एक बेटी का सवाल ……घर कौन सा है मेरा?

चौराहे पर खङी है, सामान बांधे अपना
कोइ मुझे बता दे, कौन सा घर है मेरा
पहला वो घर था, जिस में जनम लिया था
बाबा ने उंगली पकङी, मैंने कदम लिया था|

युं लम्हा-लम्हा पाला, खूने जिगर पिलाया
मेहनत से रोज़ो-शुब की, इतना मुझे पढाया
कह्ती थी मेरी अम्मी, तुम तो पराया धन हो
हो गैर की अमानत, मेहमान जाने मन हो|

तुम गैर की अपनी होगी, तो सांस सुख का लुंगी
सोऊंगी नींद अपनी, बेफिक्र भी रहुउंगी
बाबा ने रुख्सति पर, मुझ से कहा था बेटा!
गर हो खुशी से आना, तो दर ये खुला है|

वर्ना तुम्हारा घर तो, शौहर का घर है बेटा!
उस घर में जा बसोगी, तो मुझ को सुकुं मिलेगा
खुशियां बहुत समेटो, फूलो फलो वहीं पर
तुम चाहे तख्त नशिं हो, या बैठो ज़मिं पर|

उस घर की प्यरी मिट्टी, तुम्हारा श्रंगार होगी
ये प्यरा सा तस्सुवर, दिल में बसा के लायी
माँ-बाप की दुनिया, भाईयों का प्यार लायी
तब मैं ये सोच बैठी, ये घर है मेरा अपना
मुद्दत के बाद आखिर, पुरा हुआ है सपना|

इस को बनाया मैंने, इसको संवारा मैंने
मेहनत से रोज़-ओ-शब की, इसको निखारा मैंने
आंगन से घर के जैसे, कुछ फूल महक उठे
खुशियां से इन गुलों की, दिवार-ओ-दर भी मेहके|

हर लम्हा ज़िन्दगी का, इन्हीं को मैंने सौंपा
रतों की निंद दे दी, आराम दिन का सौंपा
शौहर की खिदमत में, ये जान-ओ-तन भी गँवाया
हुस्न-ओ-जवानी सेहत, और हुस्न-ए-ज़ुन गँवाया

इक रोज़ जो घर लौटे, तेवर थे उन्के बद्ले
ये कैनात बदली, और रोज़-ओ-शब भी बद्ले
कहने लगे मुझे वो, तंग आ गया हुँ तुम से
मीयार अपना खोया, घबरा गया हुँ तुम से

रहता हुँ तंग तुम से, होगा ना अब गुज़ारा
निकलो यहाँ से फौरन, कब है ये घर तुम्हरा
बच्चे भी उस के ठहरे, घर बार भी उसी का
दौलत भी उस की ठहरी, संसार भी उसी का

हैरान खढी हुँ, चौराहे पर अकेली
कोई मुझे बता दे, कौन सा घर है मेरा?

आभार

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