फूल पत्थर से उगेगा सोचता है आदमी,
पर्वतों पिघलोगे इकदिन, सोचता है आदमी.
चाँद पर तो घुमने हम कई बार आ चुके हैं,
चाँद के आगे है क्या फिर, सोचता है आदमी.
शम्मां के हिस्से में आए परवाने देखो कई हैं,
परवानों के हिस्सों का फिर, सोचता है आदमी.
रास्ता सागर में जब भी चाहूँगा बन जायेगा फिर,
सागरों में घर बनाना, सोचता है आदमी.
देश बाँटे सरहदों में, सरहदें फिर से बँटीं,
सरहदों को फिर घटाना, सोचता है आदमी.
बाढ, सूखा या सुनामी लाख आपदायें क्यों ना,
जीत इक दिन सबको लूंगा, सोचता है आदमी.

6 responses so far ↓
shobha // September 10, 2008 at 2:52 pm |
देश बाँटे सरहदों में, सरहदें फिर से बँटीं,
सरहदों को फिर घटाना, सोचता है आदमी.
बाढ, सूखा या सुनामी लाख आपदायें क्यों ना,
जीत इक दिन सबको लूंगा, सोचता है आदमी.
बहुत सुंदर लिखा है. बधाई .
Subhash Bhatt // September 10, 2008 at 3:03 pm |
देश बाँटे सरहदों में, सरहदें फिर से बँटीं,
सरहदों को फिर घटाना, सोचता है आदमी.
sunder likha hai
Gurpreet // September 10, 2008 at 3:21 pm |
Kavita hai Achhi, Soch hai Sachi,
likhne wala achhi Sangat ka lagta hai Aadmi.
Ise ooper Rakhen (Keep it Up !!!)
tarushree // September 10, 2008 at 3:27 pm |
फूल पत्थर से उगेगा सोचता है आदमी,
पर्वतों पिघलोगे इकदिन, सोचता है आदमी
अच्छी रचना… प्रेरित करने वाली, खूबसूरत।
seema gupta // September 10, 2008 at 3:44 pm |
चाँद पर तो घुमने हम कई बार आ चुके हैं,
चाँद के आगे है क्या फिर, सोचता है आदमी.
” wah, bhut shee kha aapne, aaj kal tyo yhee ho rhai hai, jitna aaj ka inssan janta hai, uske aage ke sochta hai, bhut sunder”
Regards
sameerlal // September 10, 2008 at 11:28 pm |
बहुत उम्दा!!