Tag Archives: purani kahaniyan

उत्तराखण्ड त्रासदी पर

शिव को दोष मत दे रे ऐ बेगैरत इंसान
दुषकर्मों का मिल रहा है ये तुझको ईनाम…1

uttarakhand flood 2013

शीश झुका मैं कर रहा था अपने शिव का ध्यान
तब चुपके से आया था वो नरभक्षी हैवान…2

आफत में जब पडी हुई थी उन लोगों की जान
मानवता को कुचल रहे थे तब भी कुछ शैतान…3

पर्वत नदीयाँ वृक्ष धरा ही हैं असली भगवान
इनकी रक्षा करके ही अब बच सकती है जान…4

उत्तराखण्ड त्रासदी 2013, उत्तराखण्ड बाढ 2013, बादल फटना, उत्तराखण्ड में बादल फटा, प्रयास, प्रयास का ब्लौग, नरेश का ब्लौग, पुरानी कहानियाँ, विक्रम बेताल की कहानी, Uttarakhand trasdi 2013, uttarakhand flood 2013, baadala fatna, uttarakhana baadal, pryas, pryas ka blog, naresh ka blog, purani kahaniyan, vikram vaital ki kahani

मेरा वैलैंटाइन – हास्य कविता

इस बार हमने सोचा
हम भी वैलैंटाईन डे मनायेंगे
अपनी मैडम को पिक्चर दिखायेंगे
हमारा भी तो दोस्तों में रुतबा बढेगा
घरेलू लडका है फिर कोई नहीं कहेगा
बस कर लिये दो टिकट ऐडवांस में बुक
श्रीमति जी के चेहरे का देखने लायक था लुक
मुस्कुराते हुए बोलीं कार्नर की ली हैं ना
हमने कहा हाँ एक दाहिना एक बाहिना.

तो हम भी पहुँच गये मैडम के संग
देखने सलमान की लेटेस्ट फिल्म दबंग
ये फिल्म देखना का मेरा पहला टैस्ट था
मैडम का सलमान में कुछ ज्यादा ही इंट्रस्ट था
वो बाहर से तो हम पर ही मर रही थी
पर तारिफ सलमान की ही कर रही थी

फिल्म का जैसे ही हुआ इंटरवल
मैडम जी के माथे पर आ गये बल
गुस्से में बोली, “आज के दिन भी भूखा मारोगे”
जेब में रखे पैसों की क्या आरती उतारोगे
पूरा सिनेमा हाल हमें लानत भेज रहा था
फिल्म के इंटरवल में हमारा ट्रेलर देख रहा था

हम फौरन कैंटीन की तरफ दौडे
ना ब्रैड दिखे ना ही पकौडे
चारों तरफ बस माल ही माल दिख रहा था
हर काउंटर पर पापकार्न और पिज्जा ही बिक रहा था
कुछ देर तक आँखें सेकीं और दिल ठंडा किया
फिर धर्मपत्नी जी के लिये एक ठंडा लिया

ठंडा लेकर हाल में हम जैसे ही पहुँचे
श्रीमति जी पिल पडी बिना कुछ सोचे
बडे प्यार से मुझे डांट कर बोली
अभी तक ठंडे की बोतल भी नहीं खोली
हम बोले सलमान खान से ध्यान हटाओ
बोतल खुली है अब इस पर ध्यान लगाओ

ठंडा पीते ही मैडम गुर्राई
ये ठंडा है या गर्म मेरे भाई
लो जी अब तो कमाल हो गया
सलमान के सामने मैं भाई हो गया
मैंने चुपचाप से सौरी का सहारा लिया
गर्म होते मामले का वहीं निपटारा किया

जैसे तैसे सलमान की दबंगई हुई खत्म
हमारे अंदर भी आ गया थोडा सा दम
धर्मपत्नी बोली अब क्या दिलवाओगे
हम बोले अभी तक क्या दिलवाया है?
वो बोली ज्यादा मजाक नहीं चलेगा
घर जाकर धोऊं या यहीं पिटेगा?

हमने चुपचाप चुप्पी साध ली
सीधे अपने घर की राह ली
आज हमें एक शिक्षा मिली थी
कि वैलंटाईन हो या करवा चौथ
रक्षा बंधन हो या भैया दौज
सब प्यार मौहब्बत ही फैलाते हैं
और इनका मजा तब ही आता है
जब आप इन्हें घर पर ही मनाते हैं

घर पर ना होगी सलमान की दबंगाई
और ना होगी बाजार में आपकी पिटाई

 

दिल्ली पुलिस – जाँच का तरीका

पूर्वी दिल्ली में एक डी.डी.ए. की कालोनी है मयूर विहार, फेज-1. यूं तो मयूर विहार, फेज-2 और  3 भी हैं. लेकिन फेज-1 इनमें सबसे पुरानी कालोनी है. इस मयूर विहार में एक छोटा सा नर्सिंग होम है कुकरेजा नर्सिंग होम. यहाँ 24 घंटे बीमार लोगों की आवाजाही लगी रहती है.

यह नर्सिंग होम थाना पांडव नगर के अन्तृगत आता है. पिछले कुछ दिनों से मैंने यहाँ एक अजीब बात देखी. वैसे पूरी दिल्ली में दिल्ली पुलिस ने बाईकर्स के खिलाफ जंग छेड रखी है. कागज पूरे ना पाये जाने पर या तो उन्हें बंद किया जा रहा है या उनका चालान किया जा रहा है. अच्छी बात है, अपराधी तत्व इन बाईकों पर बैठ कर राहजनी, लूटपाट और चेन छपटने में उस्ताद हो गये हैं.

लेकिन जो नजारा मैंने कुकरेजा नर्सिंग होम पर देखा वह अद्भुत पाया. वाहन चेकिंग के लिये दिल्ली पुलिस बैरिकेटिंग करके वाहन चैक करती है. लेकिन यहाँ पुलिस को इतनी मेहनत भी नहीं करनी पडती. यह नर्सिंग होम एक मोड पर बना हुआ है और सामने ही एक डिसपैन्सरी भी है. पुलिस की मिलीभगत से यहाँ बहुत से ठेले वाले खडे रहते हैं. और इसके अतिरिक्त मयूर विहार, फेज-1 के पाकेट-5 पर जाने के लिये एक मुख्य सडक भी है. कुल मिला कर यहाँ बहुत ही भीड रहती है और आपको अपनी गाडी की स्पीड ना चाहते हुए भी धीरे करनी ही पडेगी. और हाँ यहाँ दिनभर एमबुलैन्स की आवाजाही भी लगी रहती है.

तो जी, अब पुलिस वालों को ये मोड जंच गया. अब वो यहाँ वाहन चैकिंग के लिये कोई बैरिकेटिंग नहीं करते और ना ही यहाँ 4-5 पुलिस वालों की आवश्यकता पडती. केवल दो पुलिस वाले चुप-चाप बाईक में यहाँ आते हैं और एक चाय वाले के यहाँ बीडी व चायपान करते हैं. इस खास नाश्ते के बाद इनकी फुर्ती देखने लायक होती है.

ये चुप-चाप चाय की दुकान में खडे रहते हैं और जैसे ही कोई मरीज आता है तो जाहिर सी बात है कि दो-चार लोग और साथ में आते हैं. और यदि ये लोग स्कूटर या बाईक पर होते हैं तो पुलिस वाले चुपचाप उनके पास चले आते हैं और फिर आवश्यक कागज और हेलमेट क्यों नहीं पहना से जेब गर्म करने की भूमिका बनाई जाती है. अब बेचारे लोग आपातस्तिथी के कारण हेलमेट ना पहनपाने या कागज ना लापाने की बात समझाने की नाकाम कोशिश करते हैं. लेकिन पुलिस वालों के कान तो भर्ती के समय ही बंद कर दिये जाते हैं. केवल बोलना है ही सिखाया जाता है इन्हें, और बोलना क्या बल्कि डांटना या धमकाना कहिये जनाब!

अब जो जैसा मिल जाये उसी के हिसाब से अस्पताल के बाहर ही उन तिमारदारों का ईलाज कर दिया जाता है. अब तिमारदार भी कुछ ले-देकर मामला रफा-दफा करने को प्राथमिकता देते हैं. अपने मरीज को भर्ती जो करवाना है. और यदि कोई व्यक्ति फुरसत में हो और पैसे देने में आनाकानी करे तो बस सीधा कोर्ट का चालान.

यह पूरी कार्यवाही सुरक्षा की दृष्टि से की गई हो ऐसा समझने का मैने भरसक प्रयास किया लेकिन सफल ना हो सका. यकीन मानिये मैंने एक दिन हिम्म्त करके उनसे पूछा कि आप सीधी तरह से सडक पर खडे होने के स्थान पर चाय वाले के पास क्यों खडे रहते हैं. तो उनका जवाब था कि लोग हमें देख कर भाग जाते हैं. और इसीलिये आप रोगीयों के रिश्तेदारों को निशाना बना रहे हैं – मैंने झट से कहा. क्यों इब तू काम सिखायगा हमैं. लिकड ले यहाँ सै. अर नहीं तो तेरेई पडलैगा एक-आधा. आया रोगीयन का ठेकेदार - जैसी लताड सुनने को मिली.

अब ये क्या तरीका है. सुरक्षा के नाम पर वाहन चैकिंग करते पुलिस वालों को देखकर जहाँ मैं सुरक्षित महसूस करता था, वहीं उनके इस रैवैये को देखकर मेरे मन में दिल्ली पुलिस की रही सही छवि और भी खराब हो गयी.

दिल्ली पुलिस, प्रयास, वाहन चैकिंग दिल्ली, 

जीवन की नाव

एक संत थे। उनके कई शिष्य उनके आश्रम में रहकर अध्ययन करते थे। एक दिन एक महिला उनके पास रोती हुए आई और बोली, ‘बाबा, मैं लाख प्रयासों के बाद भी अपना मकान नहीं बना पा रही हूं। मेरे रहने का कोई निश्चित ठिकाना नहीं है। मैं बहुत अशांत और दु:खी हूं। कृपया मेरे मन को शांत करें।’

उसकी बात पर संत बोले, ‘हर किसी को पुश्तैनी जायदाद नहीं मिलती। अपना मकान बनाने के लिए आपको नेकी से धनोपार्जन करना होगा, तब आपका मकान बन जाएगा और आपको मानसिक शांति भी मिलेगी।’ महिला वहां से चली गई। इसके बाद एक शिष्य संत से बोला, ‘बाबा, सुख तो समझ में आता है लेकिन दु:ख क्यों है? यह समझ में नहीं आता।’

उसकी बात सुनकर संत बोले, ‘मुझे दूसरे किनारे पर जाना है। इस बात का जवाब मैं तुम्हें नाव में बैठकर दूंगा।’ दोनों नाव में बैठ गए। संत ने एक चप्पू से नाव चलानी शुरू की। एक ही चप्पू से चलाने के कारण नाव गोल-गोल घूमने लगी तो शिष्य बोला, ‘बाबा, अगर आप एक ही चप्पू से नाव चलाते रहे तो हम यहीं भटकते रहेंगे, कभी किनारे पर नहीं पहुंच पाएंगे।

उसकी बात सुनकर संत बोले, ‘अरे तुम तो बहुत समझदार हो। यही तुम्हारे पहले सवाल का जवाब भी है। अगर जीवन में सुख ही सुख होगा तो जीवन नैया यूं ही गोल-गोल घूमती रहेगी और कभी भी किनारे पर नहीं पहुंचेगी। जिस तरह नाव को साधने के लिए दो चप्पू चाहिए, ठीक से चलने के लिए दो पैर चाहिए, काम करने के लिए दो हाथ चाहिए, उसी तरह जीवन में सुख के साथ दुख भी होने चाहिए।

जब रात और दिन दोनों होंगे तभी तो दिन का महत्व पता चलेगा। जीवन और मृत्यु से ही जीवन के आनंद का सच्चा अनुभव होगा, वरना जीवन की नाव भंवर में फंस जाएगी।’ संत की बात शिष्य की समझ में आ गई।

 

प्रयासप्रयास का ब्लौगनरेश का ब्लौगयह भी खूब रही, पुरानी कहानियाँ, pryaspryas ka , blog, naresh ka blog, yah bhi khoob rahi, purani kahaniyan,जीवन की नाव

पेशे की इज्जत

यह घटना उन दिनों की है जब फ्रांस में विद्रोही काफी उत्पात मचा रहे थे। सरकार अपने तरीकों से विद्रोहियों से निपटने में जुटी हुई थी। काफी हद तक सेना ने विद्रोह को कुचल दिया था , फिर भी कुछ शहरों में स्थिति खराब थी। इन्हीं में से एक शहर था लिथोस। लिथोस में विद्रोह पूर्णतया दबाया नहीं जा सका था , लिहाजा जनरल कास्तलेन जैसे कड़े अफसर को वहां नियंत्रण के लिए भेजा गया। कास्तलेन विद्रोहियों के साथ काफी सख्ती से पेश आते थे।

इसलिए विद्रोहियों के बीच उनका खौफ भी था और वे उनसे चिढ़ते भी थे। इन्हीं विद्रोहियों में एक नाई भी था , जो प्राय : कहता फिरता – जनरल मेरे सामने आ जाए तो मैं उस्तरे से उसका सफाया कर दूं। जब कास्तलेन ने यह बात सुनी तो वह अकेले ही एक दिन उसकी दुकान पर पहुंच गया और उसे अपनी हजामत बनाने के लिए कहा। वह नाई जनरल को पहचानता था। उसे अपनी दुकान पर देखकर वह बुरी तरह घबरा गया और कांपते हाथों से उस्तरा उठाकर जैसे – तैसे उसकी हजामत बनाई।

काम हो जाने के बाद जनरल कास्तलेन ने उसे पैसे दिए और कहा – मैंने तुम्हें अपना गला काटने का पूरा मौका दिया। तुम्हारे हाथ में उस्तरा था , मगर तुम उसका फायदा नहीं उठा सके। इस पर नाई ने कहा – ऐसा करके मैं अपने पेशे के साथ धोखा नहीं कर सकता था। मेरा उस्तरा किसी की हजामत बनाने के लिए है किसी की जान लेने के लिए नहीं। वैसे मैं आपसे निपट लूंगा जब आप हथियारबंद होंगे। लेकिन अभी आप मेरे ग्राहक हैं। कास्तलेन मुंह लटकाकर चला गया।

प्रयास, प्रयास का ब्लौग, नरेश का ब्लौग, यह भी खूब रही, पुरानी कहानियाँ, pryas, pryas ka blog, naresh ka blog, yah bhi khoob rahi, purani kahaniyan

सदाचरण से सम्मान

प्राचीन समय में वाराणसी के राज पुरोहित हुआ करते थे- देव मित्र। राजा को राज पुरोहित की विद्वता और योग्यता पर बहुत भरोसा था। राजा इसलिए उनकी हर बात मानते थे। प्रजा के बीच भी राज पुरोहित का काफी आदर था। एक दिन राज पुरोहित के मन में सवाल उठा कि राजा और दूसरे लोग जो मेरा सम्मान करते हैं, उसका कारण क्या है? राज पुरोहित ने अपने इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए एक योजना बनाई।

अगले दिन दरबार से लौटते समय उन्होंने राज कोषागार से एक स्वर्ण मुद्रा चुपचाप ले ली, जिसे कोष अधिकारी ने देखकर भी नजरंदाज कर दिया। राज पुरोहित ने दूसरे दिन भी दरबार से लौटते समय दो स्वर्ण मुद्राएं उठा लीं। कोष अधिकारी ने देखकर सोचा कि शायद किसी प्रयोजन के लिए वे ऐसा कर रहे हैं, बाद में अवश्य बता देंगे। तीसरे दिन राज पुरोहित ने मुट्ठी में स्वर्ण मुद्राएं भर लीं। इस बार कोष अधिकारी ने उन्हें पकड़कर सैनिकों के हवाले कर दिया। उनका मामला राजा तक पहुंचा। न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठे राजा ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि राज पुरोहित द्वारा तीन बार राजकोष का धन चुराया गया है। इस दुराचरण के लिए उन्हें तीन महीने की कैद दी जाए ताकि वह फिर कभी ऐसा अपराध न कर सकें।

राजा के निर्णय से राज पुरोहित को अपने सवाल का जवाब मिल चुका था। राज पुरोहित ने राजा से निवेदन किया, ‘राजन मैं चोर नहीं हूं। मैं यह जानना चाहता था कि आपके द्वारा मुझे जो सम्मान दिया जाता है, उसका सही अधिकारी कौन है, मेरी योग्यता, विद्वता या मेरा सदाचरण। आज सभी लोग समझ गए हैं कि सदाचरण को छोड़ते ही मैं दंड का अधिकारी बन गया हूं। सदाचरण और नैतिकता ही मेरे सम्मान का मूल कारण थी।’ इस पर राजा ने कहा कि वह उनकी बात समझ रहे हैं मगर दूसरों को सीख देने के लिए उनका दंडित होना आवश्यक है।

राज पुरोहित, वाराणासी, देव मित्र, विद्वता, योग्यता, सदाचरण, नैतिकता, कोषागार, स्वर्ण मुद्रा, प्रयास, हिन्दी ब्लौग, यह भी खूब रही, पुरानी कहानीयाँ, प्रयास का ब्लौग, नरेश का ब्लौग, raaj purhoit, varanasi, dev mitra, vidhwata, yogyata, sadacharan, naitikta, koshagar, swarn mudra, pryas, hindi blog, yah bhi khoob rahi, purani kahaniyan, pryas ka blog, naresh ka blog

क्रोध से नुकसान

अहं नामक व्यक्ति को बहुत गुस्सा आता था। वह जरा – जरा सी बात पर क्रोधित हो जाता था। वह उच्च शिक्षित और उच्च पद पर आसीन था। उसके क्रोध को देखकर एक सज्जन ने उसे सुदर्शन नामक ऋषि के आश्रम में जाने को कहा। अहं ने उस सज्जन की यह बात सुनते ही उसे गुस्से से घूरा और बोला , ‘मैं क्या पागल हूं जो सदुर्शन ऋ षि के आश्रम में जाऊं?

मैं तो सर्वश्रेष्ठ हूं और मेरे आगे कोई कुछ नहीं है। ‘ उसकी इस बात को सुनकर सज्जन वहां से चला गया। धीरे – धीरे सभी अहं से दूर – दूर रहने लगे। उसे भी इस बात का अहसास हो गया था। एक दिन वह बेहद क्रोध में सुदर्शन ऋ षि के आश्रम में जा पहुंचा। सुदर्शन ऋषि ने अहं के क्रोध के बारे में सुन रखा था। उन्होंने उसके क्रोध को दूर करने की मन में ठानी। वह जानबूझकर बोले , ‘ कहो नौजवान कैसे हो ? तुम्हें देखकर तो प्रतीत होता है कि तुममें दुर्गुण ही दुर्गुण भरे हुए हैं। ‘

सुदर्शन ऋषि की बात सुनकर अहं को बेहद क्रोध आया । क्रोध में उसकी मुट्ठियां भिंच गईं और वह दांत पीसते हुए सुदर्शन ऋ षि के साथ सबको अनाप – शनाप बकने लगा। क्रोध में उसकी उल्टी – सीधी बातें सुनकर आश्रम में अनेक लोग एकत्रित हो गए किंतु किसी ने भी उसे कुछ नहीं कहा । बोल – बोलकर जब वह थक गया तो चुपचाप नीचे बैठ गया।

बेवजह क्रोध में बोलकर उसका सिर दर्द हो गया था और गला भी सूख गया था। उसकी ऐसी स्थिति देखकर सुदर्शन ऋ षि बोले ,’ कहो नौजवान क्त्रोध ने तुम्हारे सिवाय किसी और का अहित किया है। सभी दुर्गुण पहले स्वयं को विनाश के कगार पर लेकर आते हैं। तुम्हारे क्रोध ने तुमको सबसे दूर कर दिया है जबकि तुम अत्यंत ज्ञानी एवं शिक्षित व्यक्ति हो। ‘ ऋ षि की सारी बातें अहं ने सुनी और उसे अपनी गलती का पश्चाताप् हुआ। उसने उसी दिन से अपने व्यक्तित्व में से क्रोध को दूर करने का निश्चय कर लिया।

क्रोध, नुकसान, क्रोध से नुकसान, सुदर्शन ऋषि, ऋषि के आश्रम, दुर्गुण ही दुर्गुण, पुरानी कहानियाँ, प्रयास, प्रयास का ब्लौग, यह भी खूब रही, हितोपदेश, hitopdesh, pryas, pryas ka blog, purani kahaniyan, yah bhi khoob rahi, krodh, nuksan, krodh se nuksan, sudarshan rishi, rishi ka ashram, durgun hi durgun