चौदह अगस्त-गुडगाँव की वो भयानक रात

चौदह अगस्त की शाम मेरे लिये एक ना भूलने वाली शाम थी. और मेरे लिये ही क्या ब्लकि उन सभी लोगों के लिये जो दिल्ली और NCR से यहाँ के दफ्तरों में काम करने आते हैं.

उस दिन दोपहर करीब दो बजे से लगातार बारिश हो रही थी. बारिश देख कर ऐसा लग रहा था जैसे पूरा गुडगाँव आज पानी में बह जायेगा. हम अपने ऑफिस की खिडकियाँ खोलकर सडकों पर परेशान होते लोगों को देख कर लुत्फ उठा रहे थे. लेकिन क्या मालुम था कि जिस बारिश और ट्रैफिक जाम को देख कर हम खुश हो रहे हैं वो हमारे लिये भी परेशानी का सबब बन सकता है.

शाम करीब चार बजे से ही शंकर चौक पर बुरी तरह जाम लग गया और सडकों पर जगह-जगह पानी जमा हो गया. हालांकि, सडकों की हालत इतनी बुरी नहीं रही होगी लेकिन फिर भी वे नई-नवेली सडकें इस पानी के सामने लाचार नज़र आ रही थीं. दुपहिया वाहन बिल्कुल पानी में जाने का रिस्क नहीं लेना चाहते थे. जो गाडियाँ सी.एन.जी से चल रही थीं वो जगह-जगह बंद हो गयीं. स्कुटर और बाइकों के साइलंसर पानी से लबालब भरे थे और उनके चालक कभी जाम को देखकर झुंझलाते तो कभी AC Cabs में बैठे स्टाफ को देख कर मन ही मन जलते.

अधिकतर ऑफिसों में स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष में पार्टियाँ रखी गयीं थी. हालांकि उस दिन बृहस्पतिवार था लेकिन फिर भी कई ऑफिसों में उस दिन कैज़ुल में आने की छुट दी गयी थी. सुबह टिप-टॉप होकर आने वाले लडके और लडकियाँ शाम को घुटने तक जिंस चढा कर और जूते हाथों में लेकर चलते हुए ऐसे लग रहे थे जैसे वो सब इक्ट्ठा होकर मंदिर जा रहे हों. कुछ ऑफिसों में थीम पार्टियाँ थीं जिसमें लडके और लडकियाँ के कपडे तिरंगे झंडे के समान लग रहे थे. लेकिन बरसात में भीग जाने के कारण उनका रंग भी फीका पड चुका था.

6 बजते ही हम अपना System Shut Down किया और Reception पर आ धमके. जाम का डर तो मन में पहले से ही था. सडकों पर लगने वाला जाम अब गली तक आ गया था. हमारी सभी routes की Cabs ऑफिस से कुछ ही दूरी पर जाम में खडी थी. करीब आधा घंटा इंतज़ार करने के बाद एक Cab जो West Delhi जाती थी ऑफिस पहुँच गयी. मैंने सोचा की क्यों ना इसी में द्वारका तक चला जाऊँ. वहाँ से Metro पकड लुँगा और जाम से बच जाऊँगा. लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था. बहुत सारे लोग थे जो मेरे जैसा सोच रहे थे. वहाँ दो और लोग आ गये और बोले की हमें भी द्वारका मैट्रो स्टेशन तक छोड दो. उनमें से एक को निज़ामुद्दीन स्टेशन से ट्रेन पकडनी थी.

अब हुआ यूँ कि Cab की बीच वाली सीट पर, जहाँ तीन लोग बैठ सकते हैं, वहाँ चार लोग बैठे थे. और इन चारों में मैं भी था. मेरे पैरों का खून का दौरा रूक गया था. हम सब गाडी में बैठे और मन में अजीब सा डर लिये चल दिये. तभी किसी ने सुझाया की फलां रास्ता गुडगाँव के पीछे से निकलता है वहाँ से निकल लेते हैं. सभी ने मौन स्विकृती दी. हमारी Cab धीरे-धीरे अपने गंतव्य की तरफ निकल पडी. सभी अपने-अपने मोबाईल पर जाम की स्थिती का जायजा ले रहे थे. कोई ऑफिस में रूके हुए लोगों को फोन कर रहे थे. कुछ लोग जो अपनी बाईक्स पर पहले ही निकल गये थे वो बता रहे थे की कहाँ-कहाँ जाम है और कहाँ से निकला जा सकता है.

करीब सात बजे तक हम TCS, Phase-IV तक ही पहुँच पाये थे जो कि हमारे ऑफिस से मात्र डेढ किलोमीटर दूर था. TCS के सामने करीब दो-दो फुट पानी बह रहा था. बहते पानी को देख कर एक बार तो मुझे हरिद्वार ही याद आ गया था. क्या मजदूर और क्या अफसर सभी को प्रकृति आज एक ही नजरों से देख रही थी. TCS Towers की खिडकीयों से बहुत से लोग झांक कर बारिश का जायजा ले रहे थे. सप्ताहांत, स्वतंत्रता दिवस और राखी तीनों एक साथ होने के कारण लगभग सभी लोगों को अपने होम टाऊन जाना था. बस अड्डे और स्टेशन तक कैसे पहुँचा जायेगा इसकी घबराहट उनके चहेरे पर साफ झलक रही थी.

कीचड, तेज पानी का बहाव, ट्रैफिक जाम, बंद पडी गाडियाँ, पैदल चलते लोग इन सभी को मात देते हुये, लगभग दो किलोमीटर का लम्बा जाम हमने ढाई घंटे में तय किया. हमने द्वारका तक पहुँचने के लिये बिजवासन से होकर जाने वाला लम्बा रास्ता तय किया. अब सडक दिखने लगी थी. तभी गाडी में से कोई बुदबुदाया, “यार कहीं फ़ाटक बंद ना हो”. यानि अभी हमें रेलवे फाटक को भी झेलना था. यकीन मानिये फाटक बंद ही मिला और जैसे हँसते हुये कह रहा हो, “कहाँ जा रहे हो, जरा हमसे भी मिलते जाओ”. एक छोटी सी पैसेनजर ट्रेन गुज़री और १० मिनट के बाद फाटक खुल गया. बिजवासन गाँव की कच्ची-टूटी और अँधेरी सडकों पर गाडी रेंग रही थी. पानी भरे गढ्ढों की वजह से टूटी सडक भी समतल नज़र आ रही थी. इसी धोके में कभी-कभी गाडी गढ्ढों में भी उतर जाती.

कुछ ही देर में हमारी गाडी द्वारका की सुंदर सडकों पर सवार हो गई और अब रफ्तार पकड चुकी थी. करीब नौ बजे हम द्वारका सैक्टर-नौ के मैट्रो स्टेशन पर पहुँच गये थे. मैं, नीरज और अखिल तीनों वहाँ उतर गये. सभी सहयात्रियों को धन्यवाद दिया और उनकी मंगलमय यात्रा के लिये कामना की. अब तो मैं ट्रेन पकड ही लूँगा, नीरज खुशी में बडबडाया. दो-तीन मिनट के वॉक के बाद हम मैट्रो स्टेशन के गेट पर थे. नहीं…….. तीनों के मुँह से एक साथ चीख निकली. टोकन लेने के लिये करीब एक किलोमीटर तक लोगों लंबी लाईन लगी थी. नीरज के हौंसले पस्त हो गये. अब तो मैं अपनी ट्रेन नहीं पकड पाऊँगा. हम सब के चेहरे घुटनों तक लटक गये. और हमारे ही क्यों वहाँ लगभग सभी लोग निराश दिख रहे थे.

तभी अखिल को एक आईडिया सूझा. वह लाईन में खिडकी के पास पहुँच कर एक व्यक्ति को रिकवैस्ट की,”प्लीज़, क्या आप एक टिकीट ले लेंगे, उसे ट्रेन पकडनी है”. नहीं, हम यहाँ पागल खडे हैं… मतलब मुझे नहीं पकडनी ट्रेन… मेरा टिकिट किसने लिया था? कई सारे सवाल उसने एक साथ दाग दिये. अखिल चुपचाप वहाँ से खिसक लिया. एक लडकी से कहा तो उसने एक टिकिट इंद्रप्रस्थ तक का ले लिय. वह टिकिट हमने नीरज को दिया और उसे भेज दिया ताकि वो ट्रेन पकड सके.

मैं चुपचाप लाईन में खडा था. दिवार घडी नौ चालीस का समय बता रही थी. मेरे आगे दो-तीन लोग ही खडे थे. तभी एक लडकी आई और बोली, “प्लीज़, क्या आप दो टिकिट नई दिल्ली स्टेशन के ले सकते हैं”. उसके यह कहते ही पीछे से लोग चिल्लाने लगे.. नहीं लेना.. हम दो घंटे से खडे हैं. मैंने उस लडकी से पैस नहीं लिये और अपने पैसों में से ही उसके दो टोकन ले लिये. यहाँ नीरज के लिये जिससे एहसान लिया था वो चुकता हो गया था. उस लडकी को टोकन देकर उससे पैसे ले लिये और बिना Thanks की wait किये प्लेटफार्म की तरफ भागे.

प्लेटफार्म पर भी कोई कम भीड नहीं थी. मैं और अखिल ब्लाइंड लोगों के लिये बने निशान पर खडे हो गये. शायद बहुत से लोगों को ना पता हो कि इस निशान पर ट्रेन का गेट जरूर खुलता है. अपने कोच में घुसने वाले हम दोनों सबसे पहले पैसेंजर थे. हमने कार्नर की कपल सीट हथिया ली और लोगों के चेहरे देख कर पता नहीं क्यों खुशी से फूले नहीं समा रहे थे. आखिर हम जीत गये थे. लेकिन पता नहीं किससे. प्रतिस्पर्धी तो हमारे साथ कोई नहीं था. दस बजे ट्रेन चल पडी.

अब अच्छा महसूस हो रहा था. साढे छ: बजे के निकले अब दस बजे चैन की साँस ली थी. मैंने नीरज को फोन किया तो पता लगा उसकी गाडी आधा घंटा लेट है और वो स्टेशन पहुँचने वाला है. तभी अखिल ने फोन पर किसी से बात की और मुझसे कहा कि हम आर.के आश्रम उतर जायेंगे. वहाँ से मॉसी जी हमें पिक कर लेंगी. हम आर.के. आश्रम उतरे और वहाँ से कुछ ही देर में हमें मॉसी जी ने पिक कर लिया और इस तरह हम रात 11.45 पर घर पहुँचे.

घर पहुँच कर राहूल को फोन किया तो पता चला कि हमारी ऑफिस की कैब रात करीब सवा नौ बजे ऑफिस पहुँची थी. और वो रात साढे बारह बजे घर पहुँचा. नीरज को फोने किया तो उसने बताय कि वह अभी तक गाडी का इंतज़ार कर रहा है और उसकी गाडी रात दो बजे आयेगी.

डेढ घंटे का सफर उस दिन मैंने पाँच घंटों में तय किया. मुझे अभी भी वो बहता हुआ पानी, परेशान लोग, भयानक ट्रैफिक भूले नहीं भूलता. भगवान ऐसा दिन कभी दोबारा ना दिखाये.

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9 responses to “चौदह अगस्त-गुडगाँव की वो भयानक रात

  1. इतनी लंबी लाइन की जगह स्‍मार्ट कार्ड खरीद लेना था, लाइन से भी बचते और बाद में भी काम आता…पर हॉं टोकन खरीद कर देने के प्रिविलेज से वंचित होना पड़ता :))

    वैसे और भी कई भुक्‍तभोगियासें ने इस जाम के विषय में सुनाया है। महानगरीय जीवन का प्रसाद है भई।

  2. मसिजीवी भाई, हमने स्मार्ट कार्ड खरीदने के बारे में भी सोचा था. लेकिन पता नहीं क्यों हम टोकन खरीदने में ही ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे थे.

  3. तो आप भी थे उस जाम में. चलिये जल्दी पहुंच गये. हमारे ऑफिस के लोग तो दो-दो बजे तक घर पहुंचे. हम अपने पिछ्ले साल के अनुभव के कारण 1 बजे ही ऑफिस से निकल गये थे.

  4. हम तो गुडगाव के रस्ते से ही वापस भाग आये जी 🙂 ऐसी बारिश मे अपने शहर के गड्ढे अच्छे

  5. प्रयास भाइ कुछ ऐसा ही हाल हमारा भी हुआ था. आजादी के दिन से एक दिन पहले ही हम लोग खुद को बारीश और खराब सीसटम के गुलाम मह्सूस कर रहे थे.

  6. अच्छा विवरण लिखा है. इसे भयानक रात नही मान लेना चाहिए. थोडी परेशनी वाली रात तो समझ मे आती है.
    लेकिन आपके लिखने के अन्दाज ने महसूस करवा दिया जैसे मै वही था. आपका ब्लोग पढता रहता हू हिन्दी से जुडा रहने के लिए.
    अच्छा लिखते रहे. धन्यावाद.

  7. विर्क जी,

    मेरे ब्लौग पर आने व पढने के लिये आपका धन्यवाद.

    चौदह अगस्त-गुडगाँव की वो भयानक रात में ये भयानक शब्द मैंने इस लिये उपयोग किया है क्योंकि जिस बिजवासन गाँव से हम लोग निकले थे वह एकदम सुनसान और हमारे लिये अनजान था. वहाँ सडक के नाम पर केवल कच्ची पगडंडीयाँ थीं जो कि पानी से पटी पडी थीं. दूर-दूर तक बिजली का पता नहीं था. और उस पर हमारी ग़ाडी ऐसे हिचकोले खाती हुई निकल रही थी की लगता था शायद इस गढ्ढे में ही गाडी डूब जायेगी.

  8. mana ki ye bhyank raat thi. per hum log isses bhi boory anubhase roaj jugaraty hai .mai NTPC BARH PROJECT mai karyrat hoon aur roaj patna se BARH anna janna hota hai subha sate baje ghar se nikalte hai aur bus ho y train 70 km ka safar 3-3.30 ghante mai pura karty hai aur saam ko 6 baze office se nikalte hai to patta nahi raat mai patna 10 baze pahuche y 11 baze patna ki rail aur sadak yatayat ke bare mai phir kabhi.appke anubhab phir padney ko milyengy.

  9. Same was mine experience on that day. I had a meting with client in gurgaon itself. It took me 2 hrs to reach my office just 2 km from client office. I had to left my car on raod in between the jam as traffic was not moving for last 45 min (within udyog viaha). Then I left my office at about 8.30 to go to home in delhi, hoping traffic would have eased. Till rajoukri after toll plaza it seems it really had, but worst was yet to be seen. after crossing rajoikri flyover, traffic was heavily jammed till dhaula kouan. I had to walk at least 5-6 km in rain to reach dhaula kouan. I also had been deprived of last metro due to jam. Even after dhaula kouan, delhi’s road were also jam pakced. No Autowala was ready to go anywhere. Bus stands were full of commuters even at 11.00 pm, which otherwise looks deserted by this time. some how I managed to get into a packed bus and traveled upto CP on it’s foot-step. Only from there I could get an auto for my home. But by then it was already 12.30. I reached my home by 1.15. So it took me around 5 hours to reach my home. It was really a nightmare.