Daily Archives: सितम्बर 15, 2008

आतंकवाद का चेहरा पहचानने लगा हूँ

1
इस दुनिया को कुछ-कुछ,
जानने लगा हूँ.
आतंकवाद का चेहरा अब,
पहचानने लगा हूँ.

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2
धर्म निरपेक्षता के बिगुल,
हम बजाते रहे हैं.
घर के चिरागों से,
घर जलाते रहे हैं.

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3
जिनको पाला था हमने,
कभी भाई बनके.
वो सभी आस्तीन के,
साँप निकले.

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4
माउनटबेटेन ने समाधान नहीं,
एक साजिश बनाई.
हमने मातम मनाया,
जब जब दिवाली आई.

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5
मैं भाई समझ कर जिसे,
प्यार करता रहा.
वो छुप कर पीछे से,
वार करता रहा.

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