कदम मेरे खुद ही पडेंगे ये बादल

कल ऑफिस के काम से बाहर जाना था. गार्ड को बोला की ड्राईवर को गाडी निकालने के लिये कह दे. कोई दो बजे खाना खा कर निकला तभी बहुत जोर से बादल गरजे और झमाझम बारिश शुरू. दस मिनट इंतज़ार किया लेकिन बारिश अपना यौवन दिखा रही थी. बारिश की वजह से ट्रैफिक जाम और दुर्घटना का खतरा भी बढ जाता है. काम बहुत जरूरी था मैंने ड्राईवर को कहा, “यार निकाल लो गाडी, जो होगा देखा जायेगा काम तो करना ही है”. हालांकि ड्राईवर ज्यादा खुश नहीं था लेकिन उसके पास मना करने का कोई कारण नहीं था.

काम खत्म करके कोई साढे पाँच बजे ऑफिस वापिस आ गया था. बारिश के साथ जो संघर्ष कल किया था उस पर आज एक छोटी सी कविता लिख डाली.

उमडते घुमडते गरजते ये बादल,
हवाओं के संग में सँवरते ये बादल.

ये क्या कर रहे हैं कहो कुछ इन्हें तो,
क्यों राहों में मेरी खडे हैं ये बादल.

ये जंगल पडे हैं ये पर्वत खडे हैं,
जहाँ चाहे मर्जी बरस लें ये बादल.

समझ ले ये खुद ही नहीं मैं डरूँगा,
चाहे रूप जिसका धरें भी ये बादल.

नहीं रोक सकते मेरे हौंसलों को,
कदम मेरे खुद ही पडेंगे ये बादल.

प्रयास (नरेश)

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2 responses to “कदम मेरे खुद ही पडेंगे ये बादल

  1. नहीं रोक सकते मेरे हौंसलों को,
    कदम मेरे खुद ही पडेंगे ये बादल.

    -बहुत उम्दा, क्या बात है!

  2. wah bahut hi badhiya,badal se nahi darenge,wahi kadam mein padenge undar,i always think like what u hv writtn in poem,ye badal jungle mein kyun nahi baraste,kyun hamare kaam ke aade aate hai:)