आतंकवाद का चेहरा पहचानने लगा हूँ

1
इस दुनिया को कुछ-कुछ,
जानने लगा हूँ.
आतंकवाद का चेहरा अब,
पहचानने लगा हूँ.

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2
धर्म निरपेक्षता के बिगुल,
हम बजाते रहे हैं.
घर के चिरागों से,
घर जलाते रहे हैं.

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3
जिनको पाला था हमने,
कभी भाई बनके.
वो सभी आस्तीन के,
साँप निकले.

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4
माउनटबेटेन ने समाधान नहीं,
एक साजिश बनाई.
हमने मातम मनाया,
जब जब दिवाली आई.

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5
मैं भाई समझ कर जिसे,
प्यार करता रहा.
वो छुप कर पीछे से,
वार करता रहा.

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6 responses to “आतंकवाद का चेहरा पहचानने लगा हूँ

  1. धर्म निरपेक्षता के बिगुल,
    हम बजाते रहे हैं.
    घर के चिरागों से,
    घर जलाते रहे हैं.

    i like this one…

  2. “Bahut Achha likha hai Aapne, Main apne jazbaton ko kabu main nahi rakh pa raha, Main bhi kuch kahana chahta hoon”

    Inko bithaya sub se oonche pad par humne
    Fir bhi Nafrat ke in pedon par fal payar ka na paya humne

    Jinhe paal liya tha aapna smajh kar 47 main humne
    Aaj tak Khata oosi galti ki Khai hain Humne.

  3. सुन्दर लेखन। हमारे राष्ट्र में आतंकवाद से लड़ने की संकल्प-शक्ति गायब है!