फोटोफेयर-2009

शनिवार (10.01.2009) को सुभाष जी को फोन किया कि फ़ोटोफेयर चलना है तो फटाफट आ जाओ. उन्होंने कहा, “यार मैं तो ऑफिस में हूँ एक बजे तक ही आ पाऊँगा”. मैंने बोला ठीक है मैं इंतजार कर रहा हूँ.

फोटो खिंचने के लिये पेट में कीडे उछल-कूद कर रहे थे. रात को ही चारों सैलों को गर्म कर के तैयार कर दिया था. अपना छोटा वाला कैनन चमकाकर मैं सुभाष जी का इंतजार करने लगा.

करीब सवा एक बजे सुभाष जी ने घर के नीचे से आवाज लगाई. मैं चार-पाँच मिनट में नीचे उतरा और फटाफ़ट रिक्शा पकडा और बस स्टैंड की तरफ चल दिये. हडताल की वजह से पैट्रोल मिल नहीं रहा था इसलिये बस में जाना एक अच्छा विचार था. हमारे घर से प्रगती मैदान कोई 6-7 किलोमीटर है और मुश्किल से कोई 20-25 मिनिट लगते हैं. रिक्शे से उतरे ही थे 355 आ गई. झट से बस में चढे और दो टिकिट पाँच-पाँच रूपय वाली ले कर कोने की सीट पकड ली और लगे कोई सुंदर चेहरा ढुंढने. बहरहाल चेहरा तो कोई नहीं मिला हाँ एक माताजी खडी थीं उनसे नज़रें मिल गयीं. नजरें मिलते ही वो हमारे पास आ गई और कहने लगी, “बेटा लेडीज़ सीट”. मैं चुपचाप खडा हो गया, हाँलांकि वो सीट लेडिज़ के लिये आरक्षित नहीं थी.

कुछ ही देर बाद प्रगती मैदान आ गया और हम दोनों बस से उतर गये. सबवे से रोड क्रास कर टिकिट ली. टिकिट दस रूपय की थी. टिकिट लेकर अंदर घुसे तो सबसे पहले फोटोफेयर के एक बडे से होर्डिंग की तस्वीर उतारी. कई एंगल से तीन-चार तस्वीर उतारी. लोग बडे आश्चर्य से देख रहे थे की होर्डिंग की तस्वीर एक-दो तो ठीक है ये तो पीछे ही पड गया. एक भाई साहब ने आखिर पूछ ही लिया, “Is something special in this hording?”. No, nothing special. I just want to put these photographs in my blog, I said. “What is blog?”, he asked. “On Internet”, I replied. “OK, OK, I understand”, gentlement replied.

अंदर जाने के लिये विज़ीटर रजिस्ट्रेशन करवाना जरूरी था सो करवा कर अंदर घुसे. अब घुसते ही लगा मानो मनोकामना पूरी हो गयी. सामने ही एक ऊँची सी क्रेन पर एक विडीयो कैमार लगा था जिसको ऑपरेटर नीचे बैठ कर एक रिमोट से ऑपरेट कर रहा था.

photofair

उसके बाद हम पहँचे सीधा किंगस्टन के स्टाल पर. वहाँ एक सुंदरी के अलावा कुछ मैमोरी कार्डस भी डिस्पले में थे. एक सरसरी सी निगाह डाल कर बाकी काम अपने कैमरे पर छोड दिया और खिंच डाली पाँच-सात तस्वीरें.

आगे देखा तो “Better Photography” मैग्ज़ीन का स्टाल लगा था. उस पर एक नज़र डाल कर सीधा पहुँचे सैमसंग के स्टाल पर. भैइ वाह!!! सुंदर-सुंदर लडकीयों के आदमकद फोटो लगा रखे थे. बहुत से कैमरे डैमो के लिये रखे थे. चार-पाँच बालाएं एअर-होस्टस टाईप ड्रैस में यहाँ-वहाँ घूम रहीं थीं. बस अपलक निहारने लगे हम तो. सामने लगी टी.वी स्क्रीन में बहुत से लोगों की विडियो आ रही थी. हम समझ गये लाईव कैमरा लगा रखें हैं. अचानक एक स्क्रीन पर एक जाने माने साहब नज़र आये और बताओ जैकेट भी हमारे जैसी पहन रखी थी. साहब चोरी छुपे एक सुंदरी को निहार रहे थे. अबे तेरी तो…. ये तो हम ही थे. साला, कैमरे ने हमे रंगे हाथों पकड लिया. चुपचाप खिसक ले यहाँ से, सुभाष जी ने चिकोटी काटी. मैंने कहा यार इन पोस्टरों की फोटो खिंच लेते हैं, देखो मॉडल कितनी सुंदर लग रहीं हैं. जैसे ही कैमरा निकाला तो…. यकीन मानीये साहब पोस्टर में से वो लडकी बोल पडी…. excuse me sir, no photograph please. अरे बाप रे ये तो सच्ची कि लडकी है! 18-19 साल की वो बाला सचमुच की लडकी थी. चारों तरफ नज़र घुमाई और ध्यान से देखा तो पाया जिन्हें हम पोस्टर समझ रहे थे वो तो सचमुच की मॉडल हैं. और ये जो सात-आठ अफसर से दिखने वाले सूट-बूट में साहब खडे हैं ये कोई सज्जन पुरूष नहीं ब्लकि इन मॉडलों के रखवाले हैं. सुभाष जी को हमने इशारों से कहा, “यार निकलो यहाँसे”.

अब वहाँ से निकल कर सीधा पहुँचे Nikon के स्टाल पर. वहाँ इतने बडे-बडे टैलीफोटो लैंस थे जिनकी शायद मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था. वहाँ मुंबई हमलों की एक फोटो प्रदर्शनी भी लगी हुई थी. एक फोटो कसाब की ऐसी थी जिसमें वो आराम से सडक के साईड में चल रहा है. ना कोई टेंशन ना कोई डर. और एक फ़ोटो नारीमन हाऊस की थी. जिसकी रसोई की दिवार पर एक नोट लिखा था “sorry, आपका खाना खालिया, पोलिस”. वहाँ की भी कोई आठ-दस फ़ोटो खिंच मारी.

उसके बाद सामने एक स्टाल दिखा. सावित्री डिजिटल कम्प्यूटर्स, तमिलनाडू ( http://www.savithriphotohouse.com). यहाँ पर सीडी और डीवीडी मिल रहे थे. उनमें बहुत सारे बैकग्राऊंडस थे जिनमें अपनी फ़ोटो मर्ज कर सकते हो. एक खरीद डाली. डेढ सौ रूपय की.

इसके बाद जिस स्टाल पर हम रूके थे वहाँ एक बंगाली बाबू एक मशीन का डैमो दे रहे थे. वह मशीन करीब तीन लाख की थी और उसमें आप अपना कोई भी मिडिया लगा सकते हो. जैसे मैमोरी कार्ड, सीडी, डीवीडी, पैन ड्राईव आदि. मिडिया से फोटो चुनो और बस एक बटन दबाते ही फोटो प्रिंट हो जाएगी. अगर वो बंगाली दादा मुझे मिल जाये तो उसे सही तरीके से लपेट दूंगा (डाँट दूँगा और बहुत सी गाली दुंगा). मैंने उससे कुछ जानकारी लेनी चाही तो उसने कहा, “अरे दादा, जरा अपना मैमोरी कार्ड निकालिये सब समझ आ जायेगा”. हमने अपने कैमरे का मैमोरी कार्ड निकाल कर उसकी तरफ बढाया और उसने अपने मन से एक फोटो सैकिंड में प्रिंट कर दी.

हम खुशी खुशी वहाँ से चल पडे. खुशी इसलिये की पाँच-छ: रूपय बच गये. सोनी, कैनन आदि के स्टाल देखने के बाद शाम को पाँच बजे हम घर के लिये निकल पडे.

पौने छ: बजे हम घर पर थे. सुभाष जी को भी चाय पीने के लिये घर पर ले आये थे. गृह लक्ष्मी को चाय का आर्डर देने के बाद हमने कंप्यूटर स्टार्ट किया और फटाफट कैमरे की फ़ोटो ट्रांसफर करने लगे. कार्ड रीडर में कार्ड लगाते ही तोते उड गये. ट्रोज़न हार्स फाऊंड. सारी फोटो गायब. कार्ड में वायरस घुस गया. लेकिन कहाँ से? तभी उस बंगाली की बाद ध्यान आई, “दादा कार्ड में वायरस आ सकता है”. चार-पाँच रूपय बचाने के चक्कर में वायरस ले आये. सारी फोटो खराब हो गयीं. एवीजी से स्कैन किया, कोई बात नहीं बनी. चुपचाप से कार्ड फॉरमैट कर दिया.

अब ये पोस्ट लिखी है कि अपना दुख आपसे बाँटु ताकी दुख थोडा कम हो जाये.

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One response to “फोटोफेयर-2009

  1. sahi hai sir, akle akle chle jao