Monthly Archives: जुलाई 2010

वह खास मुसाफिर

यह उस समय की बात है जब भारत में अंग्रेजों का शासन था। खचाखच भरी एक रेलगाड़ी चली जा रही थी। यात्रियों में अधिकतर अंग्रेज थे। एक डिब्बे में एक भारतीय मुसाफिर गंभीर मुद्रा में बैठा था। सांवले रंग और मंझले कद का वह यात्री साधारण वेशभूषा में था इसलिए वहां बैठे अंग्रेज उसे मूर्ख और अनपढ़ समझ रहे थे और उसका मजाक उड़ा रहे थे। पर वह व्यक्ति किसी की बात पर ध्यान नहीं दे रहा था। अचानक उस व्यक्ति ने उठकर गाड़ी की जंजीर खींच दी। तेज रफ्तार में दौड़ती वह गाड़ी तत्काल रुक गई। सभी यात्री उसे भला-बुरा कहने लगे। थोड़ी देर में गार्ड भी आ गया और उसने पूछा, ‘जंजीर किसने खींची है?’ उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, ‘मैंने खींची है।’ कारण पूछने पर उसने बताया, ‘मेरा अनुमान है कि यहां से लगभग एक फर्लांग की दूरी पर रेल की पटरी उखड़ी हुई है।’ गार्ड ने पूछा, ‘आपको कैसे पता चला?’ वह बोला, ‘श्रीमान! मैंने अनुभव किया कि गाड़ी की स्वाभाविक गति में अंतर आ गया है।पटरी से गूंजने वाली आवाज की गति से मुझे खतरे का आभास हो रहा है।’

गार्ड उस व्यक्ति को साथ लेकर जब कुछ दूरी पर पहुंचा तो यह देखकर दंग रहा गया कि वास्तव में एक जगह से रेल की पटरी के जोड़ खुले हुए हैं और सब नट-बोल्ट अलग बिखरे पड़े हैं। दूसरे यात्री भी वहां आ पहुंचे। जब लोगों को पता चला कि उस व्यक्ति की सूझबूझ के कारण उनकी जान बच गई है तो वे उसकी प्रशंसा करने लगे। गार्ड ने पूछा, ‘आप कौन हैं?’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘मैं एक इंजीनियर हूं और मेरा नाम है डॉ. एम. विश्वेश्वरैया।’ नाम सुन सब स्तब्ध रह गए। दरअसल उस समय तक देश में डॉ. विश्वेश्वरैया की ख्याति फैल चुकी थी। लोग उनसे क्षमा मांगने लगे। डॉ. विश्वेश्वरैया का उत्तर था, ‘आप सब ने मुझे जो कुछ भी कहा होगा, मुझे तो बिल्कुल याद नहीं है।’

संकलन: लाजपत राय सभरवाल
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

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मनुष्य के आभूषण

किसी गांव में एक पंडित जी रहते थे। वह घूम-घूमकर कथा सुनाते और धर्म की शिक्षा देते थे। एक बार वह एक शहर में कथा सुना रहे थे। वहां एक लुटेरा भी था। उसने देखा कि पंडित जी के पंडाल में बहुत लोग आते हैं और काफी चढ़ावा चढ़ाते हैं। उसने सोचा क्यों न इन्हें लूट लिया जाए। वह भक्तों के बीच बैठकर कथा सुनने लगा। पंडित जी कह रहे थे, ‘क्षमा और अहिंसा मनुष्य के आभूषण हैं। इन्हें कभी नहीं छोड़ना चाहिए।’ कथा समाप्त कर पंडित जी दक्षिणा आदि लेकर अपने गांव के लिए चल पड़े। उनके पीछे-पीछे लुटेरा भी चला।

एक सुनसान जगह पर लुटेरे ने उन्हें डराया और सारा माल देने को कहा। पंडित जी निडर थे और हमेशा अपने साथ एक लाठी रखते थे। वह लुटेरे की बात से डरे तो नहीं, उलटा उस पर प्रहार करने लग गए। पंडित जी के प्रतिकार से लुटेरा घबरा गया। वह बोला, ‘पंडित जी, आपने तो कहा था क्षमा और अहिंसा मनुष्य के आभूषण हैं। इन्हें नहीं छोड़ना चाहिए। फिर भी आप मुझे मार रहे हैं।’ पंडित जी ने कहा, ‘मैंने जो कहा, वह सत्य था। लेकिन वह मैंने सज्जनों के लिए कहा था, तुम जैसे दुष्टों के लिए नहीं। क्षमाशील होने का यह अर्थ नहीं कि हम कायर हो जाएं और दूसरा हमारे इस सद्गुण का अनुचित लाभ उठाए। कहां कैसा व्यवहार करना है, यह परिस्थितियों के आधार पर तय करना चाहिए।’ लुटेरे ने पंडित जी से क्षमा मांगी और नेक रास्ते पर चलने का वचन दिया।

संकलन: लखविन्दर सिंह
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

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ईर्ष्या का बोझ

 एक बार एक गुरु ने अपने सभी शिष्यों से अनुरोध किया कि वे कल प्रवचन में आते समय अपने साथ एक थैली में बड़े-बड़े आलू साथ लेकर आएं। उन आलुओं पर उस व्यक्ति का नाम लिखा होना चाहिए, जिनसे वे ईर्ष्या करते हैं। जो शिष्य जितने व्यक्तियों से ईर्ष्या करता है, वह उतने आलू लेकर आए।

अगले दिन सभी शिष्य आलू लेकर आए। किसी के पास चार आलू थे तो किसी के पास छह। गुरु ने कहा कि अगले सात दिनों तक ये आलू वे अपने साथ रखें। जहां भी जाएं, खाते-पीते, सोते-जागते, ये आलू सदैव साथ रहने चाहिए। शिष्यों को कुछ समझ में नहीं आया, लेकिन वे क्या करते, गुरु का आदेश था। दो-चार दिनों के बाद ही शिष्य आलुओं की बदबू से परेशान हो गए। जैसे-तैसे उन्होंने सात दिन बिताए और गुरु के पास पहुंचे। गुरु ने कहा, ‘यह सब मैंने आपको शिक्षा देने के लिए किया था।

जब मात्र सात दिनों में आपको ये आलू बोझ लगने लगे, तब सोचिए कि आप जिन व्यक्तियों से ईर्ष्या करते हैं, उनका कितना बोझ आपके मन पर रहता होगा। यह ईर्ष्या आपके मन पर अनावश्यक बोझ डालती है, जिसके कारण आपके मन में भी बदबू भर जाती है, ठीक इन आलूओं की तरह। इसलिए अपने मन से गलत भावनाओं को निकाल दो, यदि किसी से प्यार नहीं कर सकते तो कम से कम नफरत तो मत करो। इससे आपका मन स्वच्छ और हल्का रहेगा।’ यह सुनकर सभी शिष्यों ने आलुओं के साथ-साथ अपने मन से ईर्ष्या को भी निकाल फेंका।

संकलन: लखविन्दर सिंह
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

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