सोचता है आदमी

फूल पत्थर से उगेगा सोचता है आदमी,
पर्वतों पिघलोगे इकदिन, सोचता है आदमी.

चाँद पर तो घुमने हम कई बार आ चुके हैं,
चाँद के आगे है क्या फिर, सोचता है आदमी.

शम्मां के हिस्से में आए परवाने देखो कई हैं,
परवानों के हिस्सों का फिर, सोचता है आदमी.

रास्ता सागर में जब भी चाहूँगा बन जायेगा फिर,
सागरों में घर बनाना, सोचता है आदमी.

देश बाँटे सरहदों में, सरहदें फिर से बँटीं,
सरहदों को फिर घटाना, सोचता है आदमी.

बाढ, सूखा या सुनामी लाख आपदायें क्यों ना,
जीत इक दिन सबको लूंगा, सोचता है आदमी.

6 responses to “सोचता है आदमी

  1. देश बाँटे सरहदों में, सरहदें फिर से बँटीं,
    सरहदों को फिर घटाना, सोचता है आदमी.

    बाढ, सूखा या सुनामी लाख आपदायें क्यों ना,
    जीत इक दिन सबको लूंगा, सोचता है आदमी.
    बहुत सुंदर लिखा है. बधाई .

  2. देश बाँटे सरहदों में, सरहदें फिर से बँटीं,
    सरहदों को फिर घटाना, सोचता है आदमी.

    sunder likha hai

  3. Kavita hai Achhi, Soch hai Sachi,
    likhne wala achhi Sangat ka lagta hai Aadmi. 🙂

    Ise ooper Rakhen (Keep it Up !!!)

  4. फूल पत्थर से उगेगा सोचता है आदमी,
    पर्वतों पिघलोगे इकदिन, सोचता है आदमी

    अच्छी रचना… प्रेरित करने वाली, खूबसूरत।

  5. चाँद पर तो घुमने हम कई बार आ चुके हैं,
    चाँद के आगे है क्या फिर, सोचता है आदमी.

    ” wah, bhut shee kha aapne, aaj kal tyo yhee ho rhai hai, jitna aaj ka inssan janta hai, uske aage ke sochta hai, bhut sunder”

    Regards