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परोपकार की भावना May 5, 2008

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पुराने जमाने की बात है। एक राजा ने दूसरे राजा के पास एक पत्र और सुरमे की एक छोटी सी डिबिया भेजी। पत्र में लिखा था कि जो सुरमा भिजवा रहा हूं, वह अत्यंत मूल्यवान है। इसे लगाने से अंधापन दूर हो जाता है। राजा सोच में पड़ गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि इसे किस-किस को दे। उसके राज्य में नेत्रहीनों की संख्या अच्छी-खासी थी, पर सुरमे की मात्रा बस इतनी थी जिससे दो आंखों की रोशनी लौट सके।

राजा इसे अपने किसी अत्यंत प्रिय व्यक्ति को देना चाहता था। तभी राजा को अचानक अपने एक वृद्ध मंत्री की स्मृति हो आई। वह मंत्री बहुत ही बुद्धिमान था, मगर आंखों की रोशनी चले जाने के कारण उसने राजकीय कामकाज से छुट्टी ले ली थी और घर पर ही रहता था। राजा ने सोचा कि अगर उसकी आंखों की ज्योति वापस आ गई तो उसे उस योग्य मंत्री की सेवाएं फिर से मिलने लगेंगी। राजा ने मंत्री को बुलवा भेजा और उसे सुरमे की डिबिया देते हुए कहा, ‘इस सुरमे को आंखों में डालें। आप पुन: देखने लग जाएंगे। ध्यान रहे यह केवल 2 आंखों के लिए है।’ मंत्री ने एक आंख में सुरमा डाला। उसकी रोशनी आ गई। उस आंख से मंत्री को सब कुछ दिखने लगा। फिर उसने बचा-खुचा सुरमा अपनी जीभ पर डाल लिया।

यह देखकर राजा चकित रह गया। उसने पूछा, ‘यह आपने क्या किया? अब तो आपकी एक ही आंख में रोशनी आ पाएगी। लोग आपको काना कहेंगे।’ मंत्री ने जवाब दिया, ‘राजन, चिंता न करें। मैं काना नहीं रहूंगा। मैं आंख वाला बनकर हजारों नेत्रहीनों को रोशनी दूंगा। मैंने चखकर यह जान लिया है कि सुरमा किस चीज से बना है। मैं अब स्वयं सुरमा बनाकर नेत्रहीनों को बांटूंगा।’

राजा ने मंत्री को गले लगा लिया और कहा, ‘यह हमारा सौभाग्य है कि मुझे आप जैसा मंत्री मिला। अगर हर राज्य के मंत्री आप जैसे हो जाएं तो किसी को कोई दुख नहीं होगा।’

संकलन: त्रिलोक चंद्र जैन
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

दर्पण की सीख April 28, 2008

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पुराने जमाने की बात है। एक गुरुकुल के आचार्य अपने शिष्य की सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए। विद्या पूरी होने के बाद शिष्य को विदा करते समय उन्होंने आशीर्वाद के रूप में उसे एक ऐसा दिव्य दर्पण भेंट किया, जिसमें व्यक्ति के मन के भाव को दर्शाने की क्षमता थी। शिष्य उस दिव्य दर्पण को पाकर प्रसन्न हो उठा। उसने परीक्षा लेने की जल्दबाजी में दर्पण का मुंह सबसे पहले गुरुजी के सामने कर दिया। वह यह देखकर आश्चर्यचकित हो गया कि गुरुजी के हृदय में मोह, अहंकार, क्रोध आदि दुर्गुण परिलक्षित हो रहे थे। इससे उसे बड़ा दुख हुआ। वह तो अपने गुरुजी को समस्त दुर्गुणों से रहित सत्पुरुष समझता था।

दर्पण लेकर वह गुरुकूल से रवाना हो गया। उसने अपने कई मित्रों तथा अन्य परिचितों के सामने दर्पण रखकर परीक्षा ली। सब के हृदय में कोई न कोई दुर्गुण अवश्य दिखाई दिया। और तो और अपने माता व पिता की भी वह दर्पण से परीक्षा करने से नहीं चूका। उनके हृदय में भी कोई न कोई दुर्गुण देखा, तो वह हतप्रभ हो उठा। एक दिन वह दर्पण लेकर फिर गुरुकुल पहुंचा। उसने गुरुजी से विनम्रतापूर्वक कहा, ‘गुरुदेव, मैंने आपके दिए दर्पण की मदद से देखा कि सबके दिलों में नाना प्रकार के दोष हैं।’ तब गुरु जी ने दर्पण का रुख शिष्य की ओर कर दिया।

शिष्य दंग रह गया. क्योंकि उसके मन के प्रत्येक कोने में राग,द्वेष, अहंकार, क्रोध जैसे दुर्गुण विद्यमान थे। गुरुजी बोले, ‘वत्स यह दर्पण मैंने तुम्हें अपने दुर्गुण देखकर जीवन में सुधार लाने के लिए दिया था दूसरों के दुर्गुण देखने के लिए नहीं। जितना समय तुमने दूसरों के दुर्गुण देखने में लगाया उतना समय यदि तुमने स्वयं को सुधारने में लगाया होता तो अब तक तुम्हारा व्यक्तित्व बदल चुका होता। मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह दूसरों के दुर्गुण जानने में ज्यादा रुचि रखता है। वह स्वयं को सुधारने के बारे में नहीं सोचता। इस दर्पण की यही सीख है जो तुम नहीं समझ सके।’

संकलन : चंद्र सैन
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

अहंकार कुबेर का March 27, 2008

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अहंकार

यह एक पौराणिक कथा है। कुबेर तीनों लोकों में सबसे धनी थे। एक दिन उन्होंने सोचा कि हमारे पास इतनी संपत्ति है, लेकिन कम ही लोगों को इसकी जानकारी है। इसलिए उन्होंने अपनी संपत्ति का प्रदर्शन करने के लिए एक भव्य भोज का आयोजन करने की बात सोची। उस में तीनों लोकों के सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया।

भगवान शिव उनके इष्ट देवता थे, इसलिए उनका आशीर्वाद लेने वह कैलाश पहुंचे और कहा, प्रभो! आज मैं तीनों लोकों में सबसे धनवान हूं, यह सब आप की कृपा का फल है। अपने निवास पर एक भोज का आयोजन करने जा रहा हूँ, कृपया आप परिवार सहित भोज में पधारने की कृपा करे।

भगवान शिव कुबेर के मन का अहंकार ताड़ गए, बोले, वत्स! मैं बूढ़ा हो चला हूँ, कहीं बाहर नहीं जाता। कुबेर गिड़गिड़ाने लगे, भगवन! आपके बगैर तो मेरा सारा आयोजन बेकार चला जाएगा। तब शिव जी ने कहा, एक उपाय है। मैं अपने छोटे बेटे गणपति को तुम्हारे भोज में जाने को कह दूंगा। कुबेर संतुष्ट होकर लौट आए। नियत समय पर कुबेर ने भव्य भोज का आयोजन किया।

तीनों लोकों के देवता पहुंच चुके थे। अंत में गणपति आए और आते ही कहा, मुझको बहुत तेज भूख लगी है। भोजन कहां है। कुबेर उन्हें ले गए भोजन से सजे कमरे में। सोने की थाली में भोजन परोसा गया। क्षण भर में ही परोसा गया सारा भोजन खत्म हो गया। दोबारा खाना परोसा गया, उसे भी खा गए। बार-बार खाना परोसा जाता और क्षण भर में गणेश जी उसे चट कर जाते।

थोड़ी ही देर में हजारों लोगों के लिए बना भोजन खत्म हो गया, लेकिन गणपति का पेट नहीं भरा। वे रसोईघर में पहुंचे और वहां रखा सारा कच्चा सामान भी खा गए, तब भी भूख नहीं मिटी। जब सब कुछ खत्म हो गया तो गणपति ने कुबेर से कहा, जब तुम्हारे पास मुझे खिलाने के लिए कुछ था ही नहीं तो तुमने मुझे न्योता क्यों दिया था? कुबेर का अहंकार चूर-चूर हो गया।

संकलन : सुरेश सिंह
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

क्या वाकई भगवान हमें देख रहा है March 14, 2008

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हमारे घर के पास एक डेरी वाला है. वह डेरी वाला एसा है कि आधा किलो घी में अगर घी 50२ ग्राम तुल गया तो 2 ग्राम घी निकाल लेता था.

एक बार मैं आधा किलो घी लेने गया. उसने मुझे 90 रूपय ज्यादा दे दिये. मैंने कुछ देर सोचा और पैसे लेकर निकल लिया. मैंने मन में सोचा कि 2-2 ग्राम से तूने जितना बचाया था बच्चू अब एक ही दिन में निकल गया. मैंने घर आकर अपनी गृहल्क्षमी को कुछ नहीं बताया और घी दे दिया. उसने जैसे ही घी डब्बे में पलटा आधा घी बिखर गया. मुझे झट से “बेटा चोरी का माल मोरी में” वाली कहावत याद आ गयी. और साहब यकीन मानीये वो घी किचन की सिंक में ही गिरा था.

इस वाकये को कई महीने बीत गये थे. परसों शाम को मैं एग रोल लेने गया. उसने भी मुझे सत्तर रूपय ज्याद दे दिये. मैंने मन ही मन सोचा चलो बेटा आज फिर चैक करते हैं की क्या वाकई भगवान हमें देखता है. मैंने रोल पैक कराये और पैसे लेकर निकल लिया. आश्चर्य तब हुआ जब एक रोल अचानक रास्ते में ही गिर गया. घर पहुँचा, बचा हुआ रोल टेबल पर रखा, जूस निकालने के लिये अपना मनपसंद काँच का गिलास उठाया… अरे यह क्या गिलास हाथ से फिसल कर टूट गया. मैंने हिसाब लगाय करीब-करीब सत्तर में से साठ रूपय का नुकसान हो चुका था. मैं बडा आश्चर्यचकित था.

और अब सुनिये ये भगवान तो मेरे पीछे ही पड गया जब कल शाम को सुभिक्षा वाले ने मुझे तीस रूपय ज्याद दे दिये. मैंने अपनी धर्म-पत्नी से पूछा क्या कहती हो एक ट्राई और मारें. उन्होने मुस्कुराते हुये कहा - जी नहीं. और हमने पैसे वापस कर दिये. बाहर आकर हमारी धर्म-पत्नी जी ने कहा - वैसे एक ट्राई और मारनी चाहिये थी. बस इतना कहना था कि उन्हें एक ठोकर लगी और वह गिरते-गिरते बचीं.

मैं सोच में पड गया कि क्या वाकई भगवान हमें देख रहा है.

त्याग भावना March 12, 2008

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शिबि अपनी त्याग बुद्धि के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। उनकी त्याग भावना तात्कालिक और अस्थायी है या उनके स्वभाव का स्थायी गुण, इसकी परीक्षा करने के लिए इंद्र और अग्नि ने एक योजना बनायी। अग्नि ने एक कबूतर का रूप धारण किया और इन्द्र ने एक बाज का। कबूतर को अपना आहार बनाने के लिए बाज ने उसका शिकार करने के लिए पीछा किया। कबूतर तेजी से उड़ता हुआ राजा शिबि के चरणों में जा पड़ा और बोला, मेरी रक्षा कीजिए। शिबि ने उसे रक्षा का आश्वासन दिया। पीछे-पीछे बाज भी आ पहुंचा। उसने शिबि से कहा, महाराज! मैं इस कबूतर का पीछा करता आ रहा हूं और इसे अपना आहार बना कर अपनी भूख मिटाना चाहता हूं, यह मेरा भक्ष्य है। आप इसकी रक्षा न करें।

शिबि ने बाज से कहा, मैंने इस पक्षी को अभय प्रदान किया है। इसे कोई मारे यह मैं कभी बर्दाश्त नहीं करूंगा। तुम्हें अपनी भूख मिटाने के लिए मांस चाहिए, सो मैं तुम्हें अपने शरीर से इस कबूतर के वजन के बराबर मांस काटकर देता हूं। उन्होंने एक तराजू मंगवाई और उसके एक पलड़े में कबूतर को रख दिया। दूसरे पलड़े में महाराज शिबि अपने शरीर से मांस काटकर डालने लगे। काफी मांस काट डाला किंतु कबूतर वाला पलड़ा तनिक भी नहीं हिला और अंत में महाराज शिबि स्वयं उस पलड़े पर जा बैठे और बाज से बोले, मेरा पूरा शरीर तुम्हारे सामने है, आओ भोजन करो।

महाराज शिबि की त्याग बुद्धि को स्वीकार करते हुए अग्नि और इंद्र अपने स्वाभाविक रूप में प्रकट हुए और महाराज शिबि को भी उठा कर खड़ा कर दिया। उन्होंने शिबि की त्याग भावना की बड़ी प्रशंसा की, आशीर्वाद दिया और फिर चले गए।

त्याग से मनुष्य लाभ प्राप्त करता है। महाराज शिबि ने अपने शरीर को सहर्ष समर्पित कर दिया। अग्नि और इंद्र ने उनकी कितनी कठोर परीक्षा ली। मनुष्य सोचता है कि उसके जीवन में कोई कष्ट न आये। लेकिन जीवन में कोई कष्ट न आये, तो जीवन जड़ हो जाता है। भगवान हमारी परीक्षा लेते हैं जिससे कि हम अपने गुण और शील को संस्कारित कर उन कष्टों का सफलता के साथ सामना कर सकें और भगवान का अनुग्रह प्राप्त कर सकें।

संकलन : सुभाष चंद्र शर्मा
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

मन की आवाज़ February 8, 2008

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एक बुढ़िया बड़ी सी गठरी लिए चली जा रही थी। चलते-चलते वह थक गई थी। तभी उसने देखा कि एक घुड़सवार चला आ रहा है। उसे देख बुढ़िया ने आवाज दी, ‘अरे बेटा, एक बात तो सुन।’ घुड़सवार रुक गया। उसने पूछा, ‘क्या बात है माई?’ बुढ़िया ने कहा, ‘बेटा, मुझे उस सामने वाले गांव में जाना है। बहुत थक गई हूं। यह गठरी उठाई नहीं जाती। तू भी शायद उधर ही जा रहा है। यह गठरी घोड़े पर रख ले। मुझे चलने में आसानी हो जाएगी।’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘माई तू पैदल है। मैं घोड़े पर हूं। गांव अभी बहुत दूर है। पता नहीं तू कब तक वहां पहुंचेगी। मैं तो थोड़ी ही देर में पहुंच जाऊंगा। वहां पहुंचकर क्या तेरी प्रतीक्षा करता रहूंगा?’ यह कहकर वह चल पड़ा। कुछ ही दूर जाने के बाद उसने अपने आप से कहा, ‘तू भी कितना मूर्ख है। वह वृद्धा है, ठीक से चल भी नहीं सकती। क्या पता उसे ठीक से दिखाई भी देता हो या नहीं। तुझे गठरी दे रही थी। संभव है उस गठरी में कोई कीमती सामान हो। तू उसे लेकर भाग जाता तो कौन पूछता। चल वापस, गठरी ले ले। ‘

वह घूमकर वापस आ गया और बुढ़िया से बोला, ‘माई, ला अपनी गठरी। मैं ले चलता हूं। गांव में रुककर तेरी राह देखूंगा।’ बुढ़िया ने कहा, ‘न बेटा, अब तू जा, मुझे गठरी नहीं देनी।’ घुड़सवार ने कहा, ‘अभी तो तू कह रही थी कि ले चल। अब ले चलने को तैयार हुआ तो गठरी दे नहीं रही। ऐसा क्यों? यह उलटी बात तुझे किसने समझाई है?’

बुढ़िया मुस्कराकर बोली, ‘उसी ने समझाई है जिसने तुझे यह समझाया कि माई की गठरी ले ले। जो तेरे भीतर बैठा है वही मेरे भीतर भी बैठा है। तुझे उसने कहा कि गठरी ले और भाग जा। मुझे उसने समझाया कि गठरी न दे, नहीं तो वह भाग जाएगा। तूने भी अपने मन की आवाज सुनी और मैंने भी सुनी।’

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

ढाई आखर प्रेम का भेद न जाने कोय January 28, 2008

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कृष्ण गोकुल से मथुरा आ गए। उनको मथुरा में कुछ भी अच्छा नहीं लगता। वहां मथुरा में उद्धव भगवान कृष्ण के मित्र थे। बड़े भारी विद्वान चिंतक। पर अपने ज्ञान का अभिमान भी उतना ही था। कृष्ण ने उद्धव को कहा-

उधो ब्रज मोहि बिसरत नाहीं

लेकिन उद्धव को यह पीड़ा कहाँ समझ में आने वाली थी। वे तो ज्ञान-ध्यान की बातें करते थे। कृष्ण को माया-मोह को भुलाने की बात कहते थे।

कृष्ण ने उद्धव को अपना संदेशवाहक बनाकर मथुरा भेज दिया और एक पत्र भी ग्वाल बाल के नाम लिख भेजा। उधर उद्धव कृष्ण के सन्देशवाहक बनकर ब्रज पहुंचे और इधर ब्रज में कोहराम मच गया। जिसने जहां भी सुना वहीं अपना कामकाज छोड़कर उद्धव को मिलने पहुंच गया। यशोदानंदन के मित्र को सबने घेर लिया। उधो जी कृष्ण का क्या संदेश लाए हैं?

क्या लाए थे, उद्धव जी तो अपने ज्ञान की पोटली लेकर आए थे। कृष्ण का दिया हुआ तो बस एक पत्र ही था, सो हाथ का लिखा हुआ वह रुक्का बढ़ा दिया। सोचा, पढ़ लें, स्थिर चित्त हो जाएँ, तब समझाऊंगा इन्हें जीवन का तत्व भेद।

सो पत्र उनको दे दिया। लेकिन यह क्या, जिसके हाथ में पत्र आया, उसी के आँसुओं से वह भीगने लगा, कागज गल गया, स्याही फैल गई, पढ़ने को तो कुछ बचा ही नहीं। इसके बाद छीना-झपटी मच गई, जरा हम भी देखें, हम भी पढ़ें उनका संदेश। पत्र के टुकड़े-टुकड़े हो गया। छीना-झपटी में जिसके हाथ जितना छोटा टुकड़ा आया, उसी फटे हुए टुकड़े को वह लेकर रोने लगा। अपने माथे से लगाने लगा, छाती से लगाने लगा। कृष्ण की स्मृति में खो गया। पत्र पढ़ने की तो जरूरत ही नहीं रही।

सभी गोपी-ग्वाल बालकृष्ण की याद में रोते-सिसकते और आँसू बहाते रहे। उद्धव उनके प्रेमाश्रुओं की बहती हुई गंगा की धारा को पार नहीं कर सके। प्रेम भक्ति के इस हृदयस्पर्शी मार्मिक दृश्य में किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े रहे। बिलखते हुए गोपियों ने कहा- उधो, अँखियाँ हरिदर्शन की प्यासी।

उद्धव ने उन्हें आत्मतत्व का महत्व समझाया, ज्ञान-ध्यान का रस पिलाया किन्तु कौन सुनता है। किसी को इसमें कोई स्वाद नहीं आया। नीरस ज्ञान किसी के मन को नहीं भाया। फिर उन सब को भगवान की व्यापकता का परिचय दिया। योग का मूल सूत्र बताया। किन्तु गोपियाँ तो उस कृष्ण की याद में आँसू बहाती रहीं, जो उनके साथ खेलता था। कहा,

उधो! मन नाहीं दस-बीस, एकहुतो सो गयो श्याम संग, को आराधो ईश

महाराज, यह मन 10-20 तो हैं नहीं। हमारे पास हमारा एक ही मन था और वह कृष्ण के संग चला गया। तुम्हारे ज्ञान की बातें सुनने के लिए अब हमारे पास हमारा मन नहीं है।

गोपियों और ग्वाल बाल के प्रेम के सामने उद्धव निरुत्तर हो गए। ज्ञान की पोटली खुल कर बिखर गई, मूल्यहीन हो गई। उन्हें मथुरा वापस लौटना पड़ा। प्रेम का सम्बन्ध तर्क-वितर्क से नहीं होता, उसका सम्बन्ध तो हृदय से होता है।

प्रेम के रहस्य को कोई भी नहीं जान पाया। मीरा कृष्ण के प्रेम में व्याकुल होकर एक बार कहती हैं- मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई, जाको सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई। फिर अगले ही पल कहती थी, जो मैं ऐसा जानती प्रेम करे दुख होय। नगर ढिंढोरा पीटती, प्रेम करो मत कोय।

प्रेम शब्द का बड़ा व्यापक अर्थ है। यह प्रभु का ही अनन्त रूप है। यह निष्काम, नि:स्वार्थ, पावन पवित्र शब्द है। यह भगवान की महिमा का व्यापक रूप है। जिसने भी इस प्रेम शब्द को जान लिया-पहचान लिया, वह भगवानमय बन जाता है। जब भक्तगण भगवान को याद करते हैं, उनका मनन-चिन्तन-स्मरण करते हैं, भावविभोर होकर गुणगान करते हैं, भगवान के लिए करुण क्रंदन करते हैं, तो भगवान का हृदय भी उनकी भाव भक्ति से दवित हो जाता है। और भगवान भी अपने भक्तों को याद करते हैं। भक्ति भाव भी उसी प्रेम का एक रूप है।

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

विचार की पवित्रता January 17, 2008

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एक राजा और नगर सेठ में गहरी मित्रता थी। वे रोज एक दूसरे से मिले बिना नहीं रह पाते थे। नगर सेठ चंदन की लकड़ी का व्यापार करता था। एक दिन उसके मुनीम ने बताया कि लकड़ी की बिक्री कम हो गई है। तत्काल सेठ के मन में यह विचार कौंधा कि अगर राजा की मृत्यु हो जाए, तो मंत्रिगण चंदन की लकडि़यां उसी से खरीदेंगे। उसे कुछ तो मुनाफा होगा। शाम को सेठ हमेशा की तरह राजा से मिलने गया। उसे देख राजा ने सोचा कि इस नगर सेठ ने उससे दोस्ती करके न जाने कितनी दौलत जमा कर ली है, ऐसा कोई नियम बनाना होगा जिससे इसका सारा धन राज खजाने में जमा हो जाए।

दोनों इसी तरह मिलते रहे, लेकिन पहले वाली गर्मजोशी नहीं रही। एक दिन नगर सेठ ने पूछ ही लिया, ‘पिछले कुछ दिनों से हमारे रिश्तों में एक ठंडापन आ गया है। ऐसा क्यों?’ राजा ने कहा, ‘मुझे भी ऐसा लग रहा है। चलो, नगर के बाहर जो महात्मा रहते हैं, उनसे इसका हल पूछा जाए।’ उन्होंने महात्मा को सब कुछ बताया। महात्मा ने कहा, ‘सीधी सी बात है। आप दोनों पहले शुद्ध भाव से मिलते रहे होंगे, पर अब संभवत: एक दूसरे के प्रति आप लोगों के मन में कुछ बुरे विचार आ गए हैं इसलिए मित्रता में पहले जैसा सुख नहीं रह गया।’

नगर सेठ और राजा ने अपने-अपने मन की बातें कह सुनाईं। महात्मा ने सेठ से कहा,’ तुमने ऐसा क्यों नहीं सोचा कि राजा के मन में चंदन की लकड़ी का आलीशान महल बनवाने की बात आ जाए? इससे तुम्हारा चंदन भी बिक जाता। विचार की पवित्रता से ही संबंधों में मिठास आती है। तुमने राजा के लिए गलत सोचा इसलिए राजा के मन में भी तुम्हारे लिए अनुचित विचार आया। गलत सोच ने दोनों के बीच दूरी बढ़ा दी। अब तुम दोनों प्रायश्चित करके अपना मन शुद्ध कर लो, तो पहले जैसा सुख फिर से मिलने लगेगा।’

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विश्वास की शक्ति January 8, 2008

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एक बार नारदजी एक पर्वत से गुजर रहे थे। अचानक उन्होंने देखा कि एक विशाल वटवृक्ष के नीचे एक तपस्वी तप कर रहा है। उनके दिव्य प्रभाव से वह जाग गया और उसने उन्हें प्रणाम करके पूछा कि उसे प्रभु के दर्शन कब होंगे। नारदजी ने पहले तो कुछ कहने से इनकार किया, फिर बार-बार आग्रह करने पर बताया कि इस वटवृक्ष पर जितनी छोटी-बड़ी टहनियां हैं उतने ही वर्ष उसे और लगेंगे। नारदजी की बात सुनकर तपस्वी बेहद निराश हुआ। उसने सोचा कि इतने वर्ष उसने घर-गृहस्थी में रहकर भक्ति की होती और पुण्य कमाए होते तो उसे ज्यादा फल मिलते। वह बोला, ‘मैं बेकार ही तप करने आ गया।’ नारदजी उसे हैरान-परेशान देखकर वहां से चले गए।

आगे जाकर संयोग से वह एक ऐसे जंगल में पहुंचे, जहां एक और तपस्वी तप कर रहा था। वह एक प्राचीन और अनंत पत्तों से भरे हुए पीपल के वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था। नारदजी को देखते ही वह उठ खड़ा हुआ और उसने भी प्रभु दर्शन में लगने वाले समय के बारे में पूछा। नारदजी ने उसे भी टालना चाहा, मगर उसने बार-बार अनुरोध किया। इस पर नारदजी ने कहा कि इस वृक्ष पर जितने पत्ते हैं उतने ही वर्ष अभी और लगेंगे। हाथ जोड़कर खड़े उस तपस्वी ने जैसे ही यह सुना, वह खुशी से झूम उठा और बार-बार यह कहकर नृत्य करने लगा कि प्रभु उसे दर्शन देंगे। उसके रोम-रोम से हर्ष की तरंगें उठ रही थीं।

नारदजी मन ही मन सोच रहे थे कि इन दोनों तपस्वियों में कितना अंतर है। एक को अपने तप पर ही संदेह है। वह मोह से अभी तक उबर नहीं सका और दूसरे को ईश्वर पर इतना विश्वास है कि वह वर्षों प्रतीक्षा के लिए तैयार है। तभी वहां अचानक अलौकिक प्रकाश फैल गया और प्रभु प्रकट होकर बोले, ‘वत्स! नारद ने जो कुछ बताया वह सही था पर तुम्हारी श्रद्धा और विश्वास में इतनी गहराई है कि मुझे अभी और यहीं प्रकट होना पड़ा।’

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आत्मा की ज्योति December 25, 2007

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एक दिन राजा जनक ने महर्षि याज्ञवल्क्य से पूछा, ‘महात्मन्! बताइए कि एक व्यक्ति किस ज्योति से देखता है और काम लेता है?’ याज्ञवल्क्य ने कहा, ‘यह तो बिल्कुल बच्चों जैसी बात पूछी आपने महाराज। यह तो हर व्यक्ति जानता है कि मनुष्य सूर्य के प्रकाश में देखता है और उससे अपना काम चलता है।’ इस पर जनक बोले, ‘और जब सूर्य न हो तब?’

याज्ञवल्क्य बोले, ‘तब वह चंद्रमा की ज्योति से काम चलाता है।’ तभी जनक ने टोका, ‘और जब चन्द्रमा भी न हो तब।’ याज्ञवल्क्य ने जवाब दिया, ‘तब वह अग्नि के प्रकाश में देखता है।’ जनक ने फिर कहा, ‘और जब अग्नि भी न हो तब।’ याज्ञवल्क्य ने मुस्कराते हुए कहा, ‘तब वह वाणी के प्रकाश में देखता है।’ जनक ने गंभीरतापूर्वक उसी तरह पूछा, ‘महात्मन् यदि वाणी भी धोखा दे जाए तब।’ याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया, ‘राजन् तब मनुष्य का मार्ग प्रशस्त करने वाली एक ही वस्तु है-आत्मा। सूर्य, चंद्रमा, अग्नि और वाणी चाहे अपनी आग खो दें पर आत्मा तब भी व्यक्ति के मार्ग को प्रशस्त करती है।’ इस बार जनक संतुष्ट हो गए।

नवभारत टाईम्स में प्रकाशित