एक भिखारी

वह एक बैंकर का बंग्ला था| सुबह के पाँच बजे किसी ने दरवाज़ा खटखटाया| एक भिखारी खडा था| बैंकर को गुस्सा आया| बेवक़्त उठा दिया| वह तमतमाता हुआ बाहार आया, हालांकि उसे दान देने में कोई दिक्कत नहिं होती थी| बाहर आकर बोला, ये भी कोई वक़्त है? भिखारी बोला, आप बैंकिंग का धन्धा करते हैं, मैंने कोई सलाह दी क्या? यह हमारा धन्धा है| आप हमें क्यों सलाह देते हैं?

बैंकर ने लाईट जलाई| वह देखना चाहता था कि आखिर सामने कौन है| यह अन्दाज़ तो किसी बादशाह का होता है, भिखमंगे का नहीं| वह एक साधारण व्यक़्ती था और वहाँ भिख माँगने ही आया था, लेकिन बैंकर ने महसूस किया की कोई आदमी अपने हेय जीवन की भी इतनी इज़्ज़्त कर सकता है|

संकलन – रमेश जैन (नवभारत टाइम्स में प्राकाशित)

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