सम्पूर्ण परीक्षा

मिथिला के राजा ने राजपाट छोड़ने की ठान ली। उसने परीक्षा लेने के इरादे से अपने तीनों पुत्रों को बुलाया और उन्हें तीन-तीन सोने के सिक्के दिए और कहा, ‘आज शाम तक इन सिक्कों का उपयोग इस प्रकार करना है कि एक यहां के लिए खर्च हो, दूसरा वहां के लिए और तीसरा न यहां के लिए खर्च हो और न वहां के लिए।’

तीनों राजकुमार दिन भर अपनी-अपनी समझ में यहां-वहां का मतलब निकालते और खर्च करते हुए शाम को वापस आ गए। राजा ने तीनों को बुलवाकर खर्च की जानकारी मांगी। पहले ने कहा, ‘महाराज, मैंने एक सिक्का राजकोष में जमा करवा दिया, यानी यहां के लिए। दूसरे सिक्के की बहुत सारी इकन्नियां (एक पैसा) इकट्ठी करके जनता में लुटवा दीं, यानी वहां के लिए और तीसरा सिक्का नदी में फेंक आया यानी न यहां के लिए और न वहां के लिए।’

दूसरा राजकुमार बोला, ‘पिताजी, मैंने एक सिक्का तो अपनी जेब में डाल लिया अर्थात यहां के लिए। दूसरा एक मित्र को दे दिया, मतलब वहां के लिए और तीसरे सिक्के का मैं कुछ नहीं कर सका।’

तीसरे राजकुमार ने कहा, ‘मैंने पहले पता लगाया कि राजमहल में किन-किन वस्तुओं की अत्यंत आवश्यकता है। मैंने एक सिक्के से वही सारी वस्तुएं खरीद कर महल में पहुंचवा दीं। यह हुआ यहां यानी इहलोक का काम। कुछ गांवों में सूखा पड़ने के कारण भुखमरी की हालत हो गई थी। दूसरे सिक्के से अनाज खरीद कर बेसहारा लोगों में बांट दिया। यह हुआ वहां अर्थात परलोक का कार्य। राजसी स्वभाव का पालन करते हुए मैंने और मेरे कुछ मित्रों ने तीसरे सिक्के से मनचाहे खाद्य पदार्थ चखे और मेले में जाकर विभिन्न क्रीड़ाएं करके आनंद प्राप्त किया। यह हुआ न तो यहां और न वहां के लिए खर्च।’

राजा यह सुनकर प्रसन्न हुए और बोले, ‘पुत्र, तुम्हीं राजगद्दी के वास्तविक हकदार हो, क्योंकि तुमने तीसरे सिक्के के व्यर्थ के खर्च को भी सार्थक कर दिखाया।’

संकलन: चन्द्रप्रकाश
आभार: नवभारत टाइम्स

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3 responses to “सम्पूर्ण परीक्षा

  1. अच्छी कहानी।

  2. प्रेरक प्रसंग, आभार.

  3. आजकल भारत को चलाने वाले सिर्फ़ तीसरे सिक्के को ही प्रयोग कर रहे हैं.