माँ संवेदना है तो पिता क्या है? ओम व्यास जी की कविता January 20, 2008
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पिता…पिता जीवन है, सम्बल है, शक्ति है,
पिता…पिता सृष्टी मे निर्माण की अभिव्यक्ती है,
पिता अँगुली पकडे बच्चे का सहारा है,
पिता कभी कुछ खट्टा कभी खारा है,
पिता…पिता पालन है, पोषण है, परिवार का अनुशासन है,
पिता…पिता धौंस से चलना वाला प्रेम का प्रशासन है,
पिता…पिता रोटी है, कपडा है, मकान है,
पिता…पिता छोटे से परिंदे का बडा आसमान है,
पिता…पिता अप्रदर्शित-अनंत प्यार है,
पिता है तो बच्चों को इंतज़ार है,
पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं,
पिता है तो बाज़ार के सब खिलौने अपने हैं,
पिता से परिवार में प्रतिपल राग है,
पिता से ही माँ की बिंदी और सुहाग है,
पिता परमात्मा की जगत के प्रति आसक्ती है,
पिता गृहस्थ आश्रम में उच्च स्थिती की भक्ती है,
पिता अपनी इच्छाओं का हनन और परिवार की पूर्ती है,
पिता…पिता रक्त निगले हुए संस्कारों की मूर्ती है,
पिता…पिता एक जीवन को जीवन का दान है,
पिता…पिता दुनिया दिखाने का एहसान है,
पिता…पिता सुरक्षा है, अगर सिर पर हाथ है,
पिता नहीं तो बचपन अनाथ है,
पिता नहीं तो बचपन अनाथ है,
तो पिता से बडा तुम अपना नाम करो,
पिता का अपमान नहीं उनपर अभिमान करो,
क्योंकि माँ-बाप की कमी को कोई बाँट नहीं सकता,
और ईश्वर भी इनके आशिषों को काट नहीं सकता,
विश्व में किसी भी देवता का स्थान दूजा है,
माँ-बाप की सेवा ही सबसे बडी पूजा है,
विश्व में किसी भी तिर्थ की यात्रा व्यर्थ हैं,
यदि बेटे के होते माँ-बाप असमर्थ हैं,
वो खुशनसीब हैं माँ-बाप जिनके साथ होते हैं,
क्योंकि माँ-बाप के आशिषों के हाथ हज़ारों हाथ होते हैं
क्योंकि माँ-बाप के आशिषों के हाथ हज़ारों हाथ होते हैं
माँ संवेदना है - ओम व्यास जी की कविता January 20, 2008
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माँ…माँ संवेदना है, भावना है अहसास है
माँ…माँ-माँ संवेदना है, भावना है अहसास है
माँ…माँ जीवन के फूलों में खुशबू का वास है,
माँ…माँ रोते हुए बच्चे का खुशनुमा पलना है,
माँ…माँ मरूथल में नदी या मीठा सा झरना है,
माँ…माँ लोरी है, गीत है, प्यारी सी थाप है,
माँ…माँ पूजा की थाली है, मंत्रों का जाप है,
माँ…माँ आँखों का सिसकता हुआ किनारा है,
माँ…माँ गालों पर पप्पी है, ममता की धारा है,
माँ…माँ झुलसते दिलों में कोयल की बोली है,
माँ…माँ मेहँदी है, कुमकुम है, सिंदूर है, रोली है,
माँ…माँ कलम है, दवात है, स्याही है,
माँ…माँ परामत्मा की स्वयँ एक गवाही है,
माँ…माँ त्याग है, तपस्या है, सेवा है,
माँ…माँ फूँक से ठँडा किया हुआ कलेवा है,
माँ…माँ अनुष्ठान है, साधना है, जीवन का हवन है,
माँ…माँ जिंदगी के मोहल्ले में आत्मा का भवन है,
माँ…माँ चूडी वाले हाथों के मजबूत कधों का नाम है,
माँ…माँ काशी है, काबा है और चारों धाम है,
माँ…माँ चिंता है, याद है, हिचकी है,
माँ…माँ बच्चे की चोट पर सिसकी है,
माँ…माँ चुल्हा-धुंआ-रोटी और हाथों का छाला है,
माँ…माँ ज़िंदगी की कडवाहट में अमृत का प्याला है,
माँ…माँ पृथ्वी है, जगत है, धूरी है,
माँ बिना इस सृष्टी की कलप्ना अधूरी है,
तो माँ की ये कथा अनादि है,
ये अध्याय नही है…
…और माँ का जीवन में कोई पर्याय नहीं है,
और माँ का जीवन में कोई पर्याय नहीं है,
तो माँ का महत्व दुनिया में कम हो नहीं सकता,
और माँ जैसा दुनिया में कुछ हो नहीं सकता,
और माँ जैसा दुनिया में कुछ हो नहीं सकता,
तो मैं कला की ये पंक्तियाँ माँ के नाम करता हूँ,
और दुनिया की सभी माताओं को प्रणाम करता हूँ.
बेटी होने का सुख या दुख - अनु सपन की एक गज़ल January 20, 2008
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मेरे घर में चहकती रही बेटीयाँ, शहर भर को खटकती रही बेटीयाँ
मेरे घर में चहकती रही बेटीयाँ, शहर भर को खटकती रही बेटीयाँ
ओढ कर स्वपन सारा शहर सो गया,
ओढ कर स्वपन सारा शहर सो गया,
राह पापा की तकती रही बेटीयाँ.
छोड माँ-बाप-बेटा-बहू चल दिये,
छोड माँ-बाप-बेटा-बहू चल दिये,
खुशबू बन के महकती रही बेटीयाँ.
मेरे घर में चहकती रही बेटीयाँ, शहर भर को खटकती रही बेटीयाँ
अब की तनख्वहा पे ये चीज़ लाना हमें,
अब की तनख्वहा पे ये चीज़ लाना हमें,
कहते-कहते झिझकती रही बेटीयाँ.
मेरे घर में चहकती रही बेटीयाँ, शहर भर को खटकती रही बेटीयाँ
इस जमाने ने शर्मो-हया बेच दी,
इस जमाने ने शर्मो-हया बेच दी,
राह चलते सहमती रही बेटीयाँ.
मेरे घर में चहकती रही बेटीयाँ, शहर भर को खटकती रही बेटीयाँ
ब्लाइंड शिष्या का ब्लाइंड अध्यापक ने ब्लात्कार किया??? January 17, 2008
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तिमारपुर के संत नगर में नेत्रहीन लड़कियों के स्कूल में एक टीचर ने हॉस्टल में रहने वाली 20 साल की स्टूडेंट के साथ बलात्कार किया। आरोपी टीचर राजेंद्र प्रसाद गुप्ता (3
भी दृष्टिहीन हैं।
हमारे इस सभ्य समाज में जब भी हमारी माँओं, बहनों का ब्लातकार होता है तो टीवी में, पत्र-पत्रिकाओं में अनेकों-अनेक लेख, साक्षात्कार व बहस होती है और इसमें अधिकतर महिलाओं को उनके भडकाऊ और बदन दिखाऊ कपडों के लिये दोषी ठहराया जाता है.
लेकिन यदि एक ब्लाइंड अध्यापक अपनी ब्लाइंड शिष्या का ब्लात्कार करे तो क्या???
तो मतलब साफ है कि छोटी स्कर्ट, जींस, ट्राउज़र, बदन दिखाऊ कपडे, गोरा बदन इन सब शब्दों का इस्तेमाल हम मर्द लोग अपनी बेशर्मी छुपाने के लिये ही तो करते हैं.
मेरी बेटी का शब्द ज्ञान January 3, 2008
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मेरी बेटी १६ महीनों की है. मम्मी-पापा के अलावा हिन्दी के काफी शब्द बोल लेती है. लेकिन कुछ शब्द उसने पता नहीं कहाँ से सीखे है जिनको सुनकर हँसी आती है. लेकिन जब मैंने थोडा गम्भीरता से सोचा तो लगा शायद ये शब्द शायद उसने अपनी जरूरत के हिसाब से खुद बना लिये हैं. आप भी इन शब्दों को पढें.
बीबा == मतलब ==> भैया
डाडू == मतलब ==> कबूतर
अंडा == मतलब ==> मक्खन
बीबी == मतलब ==> दूध
ठंडा == मतलब ==> कम्बल
और ये है वो…बिटीया रानी
नववर्ष मंगलमय हो!!! December 31, 2007
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शिमला जा रहा हूँ December 26, 2007
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मैं ९ जनवरी को ट्रेन से शिमला जा रहा हूँ. वैसे तो ऑफिस के काम से कोई ७-८ साल पहले शिमला गया था लेकिन इस बार तो घुमने के लिये जा रहा हूँ. सुना है अब बहुत बदल गया है. रात को शिमला के सपने आते हैं और दिन में दिल्ली की सारी कॉल सेंटरों की सफेद गाडियाँ मुझे बर्फ से ढकी नज़र आती हैं.
शिमला में कुफरी के अलावा घूमने के लिये कौन-कौन सी जगह हैं कृपया हो सके तो राय दें.
मेरी बेटी - एक छंद October 29, 2007
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अक्सर हिन्दुसतान में लडकों को चंचल और शरारती माना जाता है और उनकी इन शरारतों पर उनके माता-पिता बडे रीझते और खुश होते हैं. और यदि एसी शरारतें लडकियाँ करें तो माता-पिता खुश होने के स्थान पर उन्हें शरारतें न करने के लिये कहते हैं.
इसी विषय पर एक छंद लिखने की कोशिश की है. अभी तक तो अन्य कवियों की कवितायें पोस्ट की हैं पर यह छंद मेरी अपनी रचना है. आपकी टिप्पणीयों की प्रतिक्षा रहेगी.
……छोटे-छोटे पैर और नन्हे-नन्हे हाथ लेके,
……ठुमक चली है जग, सब देखो दंग है,
……कभी दौडे तेज-तेज कभी दौडे धीरे से वो,
……तंग मुझे करने का, अजब ये ढंग है,
……यह देख चकित हो, कहा मेरी श्रीमती ने,
……लडकी है देखो करे, लडकों सी तंग है,
……मैने कहा रहने दो जी, ऐसे तुम मत कहो,
……गुडीया ये मेरी नहीं, लडकों से कम है.`
फीड में अवाँछनीय अक्षर आने के कारण एग्रीगेटर पर नहीं दिख रही थी October 25, 2007
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मेरे ब्लाग की फीड में अवाँछनीय अक्षर आने के कारण एक्स एम एल फाईल में समस्या आ गयी थी. मैंने कोशिश करके उसे ठीक कर लिया.
इससे मैंने ये सिखा कि यदि किसी कारणवश आपकी कोई पोस्ट एग्रीगेटर पर नहीं दिखती और बाद में समस्या ठीक करने पर वह ताजा पोस्टों में नहीं अपीतु जिस तिथी में वह लिखी गयी थी उसी क्रम में वह दिखाई जाएगी.
नारद और ब्लौगवाणी मेरी पोस्ट क्यों नहीं दिखा रहे हैं? October 25, 2007
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ये क्या चक्कर है भाई, नारद और ब्लौगवाणी मेरी पोस्ट क्यों नहीं दिखा रहे हैं? एसी क्या नाराज़गी है हमसे जरा हमें भी अवगत करवायें.











