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सरदार तुकतुक की एक हास्य कविता – शाहरूख खान

सरदार तुकतुक की एक हास्य कविता “शाहरूख खान

पता नहीं कौन से जन्म की दुश्मनी निभाई है।
जो इस नासपीटे ने, सिक्स पैक बाडी बनाई है।
एक सुबह मेरी पत्नी ने कहा मुझे शाहरूख खान की बाडी चाहिये।
मैंने कहा तो अपने पिताजी से कहिये।
वो बोली जब पिताजी ने तुमसे मिलवाया था।
तब भी मुझे यही समझाया था।
बेटा पैकिंग पे मत जा मेरी बात मान।
अन्दर से ये भी है शाहरूख खान।
और फिर इसकी हाईट भी ज्यादा है।
शाहरूख खान तो इसका आधा है।
नहीं तो मेरा तुम्हारा क्या मेल।
छछूंदर के सर में चमेली का तेल।
पर जबसे शाहरूख खान ने अपनी शर्ट उतारी है।
तब से मेरा दिल बहुत भारी है।
फर्स्ट थिंग्स फर्स्ट।
दिस इज़ ब्रीच आफ ट्रस्ट।
मैंने कहा देवी कैसी बात कर रही है भगवान से डर।
वो बोली शुक्र मनाओ कि तुमपे नहीं है एक्सचेंज आफर।
मैंने कहा देवी क्या ये अच्छा लगेगा कि मैं शाहरूख खान के पास जाऊँगा।
और तेरे रिशते की बात चलाऊँगा।
ये सुनते ही पत्नी का चढ़ गया पारा।
उसने मुझे आधे घंटे तक मारा।
फिर बोली दो मिनट साँस ले लूँ तब तक कामर्शियल ब्रेक।
उसके बाद करती हूँ एक और टेक।
मैंने कहा देवी मुन्नाभाई को ध्यान में लाओ।
जो समझाना है विनम्रता से समझाओ।
वो बोली संक्षेप में केवल इतनी कहानी है।
तुम्हें एक महीने के अन्दर सिक्स पैक बाडी बनानी है।
मैंने कहा देवी बाडी का क्या है बाडी तो बन जायेगी।
पर तेरे ये किस काम आयेगी।
कोई सालिड रीजन है या लेनी है फील।
इस बार मारा तो पड़ गये नील।
वो बोली आज कल चल रहा है अजब सा ट्रेंड।
बीवीयों को छोड़ रहे हैं तुम्हारे बिना बाडी वाले फ्रेंड।
आमिर और सैफ ने छोड दी अपनी वैफ।
और जो जो भी बाडी बना रहे हैं।
सेम बीवी के साथ निभा रहे हैं।
शाहरूख और रितिक हैं हाट पिक।
मैंने कहा क्यों शाहिद की बाडी नहीं है।
क्या उसके हुआ फोड़ा है।
वो बोली हटो जी उसे तो करीना ने छोड़ा है।
मैंने कहा अगर बाडी बन जायेगी तो मौहल्ले की लड़कियाँ मारेंगी लैन।
वो बोली अगर तुमने मुड़ के देखा तो फोड़ दूँगी नैन।
मैंने कहा ऐसा है तो मैं जिम विम जाता हूँ।
बाडी बनाता हूँ।
दूध शूध पीता हूँ।
लाइफ को जीता हूँ।
ठीक है सरकार।
निकालो दस हजार।
ये सुनते ही पत्नी ने हाथ पीछे खींचे।
हम समझ गये कि अब आया ऊँट पहाड के नीचे।
पत्नी की आँख हो गई नम।
बोली आखिर कब होगी ये महँगाई कम।
हम कब तक अपनी इच्छाओं को दबायेंगे।
क्या बुढ़ापे में जा के बाडी बनायेंगे।
मैंने कहा देवी तू इच्छाओं को रोती है।
हिंदुस्तान में २२ करोड़ लोगों की इच्छा ही नहीं होती है
ये दो रूपये रोज में अपना पूरा घर चलाते हैं
बंद और बरसात में तो भूखे ही सो जाते हैं
इनके यहाँ बीमारी बीमार को साथ ले के जाती है
बच्चों की मासूमियत बचपन में छिन जाती है
इन्हें वेट घटाने की जरूरत नहीं पड़ती
मसल छोड़ो हड्डियों पर खाल मुशिकल से है चढ़ती

हमारी अर्थव्यवस्था भी पर्दे पर शहरूख खान सी नजर आती है।
पर आज भी वह हड्डियों के ढाँचे सी खेत में हल चलाती है।

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शोले का नया वर्ज़न

पुण्डीर जी के ब्लाग पर आज एक पोस्ट देखी New version of sholey. पसंद आयी तो सोचा इसे हिंदी में भाषा में बदलकर हिंदी प्रेमीयों के लिये प्रस्तुत किया जाये.

शोले का नया वर्ज़न

जय: मौसी, लडका सत्यम में काम करता है
मौसी: हाय राम!!! और कहीं ट्राई कर रहा है क्या?

जय: कहाँ मौसी, दो साल सत्यम में काम करने के बाद कोई कंपनी लेती है भला.
मौसी: हाय राम!!! तो क्या दो साल से सत्यम में काम कर रहा है.

जय: हाँ सोचा था दो साल में सैलरी बढ जायेगी. आजकल तो सैलरी भी ज्यादा नहीं है.
मौसी: तो क्या सैलरी भी कम मिल रही है.

जय: अब अप्रैज़ल भी तो आसानी से नहीं होता है ना मौसी.
मौसी: हाय हाय…!!! तो क्या अप्रैज़ल भी नहीं होता उसका?

जय: सिनीयर से झगडा करने के बाद अप्रैज़ल में अच्छी रेटिंग कहाँ मिलती है मौसी…?
मौसी: तो क्या सिनीयर से लडता भी है?

जय: अब दो साल तक ऑन साईट जाने को ना मिले तो हो जाती है कभी कभी अनबन.
मौसी: तो क्या अब तक एक बार भी ऑनसाईट नहीं गया.

जय: अब आऊटडेटिड टैक्नोलौजी के डवलपरों की किस्मत में तो यही लिखा है मौसी.
मौसी: क्या कहा लडका आऊटडेटिड टैक्नोलौजी में काम करता है…?

मौसी: कौन से कालेज से पढाई की है?
जय: उसका पता लगते ही आपको खबर कर देंगे मौसी.

मौसी: हाय राम…
जय: तो मैं रिश्ता पक्का समझुं मौसी?

मौसी: बेटा कान खोल कर सुन लो… सगी मौसी हूँ बसंती की कोई सौतेली माँ नहीं… भले ही हमारी बसंती किसी कॉल सेंटर वाले लडके से शादी कर ले पर सत्यम के किसी ऐम्प्लाय से कतई नहीं करेगी.

ऑफिस की किस बंदी से सैटिंग हो गयी तेरी…

पिछले दिनों मैं महाकवि कालिदास कृत “मेघदूत” पढ रहा था. उसे पढकर मेरे अन्दर का लेखक अँगडाईयाँ लेने लगा. और प्यार-मुहब्बत पर कुछ लिखने की ठानी. कल दोपहर को वर्षा ऋतू अपने यौवन पर थी तो मन में विचारों की लहरें उठने लगीं.

बस भगवान को नमन किया और तुरत-फुरत दो शेर लिख डाले.

छुप कर मत दिदार करो तुम पकडे जाओगे
शर्म से लाल हुआ चेहरा फिर कहाँ छुपाओगे.

गीली आँखों में तेरी मेरा अक्स नज़र आता है
मेरी रूह को तुम मन में कब बसाओगे.

लिखने के बाद सबसे पहले अपने पडोसी मित्र को पढवाया. पढने के बाद महाशय बोले –

क्यों, किसका चुराया है?

मैं बोला, “नहीं भाई चुराया नहीं है अभी-अभी लिखा है”. जल्दी-जल्दी तीन-चार भगवानों की कसमें खाने के बाद उसे यकीन हो गया.

अब उन साहब ने दूसरा जुमला फेंका – साले तू तो गया काम से. ऑफिस की किस बंदी से सैटिंग हुई है तेरी?

सैटिंग? मतलब? इसमें सैटिंग कहाँ से आ गयी?

…हाँ-हाँ मुझे सब पता है आजकल तू दिन में तीन-तीन बार चाय लेने किचन में क्यों जाता है. और वह साहब मुझे ऐसे निहारने लगे जैसे पुलिस वाला चोर को निहार रहा होता है.

मैं हक्का-बक्का उनकी शक्ल देखता रह गया.

रास्ता नापो

एक बार मुल्ला नसरूद्दीन अपने घर की छत की मरम्मत कर रहे थे तभी एक भिखारी आया और मुल्ला नसरूद्दीन को आवाज दी. मुल्ला नसरूद्दीन ने पूछा, “क्या है, क्यों चिल्ला रहे हो?” ज़रा नीचे आओ तब बताता हूँ, भिखारी बोला. बडी मुश्किल से काम छोड कर मुल्ला नसरूद्दीन नीचे आये और फिर बोले,”अब कहो”. कुछ पैस मिलेंगे हुज़ूर, भिखारी बोला. मुल्ला नसरूद्दीन ने भिखारी को ऊपर से नीचे तक देखा और कहा ऊपर आ जाओ. भिखारी बहुत खुश हुआ और मुल्ला नसरूद्दीन के साथ-साथ छत पर चला गया. ऊपर पहुँचने के बाद मुल्ला नसरूद्दीन बोले,”नहीं हैं, रास्ता नापो”.

अल्हड बिकानेरी की सरकार बन क्यों नहीं जाने देते? – हास्य कविता –

अल्हड बिकानेरी की एक मज़ेदार कविता

जो बुढ्ढे खूसट नेता हैं, उनको खड्डे में जाने दो ।
बस एक बार, बस एक बार मुझको सरकार बनाने दो ।

मेरे भाषण के डंडे से
भागेगा भूत गरीबी का ।
मेरे वक्तव्य सुनें तो झगडा
मिटे मियां और बीवी का ।

मेरे आश्वासन के टानिक का
एक डोज़ मिल जाए अगर,
चंदगी राम को करे चित्त
पेशेंट पुरानी टी बी का ।

मरियल सी जनता को मीठे, वादों का जूस पिलाने दो,
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो ।

जो कत्ल किसी का कर देगा
मैं उसको बरी करा दूंगा,
हर घिसी पिटी हीरोइन कि
प्लास्टिक सर्जरी करा दूंगा;

लडके लडकी और लैक्चरार
सब फिल्मी गाने गाएंगे,
हर कालेज में सब्जैक्ट फिल्म
का कंपल्सरी करा दूंगा ।

हिस्ट्री और बीज गणित जैसे विषयों पर बैन लगाने दो,
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो ।

जो बिल्कुल फक्कड हैं, उनको
राशन उधार तुलवा दूंगा,
जो लोग पियक्कड हैं, उनके
घर में ठेके खुलवा दूंगा;

सरकारी अस्पताल में जिस
रोगी को मिल न सका बिस्तर,
घर उसकी नब्ज़ छूटते ही
मैं एंबुलैंस भिजवा दूंगा ।

मैं जन-सेवक हूं, मुझको भी, थोडा सा पुण्य कमाने दो,
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो ।

श्रोता आपस में मरें कटें
कवियों में फूट नहीं होगी,
कवि सम्मेलन में कभी, किसी
की कविता हूट नहीं होगी;

कवि के प्रत्येक शब्द पर जो
तालियाँ न खुलकर बजा सकें,
ऐसे मनहूसों को, कविता
सुनने की छूट नहीं होगी ।

कवि की हूटिंग करने वालों पर, हूटिंग टैक्स लगाने दो,
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो ।

ठग और मुनाफाखोरों की
घेराबंदी करवा दूंगा,
सोना तुरंत गिर जाएगा
चाँदी मंदी करवा दूंगा;

मैं पल भर में सुलझा दूंगा
परिवार नियोजन का पचडा,
शादी से पहले हर दूल्हे
की नसबंदी करवा दूंगा ।

होकर बेधडक मनाएंगे फिर हनीमून दीवाने दो,
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो ।
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो ।

वेद प्रकाश जी की एक “डबल हास्य” कविता

एक काला आदमी
बहुत ही काला
काला स्याह
सुपर काला
जैड ब्लैक

डबल अफ्रीकन
एल्डर सन ऑफ अमावस्य
औंधे तवे का ताऊ
पहाडी कौए का पडदादा

कोयल संप्रदाय का दादू
बंगाल का काला जादू

तारकोल जिसके पैरों में भक्ति भाव से पसरता हो,
कोयला जिसका रूप रंग पाने के लिये, सदियों तक जमीन के नीचे बैठ कर तपस्या करता हो

जिसदिन उस कालानुभाव के दर्शन हुए, जमीन थमी रह गयी
अब इससे ज्यादा क्या कहुँ,
इतना कहने के बाद भी, मेरे पास शब्दों की कमी रह गयी

शादी होते ही माँ-बाप को धक्के देकर बाहर निकाल देने वाली औलाद सा कपूत,
कुल मिला कर इतना काला जितनी किसी भ्रष्ट नेता की करतूत

एक दुकान पर गया
ना शर्म ना हया
बोला – फेयर एण्ड लवली है
दुकानदार ने कहा नहीं
तो कहने लगा –
फेयर-फेयर नैस जैसी कोई और क्रीम सही
दुकानदार बोला वो भी नहीं
तो बोला – कोई और
तो जब इस बार भी गर्दन दुकानदार ने इंकार में हिलाई
तो कहने लगा – Cherry Blossom ही दे दे
कम से कम चमक तो बनी रहेगी भाई

जैमिनी हरियाणवी की एक हास्य कविता

एक दिन
एक पडोस का छोरा
मेरे तैं आके बोल्या
‘चाचा जी अपनी इस्त्री दे देयो’

मैं चुप्प
वो फेर कहण लागा:
‘चाचा जी अपनी इस्त्री दे देयो ना?’

जब उसने यह कही दुबारा
मैंने अपनी बीरबानी की तरफ करयौ इशारा:
‘ले जा भाई यो बैठ्यी’

छोरा कुछ शरमाया, कुछ मुस्काया
फिर कहण लागा:
‘नहीं चाचा जी, वो कपडा वाली’

मैं बोल्या,
‘तैन्नै दिखे कोन्या
या कपडा में ही तो बैठी सै’

वो छोर फिर कहण लगा
‘चाचा जी, तम तो मजाक करो सो
मननै तो वो करंट वाली चाहिये’

मैं बोल्या,
‘अरी बावली औलाद,
तू हाथ लगा के देख
या करैंट भी मारयै सै’