गंगा का उद्गम – 2

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भगवान राम के कुल में एक राजा थे राजा सगर. राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया. राजा इंद्र ने घोड़े को चुरा लिया और कपिल मुनि की गुफा में जाकर बांध दिया। राजा ने अपने साठ हजार बेटों से घोड़े का पता लगाने को भेजा। ढुंढते-ढुंढते वो कपिल मुनि की गुफा में पहुँचे. वहाँ उन्होंने घोडा बंधा देखा. उन्होंने मुनि को पकडना चाहा तो वो सब मुनि कि तेज से राख के ढेर हो गये.

अब आगे पढिये -

साठ हजार राजकुमारों को गये बहुत दिन हो गये। उनकी कोई खबर न मिली। राजा सगर की चिंता बढ़ने लगी। तभी एक दूत ने आकर बताया कि बंगाल से कुछ मछुवे आये हैं, उनसे मैंने अभी-अभी सुना है कि उन्होंने राजकुमारों को एक गुफा में घुसते देखा और वे अभी तक उस गुफा से निकलकर नहीं आये।

सगर सोच में पड़ गये। हो न हो, राजकुमार किसी बड़ी मुसीबत में फंस गये हैं। उनको विपत से उबारने का उपाय करना चाहिए। राजा ने ऊंच-नीच सोची, आगा-पीछा सोचा और अपने पोते अंशुमान को बुलाया।

अंशुमान के आने पर सगर ने उसका माथा चूमकर उसे छाती से लगा लिया और पिर कहा, “बेटा, तुम्हारे साठ हजार चाचा बंगाल में सागर के किनारे एक गुफा में घुसते हुए देखे गये हैं, पर उसमें से निकलते हुए उनको अभी तक किसी ने नहीं देखा है।”

अंशुमान का चेहरा खिल उठा। वह बोला, ” बस! यही समाचार है। यदि आप आज्ञा दें तो मैं जाऊं और पता लगाऊं।”

सगर बोले, “जा, अपने चाचाओं का पता लगा।”

जब अंशुमान जाने लगा तो बूढ़े राजा सगर ने उसे फिर छाती से लगाया, उसका माथा चूमा और आशीष देकर उसे विदा किया।

अंशुमान इधर-उधर नहीं घूमा। उसने पता लगाया और उसी गुफा के दरवाजे पर पहुंचा। गुफा के दरवाजे पर वह ठिठक गया। उसने कुल के देवता सूर्य को प्रणाम किया और गुफा के भीतर पैर रखा। अंधेरे से उजाले में पहुंचा तो अचानक रुककर खड़ा हो गया। उसने जो देखा, वह अदभुत था। दूर-दूर तक राख की ढेरियां फैली हुई थीं। ऐसी कि किसी ने सजाकर फैलद दी हों। इतनी ढेरियां किसने लगाई? क्यों लगाई? वह उन ढेरियों को बचाता आग बढ़ा। थोड़ा ही आगे गया था कि एक गम्भीर आवाज उसे सुनाई दी, “आओ, बेटा अंशुमान, यह घोड़ा बहुत दिनों से तुम्हारी राह देख रहा है।”

अंशुमान चौंका। उसने एक दुबले-पतले ऋषि हैं, जो एक घोड़े के निकट खड़े है। इनको मेरा नाम कैसे मालूम हो गया? यह जरुर बहुत पहुंचे हुए हैं। अंशुमान रुका। उसने धरती पर सिर टेककर ऋषि को नमस्कार किया

आओ बेटा, अंशमान, यह घोड़ा तुम्हारी राह देख रहा है।”

ऋषि बोले, “बेटा अंशुमान, तुम भले कामों में लगो। आओ मैं कपिल मुनि तुमको आशीष देता हूं।”

अंशुमान ने उन महान कपिल को बारंबार प्रणाम किया।

कपिल बोले, “जो होना था, वह हो गया।”

अंशुमान ने हाथ जोड़कर पूछा, “क्या हो गया, ऋषिवर?”

ऋषि ने राख की ढेरियों की ओर इशारा करके कहा, “ये साठ हजार ढेरियां तुम्हारे चाचाओं की हैं, अंशुमान!”

अंशुमान के मुंह से चीख निकल गई। उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बह चली।

ऋषि ने समझाया, “धीरज धरो बेटा, मैंने जब आंखें खोलीं तो तुम्हारी चाचाओं को फूस की तरह जलते पाया। उनका अहंकार उभर आया था। वे समझदारी से दूर हट गये थे। उन्होंने सोच-विचार छोड़ दिया था। वे अधर्म पर थे। अधर्म बुरी चीज है। पता नहीं, कब भड़क पड़े। उनका अधर्म भड़का और वे जल गये। मैं देखता रह गया। कुछ न कर सका।”

अंशुमान ने कहा, “ऋषिवर!”

कपिल बोले, “बेटा, दुखी मत होओ। घोड़े को ले जाओ और अपने बाबा को धीरज बंधाओ। महाप्रतापी राजा सगर से कहना कि आत्मा अमर है। देह के जल जाने से उसका कुछ नहीं बिगड़ता।”

अंशुमान ने कपिल के सामने सिर झुकाया और कहा, “ऋषिवर! मैं आपकी आज्ञा का पालन करुंगा। पर मेरे चाचाओं की मौत आग में जलने से हुई है। यह अकाल मौत है। उनको शांति कैसे मिलेगी?”

कपिल ने कुछ देर सोचा और बोले, “बेटा, शांति का उपाय तो है, पर काम बहुत कठिन है।”

अंशुमान ने सिर झुकाकर कहा, “ऋषिवर! सूर्यवंशी कामों की कठिनता से नहीं डरते।”

कपिल बोले, “गंगाजी धरती पर आयें और उनका जल इन राख की ढेरियों को छुए तो तुम्हारे चाचा तर जायंगे।”

अंशुमान ने पूछा, ” गंगाजी कौन हैं और कहां रहती है?”

कपिल ने बताया, “गंगाजी विष्णु के पैरों के नखों से निकली हैं और ब्रह्मा के कमण्डल में रहती हैं।”

अंशुमान ने पूछा, ” गंगाजी को धरती पर लाने के लिए मुझे क्या करना होगा?”

ऋषि ने कहा, ” तुमको ब्रह्मा की विनती करनी होगी। जब ब्रह्मा तप पर रीझ जायंगे तो प्रसन्न होकर गंगाजी को धरती पर भेज देंगे। उससे तुम्हारे चाचाओं का ही भला नहीं होगा, और भी करोंड़ों आदमी तरह-तरह के लाभ उठा सकेंगे।”

अंशुमान ने हाथ उठाकर वचन दिया कि जबतक गंगाजी को धरती पर नहीं उतार लेंगे, तब तक मेरे वंश के लोग चैन नहीं लेंगे।

कपिल मुनि ने अपना आशीष दिया।

अंशुमान सूरज के वंश के थे। इसी कुल के सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र को छोटे बड़े सब जानते हैं। अंशुमान ने ब्रह्माजी की विनती की। बहुत कड़ा तप किया। तप में अपना शरीर घुला दिया। अपनी जान दे दी, पर ब्रह्माजी प्रसन्न नहीं हुए।

अंशुमान के बेटे हुए राजा दिलीप। दिलीप ने पिता के वचन को अपना वचन समझा। वह भी तप करने में जुट गये। बड़ा भारी तप किया। ऐसा तप किया कि ऋषि और मुनि चकित हो गये। उनके सामने सिर झुका दिया। पर ब्रह्मा उनके तप पर भी नही रीझे।

दिलीप के बेटे थे भगीरथ। भगीरथ के सामने बाबा का वचन था, पिता का तप था। उन्होंने मन को चारों ओर से समेटा और तप में लगा दिया। वह थे और था उनका तप।

सभी देवताओं को खबर लगी। देवों ने सोचा, “गंगाजी हमारी हैं। जब वह उतरकर धरती पर चली जायेंगी तो हमें कौन पूछेगा?”

देवताओं ने सलाह की। ऊंच-नीच सोची और फिर उर्वशी तथा अलका को बुलाया गया। उनसे कहा गया कि जाओ, राजा भगीरथ के पास जाओ और ऐसा यतन करो कि वह अपने तप से डगमगा जाय। अपनी राह से विचलित हो जाय और छोटे-मोटे सुखों के चंगुल में फंस जाय।

अलका और उर्वशी को देखा। उर्वशी ने भगीरथ को देखा। एक सादा सा आदमी अपनी धुन में डूबा हुआ था।

उन दोनों ने अपनी माया फैलाई। भगीरथ के चारों ओर बसंत बनाया। चिड़ियां चहकने लगीं। कलियां चटकने लगी। मंद पवन बहने लगा। लताएं झूमने लगीं। कुंजे मुस्कराने लगीं। दोनों अप्सराएं नाचीं। माया बखेरी। मोहिनी फैलाई और चाहा कि भगीरथ के मन को मोड़ दें। तप को तोड़ दें।

पर वह नहीं हुआ।

जब उर्वशी का लुभावबढ़ा तो भगीरथ के तप का तेज बढ़ा। दोनों हारीं और लौट गई।

उनके लौटते ही ब्रह्मा पसीज गये। वह सामने आये और बोले, “बेटा, वर मांगा! वर मांग!”

क्रमश:

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आभार: विकिसोर्स

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22 responses to “गंगा का उद्गम – 2

  1. मेरठ वाले प्रकाशन की याद हो आई..जासूसी टाईप उपन्यास का टच है आपकी लेखनी मे..बहुत उम्दा…जारी रहो वैसी ही उत्कुंठा बन आई है. :)

  2. बहुत बढ़िया बहुत ही अच्छा प्रयास है आपका आभार !

  3. पिंगबैक: गंगा का उद्गम – 3 « यह भी खूब रही

  4. I appreciate your work
    Thanks for mythological stories

  5. thnx sir,
    really appreciable work
    thnx

    trom:- alok bhatt, jaipur (raj)

  6. PRAYAS JI

    NAMASKAR,

    mujhe hindi ki typing nahi aati atah me is tarah se apane vichar vyakt kar raha hu. asha hai kshama karenge. aapaka prayas YATHA NAAM YATHA GUN hai . hindi ki itni achchhi kathaye prakashit karane ke liye DHANYAVAAD & SAADHUVAAD.

    preshak:-
    ALOK BHATT
    JAIPUR( RAJ.)

  7. very nice story when i read it i just fall in that environment really i thank you for this story

  8. it was fabulous and fantastic story but was having many grammatical errors but then also reading it was a good experience thank you thank you

  9. YOU have not given the full story

  10. ye ganga ki kahani acchi hai muje gaga nadi ka ugam kaise hua ye pata chala hai to sabhiko dhanyawad

  11. Bhut accahae tarike se likha Hai aapne yahan se ped kar meine apne sabhi ghar walo ko ma ganga ke udgam ki katha sunai dhanyevaad pryas g

    DHEERAJ KUMAR SHARMA DELHI

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