जब महाराज जनक लज्जित हो गए

सुलभा परम विदुषी थीं। वह अपना सारा समय ईश्वर की आराधना में बिताती थीं। लोग उनसे बहुत प्रभावित थे और उन का आदर करते थे। एक दिन उन्हें पता चला कि महाराजा जनक एक सिद्ध पुरुष हैं और संतों तथा ज्ञानियों का बहुत सम्मान करते हैं। वह उनसे मिलने पहुंच गईं।

महाराजा जनक ने उनका स्वागत-सत्कार किया, फिर बातचीत के बाद भोजन के लिए आमंत्रित किया। भोजन के बाद एक बार फिर विभिन्न प्रसंगों पर चर्चा चलने लगी। अचानक जनक ने सवाल किया, ‘आपने विवाह क्यों नहीं किया? मुझे तो ऐसा नहीं लगता कि गृहस्थ जीवन ज्ञानार्जन या भक्ति में बाधा डालता है। अब मुझे ही देखो। मैं तो गृहस्थ होते हुए भी गृहस्थी से मोह नहीं करता। राजा होते हुए भी राजसत्ता से विरक्त रहता हूं। मैं तो अग्नि और चंदन को समान मानता हूं।’ जनक के ऐसा कहने पर सुलभा ने कोई उत्तर नहीं दिया, बस मुस्कराती रहीं।

जनक फिर बोले, ‘आप तो स्वयं परम विदुषी और ज्ञानी हैं। आप ही बताइए न वास्तव में ज्ञानी कौन होता है?’ जनक के इस प्रश्न पर सुलभा सहजता से बोलीं, ‘महाराज, जहां तक मैं सोचती हूं ज्ञानी व्यक्ति कभी आत्मप्रशंसा नहीं करता। वह कम बोलता है तथा मौन को महत्व देता है। वह इस तथ्य के प्रति विरक्त होता है कि वह राजा है या रंक, गृहस्थ है या संन्यासी। ज्ञानी इन सबसे बेपरवाह रहता है। वह अपनी स्थिति को लेकर सचेत नहीं रहता।’

महाराज जनक समझ गए कि सुलभा का इशारा क्या है। उन्हें ख्याल आया कि अभी थोड़ी ही देर पहले वह आत्मप्रशंसा में लीन थे। वह लज्जित हो गए। उन्होंने कहा, ‘सुलभा, असली ज्ञानी तो आप हैं। आज आपने मेरी आंखें खोल दीं। आगे से इन बातों का ध्यान रखते हुए मैं अपनी वाणी पर संयम रखूंगा। यह मेरा सौभाग्य है कि आज आप आईं और आपने मुझे एक नई दृष्टि दी।’ सुलभा उन्हें आशीर्वाद देकर चली गईं।

संकलन : रेनू सैनी
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

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3 responses to “जब महाराज जनक लज्जित हो गए

  1. sulbha ke baare main jara vistar se batain. kabhi suna ya padha nahin inke baare main.

  2. मैं आपकी कहानियों का नया पाठक हूँ मुझे यह कहानी अच्छी लगी

  3. सुन्दर और प्रेरणादायक कथा, आभार!