Daily Archives: सितम्बर 10, 2008

सोचता है आदमी

फूल पत्थर से उगेगा सोचता है आदमी,
पर्वतों पिघलोगे इकदिन, सोचता है आदमी.

चाँद पर तो घुमने हम कई बार आ चुके हैं,
चाँद के आगे है क्या फिर, सोचता है आदमी.

शम्मां के हिस्से में आए परवाने देखो कई हैं,
परवानों के हिस्सों का फिर, सोचता है आदमी.

रास्ता सागर में जब भी चाहूँगा बन जायेगा फिर,
सागरों में घर बनाना, सोचता है आदमी.

देश बाँटे सरहदों में, सरहदें फिर से बँटीं,
सरहदों को फिर घटाना, सोचता है आदमी.

बाढ, सूखा या सुनामी लाख आपदायें क्यों ना,
जीत इक दिन सबको लूंगा, सोचता है आदमी.

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