लैंसडौन की सैर – मुसाफिर के साथ भाग – 1
हम कोटद्वार साढे छै: बजे पहुँच गये थे. कोटद्वार एक छोटा सा स्टेशन है. यहाँ से बाहर निकलते ही जीप मिल गई. चालीस रूपय किराया था पाँच साल पहले. आज भी चालीस रूपय ही था, यहाँ नहीं आई महँगाई. वैसे स्टेशन से कुछ दूर ही ट्रांसपोर्ट नगर है जहाँ से दिन भर लैंसडौन के लिये जीप और बसें मिल जाती हैं. बस का किराया करीब तीस रूपय है. नीरज और मैं दोनों डिक्की में सैट हो गये. कुछ ही देर में जीप निकल पडी अपने पर्वतीय रास्तों पर.
कोटद्वार से करीब 18-20 कि.मी. के बाद दुगड्डा आता है. सिलगढ एवं लंगूरगढ के बीच स्थित होने के कारण इस शहर का दुगड्डा पडा. दुगड्डा के बारे में एक रोचक जानकारी मिलती है. यहाँ एक वृक्ष है जिसे चन्द्रशेखर स्मृति वृक्ष कहते हैं. शहीद चन्द्रशेखर आजाद तथा उनके साथीयों को नाथुपुर गाँव के निवासी भवानी सिंह रावत ने जुलाई 1930 के दौरान काकोरी डकैती के समय आमंत्रित किया था. तब प्रशिक्षण के दौरान अपने साथी हजारी लाल चैल बिहारी, विश्वेशरी दयाल तथा भवानी सिंह रावत के साथ शहीद चन्द्रशेखर आजाद के महाने निशानेबाजी का गवाह है ये पेड. इस पेड के पास शहीद चन्द्रशेखर आजाद मेमोरियल पार्क विकसित किया गया है. प्रत्येक वर्ष 27 फरवरी को यहाँ शहीद चन्द्रशेखर आजाद मेला का आयोजन होता है.
दुगड्डा में ही पानी का एक प्राकृतिक स्रोत है. यहाँ पहाडों से बहुत ही ठंडा पानी रिसता है. स्थानीय लोगों ने यहाँ पाईप लगा रखे हैं. अधिकतर गाडीयाँ यहाँ रूकती हैं. हमारी जीप भी यहाँ रूकी और मैं भी अपने आप को रोक न सका. नीरज जी को यहाँ फोटोग्राफी का एक अच्छा मौका मिल गया.

दुगड्डा में पानी प्राकृतिक स्रोत

दुगड्डा में पानी प्राकृतिक स्रोत
कुछ देर रुकने के बाद हमारी जीप फिर निकल पडी. दूर तक नजर आते पहाड, उन पर छोटे-छोटे मकान, ऊंचे-ऊंचे वृक्ष बडा ही मनोरम द्र्श्य था वो. मैं तो बस खो ही गया था उन पहाडों पर. करीब आठ बजे हम लैंसडौन की सीमा में पहुँच गये. यहाँ एक चुंगी है जहाँ सभी स्थानीय व्यक्तियों तथा पर्यटकों से एक रूपया टैक्स वसुला जाता है.
लैंसडौन में टैक्सी ने हमें गाँधी चौक पर उतार दिया. गाँधी चौक लैंसडौन का केन्द्र माना जाता है. यहाँ मयूर होटल में बडे ही स्वादिष्ट आलू के पंराठें मिलते हैं. लेकिन हमें परांठों से पहले अपने जानकार का घर ढुंढना था. उनका घर कालेशवर रोड पर है. गाँधी चौक से सदर बाजार होकर कालेशवर रोड आता है. एक-दो बार गलत घर में जा कर हम ठीक जगह पहुँच गये. नीचे एक आँटी रहती हैं. बहुत बुढी हैं. फिर कभी उनके बार में लिखुंगा.

ये हैं वो आंटी
उनसे मैं बहुत प्रभावित हूँ. जैसा की नीरज ने बताया है कि वहाँ पर घर बहुत ही छोटे हैं. मेरी दीदी पहली मंजिल पर रहती हैं. उन्होंने हमें देख लिया. हम सीधा ऊपर पहुँच गये. वहाँ गर्मागर्म चाय पी और रात के बचे हुए परांठे खाए.

छोटे-छोटे मकान

नीरज जी सलाम
नाश्ता करके मैं तरोताजा होना चाहता था लेकिन नीरज को पहाडों को जीतने की जल्दी थी. दीदी से रास्ता पूछ कर हम निकल पडे टिप-इन-टॉप के लिये. सीधा रास्ते से जाना तो शायद नीरज के शान के खिलाफ था. वो तो बस पहाडों से सीधा मुकाबला करते हुए चल रहा था. हम भी चुपचाप उसका अनुसरण कर रहे थे. टिप-इन-टॉप के रास्ते में पहले सैंट जोन्स स्कूल और उसके बाद सैंट जोन्स चर्च आया. यहाँ से कुछ ही दूर टिप-इन-टॉप था.



रास्ते की कुछ फोटो

सैंट जोन्स चर्च
टिप-इन-टॉप से नीचे जयहरीखाल दिख रहा था. बहुत ही ज्याद खाई थी. नीरज के पैर उछलने लगे बोला – नरेश जी, चलें नीचे. नहींहींहींहीं……. मैं चीखा. यहाँ हमें एक लोकल व्यक्ति मिला उससे काफी जानकारी और रास्तों के बारे में पता चला.

लैसडौन का स्थायी निवासी

टिप-इन-टॉप
कुछ देर टिप-इन-टॉप में बैठ कर हम निकल पडे संतोषी माता के मंदिर. कुछ दूर पैदल चलने के बाद 65 सीढीयाँ चढ कर संतोषी माता के मंदिर पहुँचा जा सकता है. यहाँ कोई पुजारी नहीं था. लेकिन मंदिर बहुत ही साफ और सुंदर था. यहाँ हम करीब एक घंटा बैठे रही. यहाँ नीरज ने मेरी कुछ तस्वीरें लीं.

संतोषी माता का मंदिर
आगे पढीये भुल्ला ताल, दुर्गा मंदिर व कालेशवर मंदिर की सैर.
