तेरा बस इक ख्याल है

कुछ और लिखने का प्रयास किया है. कृपया मेरी गलतियाँ सुधारें.

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चौथा पहर है रात अब कुछ मंद पडी है,
सूरज की किरण घर से कुछ ही दूर खडी है.

मोती की तरह बिखरी हैं ये ओस की बूंदें,
जैसे की रात भर तू यहाँ खुल के हँसी है.

हर मोड पर हर रोज़ हम किस वक्त मिलते हैं,
सूनी पडी हैं गलियाँ फिर भी उसको खबर है.

हो बेअदब सा कब्र पर ये कौन चल रहा,
सीने में बसीं यादें को वो रौंद रहा है.

बिस्तर के आस पास जो रातों को घुमता,
वो कुछ नहीं, यूं ही, तेरा बस इक ख्याल है.

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6 responses to “तेरा बस इक ख्याल है

  1. बिस्तर के आस पास जो रातों को घुमता,
    वो कुछ नहीं, यूं ही, तेरा बस इक ख्याल है.

    achha hai… mujhe bhi aata hai kisi ka khayal…

  2. मोती की तरह बिखरी हैं ये ओस की बूंदें,
    जैसे की रात भर तू यहाँ खुल के हँसी है.
    वाह…बहुत सुंदर प्रयास…लिखते रहिये…
    नीरज

  3. बहुत खूब

    हर मोड पर हर रोज़ हम किस वक्त मिलते हैं,
    सूनी पडी हैं गलियाँ फिर भी उसको खबर है.

  4. मोती की तरह बिखरी हैं ये ओस की बूंदें,
    जैसे की रात भर तू यहाँ खुल के हँसी है.

    –बहुत उम्दा!!!

  5. वर्तनी (स्पेलिंग) में कुछ सावधानी बरतें तो अच्छा होगा:
    जैसे की > जैसे कि; सिने में बसीं यादें को > सीने में बसीं यादों को
    – योगेन्द्र जोशी (indiaversusbharat.wordpress.com)

  6. योगेन्द्र जी,
    वर्तनी को सुधार दिया गया है.
    आपका बहुत धन्यवाद.
    प्रयास