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Entries from May 2009

असीमित पुण्य

May 29, 2009 · 2 Comments

एक बार गुजरात की एक रियासत की राजमाता मीलण देवी ने भगवान सोमनाथ जी का विधिवत् अभिषेक किया। उन्होंने सोने का तुलादान कर उसे सोमनाथ जी को अर्पित कर दिया। सोने का तुलादान कर उनके मन में अहंकार भर गया और वह सोचने लगीं कि आज तक किसी ने भी इस तरह भगवान का तुलादान नहीं किया होगा। इसके बाद वह अपने महल में आ गईं। रात में उन्हें भगवान सोमनाथ के दर्शन हुए। भगवान ने उनसे कहा, ‘मेरे मंदिर में एक गरीब महिला दर्शन के लिए आई है। उसके संचित पुण्य असीमित हैं। उनमें से कुछ पुण्य तुम उसे सोने की मुद्राएं देकर खरीद लो। परलोक में काम आएंगे।’

नींद टूटते ही राजमाता बेचैन हो गईं। उन्होंने अपने कर्मचारियों को मंदिर से उस महिला को राजभवन लाने के लिए कहा। कर्मचारी मंदिर पहुंचे और वहां से उस महिला को पकड़ कर ले आए। इन्हें भी पढ़ें

गरीब महिला थर-थर कांप रही थी। राजमाता ने उस गरीब महिला से कहा, ‘मुझे अपने संचित पुण्य दे दो, बदले में मैं तुम्हें सोने की मुद्रएं दूंगी।’ राजमाता की बात सुनकर वह महिला बोली, ‘महारानी जी, मुझ गरीब से भला पुण्य कार्य कैसे हो सकते हैं। मैं तो खुद दर-दर भीख मांगती हूं। भीख में मिले चने चबाते-चबाते मैं तीर्थयात्रा को निकली थी।

कल मंदिर में दर्शन करने से पहले एक मुट्ठी सत्तू मुझे किसी ने दिए थे। उसमें से आधे सत्तू से मैंने भगवान सोमेश्वर को भोग लगाया तथा बाकी सत्तू एक भूखे भिखारी को खिला दिया। जब मैं भगवान को ठीक ढंग से प्रसाद ही नहीं चढ़ा पाई तो मुझे पुण्य कहां से मिलेगा?’ गरीब महिला की बात सुनकर राजमाता का अहंकार नष्ट हो गया। वह समझ गईं कि नि:स्वार्थ समर्पण की भावना से प्रसन्न होकर ही भगवान सोमेश्वर ने उस महिला को असीमित पुण्य प्रदान किए हैं। इसके बाद राजमाता ने अहंकार त्याग दिया और मानव सेवा को ही अपना सवोर्परि धर्म बना लिया ।

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

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अंतिम कसक

May 28, 2009 · 1 Comment

बात तब की है, जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। बंगाल के न्यायाधीश नीलमाधव बैनर्जी अपनी न्यायप्रियता, सत्यनिष्ठा व दयालुता के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। अपने जीवन काल में उन्होंने अपने इन्हीं गुणों के कारण बेहद सम्मान व प्रसिद्धि पाई। वृद्धावस्था में उन्हें प्राण घातक रोग ने जकड़ लिया तथा उनका शरीर बेहद कमजोर हो गया।

बीमारी के कारण उनके शरीर में असहनीय पीड़ा होने लगी। वे बार-बार ईश्वर से प्रार्थना करते और कहते, ‘हे ईश्वर, अब मुझसे यह पीड़ा सही नहीं जाती। मुझे इस रोगग्रस्त शरीर से मुक्ति देकर अपने पास बुला लो।’ लेकिन इस तरह मृत्यु को बुलाने से वह थोड़े ही आती है, उन्हें पीड़ा भुगतनी पड़ रही थी।

एक दिन वह सोचने लगे कि मुझसे जरूर कुछ न कुछ गलती हुई है, जिसकी मुझे पीड़ा के रूप में सजा भुगतनी पड़ रही है। बहुत सोचने पर उन्हें याद आया कि एक बार बीमा कराते समय उन्होंने अपनी मधुमेह की बीमारी को बेहद सफाई से छिपाकर बीमा करा लिया था। यह याद आते ही उन्हें अपने शरीर में होने वाली पीड़ा का कारण समझ में आ गया और उन्होंने तभी बीमा अधिकारी को बुलाया और उससे बोले, ‘भैया, मैंने जब आपसे बीमा कराया था, उस समय मैं मधुमेह से ग्रस्त था। किंतु उस समय मैंने यह बात आपको नहीं बताई थी। इसलिए मेरा यह बीमा रद्द कर दिया जाए। मेरे मरने के बाद कोई भी इस बीमा राशि का अधिकारी नहीं होगा। मैंने न्यायाधीश के रूप में हमेशा सत्य का आचरण किया, किंतु व्यक्तिगत जीवन में मैं उस पर टिके रहने से लोभवश चूक गया। इसी कारण आज यह कष्ट भोग रहा हूं।’ उनके कहने पर बीमा अधिकारी ने उनका बीमा रद्द कर दिया। बीमा रद्द होने के बाद उनके चेहरे पर संतोष व शांति की झलक दिखाई दी। इसके बाद उसी रात उन्होंने प्राण त्याग दिए।

प्रस्तुति : रेनू सैनी
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

भक्त का अहंकार | परोपकार की भावना | यह भी खूब रही – प्रयास | सिद्धियों का सदुपयोग

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ब्लौग से 50,000 बनाए!!!

May 20, 2009 · 10 Comments

आज मेरा ब्लौग पढने वालों की संख्या 50,000 पार कर गयी है.

मेरे ब्लौग पर आने वालों तथा सभी ब्लौगर बंधुओं ने जिस प्रकार मेरा उत्साह बढाया उसके लिये आप सभी का हार्दिक धन्यवाद.

इस ब्लौग पर मैंने बहुत सी हास्य कवीतायें, शिक्षाप्रद कहानीयां व मेरी अपनी रचनाएं हैं.

मेरी सबसे ज्यादा पढी जाने वाली पोस्ट:

क्या वाकई भगवान हमें देख रहा है
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वेद प्रकाश जी की एक “डबल हास्य” कविता
1,988 views

बीरबल का जन्म
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देह अमर नहीं

May 15, 2009 · 4 Comments

एक राजा को फूलों का शौक था। उसने सुंदर, सुगंधित फूलों के पचीस गमले अपने शयनखंड के प्रांगण में रखवा रखे थे। उनकी देखभाल के लिए एक नौकर रखा गया था। एक दिन नौकर से एक गमला टूट गया। राजा को पता चला तो वह आगबबूला हो गया। उसने आदेश दिया कि दो महीने के बाद नौकर को फांसी दे दी जाए। मंत्री ने राजा को बहुत समझाया, लेकिन राजा ने एक न मानी। फिर राजा ने नगर में घोषणा करवा दी कि जो कोई टूटे हुए गमले की मरम्मत करके उसे ज्यों का त्यों बना देगा, उसे मुंहमांगा पुरस्कार दिया जाएगा। कई लोग अपना भाग्य आजमाने के लिए आए लेकिन असफल रहे।

एक दिन एक महात्मा नगर में पधारे। उनके कान तक भी गमले वाली बात पहुंची। वह राजदरबार में गए और बोले, ‘राजन् तेरे टूटे गमले को जोड़ने की जिम्मेदारी मैं लेता हूं। लेकिन मैं तुम्हें समझाना चाहता हूं कि यह देह अमर नहीं तो मिट्टी के गमले कैसे अमर रह सकते हैं। ये तो फूटेंगे, गलेंगे, मिटेंगे। पौधा भी सूखेगा।’ लेकिन राजा अपनी बात पर अडिग रहा।

आखिर राजा उन्हें वहां ले गया जहां गमले रखे हुए थे। महात्मा ने एक डंडा उठाया और एक-एक करके प्रहार करते हुए सभी गमले तोड़ दिए। थोड़ी देर तक तो राजा चकित होकर देखता रहा। उसे लगा यह गमले जोड़ने का कोई नया विज्ञान होगा। लेकिन महात्मा को उसी तरह खड़ा देख उसने आश्चर्य से पूछा, ‘ये आपने क्या किया?’ महात्मा बोले, ‘मैंने चौबीस आदमियों की जान बचाई है। एक गमला टूटने से एक को फांसी लग रही है। चौबीस गमले भी किसी न किसी के हाथ से ऐसे ही टूटेंगे तो उन चौबीसों को भी फांसी लगेगी। सो मैंने गमले तोड़कर उन लोगों की जान बचाई है।’ राजा महात्मा की बात समझ गया। उसने हाथ जोड़कर उनसे क्षमा मांगी और नौकर की फांसी का हुक्म वापस ले लिया।

संकलन : विजय कुमार सिंह
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

| प्रयास | मेहनत रंग लाई. मेरा फोटो MODEL मैग्ज़ीन के कवर पर छपा |

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क्या आप मराठी जानते हैं?

May 11, 2009 · 8 Comments

शनिवार को गाडी में गैस डलवा रहा था. 10-12 गाडीयाँ मेरे आगे लगी थीं. तभी सडक के पास कुछ लोगों पर नजर पडी. उनमें 3-4 औरतें, कुछ बच्चे और दो युवक थे. दोनों युवक यहाँ-वहाँ कुछ शायद कुछ ढुँढ रहे थे. तभी एक युवक की नजरें मुझसे टकराईं तो वो तुरंत मेरे पास आ गया और बोला, “क्या आप मराठी जानते हैं”. मैंने उत्सुकता में झट से हाँ कह दिया. बस उसने कॉल सेंटर वालों की तरह रटी-रटाई मराठी स्क्रिप्ट सुना दी. मैं बोला यार हिंदी में बोलो क्या बात है. तो उसने वही बात हिंदी में दोहरा दी.

भाई साहब, मैं महाराष्ट्र से काम की तलाश में दिल्ली आया था. यहाँ मेरा भाई ठेकेदारी का काम करता है. पिछले दो महीने से मैं अपने भाई के पास ही काम करता था. लेकिन उसने मुझे पैसे नहीं दिये. इसलिये मैं वापिस गाँव जा रहा हूँ. मेरे साथ मेरी माँ, पत्नि, दो बच्चे और छोट भाई है. हमारे पास जाने के लिये पैसे थोडे कम पड गये हैं. क्या आप दो सौ रूपय की मदद कर सकते हो? हमने कल से खाना भी नहीं खाया.

मैं एक गहरी उलझन में फंस गया था. एक मन कह रहा था कि दे दे यार सौ-दो सौ रूपय में क्या फर्क पडता है और दूसरी तरफ लग रहा था कहीं मुझे ठगने की कोशिश तो नहीं की जा रही. इसी सोच में कुछ मिनिट निकल गये. तभी मेरे पीछे वाली गाडी के हार्न मारने से मेरी सोच टूट गयी. उस लडके की तरफ देखा तो वो गायब था. करीब भागता हुआ मेरे पीछे वाली गाडी के पास खडा होकर गाडी वाले से पूछने लगा, “क्या आप मराठी जानते हैं”…. बस मैं समझ गया कि ये सब ठगने की कोशिश ही है.

उस लडके को शायद मैं पैसे दे देता लेकिन उसके पास इंतजार का समय ही नहीं था. यह कहानी उसकी मजबूरी नहीं ब्लकि ठगी का एक भावनात्मक और सटीक तरीका था. वैसे दिल्ली वालों को ठगना थोडा मुश्किल है लेकिन कोई भी भावनाओं में बह सकता है. कम से कम दो छोटे-छोटे रोते बच्चों को देखकर.

गाडी के टायर बदलवाने थे तो गैस भरवाकर धीरे-धीरे नोएडा की तरफ निकल लिया. गाडी पार्क कर ही रहा था कि तभी एक 28-30 साल का व्यक्ति आया और पूछने लगा, “क्या आप मराठी जानते हैं”. मैंने बोला नहीं और हिंदी में बताओ कि तुम्हारा भाई ठेकेदार है, तुम्हें पैसा नहीं दिया, तुम्हें महाराष्ट्र, यू.पी, बिहार कहाँ जाना है??? इतना सुनने की देर थी वो व्यक्ति बिना एक भी शब्द बोले रफूचक्कर हो गया.

अब समझ नहीं आता कि किस पर विश्वास करें और किस पर नहीं.

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हमारा सुन्दर भविष्य भाईचारे में है, न कि आपसी भेदभाव में
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