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सिग्नल पर होता मेकअप April 16, 2008

Posted by pryas in Uncategorized.
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दफ्तर आते हुए ट्रैफिक सिग्नल पर एक अजीब सा नजारा देखा…

एक ३०-३२ वर्ष की गोरी-चिट्टी मोहतरमा अपनी लंबी सी गाडी में बैठी सिग्नल के हरे होने के इंतज़ार कर रही हैं. इंतजार कुछ लंबा है क्यों ना दर्पण से गुफ्तगु की जाये. बस रियर-व्यु मिरर्र में लगी अपना चेहरा निहारने और गाडी बन गयी ब्यूटी पार्लर.

तभी ठक-ठक की आवाज से उनकी एकाग्रता भंग हुई. देखा कोई २५-२८ साल का एक नौजवान, अपने दोनों हाथों और दोनों पैरों की साहयता से एक चौपाये की तरह चल रहा था, भीख माँग रहा था. उन मोहतरमा ने एक नफरत भरी नजर उस पर डाली और फिर लिप्स्टिक निकाल कर अपने होटों की आभा बढाने लगी.

Madam

मैं उनके लाल-गुलाबी चमकते होठों को निहार रहा था तभी मुझे उस भिखारी का ख्याल आया और मैंने उसके होटों की तरफ देखा. उसके सुखे होटों पर ना खत्म होने वाली एक प्यास थी. फिर उस सुंदरी ने आई-लाईनर लगा कर अपनी सुंदर आँखों को और सुंदर बनाया. मैने भिखारी की उनींदी और अलसाई आँखों की तरफ देखा, उनमें कुछ पाने की लालसा अभी भी दम साधे खडी थी. आँखों के बाद गालों का नम्बर आया. धूप से गुलाबी हुए गालों को और गुलाबी किया जा रहा था. भिखारी के पिचके और भीतर धंसे हुए गाल शायद गुलाबी गालों से इर्ष्या कर रहे थे.

इस दौरान कभी-कभी स्वप्न सुंदरी भिखारी की तरफ भी देख लेती थी शायद पूछ रही हो-कैसी लग रही हूँ? हल्की सी मुस्कुराहट के साथ हाथ अब रंग-बिरंगी बिंदी को एड्जैस्ट करने के लिये माथे पर पहुँच चुके थे. और वो भिखारी उसके हाथ भी माथे पर थे पसीना पोंछ रहा था या शायद अपनी तकदीर को एड्जैस्ट कर रहा था…पता नहीं.

तभी सिग्नल हरा हो गया और गाडी फर्राटे से निकल गयी. पता नहीं कितने सिग्नलों पर कितनी बार वह गाडी रुकेगी और कितनी बार वह अपने रूप को सँवारेगी और कितने ही भिखारीयों को उनके वाकई भिखारी होने का एहसास करवायेगी.

उस भीखारी को मैंने बहुत ध्यान से देखा था. उसके चेहरे पर एक सवाल मुँह बाये खडा था. क्यों भगवान, इतना फर्क क्यों किया? तूने अमीर को अमीर बनाया मुझे उससे शिकायत नहीं. किंतु कम-से-कम मेरे हाथ-पैर तो सलामत बना देता.

तभी ड्राईवर की आवाज से तंद्रा टूटी, “क्यों सर मजा आ गया”? मैं फीकी सी हँसी हँस दिया.

चित्र http://www.jupiterimages.com से लिया गया है
यदि किसी को इस पर आपत्ति होगी तो यह चित्र हटा दिया जायेगा.

ईश्वर का प्रमाण April 16, 2008

Posted by pryas in Uncategorized.
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एक दिन एक राजा ने अपने सभासदों से कहा, ‘क्या तुम लोगों में कोई ईश्वर के होने का प्रमाण दे सकता है?’ सभासद सोचने लगे, अंत में एक मंत्री ने कहा, ‘महाराज, मैं कल इस प्रश्न का उत्तर लाने का प्रयास करूंगा।’ सभा समाप्त होने के बाद उत्तर की तलाश में वह मंत्री अपने गुरु के पास जा रहा था। रास्ते में उसे गुरुकुल का एक विद्यार्थी मिला। मंत्री को चिंतित देख उसने पूछा, ‘सब कुशल मंगल तो है? इतनी तेजी से कहां चले जा रहे हैं?’

मंत्री ने कहा, ‘गुरुजी से ईश्वर की उपस्थिति का प्रमाण पूछने जा रहा हूं।’ विद्यार्थी ने कहा, ‘इसके लिए गुरुजी को कष्ट देने की क्या आवश्यकता है ? इसका जवाब तो मैं ही दे दूंगा।’ अगले दिन मंत्री उस विद्यार्थी को लेकर राजसभा में उपस्थित हुआ और बोला, ‘महाराज यह विद्यार्थी आपके प्रश्न का उत्तर देगा।’ विद्यार्थी ने पीने के लिए एक कटोरा दूध मांगा। दूध मिलने पर वह उसमें उंगली डालकर खड़ा हो गया। थोड़ी-थोड़ी देर में वह उंगली निकालकर कुछ देखता, फिर उसे कटोरे में डालकर खड़ा हो जाता। जब काफी देर हो गई तो राजा नाराज होकर बोला, ‘दूध पीते क्यों नहीं? उसमें उंगली डालकर क्या देख रहे हो?’ विद्यार्थी ने कहा, ‘सुना है, दूध में मक्खन होता है, वही खोज रहा हूं।’ राजा ने कहा, ‘क्या इतना भी नहीं जानते कि दूध उबालकर उसे बिलोने से मक्खन मिलता है।’ विद्यार्थी ने मुस्कराकर कहा, ‘हे राजन, इसी तरह संसार में ईश्वर चारों ओर व्याप्त है, लेकिन वह मक्खन की भांति अदृश्य है। उसे तप से प्राप्त किया जाता है।’ राजा ने संतुष्ट होकर पूछा, ‘अच्छा बताओ कि ईश्वर करता क्या है?’

विद्यार्थी ने प्रश्न किया, ‘गुरु बनकर पूछ रहे हैं या शिष्य बनकर?’ राजा ने कहा, ‘शिष्य बनकर।’ विद्यार्थी बोला, ‘यह कौन सा आचरण है ? शिष्य सिंहासन पर है और गुरु जमीन पर।’ राजा ने झट विद्यार्थी को सिंहासन पर बिठा दिया और स्वयं नीचे खड़ा हो गया। तब विद्यार्थी बोला, ‘ईश्वर राजा को रंक और रंक को राजा बनाता है।’

संकलन: चतर सिंह ‘लुप्त’ पारसौली
साभार : नवभारत टाइम्स