ऑफिस की किस बंदी से सैटिंग हो गयी तेरी…

पिछले दिनों मैं महाकवि कालिदास कृत “मेघदूत” पढ रहा था. उसे पढकर मेरे अन्दर का लेखक अँगडाईयाँ लेने लगा. और प्यार-मुहब्बत पर कुछ लिखने की ठानी. कल दोपहर को वर्षा ऋतू अपने यौवन पर थी तो मन में विचारों की लहरें उठने लगीं.

बस भगवान को नमन किया और तुरत-फुरत दो शेर लिख डाले.

छुप कर मत दिदार करो तुम पकडे जाओगे
शर्म से लाल हुआ चेहरा फिर कहाँ छुपाओगे.

गीली आँखों में तेरी मेरा अक्स नज़र आता है
मेरी रूह को तुम मन में कब बसाओगे.

लिखने के बाद सबसे पहले अपने पडोसी मित्र को पढवाया. पढने के बाद महाशय बोले –

क्यों, किसका चुराया है?

मैं बोला, “नहीं भाई चुराया नहीं है अभी-अभी लिखा है”. जल्दी-जल्दी तीन-चार भगवानों की कसमें खाने के बाद उसे यकीन हो गया.

अब उन साहब ने दूसरा जुमला फेंका – साले तू तो गया काम से. ऑफिस की किस बंदी से सैटिंग हुई है तेरी?

सैटिंग? मतलब? इसमें सैटिंग कहाँ से आ गयी?

…हाँ-हाँ मुझे सब पता है आजकल तू दिन में तीन-तीन बार चाय लेने किचन में क्यों जाता है. और वह साहब मुझे ऐसे निहारने लगे जैसे पुलिस वाला चोर को निहार रहा होता है.

मैं हक्का-बक्का उनकी शक्ल देखता रह गया.

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7 responses to “ऑफिस की किस बंदी से सैटिंग हो गयी तेरी…

  1. ये सज्जन काम के लगते हैं। कृपया इनसे पूछें कि क्या बता सकते हैं कालिदास की किससे सेटिंग थी!-)

  2. lekhak ne to behtarin angdai li, bhai…bahut saje.

  3. Bahut achhi kavita thi,
    man ko moh lia aapki kavita ne….