गंगा का उद्गम – 3

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अलका और उर्वशी भगीरथ के तप को नहीं तोड पायीं। दोनों हारीं और लौट गई। उनके लौटते ही ब्रह्मा पसीज गये। वह सामने आये और बोले, “बेटा, वर मांगो! वर मांगो!”

अब आगे पढिये –

भागीरथ ने ब्रह्माजी को प्रणाम किया और बोले, “यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो गंगाजी को धरती पर भेजिये।”

भागीरथ की बात सुनकर ब्रह्माजी ने क्षणभर सोचा, फिर बोले, “ऐसा ही होगा, भगीरथ।”

ब्रह्माजी के मुंह से यह वचन निकले कि उनके हाथ का कमण्डल बड़े जोर से कांपने लगा। ऐसा लगता था जैसे कि वह फटकर टुकड़े-टुकड़े हो जायगा।

थोड़ी देर बाद उसमें से एक स्वर सुनाई दिया, “ब्रह्मा, ये तुमने क्या किया? तुमने भागीरथ को क्या वर दे डाला?”

ब्रह्मा बोले, “मैंने ठीक ही किया है, गंगा!”

गंगा चौंकीं। बोलीं, “तुम मुझे धरती पर भेजना चाहते हो और कहते हो कि तुमने ठीक ही किया है!”

“हां, देवी!” ब्रह्मा ने कहा।

“कैसे?” गंगा ने पूछा।

ब्रह्मा ने बताया, “देवी, आप संसार का दु:ख दूर करने के लिए पैदा हुई हैं। आप अभी मेरे कमण्डल में बैठी हैं। अपना काम नहीं कर रही हैं।”

गंगा ने कहा, “ब्रह्मा, धरती पर पापी रहते है, पाखंडी रहते हैं, पतित रहते हैं। तुम मुझे उन सबके बीच भेजना चाहते हो! बताओ, मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?”

ब्रह्मा बोले, “देवी, आप बुरे को भला बनाने के लिए बनी हैं। पापी को उबारने के लिए बनी हैं। पाखंड मिटाने के लिए बनी हैं। पतित को तारने के लिए बनी हैं। कमजोरों को सहारा देने के लिए बनी हैं और नीचों को उठाने के लिए बनी हैं।”

गंगा ने कहा, “ब्रह्मा!”

ब्रह्मा बोले, “देवी, बुरों की भलाई करने के लिए तुमकों बुरों के बीच रहना होगा। पापियों को उबारने के लिए पापियों के बीच रहना होगा। पाखंड को मिटाने के लिए पाखंड के बीच रहना होगा। पतितों को तारने के लिए पतितों के बीच रहना होगा। कमजोरों को सहारा देने के लिए कमजोरों के बीच रहना होगा और नीचों को उठाने के लिए नीचों के बीच निवास करना होगा। तुम अपने धरम को पहचानो, अपने करम को जानो।”

गंगा थोड़ी देर चुप रहीं। फिर बोलीं, “ब्रह्मा, तुमने मेरी आंखें खोल दी हैं। मैं धरती पर जाने को तैयार हूं। पर धरती पर मुझे संभालेगा कौन?”

ब्रह्मा ने भगीरथ की ओर देखा।

भगीरथ ने उनसे पूछा, “आप ही बताइये।”

ब्रह्मा बोले, “तुम भगवान शिव को प्रसन्न करो। यदि वह तैयार हो गये तो गंगा को संभाल लेंगे और गंगा धरती पर उतर आयंगी।”

ब्रह्मा उपाय बताकर चले गये। भगीरथ अब शिव को रिझाने के लिए तप करने लगे।

भगवान शिव को कौन नहीं जानता? गांव-गांव में उनके शिवाले हैं, वह भोले बाबा हैं। उनके हाथ में त्रिशूल है, सिर पर जटा है, माथे पर चांद है। गले में सांप हैं। शरीर पर भभूत है। वह शंकर हैं। महादेव हैं। औढर-दानी है। वह सदा देते रहते है। और सोचते रहते हैं कि लोग और मांगें तो और दें। भगीरथ ने बड़े भक्ति भाव वे विनती की। हिमालय के कैलास पर निवास करने वाले शंकर रीझ गये। भगीरथ के सामने आये और अपना डमरु खड़-खड़ाकर बोले, “मांग बेटा, क्या मांगता है?”

भगीरथ बोले, “भगवान, शंकर की जय हो! गंगा मैया धरती पर उतरना चाहती हैं, भगवन! कहती हैं…..”

शिव ने भगीरथ को आगे नहीं बोलने दिया। वह बोले, “भगीरथ, तुमने बहुत बड़ा काम किया है। मैं सब बातें जानता हूं। तुम गंगा से विनती करो कि वह धरती पर उतरें। मैं उनको अपने माथे पर धारण करुंगा।”

भगीरथ ने आंखें ऊपर उठाई, हाथ जोड़े और गंगाजी से कहने लगे, “मां, धरती पर आइये। मां, धरती पर आइये। भगवान शिव आपको संभाल लेंगे।”

भगीरथ गंगाजी की विनती में लगे और उधर भगवान शिव गंगा को संभालने की तैयार करने लगे।

गंगा ने ऊपर से देखा कि धरती पर शिव खड़े हैं। देखने में वह छोटे से लगते हैं। बहुत छोटे से। वह मुस्कराई। यह शिव और मुझे संभालेंगे? मेरे वेग को संभालेंगे? मेरे तेज को संभालेंगे? इनका इतना साहस? मैं इनको बता दूंगी कि गंगा को संभालना सरल काम नहीं है।

भगीरथ ने विनती की। शिव होशियार हुए और गंगा आकाश से टूट पड़ीं। गंगा उतरीं तो आकाश सफेदी से भर गया। पानी की फहारों से भर गया। रंग-बिरंग बादलों से भर गया। गंगा उतरीं तो आकाश में शोर हुआ। घनघोर हुआ, ऐसा कि लाखों-करोड़ों बादल एक साथ आ गये हों, लाखों-करोड़ों तूफान एक साथ गरज उठे हों। गंगा उतरीं तो ऐसी उतरीं कि जैसे आकाश से तारा गिरा हो, अंगारा गिरा हो, बिजली गिरी हो। उनकी कड़क से आसमान कांपने लगा। दिशाएं थरथराने लगी। पहाड़ हिलने लगे और धरती डगमगाने लगी। गंगा उतरीं तो देवता डर गये। काम थम गये। सबने नाक-कान बंद कर लिये और दांतों तले उंगली दबा ली। गंगा उतरीं तो भगीरथ की आंखें बंद हो गई। वह शांत रहे। भगवान का नाम जपते रहे। थोड़ी देर में धरती का हिलना बंद हो गया। कड़क शांत हो गई और आकाश की सफेदी गायब हो गई।

भगीरथ ने भोले भगवान की जटाओं में गंगाजी के लहराने का सुर सुना। भगीरथ को ज्ञान हुआ कि गंगाजी शिव की जटा में फंस गई हैं। वह उमड़ती हैं। उसमें से निकलने की राह खोजती हैं, पर राह मिलती नहीं है। गंगाजी घुमड़-घुमड़कर रह जाती हैं। बाहर नहीं निकल पातीं।

भगीरथ समझ गये। वह जान गये कि गंगाजी भोले बाबा की जटा में कैद हो गई है। भगीरथ ने भोले बाबा को देखा। वह शांत खड़े थे। भगीरथ ने उनके आगे घुटने टेके और हाथ जोड़कर बैठ गये और बोले, “हे कैलाश के वासी, आपकी जय हो! आपकी जय हो! आप मेरी विनती मानिये और गंगाजी को छोड़ दीजिये!”

भगीरथ ने बहुत विनती की तो शिव शंकर रीझ गये। उनकी आंखें चमक उठीं। हाथ से जटा को झटका दिया तो पानी की एक बूंद धरती पर गिर पड़ी।

बूंद धरती पर शिलाओं के बीच गिरी, फूली और धारा बन गई। वह उमड़ी और बह निकली। उसमें से कलकल का स्वर निकलने लगा। उसकी लहरें उमंग-उमंगकर किनारों को छूने लगीं। गंगा धरती पर आ गई। भगीरथ ने जोर से कहा, “गंगामाई की जय!”

गंगामाई ने कहा, “भगीरथ, रथ पर बैठो और मेरे आगे-आगे चलो।”

भगीरथ रथ पर बैठे। आगे-आगे उनका रथ चला, पीछे-पीछे गंगाजी बहती हुई चलीं। वे हिमालय की शिलाओं में होकर आगे बढ़े। घने वनों को पार किया और मैदान में उतर आये। ऋषिकेश पहुंचे और हरिद्वार आये। आगे बढ़े तो गढ़मुक्तेश्वर पहुंचे।

आगे चलकर गंगाजी ने पूछा, “क्यों भगीरथ, क्या मुझे तुम्हारी राजधानी के दरवाजे पर भी चलना होगा?”

भगीरथ ने हाथ जोड़कर कहा, “नहीं माता, हम आपको जगत की भलाई के लिए धरती पर लाये हैं। अपनी राजधानी की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं।”

गंगा बहुत खुश हुई। बोलीं, “भगीरथ, मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं। आज से मैं अपना नाम भी भागीरथी रखे लेती हूं।”

भगीरथ ने गंगामाई की जय बोली और वह आगे बढ़े। सोरो, इलाहाबाद, बनारस, पटना होते हुए कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचे। साठ हजार राख की ढेरियां उनके पवित्र जल में डूब गई। वह आगे बढ़ीं तो उनको सागर दिखाई दिया। सागर को देखते ही खिलखिलाकर हंस पड़ीं और बोलीं, “बेटा भगीरथ, अब तुम लौट जाओ। मैं यहीं सागर में विश्राम करुंगी।”

तबसे गंगा आकाश से हिमालय पर उतरती हैं। सत्रह सौ मील धरती सींचती हुई सागर में विश्राम करने चली जाती हैं। वह कभी थकमती नहीं, अटकती नहीं। वह तारती हैं, उबारती हैं और भलाई करती हैं। यही उनका काम है। वह इसमें सदा लगी रहती हैं।

समाप्त!

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गंगा का उद्गम – 2

आभार: विकिसोर्स

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14 responses to “गंगा का उद्गम – 3

  1. hamare paap dhone kaa kaam karti hai maan gange!!!

  2. sunder prastuti,padhte huye aisa laga man ganga hig gaya.

  3. ganga hindusthan ki pahchan hai. sampurn vishva me har chij har jagah mil sakti hai,parantu ganga nahi mil sakti.

  4. har har gange

  5. संजय कुमार शुक्ल राजन

    श्रीमान्! कोटि कोटि धन्यवाद. पतित-पावनी माँ गंगा की जय- जय-जय.

  6. Prayas you missed early part of Descent of the Ganga to material world which include the story of Lord Vaman Dev.
    Your narration is from Ramayan and it is beautiful you can include this part also which narrates story of Lord Vaman Dev and King Bali from Satay yuga.

  7. बहुत अच्छा,
    जय गंगा मां

  8. bahut sunar katha apne prastut ki hai apne
    ganga maiya ki jai

    jai ho suryawansi raja bhagirath

  9. Hamare paapo ko khud me sama lety maa ganga .har har gange

  10. भागीरथ की माता का नाम क्या था?