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कर्म और धर्म

डॉ. जीवराज मेहता गांधीजी के निजी चिकित्सक और सहयोगी थे। गांधीजी के विचारों का उन पर गहरा असर था। एक बार वह गांधीजी के साथ बड़ौदा से इलाहाबाद पहुंचे। गांधीजी के आने की सूचना पहले से थी इसलिए स्टेशन पर कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ जमा थी। गांधीजी के हाथ खाली थे मगर मेहता जी के हाथ में एक अटैची थी। ट्रेन से उतरते ही एक कार्यकर्ता आगे बढ़ कर मेहता जी के हाथ से अटैची लेने लगा। मेहता जी ने उसे मना कर दिया। उसी समय मेहता जी की नजर एक अधेड़ महिला पर पड़ी, जिसकी गोद में एक छोटा बच्चा था। वह दूसरे हाथ से एक बक्सा संभाले हुई थी। उसे चलने में बहुत कठिनाई हो रही थी।

मेहता जी भीड़ को धक्का देते हुए उस महिला के पास पहुंचे और बोले, ‘बहन, आप को बहुत दिक्कत हो रही है। यह बक्सा मुझे दे दो। मैं आपको स्टेशन के बाहर तक छोड़ देता हूं।’ वह महिला संकोच करने लगी। उसे असमंजस में देख कर मेहता ने कहा, ‘घबराओ नहीं। मैं कोई चोर-उचक्का नहीं हूं। तुम्हारा सामान कहीं नहीं जाएगा।’ महिला ने अपना बक्सा मेहता जी को पकड़ा दिया। तब तक दूसरे लोग भी वहां आ गए। एक कार्यकर्ता मेहता जी के हाथ से बक्सा लेने लगा तो वह बोले, ‘यह बहुत हल्का है। मुझे कोई परेशानी नहीं हो रही है। तुम लोग उसकी मदद करो जिसको तुम्हारी मदद की जरूरत है। असहायों की सेवा करना ही हमारा कर्म और धर्म है।’ सब मेहता जी के व्यवहार से बेहद प्रभावित हुए।

संकलन: सुरेश सिंह
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

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