मेरी भरतपुर यात्रा

2 अक्तुबर (2009), शुक्रवार को छुट्टी थी. तीन दिनों का ल‌बा सप्ताहांत. हम तीन दोस्त मै, रमेश और महेन्द्र ने झटपट घूमने का प्रोग्राम बनाया. कहां जाया जाये – यह सोचना हमेशा की तरह मेरे हिस्से मे‌ ही आया. हरिद्वार, ऋषिकेष, मंसूरी, शिमला घूम-घूम कर हम बोर हो चुके थे. भरतपुर जाने का हमारा प्रोग्राम कई बार रद्द हो चुका था इसलिये इस बार वहीं जाने का एलान कर दिया.

जाने की टिकिट बुक नहीं थी. निजामुद्दीन से ताज एक्सप्रैस पकडकर हम पहले मथुरा जंकश्न तक गये (टिकिट 50 रूपय). दिल्ली से मथुरा तक करीब दो घंटे लगते हैं. वहां से निजामुद्दीन से ही आने वाली गोलडन टैम्पल में भरतपुर का जनरल टिकिट लेकर स्लीपर कोच मे‌ सवार हो लिये (टिकिट 28 रूपय).  भरतपुर मथुरा से अगला स्टेशन ही है और दूरी है करीब तीस किलोमीटर है .केवल आधा घंटा लगता है. ट्रेन में सवार होते ही सबसे पहले मुलाकात हुई टी. टी. साहब से जिसका अंदेशा मुझे पहले से ही था. टी. टी. साहब ने जनरल टिकिट लेकर स्लीपकर में यात्रा करने के उपलक्ष में जुर्माने की ईनामी राशि 1200 रूपय घोषित कर दी. बाद मे‌ केवल एक व्यक्ती का जुर्माना – तीन सौ पचास रूपय देने पर बात बन गयी. जुर्माना देने के बाद थोडी शांती मिली. हालांकि रिश्व्त देने की नाकाम कोशिश भी की गई लेकिन कुछ फायदा ना हो सका. सिविल ड्रैस के टी. टी. को देख कर एक बार तो लगा की नीरज जाट जी की तर्ज पर इससे आई-कार्ड पूछ ही लूं. लेकिन फिर 1200 रूपय का ध्यान आते ही विचार बदल गया.

पौने ग्यारह बजे हम भरतपुर के स्टेशन की शोभा बढा रहे थे. यह पांच प्लेटफार्म वाला एक छोटा सा स्टेशन है. प्यास बहुत जोर से लग रही थी. ठंडे पानी का कूलर स्टेशन पर लगा हूआ था. पानी पिया तो बहुत ही खारा था पानी पिया ही नही‌ गया. स्टेशन से बाहर निकले तो बहुत से ओटो वाले खडे हुए थे. भरतपुर में रस्सी से स्टार्ट होने वाले ओटो बहुत हैं.

हमने चालीस रूपय में केवलादेव पार्क के लिये ओटो किया. भरतपुर मे‌ सडकों की हालत बहुत खस्ता है. जगह-जगह गढ्ढे और टूटी सडक के ही दर्शन होते हैं. स्टेशन से बाहर निकलते ही हलवाई की दुकानें नजर आईं जहाँ खजला बिक रहा था. खजला एक तरह का पकवान है जो मैदे से बनता है. यह फीका और मीठा दोनो तरह का होता है. देखने मे‌ यह एक बडे आकार का भठुरे जैसा दिखता है.

खजला

खजला

बारह बजे हमने केवलादेव पार्क के सामने बने होटल “द पार्क रिजैन्सी” में प्रवेश किया.

Hotel The Park Bharatpur

Hotel The Park Bharatpur

बाहर से देखने में यह होटल बहुत ही शानदार दिखता है. यहां हमे‌ एक एसी डबल बैडरूम कमरा 850 रूपय मे‌ मिल गया. हम तीन लोग थे सो ज्यादा मंहगा नहीं लगा. होटल में घुसते ही तबीयत प्रसन्न हो गेई. रूम बहुत ही खुला और बडा था. रूम के सामने बहुत बडा पार्क था जिसमें बहुत सी टेबल और चेयर लगी हुई थीं. अक्तुबर से मार्च तक यहां सीजन रहता है शायद इसीलिये होटल को रैनोवेट भी किया जा रहा था. रूम मे‌ एक बडा सा टीवी और छोटा सा फ्रिज भी था. हमारे होटल के बिल्कुल सामने था होटल प्रताप पैलेस.

Hotel Pratap Palace Bharatpur

Hotel Pratap Palace Bharatpur

भूख बहुत लगी थी इसलिये फटाफट बटर चिकन (160 रूपय हाफ) और बटर नान (25 रूपय) आर्डर कर दिया. बटर चिकन लजवाब था और नान भी बहुत सौफ्ट थे. दोपहर का खाना खा कर हमने सबसे पहले केवलादेव पार्क जाने का निश्चय किया. लेकिन वेटर ने हमें बताया कि वहां जाने का यह सही समय नहीं है. वहां सुबह-सुबह जाना चाहिये. सुबह पक्षी खाने की तलाश में बाहर निकलते हैं. लेकिन हमें उसकी बात पसंद नहीं आयी और हम सीधा निकल लिये पार्क की तरफ. इस पार्क को यहां घना (dense) के नाम से ज्यादा जाना जाता है.

होटल से बाहर निकलते ही रिक्शे वाले पीछे पड गये. लेकिन हम रिक्शा केवल पार्क के बाहर से ही लेना चाहते थे. मुझे पता था कि सरकार द्वारा लाइसेंस शुदा रिक्शे केवल पार्क के बाहर से ही मिलते हैं. लेकिन बाद में पता चला कि यहां 123 रिक्शे वालों का ग्रुप है जो तीन भागों में बंटा हुआ है. एक ग्रुप पार्क के बाहर, एक पार्क के अंदर चैक पोस्ट पर और एक ग्रुप पार्क के बाहर बने होटलों पर सैलानीयों का इंतजार करता है. अपने रिक्शे चालक राजू और इन्दर से पूछने पर पता चला की इनकी कार्य प्रणाली बहुत ही साधारण है. ये सुबह पांच बजे पार्क के गेट पर इक्ठ्ठा होते हैं और 1 से लेकर 123 नम्बर तक की पर्चीयां बनाते हैं. जिसके हिस्से जो पर्ची आती है बस वही उसका नम्बर होता है.

राजू और ईन्दर हमें लेकर पार्क में चल दिये. यहाँ बीडी-सिगरेट पीने पर सख्त मनाही है. बीडी-सिगरेटे से जंगल में आग का खतरा बना रहता है. लेकिन फिर भी कुछ लोग ईधर-उधर छुप कर सिगरेट पी रहे थे. राजू और ईन्दर हमें बार-बार दूरबीन किराये पर दिलवाने की जिद कर रहे थे. लेकिन हमने साफ मना कर दिया.

बातों-बातों में पता चला कि ईन्दर दिल्ली में मेरे घर के पास त्रिलोक पुरी का रहने वाला था. और 84 के दंगों में परिवार के साथ यहाँ आ गया था. ये पता चलने के बाद ईन्दर ने हमें अपने रिक्शे में रखी गयी दूरबीन फ्री में दे दी. दोनों रिक्शे वालों ने हमें बताया कि उनकी यहाँ ट्रेनिंग होती है और उन्हें ईंग्लिश के साथ-साथ बहुत सी यूरोपीयन भाषाओं की जानकारी भी दी जाती है. उन्होंने हमें ईंग्लिश, जर्मनी, स्पैनिश, जापानी आदि भाषाओं में बहुत सी बातें बोल कर भी बताईं. सुनने में यह सब अच्छा लग रहा था. लेकिन बाहर के सैलानीयों से टिप लेने का ये अच्छा साधन है. यहाँ एक बात और देखी कि लोकल टूरिस्ट के आने पर रिक्शे वाले ज्यादा खुश नहीं होते. क्योंकि उन्हें उनसे टिप नहीं मिलती.

बहुत प्यास लगी है

बहुत प्यास लगी है

बन्दर फोन की तार ठीक कर रहा है

बन्दर फोन की तार ठीक कर रहा है

राजू और ईन्दर ने हमें पार्क में एक मन्दिर भी दिखाया. उस मन्दिर में हमें एक तालाब में बहुत बडे-बडे कछुए दिखे उन्हें हमने आटे की बडी-बडी गोलीयाँ भी खिलायीं. वो कछुए बिल्कुल आदमखोर लग रहे थे. मन्दिर के पुजारी ने हमें बताया कि एक बार एक नील गाय इस तालाब में गिर गयी तो ये कछुए आधे घंटे में उसे चट कर गये.

कछुए

कछुए

आदमखोर कछुए

आदमखोर कछुए

पार्क में सूर्यास्त

पार्क में सूर्यास्त

शाम को करीब सात बजे तक हम पार्क घूम चुके थे. वापस आते समय रास्ते में हमें दो सियार भी दिखे. राजू और ईन्दर ने हमें होटल छोडा दिया. हमने उन्हें रू. 600/- दिये जिसमें रिक्शे का किराया और टिप भी शामिल थी.

Raju aur Inder Bharatpur

Raju aur Inder Bharatpur

अगले दिन हम भरतपुर के लोहागढ किले को देखने गये. यह किला भरतपुर जाट शासकों द्वारा निर्मित किया गया था. दुनिया में यह किला अभी तक अभेद है. इसे अभी तक जीता नहीं जा सका है. इस किले में एक म्यूसियम भी है जिसमें जाट शासकों के चित्र, पांडुलिपी, हथियार बंदूकें आदि रखीं हैं.

करीब चार बजे हम वापिस होटल पहुँच चुके थे. होटल आते ही हमें वापसी की टिकीट बुक करवानी थी. होटल में इंटरनैट की सुविधा नहीं थी और आस-पास कोई साईबर कैफे भी नहीं मिला. तब हमने दिल्ली के एक मित्र को फोन करके कोटा जनशताब्दी 2059 (अब 12059) में तीन सीट बुक करवादी. और बडी मुश्किल से एक साईबर कैफे से टिकीट का प्रिंट निकाला.

अब वापसी कि चिंता खत्म थी. शाम को किसी ने हमें बताया कि पास में ही दशहरा-मेला लगा हुआ है. हमने एक ट्रैक्टर रोका और बिना पूछे ही उस पर चढ गये. उसने हमें बताया कि वो भी मेले में ही जा रहा है. बस सुनकर मजा आ गया. मेले में सबसे पहले हम पहुँचे मौत का कुँआ देखने. हालत खराब हो गयी. कितना रिस्क है उसमें. लेकिन रोजी-रोटी के लिये लोग सब कुछ करते हैं.

आप मेले की कुछ फोटो देखीये.

ट्रैक्टर की फ्री सवारी

ट्रैक्टर की फ्री सवारी

दशहरा मेला भरतपुर

दशहरा मेला भरतपुर

मेले में भी खजला ही खजला था

मेले में भी खजला ही खजला था

दशहरा मेला भरतपुर

दशहरा मेला भरतपुर

मेले का मजा

मेले का मजा

अगले दिन हमने कोटा जनशताब्दी पकडी जो करीब डेढ घंटा लेटे थी. जन शताब्दी में पहली बार सफर किया था मुझे अच्छा लगा. लेकिन वहाँ हिजडे लोगों से खुले आम पैसे मांग रहे थे. लेकिन हम लोगों ने उन्हें पैसे नहीं दिये. हालांकि उन्होंने बहुत कोशिश की लेकिन हम सख्ती से पेश आये और उनकी दाल नहीं गलने दी. करीब डेढ बजे हम निजामुद्दीन पहुँच चुके थे.

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11 responses to “मेरी भरतपुर यात्रा

  1. अब तो मैं भी भरतपुर जाउंगी… आप ही की तरह काफी टाइम से सोच रही हू्ं जाने की..

  2. सुन्दर चित्रों के साथ बढ़िया यात्रा विवरण

  3. वाह जी भरतपुर घुमाने के लिए आपका आभार.

  4. खजला तो नानखटाई जैसी चीज लग रही है। उत्सुकता बन गई है इसके बारे में!

  5. Chaudhary g mujhe bhi bata diya hota

  6. PREM CHOUDHARY bharat pur bahut he sunder jagah he.