. हमने उन्हें रू. 600/- दिये जिसमें रिक्शे का किराया और टिप भी शामिल थी.

Raju aur Inder Bharatpur

Raju aur Inder Bharatpur

अगले दिन हम भरतपुर के लोहागढ किले को देखने गये. यह किला भरतपुर जाट शासकों द्वारा निर्मित किया गया था. दुनिया में यह किला अभी तक अभेद है. इसे अभी तक जीता नहीं जा सका है. इस किले में एक म्यूसियम भी है जिसमें जाट शासकों के चित्र, पांडुलिपी, हथियार बंदूकें आदि रखीं हैं.

करीब चार बजे हम वापिस होटल पहुँच चुके थे. होटल आते ही हमें वापसी की टिकीट बुक करवानी थी. होटल में इंटरनैट की सुविधा नहीं थी और आस-पास कोई साईबर कैफे भी नहीं मिला. तब हमने दिल्ली के एक मित्र को फोन करके कोटा जनशताब्दी 2059 (अब 12059) में तीन सीट बुक करवादी. और बडी मुश्किल से एक साईबर कैफे से टिकीट का प्रिंट निकाला.

अब वापसी कि चिंता खत्म थी. शाम को किसी ने हमें बताया कि पास में ही दशहरा-मेला लगा हुआ है. हमने एक ट्रैक्टर रोका और बिना पूछे ही उस पर चढ गये. उसने हमें बताया कि वो भी मेले में ही जा रहा है. बस सुनकर मजा आ गया. मेले में सबसे पहले हम पहुँचे मौत का कुँआ देखने. हालत खराब हो गयी. कितना रिस्क है उसमें. लेकिन रोजी-रोटी के लिये लोग सब कुछ करते हैं.

आप मेले की कुछ फोटो देखीये.

ट्रैक्टर की फ्री सवारी

ट्रैक्टर की फ्री सवारी

दशहरा मेला भरतपुर

दशहरा मेला भरतपुर

मेले में भी खजला ही खजला था

मेले में भी खजला ही खजला था

दशहरा मेला भरतपुर

दशहरा मेला भरतपुर

मेले का मजा

मेले का मजा

अगले दिन हमने कोटा जनशताब्दी पकडी जो करीब डेढ घंटा लेटे थी. जन शताब्दी में पहली बार सफर किया था मुझे अच्छा लगा. लेकिन वहाँ हिजडे लोगों से खुले आम पैसे मांग रहे थे. लेकिन हम लोगों ने उन्हें पैसे नहीं दिये. हालांकि उन्होंने बहुत कोशिश की लेकिन हम सख्ती से पेश आये और उनकी दाल नहीं गलने दी. करीब डेढ बजे हम निजामुद्दीन पहुँच चुके थे.

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भारतीय अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला 2011 (IITF 2011)

शनिवार 19 नवम्बर को मैं अपने मित्र रमेश के साथ बहुप्रतिक्षित भारतीय अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले की सैर करने गया. दिल्ली मैट्रो यहाँ आने का सबसे सुगम साधन माना जाता है. लेकिन स्टेशन से बाहर निकलते ही हजारों की संख्या में लाईन में लगे लोगों को देखकर सारा उत्साह गायब हो गया. टिकिट चैक करवाने और चैकिंग करवाने के लिये लंबी लाईन लगी हुई थी. इसमें करीब 40 मिनिट लगे. यहाँ से प्रगती मैदान का गेट न. 10 पडता है.  पुलिस वालों ने यह गेट बंद कर दिया था और लोगों को  अगले गेट न. 2 पर भेज रहे थे. लेकिन लोग लाईन में लगे हुए इतने थक चुके थे कि वो वहाँ से हिलने का नाम नहीं ले रहे थे. हारकर पुलिस वालों को गेट खोलना ही पडा.

Entrance

Entrance from Gate No. 10 (Metro Side)

इस गेट पर एक बात देखकर बडी हैरानी हुई. वह यह कि गेट के बाहर पंद्रह रूपय वाली पानी की बोतल खुलेआम बीस रूपय में बिक रही थी. पता नहीं इतने बडे व्यापार मेले में सरकार क्यों इन लोगों पर लगाम नहीं लगाती. थके हारे लोगों को पैसे से ज्यादा अपनी प्यास सता रही थी. ऐसे में किसी का भी ध्यान इस बात की तरफ नहीं जा रहा था.

हम करीब एक बजे गेट के अंदर पहुँच चुके थे. सामने लगे खंभे पर ऐयर इंडिया के साहब स्वागत करते नजर आये. बाहर जितनी भीड नजर आ रही थी अंदर उसके मुकाबले काफी कम थी.

IITF 2011

Air India Welcomes You

Way

सबसे पहले हमने सरस मेले की तरफ चल दिये. सरस मेला ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा वर्ष 1999 – 2000 के दौरान ग्रामीण उत्पाद को बढ़ावा देने और ग्रामीणों के लिये स्वरोजगार का निर्माण करने के लिए उठाए गए कदमों में से एक है.  1999 से अबतक सरस मेला हर वर्ष भारतीय अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले का हिस्सा बनता आया है.

Saras Mela IITF 2011

Saras Mela IITF 2011

यहाँ मैंने और रमेश ने एक गर्म जैकेट रू. 650/- की पसंद आयी. मोल-भाव करने के बाद दुकानदार बलबीर ने रू. 475/- प्रति जैकेट हमें दे दी. खरीदने से पहले हमने अच्छी तरह से पहन कर खूब फोटो खिंचवायीं. गर्म टोपी जो कि शिमला आदि पहाडों पर 30-40 रूपय में मिल जाती है उसे बलबीर रू. 350/- में बेच रहे थे. वो डील हमें पसंद नहीं आयी.

सरस मेले में काफी सारी घर सजाने की वस्तुयें सस्ते दामों में उपल्बध थीं. बस पैसे होने चाहियें.

Ramesh at IITF 201

Ramesh at IITF 201

यहाँ से निकलते ही सामने नजर आया मेरा प्रिय भारतीय रेलवे. यहाँ काफी सारे कोच और ईंजनों के माडल्स रखे थे. हर साल की तरह. बीच में एक कोच का बडा माडल भी नजर आया. यहाँ जो नयी बात दिखी वो थी नुक्कड नाटक. जिसमें कलाकारों ने बताया कि किस तरह लोग रेल यात्रा में लोगों को कुछ खिला-पिला कर उन्हें बेहोश कर कर लूट लिया जाता है.

Bhartiya Rail IITF 2011

Bhartiya Rail IITF 2011

इसके बाद हम मध्य प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, आंध्र प्रदेश आदि मंडपों में घूमें. बहुत सी जानी पहचानी चीजें नजर आयीं. पंजाब मंडप में अमृतसरी पापड-वडियों वाले सरदार जी खुले-आम पालीथीनों में सामान बेचते नजर आये. इस मेले में पालीथीन के प्रयोग पर बैन लगा हुआ था. पूछने पर सरदार जी बोले की आप मत लीजीये पालीथीन हमें तो सामान बेचना है हम तो यूज करेंगे ही.

पंजाब मंडप की प्रसिद्ध खीर नदारद थी. इस खीर पर हर वर्ष लोग पागलों की तरह टूटते हैं और खीर कुछ ही घंटों में खत्म हो जाती है. आंध्र प्रदेश मंडप में एक भाई साहब “कैसा भी दाग छुडायें” के नाम पर कुछ कैमीकल जैसी चीजें बेच रहे थे. बहुत सी जांच-पडताल करने के बाद रमेश ने एक सैट खरीद लिया. आंध्र प्रदेश मंडप से हमने बहुत से अचार, सौंफ, राम-लड्डू इत्यादि भी खरीदे. सभी सामान हमें प्लास्टिक की पालीथीनों में ही दिया गया.

अबतक करीब चार बज चुके थे भूख चरम पर थी. हम सीधे प्रगति फूड कोर्ट कि तरफ भागे. वहाँ दाल मक्खनी-नान (रू. 70) और पनीर-नान (रू. 80) में लिये. यहाँ खाना खाने के लिये बहुत से टेबल और कुर्सियां लगी थीं. कम-से-कम यहाँ 700-800 लोग एक साथ खाना खा रहे थे. ये हमें बहुत अच्छा लगा. इस बार किसी भी मंडप में खाने की सुविधा नहीं थी. लेकिन यहाँ पर भी पानी की बोतल और कोल्ड ड्रिंक की बोतल अधिकतम मूल्य से ज्यादा दामों में मिल रही थी. आयोजकों को इसकी कोई चिंता नहीं थी.

शाम के करीब 5.30 बज चुके थे और थकान भी बहुत हो गयी थी. अब घर जाने की जल्दी होने लगी. हम गेट न. 3 से बाहर निकले और सीधा बस पकडी मंडी हाऊसे के लिये. हम प्रगती मैदान से मैट्रो नहीं पकडना चाहते थे क्योंकि प्लेटफार्म पर पहुंचने के लिये इस स्टेशन पर कम से कम एक घंटा लग जाता.

मंडी हाऊसे से मैट्रो पकडकर हम 40 मिनिट में अपने घर पहुंच चुके थे.

Andhra God at IITF 2011

God at IITF 2011

Me

Ramesh at IITF 2011

Bhagwan JI

Delhi Pavilion at IITF 2011

Delhi Pavilion at IITF 2011

Saras Mela

Saras Mela


Raw Key Chain

Key Chain at IITF 2011