लैंसडौन की सैर मुसाफिर के साथ – अंतिम भाग

संतोषी माता मंदिर में कुछ समय बिताने के बाद हम लौट चले. लौटते हुए एक नया सा रास्ता दिखा. हम दोनों ने काफी अटकलें लगाने के बाद उस रास्ते पर चलना शुरू कर दिया. कुछ ही देर में हम भुल्ला ताल पहुँच चुके थे. बिना पूछे रास्ता मिल गया. संतोषी माता का आशिर्वाद था शायद. भुल्ला ताल एक कृत्रिम ताल है. इसका रखरखाव गढवाल राईफ्ल्स द्वारा किया जाता है. यहाँ एक बच्चों का पार्क भी है जिसमें झूले लगे हैं. ताल में बोटिंग का मजा भी लिया जा सकता है. यहाँ की सुंदरता देखते ही बनती है. हम काफी देर तक यहाँ के नजारों मजा लूटते रहे. पिकनिक के लिये एक आदर्श स्थान है भुल्ला ताल.

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भुल्ला ताल
image source : Gonomad

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भुल्ला ताल का दरवाजा

समय ज्यादा नहीं हुआ था लेकिन भूख अपने चरम पर थी. भुल्ला ताल को अलविदा कह कर घर की तरफ निकल पडे. लैंसडौन की प्राकृतिक छटा से मैं बहुत प्रभावित हुआ. रास्ते में बहुत से लोग रास्ते पूछते हुए मिले. हमने भी एक आदर्श दिल्ली वालों की तरह उन्हें मना नहीं किया और अपनी बुद्धिनुसार उनका मार्ग दर्शन किया. कोहरा बहुत हो रहा था फिर भी नीरज फोटो खींचने में कोताही नहीं बरत रहा था.

घर पहुँचते ही गर्मागर्म दाल-भात और बैंगन की सब्जी मिली. देखते ही भूख दोगुनी हो गई. खाना खाने में आनन्द आ गया. पहाडों पर मैंने एक बात नोट की है यहाँ खाना बहुत जल्दी पच जाता है और भूख भी बहुत लगती है. खान खा कर कुछ देर आराम किया. नीरज वैसे तो आराम कर रहा था लेकिन उसके पैर घुमने के लिये मचल रहे थे. मेरे ईरादे कुछ और ही थे. मैं फ्रैश होना चाहता था. यहाँ पानी एक बडी समस्या है. बहुत जद्दोजहत के बाद काम तो बन गया लेकिन फिर भी नहाना नसीब नहीं हुआ.

चाय पीने के बाद हम फिर निकल पडे नयी जगह ढुंढने. हमारा लक्ष्य था दुर्गा देवी मंदिर. एक फौजी से रास्ता पूछा तो उसने पहले हमारा ही इंटरव्यू ले डाला. कहाँ से आये हो? कहाँ रूके हो? रास्ते में स्कूल, मैस आदि देखते हुए हम दुर्गा देवी मंदिर पहुँच गये. इतनी सफाई और सुदरता देख कर और अपनी हालत देख कर एक बार तो लगा की अंदर ना ही जायें तो अच्छा है. लेकिन फिर भी हिम्म्त कर के हमने अंदर प्रवेश किया. मंदिर के अंदर के द्रश्य का वर्णन करना मुश्किल है. भारत में मंदिरों की सफाई का आलम हमसे छुपा नहीं है. मंदिर में पुजारी के स्थान पर एक फौजी साफ सफाई में व्यस्त था. दुर्गा देवी मंदिर के अन्दर और बहार का नजारा अनुभव करने लायक था. दोनों ने बहुत सी फ़ोटो खींची और लौट चले.

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दुर्गा देवी मंदिर

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नीरज – मंदिर के दरवाजे पर

रास्ता भटकने में कोई हमारी बराबरी नहीं कर सकता. जी हाँ, रास्ता एक बार फिर भटक चुके थे. एक सज्जन से रास्ता पूछा और इस बार हम पहुँच गये कालेशवर मंदिर. रास्ते से चलने के बजाय यहाँ-वहाँ कूद कर हम लोग मंदिर के प्रांगण मे पहुँच गये. बहुत ही प्राचीन मंदिर था ये. अंदर कोई पुजारी नहीं था. लेकिन दूर एक कोने में बैठे कुछ फौजीयों की हम पर नजर थी.

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पढिये कालेशवर मंदिर के बारे में

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कालेशवर मंदिर

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मंदिर में घंटीयाँ

मंदिर के अन्दर काफी अंधेरा था और यहाँ भी जगह-जगह बहुत सी घंटीयाँ लगी थीं. फोटोसेशन के बाद मंदिर की सीढियों से होते हुए हम घर की तरफ निकल पडे. सवा चार बज चुके थे.

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प्रयास – कालेश्वर मंदिर

घर पहुँचते ही सामान उठाया, घर के मालिक को धन्यवाद दिया और निकल पडे गाँधी चौक जीप स्टैंड की तरफ. जीप तैयार खडी थी. करीब साढे छै बजे कोट्द्वार स्टेशन से एक लोकल ट्रेन नजीबाबाद के लिये पकडी. वहाँ से बस द्वार रात करीब एक बजे घर के दरवाजे पर दस्त्ख दी.

वैसे मैं कई बार लैंसडौन गया हूँ. लेकिन इस बार नीरज – मुसाफिर के साथ होने से यह सफर यादगार रहा.

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नीरज – मुसाफिर

लैंसडौन की सैर – मुसाफिर के साथ भाग – 1
लैंसडौन की सैर – मुसाफिर के साथ भाग – 2

13 responses to “लैंसडौन की सैर मुसाफिर के साथ – अंतिम भाग

  1. photo dekhkar hamara man bhi ghumne ko kar raha hai.

  2. सुन्दर चित्र और आभार घुमवाने का.

  3. naresh ji,
    aaj to waakai maja aa gaya. lainsdown kee yaden fir se taja ho gayi hain.
    chalo august me fir chalte hain kahin teen char din ke liye.
    is bar maine soch rakha hai ki ya to udaypur ya mt. abu or ya fir taau ke pas indore-ujjain.

  4. बेहतरीन दृश्य, शुक्रिया!

  5. bahut achcha pryash shukriya

  6. thnx for reviving my memories of Lansdowne. which camera u use?

  7. Lansdown to main bhee gayi thee. ye sab kaise nahi dekha ??
    bahut shukriya share karne ka ..

  8. i m from pauri garhwal so people use 2 ask me abut these places. now i can share. thax

  9. करीब पंद्रह साल पहले लैंसडौन जाने का मौका मिला था, वहां गरवाल रायफल के कमांडेंट साहब से उनके घर पर औपचारिक मुलाक़ात हुई थी शाम की चाय के साथ. उन्होंने दुर्गा मंदिर का जिक्र किया था और जब हम दूसरे दिन सुबह दर्शन करने गए तो देखा वो स्वयं सपरिवार वहां मौजूद थे. कुछ अनुष्ठान चल रहा था तो ज्यादा बात ना हो पायी. उसके बाद किसी ने पास में तारकेश्वर का जिक्र किया और हम वहां भी दर्शन कर आये. बड़ी आत्मिक शांति मिली. उसके बाद दो तीन बार और जाने का मौका मिला पर कभी कालेश्वरजी के दर्शन ना हो पाए. आप का व्रतांत पढ़ कर कुछ यादें ताजा हो आयीं और साथ ही जगी कालेश्वरजी के दर्शन की भावना भी. सुन्दर पोस्ट के लिए धन्यवाद.

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