भिखारी का हठ

धनदत्त नामक सेठ के घर एक साधु पहुंचा। सेठ उसे एक मुट्ठी अन्न देने लगा तो उसने अस्वीकार कर दिया। झुंझला कर सेठ बोला, अन्न नहीं लेता, तब क्या मनुष्य लेगा?

साधु को सेठ की यह बात चुभ गई। उसने कहा, हां, अब तो मनुष्य ही लूंगा और ले कर ही हटूंगा। वह अन्न-जल छोड़ कर सेठ के द्वार पर बैठ गया। सेठ ने उसे बहुत सारा धन और अन्न देना चाहा, किंतु साधु अपनी हठ पर अड़ा ही रहा।

सेठ की चिंता बढ़ी, इसका तो समाधान निकालना ही होगा। वह राजा के दो-चार दरबारियों से मिला। सबने कहा, मरने दो उस मूर्ख को।

सेठ लौट आया, पर चिंता नहीं खत्म हुई। अभी तो दरबारी कह रहे हैं कि मरने दो, पर यदि वह सचमुच मर गया तो वे मेरी रक्षा करेंगे या नहीं? यह भी देख लेना चाहिए। यही सोचकर वह शहर कोतवाल के पास गया और बोला, ‘भिक्षुक मर गया।’

कोतवाल चौंक पड़ा। कहने लगा, सेठ जी! यह तो बुरा हुआ। आपको उसे किसी प्रकार मना लेना था। यह मृत्यु आपके द्वार पर हुई है। नियमानुसार इसकी जांच होगी। और यदि उसमें आप निमित्त सिद्ध होंगे तो पता नहीं आपको क्या दंड मिले। मेरा कर्त्तव्य है इस कांड की सूचना राजा को देना। आप मुझे क्षमा करें। सरकारी कर्मचारी होने से मैं आपको कोई सलाह नहीं दे सकता।

सेठ ने कहा, धन्यवाद! मैं तो आप लोगों को परख रहा था। भिखारी जीवित है और अब मैं उसे मरने नहीं दूंगा।

घर लौट कर उसने गंभीरता से सोच- विचार किया। फिर स्वयं ही साधु के सामने खड़ा हो कर बोला, तुम्हें मनुष्य ही लेना है न? मुझे ले चलो।

भिक्षुक उठ खड़ा हुआ। वह बोला, ‘आप मुझसे श्रेष्ठ हैं। मैं अपनी बात सत्य करने को अड़ा था, जिस क्षण आपको उसका बोध हो गया, उसी क्षण मेरी मांग पूरी हो गई। भगवान आपका मंगल करें। आशीर्वाद देता हुआ साधु वहां से चला गया।

पर सेठ को दान के अहंकार से होने वाले नुकसान का ज्ञान हो गया।

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

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6 responses to “भिखारी का हठ

  1. बहुत दिन बाद आये हो जी आज। बढिया कहानी।

  2. प्रवीण पाण्डेय

    सुन्दर कथा ।

  3. dimak ki baat budhiman samajh jayega

  4. Such a fantastic story ?