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भक्त का अहंकार May 17, 2008

Posted by pryas in हितोपदेश.
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एक बार देवर्षि नारद ने भगवान विष्णु से पूछा, भगवान आप का सबसे बड़ा भक्त कौन है। भगवान विष्णु नारद के मन की बात समझ गए। उन्होंने कहां, अमुक गांव का अमुक किसान हमारा सबसे प्रिय भक्त है। भगवान विष्णु का उत्तर सुन कर नारद जी को निराशा हुई। वह बोले, भगवान आप का प्रिय भक्त तो मैं भी हूं फिर सबसे प्रिय क्यों नहीं। भगवान विष्णु ने कहा, तुम उस किसान के यहां जाकर उसकी दिन भर की दिनचर्या देख कर मुझे आकर बताओ फिर मैं बताऊंगा। नारद उस विष्णु भक्त किसान के घर पहुंचे। उन्होंने देखा कि किसान सुबह उठ कर कुछ देर भगवान विष्णु का स्मरण किया फिर रूखी सूखी रोटी खा कर हल बैल लेकर खेत जोतने चला गया। शाम को लौटा तो बैलों को चारा पानी दिया। उसके बाद थोड़ी देर के लिए भगवान का नाम लिया और रात को खाना खाकर सो गया। एक दिन उस किसान के घर रह कर नारद जी भगवान विष्णु के पास आए और उसकी आंखों देखी दिनचर्या के बारे में बताया। अंत में नारद ने कहा, प्रभु उसके पास तो आप का नाम लेने का समय भी नहीं है फिर वह आप का सबसे प्रिय भक्त कैसे बन गया। मैं तो दिन रात आप का नाम जपने के सिवाय कोई काम करता ही नहीं फिर भला वह किसान कैसे आप का सबसे प्रिय भक्त बन गया।

भगवान विष्णु उस बात को टालते हुए नारद को एक लबालब भरा अमृत कलश देते हुए कहा, देवर्षि तुम इस कलश को लेकर त्रैलोक्य की परिक्रमा करो। लेकिन यह ध्यान रखना कि इसकी एक बूंद भी छलकने न पाए। यदि एक बूंद भी नीचे गिरी तो तुम्हारा अब तक का किया गया सारा पुण्य खत्म हो जाएगा।

नारद अमृत कलश लेकर तीनों लोको की यात्रा पर निकल गए और यात्रा पूरी करके वह भगवान विष्णु को कलश देते हुए कहा, प्रभु कलश से एक बूंद भी अमृत नहीं छलकने पाई। भगवान विष्णु ने कहा- नारद, परिक्रमा के दौरान तुमने कितनी बार मेरा नाम स्मरण किया था। नारद ने कहा, प्रभु परिक्रमा के दौरान तो मेरा ध्यान इस कलश पर केंद्रित था इसलिए एक बार भी आप का स्मरण नहीं कर पाया। भगवान विष्णु ने हंस कर कहा, जब तुम परिक्रमा के दौरान एक बार भी अपना ध्यान कलश से हटा कर मेरा स्मरण नहीं कर सके जब कि वह किसान अपने सभी काम करते हुए भी कम से कम दो बार नियमित रूप से मेरा स्मरण करना नहीं भूलता तो वह सबसे बड़ा भक्त हुआ या आप। सबसे प्रिय भक्त हो होता है जो अपना कर्म करते हुए प्रेम से मेरा स्मरण भी करता है। नारद जी को सबसे प्रिय भक्त होने का अहंकार खत्म हो गया।

प्रस्तुति: सुरेश सिंह
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

Comments»

1. Pramendra Pratap Singh - May 17, 2008

अच्‍छा प्रेरक प्रंसग है

2. समीर लाल - May 17, 2008

बहुत प्रेरणादयक. आभार आपका.

3. DR. CHANDRAKUMAR JAIN - May 18, 2008

आपके शीर्षक की तरह
मैं तो कहूँगा -
यह भी खूब रही !
================
मनन योग्य ….. प्रभावी प्रस्तुति.
शुक्रिया
डा.चंद्रकुमार जैन

4. rajesh - May 30, 2008

एक बार देवर्षि नारद ने भगवान विष्णु से पूछा, भगवान आप का सबसे बड़ा भक्त कौन है। भगवान विष्णु नारद के मन की बात समझ गए। उन्होंने कहां, अमुक गांव का अमुक किसान हमारा सबसे प्रिय भक्त है। भगवान विष्णु का उत्तर सुन कर नारद जी को निराशा हुई। वह बोले, भगवान आप का प्रिय भक्त तो मैं भी हूं फिर सबसे प्रिय क्यों नहीं। भगवान विष्णु ने कहा, तुम उस किसान के यहां जाकर उसकी दिन भर की दिनचर्या देख कर मुझे आकर बताओ फिर मैं बताऊंगा। नारद उस विष्णु भक्त किसान के घर पहुंचे। उन्होंने देखा कि किसान सुबह उठ कर कुछ देर भगवान विष्णु का स्मरण किया फिर रूखी सूखी रोटी खा कर हल बैल लेकर खेत जोतने चला गया। शाम को लौटा तो बैलों को चारा पानी दिया। उसके बाद थोड़ी देर के लिए भगवान का नाम लिया और रात को खाना खाकर सो गया। एक दिन उस किसान के घर रह कर नारद जी भगवान विष्णु के पास आए और उसकी आंखों देखी दिनचर्या के बारे में बताया। अंत में नारद ने कहा, प्रभु उसके पास तो आप का नाम लेने का समय भी नहीं है फिर वह आप का सबसे प्रिय भक्त कैसे बन गया। मैं तो दिन रात आप का नाम जपने के सिवाय कोई काम करता ही नहीं फिर भला वह किसान कैसे आप का सबसे प्रिय भक्त बन गया।

भगवान विष्णु उस बात को टालते हुए नारद को एक लबालब भरा अमृत कलश देते हुए कहा, देवर्षि तुम इस कलश को लेकर त्रैलोक्य की परिक्रमा करो। लेकिन यह ध्यान रखना कि इसकी एक बूंद भी छलकने न पाए। यदि एक बूंद भी नीचे गिरी तो तुम्हारा अब तक का किया गया सारा पुण्य खत्म हो जाएगा।

नारद अमृत कलश लेकर तीनों लोको की यात्रा पर निकल गए और यात्रा पूरी करके वह भगवान विष्णु को कलश देते हुए कहा, प्रभु कलश से एक बूंद भी अमृत नहीं छलकने पाई। भगवान विष्णु ने कहा- नारद, परिक्रमा के दौरान तुमने कितनी बार मेरा नाम स्मरण किया था। नारद ने कहा, प्रभु परिक्रमा के दौरान तो मेरा ध्यान इस कलश पर केंद्रित था इसलिए एक बार भी आप का स्मरण नहीं कर पाया। भगवान विष्णु ने हंस कर कहा, जब तुम परिक्रमा के दौरान एक बार भी अपना ध्यान कलश से हटा कर मेरा स्मरण नहीं कर सके जब कि वह किसान अपने सभी काम करते हुए भी कम से कम दो बार नियमित रूप से मेरा स्मरण करना नहीं भूलता तो वह सबसे बड़ा भक्त हुआ या आप। सबसे प्रिय भक्त हो होता है जो अपना कर्म करते हुए प्रेम से मेरा स्मरण भी करता है। नारद जी को सबसे प्रिय भक्त होने का अहंकार खत्म हो गया।

प्रस्तुति: सुरेश सिंह
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

5. mehhekk - June 5, 2008

bahut hi dilchasp kahani thi,har kahani se kuch na kuch sikhane mila,thanks