Daily Archives: अगस्त 14, 2008

कदम मेरे खुद ही पडेंगे ये बादल

कल ऑफिस के काम से बाहर जाना था. गार्ड को बोला की ड्राईवर को गाडी निकालने के लिये कह दे. कोई दो बजे खाना खा कर निकला तभी बहुत जोर से बादल गरजे और झमाझम बारिश शुरू. दस मिनट इंतज़ार किया लेकिन बारिश अपना यौवन दिखा रही थी. बारिश की वजह से ट्रैफिक जाम और दुर्घटना का खतरा भी बढ जाता है. काम बहुत जरूरी था मैंने ड्राईवर को कहा, “यार निकाल लो गाडी, जो होगा देखा जायेगा काम तो करना ही है”. हालांकि ड्राईवर ज्यादा खुश नहीं था लेकिन उसके पास मना करने का कोई कारण नहीं था.

काम खत्म करके कोई साढे पाँच बजे ऑफिस वापिस आ गया था. बारिश के साथ जो संघर्ष कल किया था उस पर आज एक छोटी सी कविता लिख डाली.

उमडते घुमडते गरजते ये बादल,
हवाओं के संग में सँवरते ये बादल.

ये क्या कर रहे हैं कहो कुछ इन्हें तो,
क्यों राहों में मेरी खडे हैं ये बादल.

ये जंगल पडे हैं ये पर्वत खडे हैं,
जहाँ चाहे मर्जी बरस लें ये बादल.

समझ ले ये खुद ही नहीं मैं डरूँगा,
चाहे रूप जिसका धरें भी ये बादल.

नहीं रोक सकते मेरे हौंसलों को,
कदम मेरे खुद ही पडेंगे ये बादल.

प्रयास (नरेश)

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सम्पूर्ण परीक्षा

मिथिला के राजा ने राजपाट छोड़ने की ठान ली। उसने परीक्षा लेने के इरादे से अपने तीनों पुत्रों को बुलाया और उन्हें तीन-तीन सोने के सिक्के दिए और कहा, ‘आज शाम तक इन सिक्कों का उपयोग इस प्रकार करना है कि एक यहां के लिए खर्च हो, दूसरा वहां के लिए और तीसरा न यहां के लिए खर्च हो और न वहां के लिए।’

तीनों राजकुमार दिन भर अपनी-अपनी समझ में यहां-वहां का मतलब निकालते और खर्च करते हुए शाम को वापस आ गए। राजा ने तीनों को बुलवाकर खर्च की जानकारी मांगी। पहले ने कहा, ‘महाराज, मैंने एक सिक्का राजकोष में जमा करवा दिया, यानी यहां के लिए। दूसरे सिक्के की बहुत सारी इकन्नियां (एक पैसा) इकट्ठी करके जनता में लुटवा दीं, यानी वहां के लिए और तीसरा सिक्का नदी में फेंक आया यानी न यहां के लिए और न वहां के लिए।’

दूसरा राजकुमार बोला, ‘पिताजी, मैंने एक सिक्का तो अपनी जेब में डाल लिया अर्थात यहां के लिए। दूसरा एक मित्र को दे दिया, मतलब वहां के लिए और तीसरे सिक्के का मैं कुछ नहीं कर सका।’

तीसरे राजकुमार ने कहा, ‘मैंने पहले पता लगाया कि राजमहल में किन-किन वस्तुओं की अत्यंत आवश्यकता है। मैंने एक सिक्के से वही सारी वस्तुएं खरीद कर महल में पहुंचवा दीं। यह हुआ यहां यानी इहलोक का काम। कुछ गांवों में सूखा पड़ने के कारण भुखमरी की हालत हो गई थी। दूसरे सिक्के से अनाज खरीद कर बेसहारा लोगों में बांट दिया। यह हुआ वहां अर्थात परलोक का कार्य। राजसी स्वभाव का पालन करते हुए मैंने और मेरे कुछ मित्रों ने तीसरे सिक्के से मनचाहे खाद्य पदार्थ चखे और मेले में जाकर विभिन्न क्रीड़ाएं करके आनंद प्राप्त किया। यह हुआ न तो यहां और न वहां के लिए खर्च।’

राजा यह सुनकर प्रसन्न हुए और बोले, ‘पुत्र, तुम्हीं राजगद्दी के वास्तविक हकदार हो, क्योंकि तुमने तीसरे सिक्के के व्यर्थ के खर्च को भी सार्थक कर दिखाया।’

संकलन: चन्द्रप्रकाश
आभार: नवभारत टाइम्स