इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं…

इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं
जिधर देखता हूं, गधे ही गधे हैं

गधे हँस रहे, आदमी रो रहा है
हिन्दोस्तां में ये क्या हो रहा है

जवानी का आलम गधों के लिये है
ये रसिया, ये बालम गधों के लिये है

ये दिल्ली, ये पालम गधों के लिये है
ये संसार सालम गधों के लिये है

पिलाए जा साकी, पिलाए जा डट के
तू विहस्की के मटके पै मटके पै मटके

मैं दुनियां को अब भूलना चाहता हूं
गधों की तरह झूमना चाहता हूं

घोडों को मिलती नहीं घास देखो
गधे खा रहे हैं च्यवनप्राश देखो

यहाँ आदमी की कहां कब बनी है
ये दुनियां गधों के लिये ही बनी है

जो गलियों में डोले वो कच्चा गधा है
जो कोठे पे बोले वो सच्चा गधा है

जो खेतों में दीखे वो फसली गधा है
जो माइक पे चीखे वो असली गधा है

मैं क्या बक गया हूं, ये क्या कह गया हूं
नशे की पिनक में कहां बह गया हूं

मुझे माफ करना मैं भटका हुआ था
वो ठर्रा था, भीतर जो अटका हुआ था

ओम प्रकाश आदित्य

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6 responses to “इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं…

  1. इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं
    घोड़ों को नहीं मिल रही घास
    गधे खा रहे हैं च्‍यवनप्राश

  2. यह कविता यार सप्तक पुस्तक से अवतरित की गयी है

  3. सुमित जी यह कविता मशहूर कवि श्री ओम प्रकाश आदित्य जी द्वारा रचित है

  4. ओम प्रकाश आदित्य जी की कविता पढ़कर मजा आया. आपका आभार इस प्रस्तुतिकरण पर.

  5. मजा आ गया भाई पढ़कर । 🙂
    बहुत बहुत शुक्रिया पेश करने का

    अगर दिक्कत ना हो तो इसे यहाँ पर भी डाल दें
    http://www.akshargram.com/paricharcha/viewtopic.php?id=213

  6. Bahut majedar Rachna hai
    Hasya se bharpoor