शिमला जा रहा हूँ December 26, 2007
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मैं ९ जनवरी को ट्रेन से शिमला जा रहा हूँ. वैसे तो ऑफिस के काम से कोई ७-८ साल पहले शिमला गया था लेकिन इस बार तो घुमने के लिये जा रहा हूँ. सुना है अब बहुत बदल गया है. रात को शिमला के सपने आते हैं और दिन में दिल्ली की सारी कॉल सेंटरों की सफेद गाडियाँ मुझे बर्फ से ढकी नज़र आती हैं.
शिमला में कुफरी के अलावा घूमने के लिये कौन-कौन सी जगह हैं कृपया हो सके तो राय दें.
मेरी बेटी - एक छंद October 29, 2007
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अक्सर हिन्दुसतान में लडकों को चंचल और शरारती माना जाता है और उनकी इन शरारतों पर उनके माता-पिता बडे रीझते और खुश होते हैं. और यदि एसी शरारतें लडकियाँ करें तो माता-पिता खुश होने के स्थान पर उन्हें शरारतें न करने के लिये कहते हैं.
इसी विषय पर एक छंद लिखने की कोशिश की है. अभी तक तो अन्य कवियों की कवितायें पोस्ट की हैं पर यह छंद मेरी अपनी रचना है. आपकी टिप्पणीयों की प्रतिक्षा रहेगी.
……छोटे-छोटे पैर और नन्हे-नन्हे हाथ लेके,
……ठुमक चली है जग, सब देखो दंग है,
……कभी दौडे तेज-तेज कभी दौडे धीरे से वो,
……तंग मुझे करने का, अजब ये ढंग है,
……यह देख चकित हो, कहा मेरी श्रीमती ने,
……लडकी है देखो करे, लडकों सी तंग है,
……मैने कहा रहने दो जी, ऐसे तुम मत कहो,
……गुडीया ये मेरी नहीं, लडकों से कम है.`
फीड में अवाँछनीय अक्षर आने के कारण एग्रीगेटर पर नहीं दिख रही थी October 25, 2007
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मेरे ब्लाग की फीड में अवाँछनीय अक्षर आने के कारण एक्स एम एल फाईल में समस्या आ गयी थी. मैंने कोशिश करके उसे ठीक कर लिया.
इससे मैंने ये सिखा कि यदि किसी कारणवश आपकी कोई पोस्ट एग्रीगेटर पर नहीं दिखती और बाद में समस्या ठीक करने पर वह ताजा पोस्टों में नहीं अपीतु जिस तिथी में वह लिखी गयी थी उसी क्रम में वह दिखाई जाएगी.
नारद और ब्लौगवाणी मेरी पोस्ट क्यों नहीं दिखा रहे हैं? October 25, 2007
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ये क्या चक्कर है भाई, नारद और ब्लौगवाणी मेरी पोस्ट क्यों नहीं दिखा रहे हैं? एसी क्या नाराज़गी है हमसे जरा हमें भी अवगत करवायें.
सम्पाती - धरमवीर भारती जी की एक कविता October 18, 2007
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(जटायू का बडा भाई संपाती जो प्रथम बार सूर्य तक पहुँचने के लिये उडा, पँख झुलस जाने पर समुन्द्र तट पर गिर पडा। सीता की खोज में जाने वाले वानर ऊसकी गुफा में भटक कर उसके आहर बने)
…यह भी अदा थी मेरे बडप्पन की
कि जब भी गिरूं तो गिरूं समुन्द्र के पार:
मेरे पतन तट पर गहरी गुफा हो एक-
बैठूं जहाँ मैं समेट कर अपने अधजले पँख
ताकि वे सनद रहें…
जिनको दिखा सकूं कि पहला विद्रोही थ मैं
जिसने सूर्य की चुनौती स्वीकारी थी
सूरज बेचारा तो अब भी अपनी जगह
उतना ही एकाकी वैसा ही ज्वलंत है
मैंने, सिर्फ चुनौतीयाँ स्वीकारना बेकार समझ कर
बंद कर दिया है अब!
सुखद है धीरे-धीरे बूढे होते हुए
गुफा में लेट कर समुन्द्र को पछाडें खाते हुए देखना
कभी-कभी छलाँग कर समुन्द्र पार करने का
कोई दुस्सहासी इस गुफा में आता है
कहता हूँ मैं आ तू! ओ अनुगामी तू मेरा आहार है!
(क्योंकि आखिर क्यों वे मुझे याद दिलाते हैं
मेरे उस रूप की, भूलना जिसे अब मुझे ज्यादा अनुकूल है!)
उनके उत्साह को हिकारत से देखता हुआ
मैं फिर फटकारता हूँ अपने अधजले पँख
क्योंकि वे सनद हैं
कि प्रामाणिक विद्रोही मैं ही था, मैं ही हूँ
नहीं, अब कोई संघर्ष मुझे छूता नहीं
वह मैं नहीं
मेरा भाई था जटायु
जो व्यर्थ के लिये जाकर भिड गया दशानन से
कौन है सीता?
और किसको बचायें? क्यों?
निराद्रत तो आखिर दोनों ही करेंगे उसे
रावण उसे हार कर और राम उसे जीत कर
नहीं, अब कोई चुनौती मुझे छूती नहीं
………………………
गुफा में शाँती है…
………………………
कौन हैं ये समुन्द्र पार करने के दावेदार
कह दो इनसे कि अब यह सब बेकार है
साहस जो करना था कब का कर चुका मैं
ये क्यों कोलाहल कर शाँती भंग करते हैं
देखते नहीं ये
कि सुखद हं मेरे लिये झुर्रियां पडती हुई पलकें उठा कर
गुफा में पडे-पडे समुन्द्र को देखना…
गाँधारी का श्राप और प्रभु श्री कृष्ण का श्राप स्वीकारना August 21, 2007
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दुर्योधन के अंत के साथ ही महाभारत के महायुद्ध का भी अंत हो गया । माता गाँधारी दुर्योधन के शव के पास खडी फफक-फफक कर रो रही हैं । पुत्र वियोग में “गाँधारी का भगवान कृष्ण को श्राप देना, भगवान कृष्ण का श्राप को स्वीकार करना और गाँधारी का पश्चताप करना” । इसका बडा ही मार्मिक वर्णन किया है धर्मवीर भारती जी ने (गीता-कविता से संकलित)
गाँधारी : ह्र्दय विदारक स्वर में
तो वह पडा है कंकाल मेरे पुत्र का
किया है यह सब कुछ कृष्ण
तुमने किया है सब
सुनो
आज तुम भी सुनो
मैं तपस्विनी गाँधारी
अपने सारे जीवन के पुण्यों का
बल ले कर कहती हूँ
कृष्ण सुनो
तुम अगर चाहते तो रूक सकता था युद्द यह
मैंने प्रसव नहीं किया था कंकाल वह
इंगित पर तुम्हारे ही भीम ने अधर्म किया
क्यों नहीं तुमने यह शाप दिया भीम को
जो तुमने दिया अश्वत्थामा को
तुमने किया है प्रभुता का दुरूपयोग
यदि मेरी सेवा में बल है
संचित तप में धर्म है
प्रभु हो या परात्पर हो
कुछ भी हो
सारा तुम्हारा वंश
इसी तरह पागल कुत्तों की तरह
एक दूसरे को परस्पर फाड खायेगा
तुम खुद उनका विनाश कर के कई वर्षों बाद
किसी घने जंगल में
साधारण व्याध के हाथों मारे जाओगे
प्रभु हो पर मारे जाओगे पशु की तरह
वंशी ध्वनि: कृष्ण की आवाज
कृष्ण ध्वनि:
प्रभु हूँ या परात्पर
पर पुत्र हूँ तुम्हारा तुम माता हो
मैंने अर्जुन से कहा
सारे तुम्हारे कर्मों का पाप पुण्य योगक्षेम
मैं वहन करूँगा अपने कंधों पर
अट्ठारह दिनों के इस भीषण संग्राम में
कोई नहीं केवल मैं ही मरा हूँ करोडों बार
जितनी बार जो भी सैनिक भूमिशायी हुआ
कोई नहीं था
मैं ही था
गिरता था जो घायल हो कर रणभूमि में
अश्वत्थामा के अंगों से
रक्त पीप स्वेद बन कर बहूँगा
मैं ही युग युगांतर तक
जीवन हूँ मैं
तो मृत्यु भी मैं ही हूँ माँ
श्राप यह तुम्हारा स्वीकार है
गाँधारी:
यह क्या किया तुमने
फूट कर रोने लगती है
कोई नहीं में अपने
सौ पुत्रों के लिये
लेकिन कृष्ण तुम पर
मेरी ममता अगाध है
कर देते श्राप मेरा तुम अस्वीकार
तो क्या मुझे दु:ख होता?
मैं थी निराश मैं कटु थी
पुत्रहीन थी
कृष्ण ध्वनी:
ऐसा मत कहो
माता
जब तक मैं जीवित हूँ
पुत्रहीन नहीं हो तुम
प्रभु हूँ या परात्पर
पर पुत्र हूँ तुम्हारा
तुम माता हो
हाथी ने कुत्ते से क्या कहा? August 8, 2007
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जब भी कोई हाथी शहर में नजर आता है तो कुत्ते उस पर भौंकने लगते हैं। एक दिन हाथी ने कुत्ते को उसकी औकात दिखा दी। शायद फ़ैज़ाबादी साहब अपनी इस कविता में यही कहने की कोशिश की है।
हे मेरे गाँव के परमप्रिय कुत्ते
मुझे देख-देख कर चौंकते रहो
और जब तक दिखाई पडूं
भौंकते रहो, भौंकते रहो, मेरे दोस्त
भौंकते रहो
इसलिये कि मैं हाथी हूं
गाँव-भर का साथी हूं
बच्चे, बूढे, जवान, सभी छिडकते हैं जान
मगर तुम खडा कर रहे हो विरोध का झंडा
बेकार का वितंडा
अपना तो ऐसे-वैसों से कोई वास्ता नहीं है
‘परिश्रम के अलावा कोई रास्ता नहीं है’
इसलिये मैं हूं पूजनीय-वंदनीय
मेरा सम्मान है मर्यादा है
क्योंकि मेरी ‘दूरद्रष्टि है पक्का इरादा है’
और तुम ढुंढ रहे हो कौरा।
कौरे के लिये दौरा।
हाय रे मुफ्तखोरी पहरे के नाम पर चोरी
बिल्कुल वाहियात हो, रीते हो
आदमियों से भी गये-बीते हो
कई बार सजाएँ मिलीं तुम्हें कडी-कडी
मगर कुत्ते की पूंछ मुडी की मुडी
सुना है तुम्हारी जबान में अमृत बसता है
फिर ज़हर क्यों बो रहे हो?
मैं तो हँस रहा हूँ, तुम रो रहे हो।
भौंक-भौंक कर क्या कर पाओगे
कुत्ते की मौत मर जाओगे
अपने गाँव के प्रति वफादार बनो
अपनों से प्यार करो
तुम्हारी तरह कितने लोग
बेकार के चक्कर में चौंकते रहते हैं
हाथी चला जाता है
कुत्ते भौंकते रहते हैं।
रामधीर सिंह दिनकर जी की बाल-कविता August 7, 2007
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एक दिन चाँद ने अपनी माता से कहा कि उसे ठंड लगती है इसलिये उसके लिये एक झिंगोला सिलवा दें. लेकिन उसकी माता के सामने समस्या यह है कि चाँद का आकार घटता-बढता रहता है तो वो नाप कैसे ले…
पढिये रामधीर सिंह दिनकर जी की यह बाल-कवित आपको बिल्कुल आपके बचपन की याद दिलायेगी
हठ कर बैठा चाँद एक दिन माता से यह बोला
सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला
सन सन चलती हवा रात भर जाडे में मरता हूँ
ठिठुर ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ
आसमान का सफर और यह मौसम है जाडे का
न हो अगर तो ला दो मुझको कुर्ता ही भाडे का
बच्चे की सुन बात कहा माता ने अरे सलोने
कुशल करे भगवान लगे मत तुझको जादू टोने
जाडे की तो बात ठीक है पर मै तो डरती हूँ
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ
कभी एक अंगुल भर चौडा कभी एक फुट मोटा
बडा किसी दिन हो जाता है और किसी दिन छोटा
घटता बढता रोज़ किसी दिन ऐसा भी करता है
नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पडता है
अब तू ही यह बता नाप तेरा किस रोज़ लिवायें?
सी दें एक झिंगोला जो हर रोज़ बदन में आयें?
चोर और राजा July 18, 2007
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किसी जमाने में एक चोर था। वह बडा ही चतुर था। लोगों का कहना था कि वह आदमी की आंखों का काजल तक उडा सकता था। एक दिन उस चोर ने सोचा कि जब तक वह राजधानी में नहीं जाएगा और अपना करतब नहीं दिखायगा, तब तक चोरों के बीच उसकी धाक नहीं जमेगी। यह सोचकर वह राजधानी की ओर रवाना हुआ और वहां पहुंचकर उसने यह देखने के लिए नगर का चक्कर लगाया कि वह कहाँ क्या कर सकता है।
उसने तय कि राजा के महल से अपना काम शुरू करेगा। राजा ने रात-दिन महल की रखवाली के लिए बहुत से सिपाही तैनात कर रखे थे। बिना पकडे गये, परिन्दा भी महल में नहीं घुस सकता था। महल में एक बहुत बडी घडीं लगी थी, जो दिन रात का समय बताने के लिए घंटे बजाती रहती थी।
चोर ने लोहे की कुछ कीलें इकठटी कीं ओर जब रात को घडी ने बारह बजाये तो घंटे की हर आवाज के साथ वह महल की दीवार में एकएक कील ठोकता गया। इस तरह बिना शोर किये उसने दीवार में बारह कीलें लगा दीं, फिर उन्हें पकड पकडकर वह ऊपर चढ गया और महल में दाखिल हो गया। इसके बाद वह खजाने में गया और वहां से बहुत से हीरे चुरा लाया।
अगले दिन जब चोरी का पता लगा तो मंत्रियों ने राजा को इसकी खबर दी। राजा बडा हैरान और नाराज हुआ। उसने मंत्रियों को आज्ञा दी कि शहर की सडकों पर गश्त करने के लिए सिपाहियों की संख्या दोगूनी कर दी जाय और अगर रात के समय किसी को भी घूमते हुए पाया जाय तो उसे चोर समझकर गिरफतार कर लिया जाय।
जिस समय दरबार में यह ऐलान हो रहा था, एक नागरिक के भेष में चोर मौजूद था। उसे सारी योजना की एक एक बात का पता चल गया। उसे फौरन यह भी मालूम हो गया कि कौन से छब्बीस सिपाही शहर में गश्त के लिए चुने गये हैं। वह सफाई से घर गया और साधु का बाना धारण करके उन छब्बीसों सिपाहियों की बीवियों से जाकर मिला। उनमें से हरेक इस बात के लिए उत्सुक थी कि उसकी पति ही चोर को पकडे ओर राजा से इनाम ले।
एक एक करके चोर उन सबके पास गया ओर उनके हाथ देख देखकर बताया कि वह रात उसके लिए बडी शुभ है। उसक पति की पोशाक में चोर उसके घर आयेगा; लेकिन, देखो, चोर की अपने घर के अंदर मत आने देना, नहीं तो वह तुम्हें दबा लेगा। घर के सारे दरवाजे बंद कर लेना और भले ही वह पति की आवाज में बोलता सुनाई दे, उसके ऊपर जलता कोयला फेंकना। इसका नतीजा यह होगा कि चोर पकड में आ जायगा।
सारी स्त्रियां रात को चोर के आगमन के लिए तैयार हो गईं। अपने पतियों को उन्होंने इसकी जानकारी नहीं दी। इस बीच पति अपनी गश्त पर चले गये और सवेरे चार बजे तक पहरा देते रहे। हालांकि अभी अंधेरा था, लेकिन उन्हें उस समय तक इधर उधर कोई भी दिखाई नहीं दिया तो उन्होंने सोचा कि उस रात को चोर नहीं आयेगा, यह सोचकर उन्होंने अपने घर चले जाने का फैसला किया। ज्योंही वे घर पहुंचे, स्त्रियों को संदेह हुआ और उन्होंने चोर की बताई कार्रवाई शुरू कर दी।
फल वह हुआ कि सिपाही जल गये ओर बडी मुश्किल से अपनी स्त्रियों को विश्वास दिला पाये कि वे ही उनके असली पति हैं और उनके लिए दरवाजा खोल दिया जाय। सारे पतियों के जल जाने के कारण उन्हें चिकित्सक के पास ले जाया गया। दूसरे दिन राजा दरबार में आया तो उसे सारा हाल सुनाया गया। सुनकर राजा बहुत चिंतित हुआ और उसने कोतवाल को आदेश दिया कि वह स्वयं जाकर चोर पकड़े।
उस रात कोतवाल ने तैयार होकर शहर का पहरा देना शुरू किया। जब वह एक गली में जा रहा रहा था, चोर ने जवाब दिया, ‘मैं चोर हूं।″ कोतवाल समझा कि वह उसके साथ मजाक कर रहा है। उसने कहा, “मजाक छोडो ओर अगर तुम चोर हो तो मेरे साथ आओ। मैं तुम्हें काल-कोठरी में डाल दूंगा।″ चोर बाला, “ठीक है। इससे मेरा क्या बिगड़ेगा!” और वह कोतवाल के साथ काल-कोठरी की तरफ चल दिया।
वहां जाकर चोर ने कहा, ″कोतवाल साहब, इस काल-कोठरी को आप इस्तेमाल कैसे किया करते हैं, मेहरबानी करके मुझे समझा दीजिए।″ कोतवाल ने कहा, तुम्हारा क्या भरोसा! मैं तुम्हें बताऊं और तुम भाग जाओं तो ?″ चोर बाला, ″आपके बिना कहे मैंने अपने को आपके हवाले कर दिया है। मैं भाग क्यों जाऊंगा?″ कोतवाल उसे यह दिखाने के लिए राजी हो गया कि चोरों को काल-कोठरी में कैसे डाला जाता है। ज्यों ही काल-कोठरी में घुसा कि चोर ने झट चाबी घुमाकर काठ का ताला बंद कर दिया और कोतवाल को राम-राम करके चल दिया। जाड़े की रात थी। दिन निकलते-निकलते कोतवाल मारे सर्दी के अधमरा हो गया। सवेरे जब सिपाही बाहर आने लगे तो उन्होंने देखा कि कोतवाल फंसे पड़े हैं। उन्होंने उनको उसमें से निकाला और अस्पताल ले गये।
अगले दिन जब दरबार लगा तो राजा को रात का सारा किस्सा सुनाया गया। राजा इतना हैरान हुआ कि उसने उस रात चोर की निगरानी स्वयं करने का निश्चय किया। चोर उस समय दरबार में मौजूद था और सारी बातों को सुन रहा था। रात होने पर उसने साधु का भेष बनाया और नगर के सिरे पर एक पेड़ के नीचे धूनी जलाकर बैठ गया। राजा ने गश्त शुरू की और दो बार साधु के सामने से गुजरा। तीसरी बार जब वह उधर आया तो उसने साधु से पूछा कि, ″क्या इधर से किसी अजनबी आदमी को जाते उसने देखा है?″ साधु ने जवाब दिया कि “वह तो अपने ध्यान में लगा था, अगर उसके पास से कोई निकला भी होगा तो उसे पता नहीं। यदि आप चाहें तो मेरे पास बैठ जाइए और देखते रहिए कि कोई आता-जाता है या नहीं।″ यह सुनकर राजा के दिमाग में एक बात आई और उसने फौरन तय किया कि साधु उसकी पोशाक पहनकर शहर का चक्कर लगाये और वह साधु के कपड़े पहनकर वहां चोर की तलाश में बैठे।
आपस में काफी बहस-मुबाहिसे और दो-तीन बार इंकार करने के बाद आखिर चोर राजा की बात मानने को राजी हो गया ओर उन्होंने आपस में कपड़े बदल लिये। चोर तत्काल राजा के घोड़े पर सवार होकर महल में पहुंचा ओर राजा के सोने के कमरे में जाकर आराम से सो गया, बेचारा राजा साधु बना चोर को पकड़ने के लिए इंतजार करता रहा। सवेरे के कोई चार बजने आये। राजा ने देखा कि न तो साधु लौटा और कोई आदमी या चोर उस रास्ते से गुजरा, तो उसने महल में लौट जाने का निश्चय किया; लेकिन जब वह महल के फाटक पर पहुंचा तो संतरियों ने सोचा, राजा तो पहले ही आ चुका है, हो न हो यह चोर है, जो राजा बनकर महल में घुसना चाहता है। उन्होंने राजा को पकड़ लिया और काल कोठरी में डाल दिया। राजा ने शोर मचाया, पर किसी ने भी उसकी बात न सुनी।
दिन का उजाला होने पर काल कोठरी का पहरा देने वाले संतरी ने राजा का चेहरा पहचान लिया ओर मारे डर के थरथर कांपने लगा। वह राजा के पैरों पर गिर पड़ा। राजा ने सारे सिपाहियों को बुलाया और महल में गया। उधर चोर, जो रात भर राजा के रुप में महल में सोया था, सूरज की पहली किरण फूटते ही, राजा की पोशाक में और उसी के घोड़े पर रफूचक्कर हो गया। अगले दिन जब राजा अपने दरबार में पहुंचा तो बहुत ही हताश था। उसने ऐलान किया कि अगर चोर उसके सामने उपस्थिति हो जाए तो उसे माफ कर दिया जाएगा और उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी, बल्कि उसकी चतुराई के लिए उसे इनाम भी मिलेगा। चोर वहां मौजूद था ही, फौरन राजा के सामने आ गया ओर बोला, “महाराज, मैं ही वह अपराधी हूँ।″ इसके सबूत में उसने राजा के महल से जो कुछ चुराया था, वह सब सामने रख दिया, साथ ही राजा की पोशाक और उसका घोड़ा भी। राजा ने उसे गांव इनाम में दिये और वादा कराया कि वह आगे चोरी करना छोड़ देगा। इसके बाद से चोर खूब आनन्द से रहने लगा।
साबुन लगाओ आलस भगाओ… July 12, 2007
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लंदन में वैज्ञानिकों ने एक ऐसा साबुन बनाया है जो आलसी लोगों के आलस को भगाने में सक्षम होगा। इस साबुन का नाम है शावर-शौक। इसके एक बार ईस्तेमाल करने पर, दो कप काफी के बराबर कैफिन शरीर में पहुँचाया जा सकेगा।
इसके निर्माता, थिंकगीक.काम ने यह साबुन सुबह उठने में आलस और थकान महसुस करने वालों को ध्यान में रखकर बनाया है। यह साबुन ईस्तेमाल के पाँच मिनट के अन्दर ही असर दिखान शुरु कर देता है।
यह अविषकार तो ठीक है भाई लेकिन इस साबुन को लगाएगा कौन, मुझे तो साबुन लगाने में बडा आलस आता है।









