एक बेटी के कुछ सवाल… February 11, 2008
Posted by pryas in Uncategorized.Tags: पापा, बेटी, मम्मी, Hindi, hindichittha, naresh, pryas
5 comments
मम्मी, पापा अभी तक क्यों नहीं आये?
मम्मी, पापा का नाश्ता बन गया क्या?
मम्मी, आप पापा से क्यों झगडती हो?
मम्मी, पापा आज मेरे लिये क्या लाये?
मम्मी, पापा सो गये क्या?
मम्मी, पापा मुझे प्यार तो करते हैं ना?
मम्मी,
मम्मी, एक आखरी सवाल…
…पापा कहीं मुझे मार तो नहीं देंगे?
बोलो ना मम्मी…
इतने सारे सवाल करती है,
माँ के पेट से…
… अ-जन्मी बेटी.
और माँ केवल अंतिम सवाल का ही उत्तर दे पाती है,
हाँ… शायद हाँ…
मन की आवाज़ February 8, 2008
Posted by pryas in हितोपदेश.Tags: गठरी, घोड़े, प्रयास, बुढ़िया, मन की आवाज़, हिन्दी चिट्ठा, hindi chittha, naresh, prysa
4 comments
एक बुढ़िया बड़ी सी गठरी लिए चली जा रही थी। चलते-चलते वह थक गई थी। तभी उसने देखा कि एक घुड़सवार चला आ रहा है। उसे देख बुढ़िया ने आवाज दी, ‘अरे बेटा, एक बात तो सुन।’ घुड़सवार रुक गया। उसने पूछा, ‘क्या बात है माई?’ बुढ़िया ने कहा, ‘बेटा, मुझे उस सामने वाले गांव में जाना है। बहुत थक गई हूं। यह गठरी उठाई नहीं जाती। तू भी शायद उधर ही जा रहा है। यह गठरी घोड़े पर रख ले। मुझे चलने में आसानी हो जाएगी।’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘माई तू पैदल है। मैं घोड़े पर हूं। गांव अभी बहुत दूर है। पता नहीं तू कब तक वहां पहुंचेगी। मैं तो थोड़ी ही देर में पहुंच जाऊंगा। वहां पहुंचकर क्या तेरी प्रतीक्षा करता रहूंगा?’ यह कहकर वह चल पड़ा। कुछ ही दूर जाने के बाद उसने अपने आप से कहा, ‘तू भी कितना मूर्ख है। वह वृद्धा है, ठीक से चल भी नहीं सकती। क्या पता उसे ठीक से दिखाई भी देता हो या नहीं। तुझे गठरी दे रही थी। संभव है उस गठरी में कोई कीमती सामान हो। तू उसे लेकर भाग जाता तो कौन पूछता। चल वापस, गठरी ले ले। ‘
वह घूमकर वापस आ गया और बुढ़िया से बोला, ‘माई, ला अपनी गठरी। मैं ले चलता हूं। गांव में रुककर तेरी राह देखूंगा।’ बुढ़िया ने कहा, ‘न बेटा, अब तू जा, मुझे गठरी नहीं देनी।’ घुड़सवार ने कहा, ‘अभी तो तू कह रही थी कि ले चल। अब ले चलने को तैयार हुआ तो गठरी दे नहीं रही। ऐसा क्यों? यह उलटी बात तुझे किसने समझाई है?’
बुढ़िया मुस्कराकर बोली, ‘उसी ने समझाई है जिसने तुझे यह समझाया कि माई की गठरी ले ले। जो तेरे भीतर बैठा है वही मेरे भीतर भी बैठा है। तुझे उसने कहा कि गठरी ले और भाग जा। मुझे उसने समझाया कि गठरी न दे, नहीं तो वह भाग जाएगा। तूने भी अपने मन की आवाज सुनी और मैंने भी सुनी।’
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित
हमारे राज्य में कौए कितने हैं (अकबर-बीरबल) February 5, 2008
Posted by pryas in अकबर-बीरबल.Tags: अकबर, कितने हैं, बीरबल, में कौए, हमारे राज्य
3 comments
एक दिन अकबर अपने मत्रीं बीरबल के साथ अपने महल के बाग में घूम रहे थे. बीरबल बागों में उडते कौओं को देखकर कुछ सोचने लगे और बीरबल से पूछा, “क्यों बीरबल, हमारे राज्य में कितने कौए होंगे”?
बीरबल ने कुछ देर अंगुलियों पर कुछ हिसाब लगाया और बोले,”हुज़ूर, हमारे राज्य में कुल मिलाकर 95, 463 कौए हैं”. तुम इतना विश्वास से कैसे कह सकते हो? हुज़ूर, “आप खुद गिन लिजीये, बीरबल बोले”. अकबर को कुछ इसी प्रकार के जवाब का अंदेशा था. उन्होंने ने पूछा,”बीरबल, यदि इससे कम हुए तो”? तो इसका मतलब है कि कुछ कौए अपने रिश्तेदारों से मिलने दूसरे राज्यों में गये हैं. और यदि ज्यादा हुए तो? तो इसका मतलब यह हैं हु़जूर कि कुछ कौए अपने रिश्तेदारों से मिलने हमारे राज्य में आये हैं बीरबल ने मुस्कुरा कर जवाब दिया.
अकबर एक बार फिर मुस्कुरा कर रह गये.










