मनुष्य की सुरक्षा

एक बार महात्मा गांधी को प्रवासियों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने के कारण जोहान्सबर्ग की जेल में बंद कर दिया गया। लेकिन थोड़े ही दिनों के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। कुछ शरारती तत्वों ने यह अफवाह फैला दी कि गांधी जी ने सरकार से समझौता कर लिया है और प्रवासियों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज न उठाने का वचन दिया है।

यह खबर फैलते ही वहां के प्रवासियों में गांधी जी के प्रति नफरत और गुस्सा फैलने लगा। कई लोगों ने गांधी जी को जान से मारने की घमकी तक दे डाली। गांधी जी को गरीबों की लड़ाई लड़ते देख वहां के एक धनाढ्य गोरे हरमन इतने अधिक प्रभावित हुए कि वह हर समय उनके साथ रहने लगे। उन्हें जब मालूम हुआ कि गांधी जी को जान से मारने की धमकी दी जा रही है, तो वह गांधी जी की सुरक्षा के लिए चिंतित हो गए। किसी अनहोनी वारदात से निपटने के लिए उन्होंने एक नई पिस्टल खरीदी और उसे हर समय अपनी जेब में रखने लगे। एक दिन गांधी जी ने उनकी पिस्टल देख ली। उन्होंने पूछा, ‘मिस्टर हरमन, यह पिस्टल अपने साथ क्यों रखते हो?’
हरमन बोले, ‘गांधी जी, आप की जान को खतरा है इसलिए आप की सुरक्षा के लिए इसे रखना जरूरी है।’

गांधी जी मुस्करा कर बोले, ‘कितने भोले हो हरमन साहब। मुझे कौन मारेगा। मुझे मारकर किसी को क्या मिलेगा। फिर आपकी पिस्टल से एक आदमी की ही सुरक्षा हो सकती है। यहां तो हजारों-लाखों लोगों की जिंदगी की सुरक्षा की तो किसी को परवाह नहीं है। उनकी जिंदगी हर समय खतरे में है। जानते हो उन्हें कौन बचाता है। उन्हें भगवान बचाते हैं। इसलिए ईश्वर पर भरोसा करो और उनके अधिकार को छीनने की कोशिश मत करो। तुम्हें मेरे साथ रहना है तो निहत्थे रहना होगा।’ हरमन लज्जित हो गए। उन्होंने क्षमा मांगते हुए कहा, ‘गांधी जी, यह मेरी नासमझी थी।’

संकलन : सुरेश सिंह
साभार : नवभारत टाइम्स

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