हमारे राज्य में कौए कितने हैं (अकबर-बीरबल) February 5, 2008
Posted by pryas in अकबर-बीरबल.Tags: अकबर, कितने हैं, बीरबल, में कौए, हमारे राज्य
3 comments
एक दिन अकबर अपने मत्रीं बीरबल के साथ अपने महल के बाग में घूम रहे थे. बीरबल बागों में उडते कौओं को देखकर कुछ सोचने लगे और बीरबल से पूछा, “क्यों बीरबल, हमारे राज्य में कितने कौए होंगे”?
बीरबल ने कुछ देर अंगुलियों पर कुछ हिसाब लगाया और बोले,”हुज़ूर, हमारे राज्य में कुल मिलाकर 95, 463 कौए हैं”. तुम इतना विश्वास से कैसे कह सकते हो? हुज़ूर, “आप खुद गिन लिजीये, बीरबल बोले”. अकबर को कुछ इसी प्रकार के जवाब का अंदेशा था. उन्होंने ने पूछा,”बीरबल, यदि इससे कम हुए तो”? तो इसका मतलब है कि कुछ कौए अपने रिश्तेदारों से मिलने दूसरे राज्यों में गये हैं. और यदि ज्यादा हुए तो? तो इसका मतलब यह हैं हु़जूर कि कुछ कौए अपने रिश्तेदारों से मिलने हमारे राज्य में आये हैं बीरबल ने मुस्कुरा कर जवाब दिया.
अकबर एक बार फिर मुस्कुरा कर रह गये.
कुँए का पानी December 23, 2007
Posted by pryas in अकबर-बीरबल.Tags: अकबर, कुँआ, पानी, बीरबल, hindi chittha, naresh, pryas
3 comments
एक बार एक आदमी ने अपना कुँआ एक किसान को बेच दिया. अगले दिन जब किसान ने कुँए से पानी खिंचना शुरू किया तो उस व्यक्ति ने किसान से पानी लेने के लिये मना किया. वह बोला, “मैने तुम्हें केवल कुँआ बेचा है ना कि कुँए का पानी”.
किसान बहुत दुखी हुआ और उसने अकबर के दरबार में गुहार लगाई. उसने दरबार में सबकुछ बताया और अकबर से इंसाफ माँगा.
अकबर ने यह समस्या बीरबल को हल करने के लिये दी. बीरबल ने उस व्यक्ति को बुलाया जिसने कुँआ किसान को बेचा था. बीरबल ने पूछा, “तुम किसान को कुँए से पानी क्यों नहीं लेने देते? आखिर तुमने कुँआ किसान को बेचा है.” उस व्यक्ति ने जवाब दिया, “बीरबल, मैंने किसान को कुँआ बेचा है ना कि कुँए का पानी. किसान का पानी पर कोई अधिकार नहीं है”.
बीरबल मुस्कुराया और बोला,”बहुत खूब, लेकिन देखो, क्योंकि तुमने कुँआ किसान को बेच दिया है, और तुम कहते हो कि पानी तुम्हारा है, तो तुम्हे अपना पानी किसान के कुँए में रखने का कोई अधिकार नहीं है. अब या तो अपना पानी किसान के कुँए से निकाल लो या फिर किसान को किराय दो.”
वह आदमी समझ गया, कि बीरबल के सामने उसकी दाल नहीं गलने वाली और वह माफी माँग कर खिसक लिया.
तीन सवाल - (अकबर-बीरबल) November 29, 2007
Posted by pryas in अकबर-बीरबल.Tags: अकबर, तीन सवाल, प्रयास, बीरबल, chittha, Hindi, naresh, pryas
4 comments
महाराजा अकबर, बीरबल की हाज़िरजवाबी के बडे कायल थे. उनकी इस बात से दरबार के अन्य मंत्री मन ही मन बहुत जलते थे. उनमें से एक मंत्री, जो महामंत्री का पद पाने का लोभी था, ने मन ही मन एक योजना बनायी. उसे मालूम था कि जब तक बीरबल दरबार में मुख्य सलाहकार के रूप में है उसकी यह इच्छा कभी पूरी नहीं हो सकती.
एक दिन दरबार में अकबर ने बीरबल की हाज़िरजवाबी की बहुत प्रशंसा की. यह सब सुनकर उस मंत्री को बहुत गुस्सा आया. उसने महाराज से कहा कि यदि बीरबल मेरे तीन सवालों का उत्तर सही-सही दे देता है तो मैं उसकी बुद्धिमता को स्वीकार कर लुंगा और यदि नहीं तो इससे यह सिद्ध होता है की वह महाराज का चापलूस है. अकबर को मालूम था कि बीरबल उसके सवालों का जवाब जरूर दे देगा इसलिये उन्होंने उस मंत्री की बात स्वीकार कर ली.
उस मंत्री के तीन सवाल थे -
१. आकाश में कितने तारे हैं.
२. धरती का केन्द्र कहाँ है.
३. सारे संसार में कितने स्त्री और कितने पुरूष हैं.
अकबर ने फौरन बीरबल से इन सवालों के जवाब देने के लिये कहा. और शर्त रखी कि यदि वह इनका उत्तर नहीं जानता है तो मुख्य सलाहकार का पद छोडने के लिये तैयार रहे.
बीरबल ने कहा, “तो सुनिये महाराज”.
पहला सवाल - बीरबल ने एक भेड मँगवायी. और कहा जितने बाल इस भेड के शरीर पर हैं आकाश में उतने ही तारे हैं. मेरे दोस्त, गिनकर तस्सली कर लो, बीरबल ने मंत्री की तरफ मुस्कुराते हुए कहा.
दूसरा सवाल - बीरबल ने ज़मीन पर कुछ लकीरें खिंची और कुछ हिसाब लगाया. फिर एक लोहे की छड मँगवायी गयी और उसे एक जगह गाड दिया और बीरबल ने महाराज से कहा, “महाराज बिल्कुल इसी जगह धरती का केन्द्र है, चाहे तो आप स्व्यं जाँच लें”. महाराज बोले ठीक है अब तीसरे सवाल के बारे में कहो.
अब महाराज तीसरे सवाल का जवाब बडा मुश्किल है. क्योंकि इस दुनीया में कुछ लोग ऐसे हैं जो ना तो स्त्री की श्रेणी में आते हैं और ना ही पुरूषों की श्रेणी. उनमें से कुछ लोग तो हमारे दरबार में भी उपस्थित हैं जैसे कि ये मंत्री जी. महाराज यदि आप इनको मौत के घाट उतरवा दें तो मैं स्त्री-पुरूष की सही सही संख्या बता सकता हूँ. अब मंत्री जी सवालों का जवाब छोडकर थर-थर काँपने लगे और महाराज से बोले,”महाराज बस-बस मुझे मेरे सवालों का जवाब मिल गया. मैं बीरबल की बुद्धिमानी को मान गया हूँ”.
महाराज हमेशा की तरह बीरबल की तरफ पीठ करके हँसने लगे और इसी बीच वह मंत्री दरबार से खिसक लिया.
तोता ना खाता है ना पीता है… (अकबर-बीरबल) November 27, 2007
Posted by pryas in अकबर-बीरबल.Tags: अकबर-बीरबल, hindi chittha, naresh, pryas
2 comments
एक बहेलीये को तोते में बडी ही दिलचस्पी थी. वह उन्हें पकडता, सिखाता और तोते के शौकीन लोगों को ऊँचे दामों में बेच देता था. एक बार एक बहुत ही सुन्दर तोता उसके हाथ लगा. उसने उस तोते को अच्छी-अच्छी बातें सिखायीं उसे तरह-तरह से बोलना सिखाया और उसे लेकर अकबर के दरबार में पहुँच गया. दरबार में बहेलिये ने तोते से पूछा - बताओ ये किसका दरबार है? तोता बोला, “यह जहाँपनाह अकबर का दरबार है”. सुनकर अकबर बडे ही खुश हुए. वह बहेलिये से बोले, “हमें यह तोता चाहिये, बोलो इसकी क्या कीमत माँगते हो”. बहेलीया बोला जहाँपनाह - सब कुछ आपका है आप जो दें वही मुझे मंजूर है. अकबर को जवाब पसंद आया और उन्होंने बहेलिये को अच्छी कीमत देकर उससे तोते को खरीद लिया.
महाराजा अकबर ने तोते के रहने के लिये बहुत खास इंतजाम किये. उन्होंने उस तोते को बहुत ही खास सुरक्षा के बीच रखा. और रखवालों को हिदायत दी कि इस तोते को कुछ नहीं होना चाहिये. यदि किसी ने भी मुझे इसकी मौत की खबर दी तो उसे फाँसी पर लटका दिया जायेगा. अब उस तोते का बडा ही ख्याल रखा जाने लगा. मगर विडंबना देखीये कि वह तोता कुछ ही दिनों बाद मर गया. अब उसकी सूचना महाराज को कौन दे?
रखवाले बडे परेशान थे. तभी उन्में से एक बोला कि बीरबल हमारी मदद कर सकता है. और यह कहकर उसने बीरबल को सारा वृतांत सुनाया तथा उससे मदद माँगी.
बीरबल ने एक क्षण कुछ सोचा और फिर रखवाले से बोला - ठीक है तुम घर जाओ महाराज को सूचना मैं दूँगा. बीरबल अगले दिन दरबार में पहुँचे और अकबर से कहा, “हुज़ूर आपका तोता…” अकबर ने पूछा - “हाँ-हाँ क्या हुआ मेरे तोते को?” बीरबल ने फिर डरते-डरते कहा - “आपका तोता जहाँपनाह…” हाँ-हाँ बोलो बीरबल क्या हुआ तोते को? “महाराज आपका तोता….” बीरबल बोला. “अरे खुदा के लिये कुछ तो कहो बीरबल मेरे तोते को क्या हुआ”, अकबर ने खीजते हुए कहा.
“जहाँपनाह, आपका तोता ना तो कुछ खाता है ना कुछ पीता है, ना कुछ बोलता है ना अपने पँख फडफडाता है, ना आँखे खोलता है और ना ही…” राज ने गुस्से में कहा - “अरे सीधा-सीधा क्यों नहीं बोलते की वो मर गया है”. बीरबल तपाक से बोला - “हुज़ूर मैंने मौत की खबर नहीं दी ब्लकि ऐसा आपने कहा है, मेरी जान बख्शी जाये”.
और महाराज निरूत्तर हो गये.
मैं आपका नौकर हूँ, बैंगन का नहीं!!! (अकबर-बीरबल) November 26, 2007
Posted by pryas in अकबर-बीरबल.Tags: अकबर, बीरबल, बैंगन का नहीं, मैं आपका नौकर हूँ, Hindi, naresh, pryas
4 comments
एक दिन अकबर और बीरबल महल के बागों में सैर कर रहे थे. फले-फूले बाग को देखकर अकबर बहुत खुश थे. वे बीरबल से बोले, “बीरबल, देखो यह बैंगन, कितनी सुनदर लग रहे हैं!” इनकी सब्जी कितनी स्वादिष्ट लगती है! बीरबल, मुझे बैंगन बहुत पसंद हैं. हाँ महाराज, आप सत्य कहते हैं. यह बैंगन है ही ऐसी सब्जी, जो ना सिर्फ देखने में ब्लकि खाने में भी इसका कोई मुकाबला नहीं है. और देखिये महाराज भगवान ने भी इसीलिये इसके सिर पर ताज बनाया है. अकबर यह सुनकर बहुत खुश हुआ.
कुछ हफ्तों बाद अकबर और बीरबल उसी बाग में घूम रहे थे. अकबर को कुछ याद आया और मुस्कुराते हुए बोले, “बीरबल देखो यह बैंगन कितना भद्दा और बदसूरत है और यह खाने में भी बहुत बेस्वाद है.” हाँ हुज़ूर, आप सही कह रहे हैं बीरबल बोला. इसीलिये इसका नाम बे-गुण है बीरबल ने चतुराई से नाम को बदलते हुए कहा.
यह सुनकर अकबर को गुस्सा आ गया. उन्होंने झल्लाते हुए कहा,”क्या मतलब है बीरबल?” मैं जो भी बात कहता हूँ तुम उसे ही ठीक बताते हो. बैंगन के बारे में तुम्हारी दोनों ही बातें सच कैसे हो सकती हैं, क्या तुम मुझे समझाओगे? बीरबल ने हाथ जोडते हुए कहा,”हुज़ूर, मैं आपका नौकर हूँ बैंगन का नहीं”.
अकबर यह जवाब सुनकर बहुत खुश हुए और बीरबल की तरफ पीठ करके मुस्कुराने लगे.
ऊँट की गर्दन क्यों मुडी है? (अकबर-बीरबल) November 19, 2007
Posted by pryas in अकबर-बीरबल.Tags: akbar, अकबर, ऊँट की गर्दन, बीरबल, beerbal, birbal, pryas
2 comments
ऊँट की गर्दन क्यों मुडी है (अकबर-बीरबल)
अकबर बीरबल की हाज़िर जवाबी के बडे कायल थे. एक दिन दरबार में खुश होकर उन्होंने बीरबल को कुछ पुरस्कार देने की घोषणा की. लेकिन बहुत दिन गुजरने के बाद भी बीरबल को धनराशि (पुरस्कार) प्राप्त नहीं हुई. बीरबल बडी ही उलझन में थे कि महारज को याद दिलायें तो कैसे?
एक दिन महारजा अकबर यमुना नदी के किनारे शाम की सैर पर निकले. बीरबल उनके साथ था. अकबर ने वहाँ एक ऊँट को घुमते देखा. अकबर ने बीरबल से पूछा, “बीरबल बताओ, ऊँट की गर्दन मुडी क्यों होती है”?
बीरबल ने सोचा महाराज को उनका वादा याद दिलाने का यह सही समय है. उन्होंने जवाब दिया - महाराज यह ऊँट किसी से वादा करके भूल गया है, जिसके कारण ऊँट की गर्दन मुड गयी है. महाराज, कहते हैं कि जो भी अपना वादा भूल जाता है तो भगवान उनकी गर्दन ऊँट की तरह मोड देता है. यह एक तरह की सजा है.
तभी अकबर को ध्यान आता है कि वो भी तो बीरबल से किया अपना एक वादा भूल गये हैं. उन्होंने बीरबल से जल्दी से महल में चलने के लिये कहा. और महल में पहुँचते ही सबसे पहले बीरबल को पुरस्कार की धनराशी उसे सौंप दी, और बोले मेरी गर्दन तो ऊँट की तरह नहीं मुडेगी बीरबल. और यह कहकर अकबर अपनी हँसी नहीं रोक पाए.
और इस तरह बीरबल ने अपनी चतुराई से बिना माँगे अपना पुरस्कार राजा से प्राप्त किया.
गधा कौन? (अकबर-बीरबल) November 18, 2007
Posted by pryas in अकबर-बीरबल.Tags: बीरबल, महाराजा अकबर, यह भी खूब रही
4 comments
एक बार अकबर अपने दो बेटों के साथ नदी के किनारे गये. साथ में बीरबल भी थे. दोनों बटों ने अपने कपडे उतारे और नदी मे नहाने उतर गये. बीरबल को उन्होंने अपने कपडों की रखवाली करने के लिये कहा.
बीरबल नदी किनारे बैठ कर उन दोनों के आने का इंतज़ार करने लगे. कपडे उन्होंने अपने कन्धों पर रखे हुए थे. बीरबल को इस अवस्था में खडे देख अकबर के मन में शरारत सूझी. उन्होंने बीरबल को कहा, “बीरबल तुम्हे देख कर ऐसा लग रह है जैसे धोबी का गधा कपडे लाद कर खडा हो”.
बीरबल ने झट से जवाब दिया, ” महराज धोबी के गधे के पास केवल एक गधे का ही बोझ होता है किंतु मेरे पास तो तीन-तीन गधों का बोझ है”.
महाराजा अकबर निरूत्तर हो गए.
प्रश्न के बदले प्रश्न (अकबर-बीरबल) November 18, 2007
Posted by pryas in अकबर-बीरबल.Tags: अकबर, प्रश्न, बीरबल
2 comments
एक दिन अकबर ने बीरबल से पूछा, “बीरबल, क्या तुम बता सकते हो कि मेरी पत्नी के हाथों में कितनी चुडीयाँ हैं”? बीरबल ने कहा, “हुज़ूर, माफ किजीये मुझे नहीं मालूम”. क्यों, तुम तो रोज़ ही मेरी पत्नी के हाथों को देखते हो तुम्हें पता होना चाहिये, अकबर ने गुस्से से कहा.
बीरबल ने कहा, “महाराज चलिये जरा बाग की तरफ चलते हैं”. वहाँ मैं आपको बताउँगा कि इस प्रश्न का उत्तर मुझे क्यों नहीं पता. और दोनो बाग की तरफ चल दिये. चलते-चलते वे बाग कि सीढीयों की तरफ बढे. अचानक बीरबल ने कहा, “महारज, आप दिन में कई बार इन सिढीयों से चढते उतरते हैं, क्या आप बता सकते हैं कि ये कितनी सिढीयाँ हैं”.
सुनकर अकबर केवल मुसकुराये और विषय बदल दिया.
बीरबल का जन्म November 16, 2007
Posted by pryas in अकबर-बीरबल.Tags: अकबर, बीरबल का जन्म
6 comments
जब महेश दास जवान हुआ तो वह अपना भाग्य आजमाने राजा बीरबल के पास गया. उसके पास राजा द्वारा दी गई अंगूठी भी थी जो उसने कुछ समय पहले राजा से प्राप्त की थी. वह अपनी माँ का आशीर्वाद लेकर भारत की नई राजधानी - फतैपुर सीकरी की तरफ़ चल दिया.
भारत की नई राजधानी को देख कर महेश दास हतप्रभ था. वह भीड़-भाड़ से बचते हुए लाल दीवारों वाले महल की तरफ़ चल दिया. महल का द्वार बहुत बड़ा और कीमती पत्थरों से सजा हुआ था, ऐसा दरवाजा महेश दास ने कभी सपनों में भी नहीं देखा था. उसने जैसे ही महल में प्रवेश करना चाहा तभी रौबदार मूछों वाले दरबान ने अपना भाला हवा में लहराया.
“तुम्हें क्या लगता है, कि तुम कहाँ प्रवेश कर रहे हो”? पहरेदार ने कड़कती आवाज़ में पूछा. महाशय, मैं महाराज से मिलने आया हूँ, नम्रता से महेश ने उत्तर दिया. ” अच्छा! तो महाराज तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं, कि तुम कब आओगे”? दरबान ने हँसते हुए पूछा. महेश मुस्कुराया और बोला, ” बिल्कुल महाशय, और देखो मैं आ गया हूँ”. और हाँ, ” तुम बेशक बहुत बहादुर और वीर होंगे किंतु तुम मुझे महल में जाने से रोक कर अपनी जान को खतरे में दाल रहे हो”. सुनकर दरबान सहम गया पर फ़िर भी हिम्मत कर के बोला, “तुम ऐसा क्यों कहा रहे हो”? तुम्हें पता है इस बात के लिए मैं तुम्हारा सिर कलम कर सकता हूँ. लेकिन महेश हार माने वालों में से नहीं था, उसने झट से महाराज कि अंगूठी दरबान को दिखाई.
अब महाराज कि अंगूठी को न पहचानने कि हिम्मत दरबान में नहीं थी. और ना चाहते हुए भी उसे महेश अंदर आने कि इजाज़त देनी पड़ी. हालांकि वह उसे नहीं जाने देना चाहता था इसलिए वह महेश से बोला ठीक है तुम अन्दर जा सकते हो लेकिन मेरी एक शर्त है. वो क्या, महेश ने आश्चर्य से पूछा. दरबान बोला, “तुम्हें महाराज जो भी ईनाम देंगे उसका आधा हिस्सा तुम मुझे दोगे”. महेश ने एक पल सोचा और फ़िर मुस्कुराकर बोला ठीक है, मुझे मंजूर है.
और इस प्रकार महेश ने महल के अन्दर प्रवेश किया, अन्दर उसने देखा महाराजा अकबर सोने के सिंहासन पर विराजमान हैं. धीरे-धीरे महेश अकबर के बिल्कुल करीब पहुँच गया और अकबर को झुक कर सलाम किया और कहा - आपकी कीर्ति सारे संसार में फैले.
अकबर मुस्कुराया और कहा, “तुम्हे क्या चाहिए, कौन हो तुम”? महेश अपने पंजों पर उचकते हुए कहा महाराज मैं यहाँ आपकी सेवा में आया हूँ. और यह कहते हुए महेश ने राजा कि दी हुई अंगूठी राजा के सामने रख दी. ओहो! यादा आया, तुम महेश दास हो है ना. जी महाराज मैं वही महेश हूँ.
बोलो महेश तुम्हें क्या चाहिए? महाराज मैं चाहता हूँ कि आप मुझे सौ कोडे मारिये. यह क्या कहा रहे हो महेश? रजा ने चौंकते हुए कहा. मैं ऐसा आदेश कैसे दे सकता हूँ जब तुमने कोई अपराध ही नहीं किया. महेश ने नम्रता से उत्तर दिया,” नहीं महाराज, मुझे तो सौ कोडे ही मारिये”. अब ना चाहते हुए भी अकबर को सौ कोडे मारने का आदेश देना ही पड़ा.
जल्लाद ने कोडे मारने शुरू किए - एक, दो, तीन, चार, . . . . . . . . . . . पचास. बस महाराज बस, महेश ने दर्द से करते हुए कहा. क्यों क्या हुआ महेश दर्द हो रहा है क्या? नहीं महाराज ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तो केवल अपना वादा पूरा करना चाहता हूँ. कैसा वादा महेश? महाराज जब मैं महल में प्रवेश कर रहा था तो दरबान ने मुझे इस शर्त पर अन्दर आने दिया कि मुझे जो भी उपहार प्राप्त होगा उसका आधा हिस्सा मैं दरबान को दूँगा. अपने हिस्से के पचास कोडे तो मैं खा चुका अब उस दरबान को भी उसका हिस्सा मिलना चाहिए. यह सुन कर सभी दरबारी हंसने लगे.
दरबान को बुलाया गया और उसको पचास कोडे लगाये गए. रजा ने महेश से कहा,”तुम बिल्कुल ही वेसे ही बहादुर और निडर हो जैसे बचपन में थे”. मैं अपने दरबार में से भ्रष्ट कर्मचारियों को पकड़ना चाहता था जिसके लिए मैंने बहुत से उपाय किए किंतु कोई भी काम नहीं आया. लेकिन यह काम तुमने जरा सी देर में ही कर दिया. तुम्हारी इसी बुद्धिमानी कि वजह से आज से तुम बीरबल कहालोगे. और तुम मेरे मुख्य सलाहकार नियुक्त किए जाते हो.
और इस तरह बीरबल का जन्म हुआ.
अकबर-बीरबल की पहली मुलाकात November 15, 2007
Posted by pryas in अकबर-बीरबल.Tags: अकबर, नरेश, प्रयास, बीरबल, ब्लॉग, हिन्दी
2 comments
अकबर को शिकार का बहुत शौक था. वे किसी भी तरह शिकार के लिए समय निकल ही लेते थे. बाद में वे अपने समय के बहुत ही अच्छे घुड़सवार और शिकरी भी कहलाये. एक बार राजा अकबर शिकार के लिए निकले, घोडे पर सरपट दौड़ते हुए उन्हें पता ही नहीं चला और केवल कुछ सिपाहियों को छोड़ कर बाकी सेना पीछे रह गई. शाम घिर आई थी, सभी भूखे और प्यासे थे, और समझ गए थे की वो रास्ता भटक गए हैं. राजा को समझ नहीं आ रहा था की वह किस तरफ़ जाएं.
कुछ दूर जाने पर उन्हें एक तिराहा नज़र आया. राजा बहुत खुश हुए चलो अब तो किसी तरह वे अपनी राजधानी पहुँच ही जायेंगे. लेकिन जाएं तो जायें किस तरफ़. राजा उलझन में थे. वे सभी सोच में थे किंतु कोई युक्ति नहीं सूझ रही थी. तभी उन्होंने देखा कि एक लड़का उन्हें सड़क के किनारे खड़ा-खडा घूर रहा है. सैनिकों ने यह देखा तो उसे पकड़ कर राजा के सामने पेश किया. राजा ने कड़कती आवाज़ में पूछा, “ऐ लड़के, आगरा के लिए कौन सी सड़क जाती है”? लड़का मुस्कुराया और कहा, “जनाब, ये सड़क चल नहीं सकती तो ये आगरा कैसे जायेगी”. महाराज जाना तो आपको ही पड़ेगा और यह कहकर वह खिलखिलाकर हंस पड़ा.
सभी सैनिक मौन खड़े थे, वे राजा के गुस्से से वाकिफ थे. लड़का फ़िर बोला,” जनाब, लोग चलते हैं, रास्ते नहीं”. यह सुनकर इस बार राजा मुस्कुराया और कहा,” नहीं, तुम ठीक कह रहे हो. तुम्हारा नाम क्या है, अकबर ने पूछा. मेरा नाम महेश दास है महाराज, लड़के ने उत्तर दिया, और आप कौन हैं? अकबर ने अपनी अंगूठी निकाल कर महेश दास को देते हुए कहा, “तुम महाराजा अकबर - हिंदुस्तान के सम्राट से बात कर रहे हो”. मुझे निडर लोग पसंद हैं. तुम मेरे दरबार में आना और मुझे ये अंगूठी दिखाना. ये अंगूठी देख कर मैं तुम्हें पहचान लूंगा. अब तुम मुझे बताओ कि मैं किस रास्ते पर चलूँ ताकि मैं आगरा पहुँच जाऊं.
महेश दास ने सिर झुका कर आगरा का रास्ता बताया और जाते हुए हिंदुस्तान के सम्राट को देखता रहा.
और इस तरह अकबर भविष्य के बीरबल से मिला.









