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लैंसडौन की सैर – मुसाफिर के साथ भाग – 1

July 6, 2009 · 8 Comments

26 जुलाई शाम को कार्यक्रम तय हो चुका था कि 27 जुलाई को शाम साढे आठ बजे यमुना बैंक स्टेशन पर मुसाफिर जी (नीरज) से मिलना था. फिर वहाँ से पुरानी दिल्ली स्टेशन से मसुरी एक्सप्रैस में सवार होना था.

27 जुलाई को शाम साढे आठ बजे घर से निकला. मैट्रो फीडर बस का करीब दस मिनट इंतजार किया. लेट हो जाने का डर था इसलिये एक ऑटो वाले को रोका. मैं और एक और व्यक्ति जो मेरे साथ ही खडा फीडर बस का इंतजार कर रहा था दोनों ऑटो वाले के ऊपर झपट पडे, उससे पूछा – यमुना बैंक चलोगे क्या? ऑटो वाला मुस्कुराया और बोला – दोनों को लेकर जाऊँगा. हम दोनों मान गये. हालांकि मैं कभी भी शेयरड ऑटो नहीं लेता. ऑटो वाले ने तीस-तीस रूपय दोनों से लिये. पैसे देकर तेजी से यमुना बैंक के प्रवेश द्वार पर खडा होकर नीरज को फोन लगाया. नीरज उस दिन शास्त्री पार्क पर मुस्तैद थे. उन्होंने इंतजार करने को कहा.

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फोटो आभार : दिल्ली मैट्रो

करीब आठ पचास पर नीरज का फोन आया और कहा कि वो फेयर कलैक्शन गेट पर खडे हैं. मैं सिक्योरीटि चैक करवा कर अन्दर गया. नीरज ने अपने ऑफिस के कार्ड से मेरी एन्ट्री करवाई. नीरज को पहचानने में मुझे कोई मुश्किल नहीं आई. छोटे से ऑफिस बैग के साथ बीस साल का एक लडका सामने ही दिख गया था.

हाल-चाल पुछने के बाद, नीरज जानना चाहता था कि मेरे इतने बडे बैग में क्या है. अब मैं ठहरा घर-गृहस्थी वाला. मेरे बैग में तो कपडों से लेकर रात का खाना, पेपर-प्लेट, गिलास, टिश्यू पेपर, कॉपी, पढने के लिये किताब, पैन, कैमरा, फोन का चार्जर, सुबह फारिग होने का सामान और ना जाने क्या-क्या सभी कुछ ही तो था. और नीरज के पास बस छोटा सा ऑफिस बैग.

कुछ ही मिनटों में हम ट्रेन में थे. बातचीत का सिलसिला जब चालू हुआ तो फिर रूकने का नाम ही कहाँ था. एक तो वैसे ही मैं “भारतीय रेल प्रेमी” उस पर बैठे भी हम मैट्रो में थे. मेरे पास सवालों की कमी नहीं थी. लेकिन पहली मुलाकात में मैं मुसाफिर को बोर नहीं करना चाहता था. इसलिये एकदम से ज्यादा प्रश्न नहीं दागे.

राजीव चौक स्टेशन पर मैट्रो बदल कर हम विश्विध्यालय-जहाँगीर पुरी वाली ट्रेन पर सवार हो गये. यहाँ से तीसरा स्टेशन चाँदनी चौक है. पुरानी दिल्ली स्टेशन जाने के लिये यहीं उतरना पडता है. वैसे यह स्टेशन है तो चाँदनी चौक फौव्वारे के पास है लेकिन इसका एक द्वार पुरानी दिल्ली स्टेशन के अंदर ही निकलता है. स्टेशन पर अनगिनित लोग थे. कुली, ठेले वाले, पार्किंग, पुलिस, भिखारी, फोकटिया, जेबकतरे, यात्री, मैं और नीरज सब अपनी-अपनी धुन में अपने गतंव्य तक पहुँचाने के लिये बेचेन दिख रहे थे.

बाहर डिस्पले बोर्ड पर मसुरी एक्सप्रैस का विवरण दिख रहा था. गाडी सात नम्बर प्लेटफार्म पर आनी थी. करीब सवा नौ बजे हम दोनों प्ल्टेफार्म नम्बर सात की शोभा बढा रहे थे. मसुरी एकस्प्रैस का प्रस्थान समय रात्री: 10:20 का था. मुसाफिर जी ने कुछ खाने की इच्छा जताई. मैंने उन्हें बताया कि वैसे तो मैं आपके लिये भी घर से खाना लाया हूँ. लेकिन फिर भी स्टेशन की आलू-पूरी तो खानी ही पडेगी. उसके बिना यात्रा करने का मजा अधुरा ही रहेगा. घर का खाना गाडी चलने के बाद खाएंगे. पूरी वाले से पहले एक प्लेट पूरीयाँ लीं. और उसी में दोनों ने खाया. जब ठीक लगीं तो उसके बाद फिर एक प्लेट ली और उसे भी निपटाया. आलू-छोले की सब्जी और आठ छोटी-छोटी सी पूरीयां थीं वो. खा पीकर हम दोनों गाडी में सवार हो गये और लगे बतियाने.

गाडी करीब 10:25 पर निकल पडी. गाडी में कुछ डेली-पैसेंजर भी चढ चुके थे जिन्हें गाजियाबद उतरना था. गाडी चलते ही टी.टी साहब आ गये. राम बाबू और नीरज का नाम लेते ही मैं सतर्क हो गया. मैंने टी.टी. की तरफ नहीं देखा. नीरज ने टिकिट चैक करवा लिया. ट्रेन करीब सवा ग्यारह बजे गालियाबाद पहुँची. सभी लोकल सवारीयाँ उतर गईं. गाजियाबद से ट्रेन के निकलते ही बर्थें खोल दी गयीं. हमारी एक बीच की व एक ऊपर की बर्थ थी. मैं तो चुपचाप ऊपर जम गया और नीरज ने बीच की बर्थ पर मोर्चा संभाल लिया.

नीरज ने बैग से खेस निकाला, बर्थ पर बिछाया और लैसडाऊन के सपने लेने लगे. मेरे पास चादर नहीं थी. वैसे मैं ट्रेन में नहीं सोता ब्लकि सबके सोने का इंतजार करता हूँ. और रात को गेट के पास बैठ जाता हूँ (लेकिन गेट पर नहीं जैसा की बहुत से लोग पैर लटका कर बैठते हैं). रात को बहुत से स्टेशन आये पिलखुआ, हापुड, गजरौला, चाँदसियाऊ, बिजनौर और फिर नजीबाबाद जिसका मैं बहुत बेसब्री से इंतजार कर रहा था. करीब सवा चार बजे ट्रेन नजीबाबाद पहुँची. यहाँ से मसूरी एक्सप्रैस दो भागों में बंट जाती है. एक जाती है देहरादून और दूसरी जाती है कोटद्वार.

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नजीबाबाद में चाय वाला है. देखो कितना अंधेरा है.
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नजीबाबाद की कुल्लहड की चाय का आन्नद केवल मैंने लिया नीरज सो रहा था.

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नजीबाबाद में ही सुबह हो गयी. वोही चाय वाला है ये.

पुरे रास्ते नीरज ने आँख नहीं खोली… सोता रहा बस घोडे बेच कर. नजीबाबाद से निकलते-निकलते साढे पाँच से ऊपर हो गये थे. गाडी निकलते ही मैंने सोचा थोडा कमर सीधी कर ली जाये. बस ऊपर बर्थ पर लेटा ही था कि नीरज जी उठ गये और अपने नम्बर बनाते हुए बोले चलो भई आ गया कोटद्वार. मैं झट से उठ गया और करीब साढे छै बजे हम कोटद्वार पहुँच गये.

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कोटद्वार स्टेशन

अगली पोस्ट में जारी

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