यह भी खूब रही

{ कुछ मेरे बारे में }

कल बताऊँगा, अभी एक नई पोस्ट लिख रहा हूँ!

15 Comments

15 responses so far ↓

  • Naresh // November 7, 2006 at 6:07 am | Reply

    हम भी आ गऐ जी।

  • pryas // November 22, 2006 at 4:59 pm | Reply

    Your most welcome!!!

  • नितिन // May 7, 2007 at 3:14 pm | Reply

    इन्गित करने के लिए क्षमा.. लेकिन आपके चिठ्ठे के शीर्षक की वर्तनी में चूक लग रही है
    मेरे हिसाब से इस प्रकार होनी चाहिए:

    ” यह भी खूब रही ”
    खुब –>> खूब

  • pryas // May 7, 2007 at 5:15 pm | Reply

    नितिन जी, इन्गित करने के लिए धन्यवाद.
    मैंने गलती को सुधार लिया है

  • Neeraj P // May 31, 2007 at 9:35 pm | Reply

    You have indeed got a very good collection of Stories. Good Going. Keep it up.

  • पंकज बेंगाणी // June 21, 2007 at 11:35 am | Reply

    प्रयासजी,

    सिहाँसन बत्तिसी सिरीज काफी अच्छी लिखी है आपने. आपको साधुवाद.

    इस सिरीज को इसी नाम से तरकश पर छापना चाहेंगे.

    आपकी राय दें.

    धन्यवाद

  • pryas // June 21, 2007 at 12:10 pm | Reply

    पंकज जी,

    इस सिरीज को तरकश पर छापने से इसकी उपल्बधता बढेगी। यह उत्तम विचार है।

    धन्यवाद

  • हिंदीभाषी // June 28, 2007 at 11:48 am | Reply

    महोदय सादर प्रणाम,

    आपको हिंदी भाषा , साहित्य, चर्चा तथा काव्य आदी को समर्पित एक नये जाल-स्थल (वेबसाइट) का परिचय हो इस हेतू यह पत्र भेजा जा रहा है|

    आज इंटरनेट पर हिंदी मे साहित्य निर्मिती हो रही है, यह बड़ी उत्साहजनक बात है| लोग अपने विचार समाज के समक्ष अपनी भाषा मे रख रहे है| हिंदी मे लिखना और वह प्रकाशित करना आज भी उतना सहज नही है लेकिन लोगों का उत्साह कायम है| आज इंटरनेट पर अच्छा हिंदी साहित्य निर्माण हो रहा है| हिंदी विकीपीडीया तथा अन्य सैकडों चिठ्ठे (ब्लॉग) इस बात का प्रमाण देंगे की हिंदी भाषी लोग अपनी भाषा के प्रति इंटरनेट पर भी सजग हो रहे है| लेकिन हमारी संख्या और हमारे प्रगल्भ साहित्य को देख कर यह प्रतीत होता है की यह प्रयास आज भी पर्याप्त नही है|

    आज हिंदी को इंटरनेट पर बढावा देने के लिये एक संयुक्त प्रयास की जरूरत है| सभी मिलकर हिंदी को साथ ले जायेंगे| इस विचार से हिंदी भाषी तथा हिंदी से प्यार करने वाले सभी लोगों की ज़रूरतों पूरा करे तथा जहां सामाजिक चर्चा मंच हो जो सरल और उपयोगी हो| ऐसा कुछ करने की चाह मन मे लेकर एक जाल स्थल की निर्मिती की गयी है| आगे उस जाल स्थल का संक्षिप्त परिचय कराने की कोशिश कर रहे है|

    इस जगह (वेबसाइट) पर आप हिंदी में अत्यंत सरलता से लिख सकते है| अपना साहित्य, काव्य प्रकाशित कर सकते है तथा किसी भी सामाजिक विषय पर चर्चा शुरु कर सकते है|
    यहां आने पर आपको सर्वप्रथम पंजियन कर अपना सदस्य नाम लेना है| यह नाम आप हिंदी मे ले सकते है और हमारा आग्रह है की आप नाम हिंदी मे ही लें| ध्यान रहे आपका संकेताक्षर ( पासवर्ड) अंग्रेजी मे ही रहेगा |

    यहाँ आप हिंदी तथा अंग्रेजी भाषा मे लिखने का चुनाव कर सकते है| एक लेख मे आप हिंदी तथा अंग्रेजी मे साथ साथ लिख सकते है| हिंदी मे लिखने के लिये मदद (की बोर्ड) दिया गया है जो अत्यंत सरल है| या ने जैसा अंग्रेजी मे लिख सकेंगे वैसा ही लिखे और आप हिंदी लिख पायेंगे|

    अपना साहित्य प्रकाशित करना तथा अन्य प्रकाशित साहित्य पर अपना मत प्रकट करना यह एक अच्छा अनुभव होगा| यह एक सामुदायिक जालस्थल है जहां आप अपने लोगों से हिंदी मे बाते कर सकेंगे| हिंदी साहित्य तथा अन्य सम-समान विचारों के लोगों से मिलने का अनुभव भी खास रहेगा|

    इस जाल स्थल की अन्य कई विशेषताएँ है जो कि समय समय पर सामने आयेगी| आप इस जाल स्थल से जुड़ जायें तथा अपना सहयोग दें यह विनती है| आपसे एक और विनती है की आप यह संदेश अपने हर परिचित तक पहुंचाने मे हमारी मदद करें| अपने स्नेही तथा परिवारजनों तक यह जाल स्थल पहूंचाये|

    जाल स्थल का पता – http://www.hindibhashi.com

    आपका
    संपादन मंडल ,
    हिंदीभाषी . कॉम

  • ashish.mishra // February 14, 2008 at 5:41 pm | Reply

    i love you and your all teem mamber

  • miley // February 28, 2008 at 9:53 pm | Reply

    hiiiiiiiiiiiiiii
    i am miley
    how r u
    wats up!!!!!!!!!!

  • ankit // September 22, 2008 at 9:41 pm | Reply

    great effort

  • pryas // September 23, 2008 at 10:12 am | Reply

    Thanks Ankit

  • Chirag // June 10, 2009 at 11:37 am | Reply

    Great,
    I think you have yery good collection. keep it up.

  • seema // August 29, 2009 at 5:18 pm | Reply

    aapki kahaniyan bahut achchi lagi.

  • मुनि मित्रानंदसागर (Muni Mitranandsagar) // September 3, 2009 at 10:07 am | Reply

    prayas के बदले pryas क्यों? कोई खास वजह हो तो जानना चाहता हूं.

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