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क्या वाकई भगवान हमें देख रहा है March 14, 2008

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हमारे घर के पास एक डेरी वाला है. वह डेरी वाला एसा है कि आधा किलो घी में अगर घी 50२ ग्राम तुल गया तो 2 ग्राम घी निकाल लेता था.

एक बार मैं आधा किलो घी लेने गया. उसने मुझे 90 रूपय ज्यादा दे दिये. मैंने कुछ देर सोचा और पैसे लेकर निकल लिया. मैंने मन में सोचा कि 2-2 ग्राम से तूने जितना बचाया था बच्चू अब एक ही दिन में निकल गया. मैंने घर आकर अपनी गृहल्क्षमी को कुछ नहीं बताया और घी दे दिया. उसने जैसे ही घी डब्बे में पलटा आधा घी बिखर गया. मुझे झट से “बेटा चोरी का माल मोरी में” वाली कहावत याद आ गयी. और साहब यकीन मानीये वो घी किचन की सिंक में ही गिरा था.

इस वाकये को कई महीने बीत गये थे. परसों शाम को मैं एग रोल लेने गया. उसने भी मुझे सत्तर रूपय ज्याद दे दिये. मैंने मन ही मन सोचा चलो बेटा आज फिर चैक करते हैं की क्या वाकई भगवान हमें देखता है. मैंने रोल पैक कराये और पैसे लेकर निकल लिया. आश्चर्य तब हुआ जब एक रोल अचानक रास्ते में ही गिर गया. घर पहुँचा, बचा हुआ रोल टेबल पर रखा, जूस निकालने के लिये अपना मनपसंद काँच का गिलास उठाया… अरे यह क्या गिलास हाथ से फिसल कर टूट गया. मैंने हिसाब लगाय करीब-करीब सत्तर में से साठ रूपय का नुकसान हो चुका था. मैं बडा आश्चर्यचकित था.

और अब सुनिये ये भगवान तो मेरे पीछे ही पड गया जब कल शाम को सुभिक्षा वाले ने मुझे तीस रूपय ज्याद दे दिये. मैंने अपनी धर्म-पत्नी से पूछा क्या कहती हो एक ट्राई और मारें. उन्होने मुस्कुराते हुये कहा - जी नहीं. और हमने पैसे वापस कर दिये. बाहर आकर हमारी धर्म-पत्नी जी ने कहा - वैसे एक ट्राई और मारनी चाहिये थी. बस इतना कहना था कि उन्हें एक ठोकर लगी और वह गिरते-गिरते बचीं.

मैं सोच में पड गया कि क्या वाकई भगवान हमें देख रहा है.

त्याग भावना March 12, 2008

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शिबि अपनी त्याग बुद्धि के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। उनकी त्याग भावना तात्कालिक और अस्थायी है या उनके स्वभाव का स्थायी गुण, इसकी परीक्षा करने के लिए इंद्र और अग्नि ने एक योजना बनायी। अग्नि ने एक कबूतर का रूप धारण किया और इन्द्र ने एक बाज का। कबूतर को अपना आहार बनाने के लिए बाज ने उसका शिकार करने के लिए पीछा किया। कबूतर तेजी से उड़ता हुआ राजा शिबि के चरणों में जा पड़ा और बोला, मेरी रक्षा कीजिए। शिबि ने उसे रक्षा का आश्वासन दिया। पीछे-पीछे बाज भी आ पहुंचा। उसने शिबि से कहा, महाराज! मैं इस कबूतर का पीछा करता आ रहा हूं और इसे अपना आहार बना कर अपनी भूख मिटाना चाहता हूं, यह मेरा भक्ष्य है। आप इसकी रक्षा न करें।

शिबि ने बाज से कहा, मैंने इस पक्षी को अभय प्रदान किया है। इसे कोई मारे यह मैं कभी बर्दाश्त नहीं करूंगा। तुम्हें अपनी भूख मिटाने के लिए मांस चाहिए, सो मैं तुम्हें अपने शरीर से इस कबूतर के वजन के बराबर मांस काटकर देता हूं। उन्होंने एक तराजू मंगवाई और उसके एक पलड़े में कबूतर को रख दिया। दूसरे पलड़े में महाराज शिबि अपने शरीर से मांस काटकर डालने लगे। काफी मांस काट डाला किंतु कबूतर वाला पलड़ा तनिक भी नहीं हिला और अंत में महाराज शिबि स्वयं उस पलड़े पर जा बैठे और बाज से बोले, मेरा पूरा शरीर तुम्हारे सामने है, आओ भोजन करो।

महाराज शिबि की त्याग बुद्धि को स्वीकार करते हुए अग्नि और इंद्र अपने स्वाभाविक रूप में प्रकट हुए और महाराज शिबि को भी उठा कर खड़ा कर दिया। उन्होंने शिबि की त्याग भावना की बड़ी प्रशंसा की, आशीर्वाद दिया और फिर चले गए।

त्याग से मनुष्य लाभ प्राप्त करता है। महाराज शिबि ने अपने शरीर को सहर्ष समर्पित कर दिया। अग्नि और इंद्र ने उनकी कितनी कठोर परीक्षा ली। मनुष्य सोचता है कि उसके जीवन में कोई कष्ट न आये। लेकिन जीवन में कोई कष्ट न आये, तो जीवन जड़ हो जाता है। भगवान हमारी परीक्षा लेते हैं जिससे कि हम अपने गुण और शील को संस्कारित कर उन कष्टों का सफलता के साथ सामना कर सकें और भगवान का अनुग्रह प्राप्त कर सकें।

संकलन : सुभाष चंद्र शर्मा
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

एक बेटी के कुछ सवाल… February 11, 2008

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मम्मी, पापा अभी तक क्यों नहीं आये?
मम्मी, पापा का नाश्ता बन गया क्या?
मम्मी, आप पापा से क्यों झगडती हो?
मम्मी, पापा आज मेरे लिये क्या लाये?
मम्मी, पापा सो गये क्या?
मम्मी, पापा मुझे प्यार तो करते हैं ना?
मम्मी,
मम्मी, एक आखरी सवाल…
…पापा कहीं मुझे मार तो नहीं देंगे?
बोलो ना मम्मी…

इतने सारे सवाल करती है,
माँ के पेट से…
… अ-जन्मी बेटी.

और माँ केवल अंतिम सवाल का ही उत्तर दे पाती है,
हाँ… शायद हाँ…

मन की आवाज़ February 8, 2008

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एक बुढ़िया बड़ी सी गठरी लिए चली जा रही थी। चलते-चलते वह थक गई थी। तभी उसने देखा कि एक घुड़सवार चला आ रहा है। उसे देख बुढ़िया ने आवाज दी, ‘अरे बेटा, एक बात तो सुन।’ घुड़सवार रुक गया। उसने पूछा, ‘क्या बात है माई?’ बुढ़िया ने कहा, ‘बेटा, मुझे उस सामने वाले गांव में जाना है। बहुत थक गई हूं। यह गठरी उठाई नहीं जाती। तू भी शायद उधर ही जा रहा है। यह गठरी घोड़े पर रख ले। मुझे चलने में आसानी हो जाएगी।’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘माई तू पैदल है। मैं घोड़े पर हूं। गांव अभी बहुत दूर है। पता नहीं तू कब तक वहां पहुंचेगी। मैं तो थोड़ी ही देर में पहुंच जाऊंगा। वहां पहुंचकर क्या तेरी प्रतीक्षा करता रहूंगा?’ यह कहकर वह चल पड़ा। कुछ ही दूर जाने के बाद उसने अपने आप से कहा, ‘तू भी कितना मूर्ख है। वह वृद्धा है, ठीक से चल भी नहीं सकती। क्या पता उसे ठीक से दिखाई भी देता हो या नहीं। तुझे गठरी दे रही थी। संभव है उस गठरी में कोई कीमती सामान हो। तू उसे लेकर भाग जाता तो कौन पूछता। चल वापस, गठरी ले ले। ‘

वह घूमकर वापस आ गया और बुढ़िया से बोला, ‘माई, ला अपनी गठरी। मैं ले चलता हूं। गांव में रुककर तेरी राह देखूंगा।’ बुढ़िया ने कहा, ‘न बेटा, अब तू जा, मुझे गठरी नहीं देनी।’ घुड़सवार ने कहा, ‘अभी तो तू कह रही थी कि ले चल। अब ले चलने को तैयार हुआ तो गठरी दे नहीं रही। ऐसा क्यों? यह उलटी बात तुझे किसने समझाई है?’

बुढ़िया मुस्कराकर बोली, ‘उसी ने समझाई है जिसने तुझे यह समझाया कि माई की गठरी ले ले। जो तेरे भीतर बैठा है वही मेरे भीतर भी बैठा है। तुझे उसने कहा कि गठरी ले और भाग जा। मुझे उसने समझाया कि गठरी न दे, नहीं तो वह भाग जाएगा। तूने भी अपने मन की आवाज सुनी और मैंने भी सुनी।’

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

हमारे राज्य में कौए कितने हैं (अकबर-बीरबल) February 5, 2008

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एक दिन अकबर अपने मत्रीं बीरबल के साथ अपने महल के बाग में घूम रहे थे. बीरबल बागों में उडते कौओं को देखकर कुछ सोचने लगे और बीरबल से पूछा, “क्यों बीरबल, हमारे राज्य में कितने कौए होंगे”?

बीरबल ने कुछ देर अंगुलियों पर कुछ हिसाब लगाया और बोले,”हुज़ूर, हमारे राज्य में कुल मिलाकर 95, 463 कौए हैं”. तुम इतना विश्वास से कैसे कह सकते हो? हुज़ूर, “आप खुद गिन लिजीये, बीरबल बोले”. अकबर को कुछ इसी प्रकार के जवाब का अंदेशा था. उन्होंने ने पूछा,”बीरबल, यदि इससे कम हुए तो”? तो इसका मतलब है कि कुछ कौए अपने रिश्तेदारों से मिलने दूसरे राज्यों में गये हैं. और यदि ज्यादा हुए तो? तो इसका मतलब यह हैं हु़जूर कि कुछ कौए अपने रिश्तेदारों से मिलने हमारे राज्य में आये हैं बीरबल ने मुस्कुरा कर जवाब दिया.

अकबर एक बार फिर मुस्कुरा कर रह गये.

ढाई आखर प्रेम का भेद न जाने कोय January 28, 2008

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कृष्ण गोकुल से मथुरा आ गए। उनको मथुरा में कुछ भी अच्छा नहीं लगता। वहां मथुरा में उद्धव भगवान कृष्ण के मित्र थे। बड़े भारी विद्वान चिंतक। पर अपने ज्ञान का अभिमान भी उतना ही था। कृष्ण ने उद्धव को कहा-

उधो ब्रज मोहि बिसरत नाहीं

लेकिन उद्धव को यह पीड़ा कहाँ समझ में आने वाली थी। वे तो ज्ञान-ध्यान की बातें करते थे। कृष्ण को माया-मोह को भुलाने की बात कहते थे।

कृष्ण ने उद्धव को अपना संदेशवाहक बनाकर मथुरा भेज दिया और एक पत्र भी ग्वाल बाल के नाम लिख भेजा। उधर उद्धव कृष्ण के सन्देशवाहक बनकर ब्रज पहुंचे और इधर ब्रज में कोहराम मच गया। जिसने जहां भी सुना वहीं अपना कामकाज छोड़कर उद्धव को मिलने पहुंच गया। यशोदानंदन के मित्र को सबने घेर लिया। उधो जी कृष्ण का क्या संदेश लाए हैं?

क्या लाए थे, उद्धव जी तो अपने ज्ञान की पोटली लेकर आए थे। कृष्ण का दिया हुआ तो बस एक पत्र ही था, सो हाथ का लिखा हुआ वह रुक्का बढ़ा दिया। सोचा, पढ़ लें, स्थिर चित्त हो जाएँ, तब समझाऊंगा इन्हें जीवन का तत्व भेद।

सो पत्र उनको दे दिया। लेकिन यह क्या, जिसके हाथ में पत्र आया, उसी के आँसुओं से वह भीगने लगा, कागज गल गया, स्याही फैल गई, पढ़ने को तो कुछ बचा ही नहीं। इसके बाद छीना-झपटी मच गई, जरा हम भी देखें, हम भी पढ़ें उनका संदेश। पत्र के टुकड़े-टुकड़े हो गया। छीना-झपटी में जिसके हाथ जितना छोटा टुकड़ा आया, उसी फटे हुए टुकड़े को वह लेकर रोने लगा। अपने माथे से लगाने लगा, छाती से लगाने लगा। कृष्ण की स्मृति में खो गया। पत्र पढ़ने की तो जरूरत ही नहीं रही।

सभी गोपी-ग्वाल बालकृष्ण की याद में रोते-सिसकते और आँसू बहाते रहे। उद्धव उनके प्रेमाश्रुओं की बहती हुई गंगा की धारा को पार नहीं कर सके। प्रेम भक्ति के इस हृदयस्पर्शी मार्मिक दृश्य में किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े रहे। बिलखते हुए गोपियों ने कहा- उधो, अँखियाँ हरिदर्शन की प्यासी।

उद्धव ने उन्हें आत्मतत्व का महत्व समझाया, ज्ञान-ध्यान का रस पिलाया किन्तु कौन सुनता है। किसी को इसमें कोई स्वाद नहीं आया। नीरस ज्ञान किसी के मन को नहीं भाया। फिर उन सब को भगवान की व्यापकता का परिचय दिया। योग का मूल सूत्र बताया। किन्तु गोपियाँ तो उस कृष्ण की याद में आँसू बहाती रहीं, जो उनके साथ खेलता था। कहा,

उधो! मन नाहीं दस-बीस, एकहुतो सो गयो श्याम संग, को आराधो ईश

महाराज, यह मन 10-20 तो हैं नहीं। हमारे पास हमारा एक ही मन था और वह कृष्ण के संग चला गया। तुम्हारे ज्ञान की बातें सुनने के लिए अब हमारे पास हमारा मन नहीं है।

गोपियों और ग्वाल बाल के प्रेम के सामने उद्धव निरुत्तर हो गए। ज्ञान की पोटली खुल कर बिखर गई, मूल्यहीन हो गई। उन्हें मथुरा वापस लौटना पड़ा। प्रेम का सम्बन्ध तर्क-वितर्क से नहीं होता, उसका सम्बन्ध तो हृदय से होता है।

प्रेम के रहस्य को कोई भी नहीं जान पाया। मीरा कृष्ण के प्रेम में व्याकुल होकर एक बार कहती हैं- मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई, जाको सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई। फिर अगले ही पल कहती थी, जो मैं ऐसा जानती प्रेम करे दुख होय। नगर ढिंढोरा पीटती, प्रेम करो मत कोय।

प्रेम शब्द का बड़ा व्यापक अर्थ है। यह प्रभु का ही अनन्त रूप है। यह निष्काम, नि:स्वार्थ, पावन पवित्र शब्द है। यह भगवान की महिमा का व्यापक रूप है। जिसने भी इस प्रेम शब्द को जान लिया-पहचान लिया, वह भगवानमय बन जाता है। जब भक्तगण भगवान को याद करते हैं, उनका मनन-चिन्तन-स्मरण करते हैं, भावविभोर होकर गुणगान करते हैं, भगवान के लिए करुण क्रंदन करते हैं, तो भगवान का हृदय भी उनकी भाव भक्ति से दवित हो जाता है। और भगवान भी अपने भक्तों को याद करते हैं। भक्ति भाव भी उसी प्रेम का एक रूप है।

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

शिमला पहुँच गये… मेरी शिमला यात्रा - २ January 26, 2008

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सुबह करीब ग्यारह बजे समर हिल स्टेशन पर टॉय-ट्रेन रूकी. यह स्टेशन बाकी स्टेशनों से थोडा सा बडा है. मुझे लगा शायद शिमला आ गया. मैंने अपने गैंग को कहा चलो आ गया शिमला. हम अपना लगेज ले कर उतर गये. मुझे शक हुआ. मैंने सुभाष को कहा शायद यह शिमला नहीं है. शिमला में तो कुली पीछे पड जाते हैं. ध्यान से देखा तो एक जगह समर हिल लिखा हुआ था. हम वापस ट्रेन में भागे. कुछ और लोग भी हमें देख कर ऊतर गये थे. वो भी भाग कर ट्रेन पर चढ गये और हमें घूर-घूर कर देख रहे थे. कुछ ही देर बाद हम शिमला पहुँच गये. शिमला पहुँचते ही बजरी वाली बर्फ (बिना बरसात के छोटे-छोटे ओले) गिरने लगी. दिल बल्लियों उछल रहा था.

ट्रेन से उतरते ही कुली पीछे पड गये. मैंने सब को पहले ही इनसे दूर रहने के लिये कह रखा था. अब हमारा पहला काम था होटल ढूँढना. मेरे एक मित्र ने कहा था कि होटल ड्रीमलैंड में ट्राई कर लेना. लेकिन वह होटल बहुत हाईट पर था. हमने एक ढाबा में नाश्ता किया और मैं और सुभाष नाश्ता करके होटल ढुँढने चल दिये. बस जैसे ही रिज पर पहुँचे और पलट कर देखा तो हमारे सुभाष जी एक कुली से बात कर रहे थे. बस मेरे माथा ठनका मैंने सुभाष पर चिखना शुरू कर दिया कि वह कुली से क्यों बात कर रहा है. उस कुली ने करीब हमारा ढाई घँटा खराब किया. इस बीच मेरा सुभाष से झगडा हो गया. वह न सिर्फ होटल बल्कि टैक्सी के बारे में भी कुली से बात कर रहा था. शिमला के कुली ऐसे चेप होते हैं की शायद कोई आत्महत्या करने पर भी मजबूर हो सकता है. मेरी आप लोगों से एक प्रार्थना है यदि आप शिमला जायें तो कुली से बिल्कुल साहयता ना माँगें और यदि वह आपको परेशान करे तो आप उसकी शिकायत टुरीस्ट केन्द्र में करदें.

बडी मुश्किल से कुली से पीछा छुडा कर हमने एक होटल ढुँढा. होटल डिप्लोमैट. उसने हमें फैमली रूम १००० रूपय में ऑफर किया. मैंने ऑफसीज़न डिसकाउन्ट पूछा तो वह बोला, “डिसकाउन्ट नहीं मिल सकता हमें कुली को कमिशन भी तो देना है”. मेरा माथा ठनका, मैंने देखा रिसैप्शन के साईड में वही कुली खडा मुस्कुरा रहा था. मैंने माथा पकड लिया, ये यहाँ कहाँ से आ गया?. मैंने होटल वाले को कहा कि हम इसके साथ नहीं हैं और यदि कोई डिसकाउन्ट है तो ठीक नहीं तो हम कहीं और ट्राई करेंगे. बात 750/- में तय हुई. चार लोगों के लिये एक दिन के लिये 750/- बहुत ही अच्छा रेट था.

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करीब तीन बज चुके थे. हम सीधे रूम में घुसे और चार चाय और नाश्ते का आर्डर दिया. रूम बहुत ही बढीया था. पूरे शिमला का नजार वहाँ से दिख रहा था.

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हमारे अलावा होटल में केवल एक फैमली और थी. जल्दी ही चाय और नाश्ता आ चुका था. ठँड इतनी अधिक थी की सुभाष जी तो बीमार पड गये और उन पर दो रजाईयाँ और एक कंबल डाला. तीन चार उबले अँडे और २ कॉफी पीने के बाद वे थोडा नार्मल हुये. उनकी ये हालत देखकर मैं, रमेश और महेन्द्र एक दूसरे की शक्ल देख रहे थे. इससे पहले की कोई कुछ कहता MacDowell की रम की बोतल खुल चुकी थी. दो-दो पैग मारने के बाद खाने का आर्डर किया.

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गर्मागर्म दाल-मक्खनी, कढाई-पनीर और तंदूरी रोटी खाने के बाद जान में जान आयी. होटल में अँडे की भुजीया बडी स्वादिष्ट थी. उसमें कसूरी मेथी डाली थी.

शाम के करीब 7 बजे हमने बाहर निकलने का प्रोगाम बनाया. हम चारों अपने होटल के पूल क्लब में पूल खेलेने चल दिये.

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महेन्द्र और सुभाष को पूल खेलेने का ज्यादा शौक चढ रखा था. हम पूल क्लब पहुँचे तो वहाँ महेन्द्र ने किसी के साथ के साथ बैटिंग लगा ली. मैं और रमेश वहाँ से रिज की तरफ खिसक लिये.

रिज पर हमने गर्म चिकन सूप (१० रूपय) और पॉप कार्न (१० रूपय) खाए. करीब दस बजे वापस होटल आकर हमने बटर-चिकन आर्डर किया. महेन्द्र आठसौ रूपय हार कर आया था, बोला, “भैया खाना-वाना बाद में पहले पैग बनाओ”. सुभाष तो पीते नहीं हैं, हम तीनों ने 2-3 पैग पीये और चिकन खा कर बिस्तर पकड लिया.

सुभाष, रमेश और महेन्द्र बिस्तर पर लेट गये और मैं अकेले फ्लोर बैड सो गया. रात को पता नहीं क्यों और कितने बजे महेन्द्र मेरे साथ रजाई में घुस गया. सुबह शेर के दहाडने की आवाज से मेरी नींद खुल गयी. चारों तरफ ध्यान से देखा तो शेर नहीं वह रमेश था और बडे ही भयानक तरीके से खर्राटे ले रहा था. उसे लात मारकर उठाया. और वेटर को चार चाय का आर्डर किया.

शेष अगले भाग में…

मेरी शिमला यात्रा - भाग - 1 January 26, 2008

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आज ठंड ज्यादा थी. शिमला के बारे में सोच कर और ज्यादा ठंड लग रही थी. मैं आज छुट्टी पर था और सुभाष, महेन्द्र और रमेश को मैंने शाम आठ बजे अपने घर आने के लिये कहा था. लेकिन वो तीनों करीब पौने नौ बजे आये. मैंने उन्हें झूठ बोला था कि हमारी ट्रेन साढे नौ बजे की है वरना वो और लेट आते. फटाफट हमेशा की तरह झगडा करके एक ऑटो किया. रास्ते से कढाई-पनीर और छह नान पैक करवा लिये. करीब पौने दस बजे ऑटो वाले ने हमें पुरानी दिल्ली के मैट्रो वाली तरफ उतार दिया. मैं देख कर हैरान था कि वहाँ कोई पुलिस वाल नहीं था. हमारे सामान की कोई तलाशी नहीं ली गयी. हम चार नम्बर प्लेटफार्म पर पहुँचे और ट्रेन का इंतज़ार करने लगे. भूख लग रही थी लेकिन खाना हमने ट्रेन में ही खाना था. वहाँ पूरी वाले से पूरीयाँ खा ही रहे थे कि तभी उदघोषणा हुई की हावडा-कालका ट्रेने डेढ घंटे लेट है और प्लेटफार्म न. 6 पर आयेगी. महेन्द्र बोल पडा भैया शिमला में बर्फ पिघल तो नहीं जायेगी और हम सभी हँस पडे.

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करीब रात ग्यारह बजे ट्रेन पर आ गयी और हम अपनी-अपनी बर्थों पर जम गये. हमारे पास २ लोअर, १ साईड और १ साईड अपर बर्थ थी. हमारे साथ बाकी बची चार बर्थों पर दो कपल थे और उन्होंने अपनी-अपनी पत्नीयों को बिना पूछे हमारी लोअर बर्थ पर सुला दिया. पन्द्र्ह मिनट बाद ट्रेन ने दो सीटियाँ मारी और पटरी पर दौडने लगी. मैं लोअर साईड बर्थ पर स्टेशन को पीछे छूटते हुए देख रहा था. स्टेशन पर लोग, लगेज, कैंटिन, चेन-ताले वाले, स्टेशन मास्टर का रूम, स्टेशन पर बने पुल के नीचे सोए हुए भिखारी, रात के अँधेर में प्लास्टिक की बोतल बीनते हुए छोटे-छोटे बच्चे सब पीछे छूट रहे थे. सब कुछ आँखों से ओझल होते देखना अच्छा लग रहा था. लेकिन वे सब छूट कहाँ रहे थे वो तो अपनी ही जगह थे हमेशा की तरह.

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मोबाईल में समय देखा बारह बज रहे थे. तभी रमेश की आवाज कानों में पडी, “भैया बाहर ही देखते रहोगे क्या चलो खाना खायें”. खाना ठँडा हो चुका था लेकिन भूख बहुत लग रही थी. ऐसे में कुछ भी मिल जाये बहुत स्वादिष्ट लगता है.

हमारे कोच में हिमाचल यूनीवर्सटी की लडकियाँ भी थीं जो हम चारों की बातों मे आनन्द ले रही थीं. करीब एक घँटे बाद हम सब सो चुके थे.

हमारी ट्रेन सुबह साढे पाँच बजे कालका स्टेशन पर पहुँच गयी. कालका स्टेशन पर ब्रौड गेज़ और नैरो गैज़ दोनों मिलते हैं.

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वहीं से टॉय-ट्रेन की रिजर्वेशन थी लेकिन विडँबना देखीये की 1, 2, 3 और 4 वेटिंग होने के बावजूद हमारी सीट कनफर्म नहीं हुई. जैसे-तैसे हमने चार सीटों पर कब्जा किया और जबतक उन सीटों का मालिक ना जाये उन पर बैठने का आनन्द लेना चाहा. लेकिन हमारी किस्मत अच्छी थी कि उन चारों सीटों पर कोई नहीं आया.

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ट्रेने निकल चुकी थी. सोलन-धर्मपुर-डिगशोई-बारोग स्टेशनों से होते हुए टॉय ट्रेन निकल चली अपने पाँच घँटों के शिमला के सफर पर.

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मेरे साथ एक सज्जन अपने परिवार के साथ बैठे थे. बातों-बातों में मुझसे पुछने लगे,”कब तक पहुँचेंगे शिमला”? मैने कहा ग्यारह बजे तक. तो महाशय कहते हैं,”हाँ-हाँ मुझे पता है कई बार आया हूँ”. मैं उनकी शक्ल देखने लगा. अच्छा वहाँ बर्फ मिलेगी क्या, वह बोले? मैंने कहा पता नहीं लेकिन कुफरी में तो मिलेगी. तो वह बोले हाँ-हाँ पता है कई बार आया हूँ. मैं समझ गया वह टाईम पास कर रहे हैं. तो मैंने उनसे पूछा ,”भाई साहब शिमला की राजधानी क्या है”? वह उछल पडे और बोले अरे नहीं…नहीं शिमला तो खुद हिमाचल की राजधानी है. मैंने हँसते हुआ कहा हाँ-हाँ पता है कई बार आया हूँ. साहब की शक्ल देखने लायक थी.

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ये थे वो सज्जन
शेष अगले भाग में…

शिमला-यात्रा की बडी सी पोस्ट का इंतज़ार किजीये January 20, 2008

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माँ संवेदना है तो पिता क्या है? ओम व्यास जी की कविता January 20, 2008

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Om Vyas Ji

पिता…पिता जीवन है, सम्बल है, शक्ति है,
पिता…पिता सृष्टी मे निर्माण की अभिव्यक्ती है,
पिता अँगुली पकडे बच्चे का सहारा है,
पिता कभी कुछ खट्टा कभी खारा है,
पिता…पिता पालन है, पोषण है, परिवार का अनुशासन है,
पिता…पिता धौंस से चलना वाला प्रेम का प्रशासन है,
पिता…पिता रोटी है, कपडा है, मकान है,
पिता…पिता छोटे से परिंदे का बडा आसमान है,
पिता…पिता अप्रदर्शित-अनंत प्यार है,
पिता है तो बच्चों को इंतज़ार है,
पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं,
पिता है तो बाज़ार के सब खिलौने अपने हैं,
पिता से परिवार में प्रतिपल राग है,
पिता से ही माँ की बिंदी और सुहाग है,
पिता परमात्मा की जगत के प्रति आसक्ती है,
पिता गृहस्थ आश्रम में उच्च स्थिती की भक्ती है,
पिता अपनी इच्छाओं का हनन और परिवार की पूर्ती है,
पिता…पिता रक्त निगले हुए संस्कारों की मूर्ती है,
पिता…पिता एक जीवन को जीवन का दान है,
पिता…पिता दुनिया दिखाने का एहसान है,
पिता…पिता सुरक्षा है, अगर सिर पर हाथ है,
पिता नहीं तो बचपन अनाथ है,
पिता नहीं तो बचपन अनाथ है,
तो पिता से बडा तुम अपना नाम करो,
पिता का अपमान नहीं उनपर अभिमान करो,
क्योंकि माँ-बाप की कमी को कोई बाँट नहीं सकता,
और ईश्वर भी इनके आशिषों को काट नहीं सकता,
विश्व में किसी भी देवता का स्थान दूजा है,
माँ-बाप की सेवा ही सबसे बडी पूजा है,
विश्व में किसी भी तिर्थ की यात्रा व्यर्थ हैं,
यदि बेटे के होते माँ-बाप असमर्थ हैं,
वो खुशनसीब हैं माँ-बाप जिनके साथ होते हैं,
क्योंकि माँ-बाप के आशिषों के हाथ हज़ारों हाथ होते हैं
क्योंकि माँ-बाप के आशिषों के हाथ हज़ारों हाथ होते हैं