शिमला पहुँच गये… मेरी शिमला यात्रा - २ January 26, 2008
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सुबह करीब ग्यारह बजे समर हिल स्टेशन पर टॉय-ट्रेन रूकी. यह स्टेशन बाकी स्टेशनों से थोडा सा बडा है. मुझे लगा शायद शिमला आ गया. मैंने अपने गैंग को कहा चलो आ गया शिमला. हम अपना लगेज ले कर उतर गये. मुझे शक हुआ. मैंने सुभाष को कहा शायद यह शिमला नहीं है. शिमला में तो कुली पीछे पड जाते हैं. ध्यान से देखा तो एक जगह समर हिल लिखा हुआ था. हम वापस ट्रेन में भागे. कुछ और लोग भी हमें देख कर ऊतर गये थे. वो भी भाग कर ट्रेन पर चढ गये और हमें घूर-घूर कर देख रहे थे. कुछ ही देर बाद हम शिमला पहुँच गये. शिमला पहुँचते ही बजरी वाली बर्फ (बिना बरसात के छोटे-छोटे ओले) गिरने लगी. दिल बल्लियों उछल रहा था.
ट्रेन से उतरते ही कुली पीछे पड गये. मैंने सब को पहले ही इनसे दूर रहने के लिये कह रखा था. अब हमारा पहला काम था होटल ढूँढना. मेरे एक मित्र ने कहा था कि होटल ड्रीमलैंड में ट्राई कर लेना. लेकिन वह होटल बहुत हाईट पर था. हमने एक ढाबा में नाश्ता किया और मैं और सुभाष नाश्ता करके होटल ढुँढने चल दिये. बस जैसे ही रिज पर पहुँचे और पलट कर देखा तो हमारे सुभाष जी एक कुली से बात कर रहे थे. बस मेरे माथा ठनका मैंने सुभाष पर चिखना शुरू कर दिया कि वह कुली से क्यों बात कर रहा है. उस कुली ने करीब हमारा ढाई घँटा खराब किया. इस बीच मेरा सुभाष से झगडा हो गया. वह न सिर्फ होटल बल्कि टैक्सी के बारे में भी कुली से बात कर रहा था. शिमला के कुली ऐसे चेप होते हैं की शायद कोई आत्महत्या करने पर भी मजबूर हो सकता है. मेरी आप लोगों से एक प्रार्थना है यदि आप शिमला जायें तो कुली से बिल्कुल साहयता ना माँगें और यदि वह आपको परेशान करे तो आप उसकी शिकायत टुरीस्ट केन्द्र में करदें.
बडी मुश्किल से कुली से पीछा छुडा कर हमने एक होटल ढुँढा. होटल डिप्लोमैट. उसने हमें फैमली रूम १००० रूपय में ऑफर किया. मैंने ऑफसीज़न डिसकाउन्ट पूछा तो वह बोला, “डिसकाउन्ट नहीं मिल सकता हमें कुली को कमिशन भी तो देना है”. मेरा माथा ठनका, मैंने देखा रिसैप्शन के साईड में वही कुली खडा मुस्कुरा रहा था. मैंने माथा पकड लिया, ये यहाँ कहाँ से आ गया?. मैंने होटल वाले को कहा कि हम इसके साथ नहीं हैं और यदि कोई डिसकाउन्ट है तो ठीक नहीं तो हम कहीं और ट्राई करेंगे. बात 750/- में तय हुई. चार लोगों के लिये एक दिन के लिये 750/- बहुत ही अच्छा रेट था.
करीब तीन बज चुके थे. हम सीधे रूम में घुसे और चार चाय और नाश्ते का आर्डर दिया. रूम बहुत ही बढीया था. पूरे शिमला का नजार वहाँ से दिख रहा था.
हमारे अलावा होटल में केवल एक फैमली और थी. जल्दी ही चाय और नाश्ता आ चुका था. ठँड इतनी अधिक थी की सुभाष जी तो बीमार पड गये और उन पर दो रजाईयाँ और एक कंबल डाला. तीन चार उबले अँडे और २ कॉफी पीने के बाद वे थोडा नार्मल हुये. उनकी ये हालत देखकर मैं, रमेश और महेन्द्र एक दूसरे की शक्ल देख रहे थे. इससे पहले की कोई कुछ कहता MacDowell की रम की बोतल खुल चुकी थी. दो-दो पैग मारने के बाद खाने का आर्डर किया.
गर्मागर्म दाल-मक्खनी, कढाई-पनीर और तंदूरी रोटी खाने के बाद जान में जान आयी. होटल में अँडे की भुजीया बडी स्वादिष्ट थी. उसमें कसूरी मेथी डाली थी.
शाम के करीब 7 बजे हमने बाहर निकलने का प्रोगाम बनाया. हम चारों अपने होटल के पूल क्लब में पूल खेलेने चल दिये.
महेन्द्र और सुभाष को पूल खेलेने का ज्यादा शौक चढ रखा था. हम पूल क्लब पहुँचे तो वहाँ महेन्द्र ने किसी के साथ के साथ बैटिंग लगा ली. मैं और रमेश वहाँ से रिज की तरफ खिसक लिये.
रिज पर हमने गर्म चिकन सूप (१० रूपय) और पॉप कार्न (१० रूपय) खाए. करीब दस बजे वापस होटल आकर हमने बटर-चिकन आर्डर किया. महेन्द्र आठसौ रूपय हार कर आया था, बोला, “भैया खाना-वाना बाद में पहले पैग बनाओ”. सुभाष तो पीते नहीं हैं, हम तीनों ने 2-3 पैग पीये और चिकन खा कर बिस्तर पकड लिया.
सुभाष, रमेश और महेन्द्र बिस्तर पर लेट गये और मैं अकेले फ्लोर बैड सो गया. रात को पता नहीं क्यों और कितने बजे महेन्द्र मेरे साथ रजाई में घुस गया. सुबह शेर के दहाडने की आवाज से मेरी नींद खुल गयी. चारों तरफ ध्यान से देखा तो शेर नहीं वह रमेश था और बडे ही भयानक तरीके से खर्राटे ले रहा था. उसे लात मारकर उठाया. और वेटर को चार चाय का आर्डर किया.
शेष अगले भाग में…
मेरी शिमला यात्रा - भाग - 1 January 26, 2008
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आज ठंड ज्यादा थी. शिमला के बारे में सोच कर और ज्यादा ठंड लग रही थी. मैं आज छुट्टी पर था और सुभाष, महेन्द्र और रमेश को मैंने शाम आठ बजे अपने घर आने के लिये कहा था. लेकिन वो तीनों करीब पौने नौ बजे आये. मैंने उन्हें झूठ बोला था कि हमारी ट्रेन साढे नौ बजे की है वरना वो और लेट आते. फटाफट हमेशा की तरह झगडा करके एक ऑटो किया. रास्ते से कढाई-पनीर और छह नान पैक करवा लिये. करीब पौने दस बजे ऑटो वाले ने हमें पुरानी दिल्ली के मैट्रो वाली तरफ उतार दिया. मैं देख कर हैरान था कि वहाँ कोई पुलिस वाल नहीं था. हमारे सामान की कोई तलाशी नहीं ली गयी. हम चार नम्बर प्लेटफार्म पर पहुँचे और ट्रेन का इंतज़ार करने लगे. भूख लग रही थी लेकिन खाना हमने ट्रेन में ही खाना था. वहाँ पूरी वाले से पूरीयाँ खा ही रहे थे कि तभी उदघोषणा हुई की हावडा-कालका ट्रेने डेढ घंटे लेट है और प्लेटफार्म न. 6 पर आयेगी. महेन्द्र बोल पडा भैया शिमला में बर्फ पिघल तो नहीं जायेगी और हम सभी हँस पडे.
करीब रात ग्यारह बजे ट्रेन पर आ गयी और हम अपनी-अपनी बर्थों पर जम गये. हमारे पास २ लोअर, १ साईड और १ साईड अपर बर्थ थी. हमारे साथ बाकी बची चार बर्थों पर दो कपल थे और उन्होंने अपनी-अपनी पत्नीयों को बिना पूछे हमारी लोअर बर्थ पर सुला दिया. पन्द्र्ह मिनट बाद ट्रेन ने दो सीटियाँ मारी और पटरी पर दौडने लगी. मैं लोअर साईड बर्थ पर स्टेशन को पीछे छूटते हुए देख रहा था. स्टेशन पर लोग, लगेज, कैंटिन, चेन-ताले वाले, स्टेशन मास्टर का रूम, स्टेशन पर बने पुल के नीचे सोए हुए भिखारी, रात के अँधेर में प्लास्टिक की बोतल बीनते हुए छोटे-छोटे बच्चे सब पीछे छूट रहे थे. सब कुछ आँखों से ओझल होते देखना अच्छा लग रहा था. लेकिन वे सब छूट कहाँ रहे थे वो तो अपनी ही जगह थे हमेशा की तरह.
मोबाईल में समय देखा बारह बज रहे थे. तभी रमेश की आवाज कानों में पडी, “भैया बाहर ही देखते रहोगे क्या चलो खाना खायें”. खाना ठँडा हो चुका था लेकिन भूख बहुत लग रही थी. ऐसे में कुछ भी मिल जाये बहुत स्वादिष्ट लगता है.
हमारे कोच में हिमाचल यूनीवर्सटी की लडकियाँ भी थीं जो हम चारों की बातों मे आनन्द ले रही थीं. करीब एक घँटे बाद हम सब सो चुके थे.
हमारी ट्रेन सुबह साढे पाँच बजे कालका स्टेशन पर पहुँच गयी. कालका स्टेशन पर ब्रौड गेज़ और नैरो गैज़ दोनों मिलते हैं.
वहीं से टॉय-ट्रेन की रिजर्वेशन थी लेकिन विडँबना देखीये की 1, 2, 3 और 4 वेटिंग होने के बावजूद हमारी सीट कनफर्म नहीं हुई. जैसे-तैसे हमने चार सीटों पर कब्जा किया और जबतक उन सीटों का मालिक ना जाये उन पर बैठने का आनन्द लेना चाहा. लेकिन हमारी किस्मत अच्छी थी कि उन चारों सीटों पर कोई नहीं आया.
ट्रेने निकल चुकी थी. सोलन-धर्मपुर-डिगशोई-बारोग स्टेशनों से होते हुए टॉय ट्रेन निकल चली अपने पाँच घँटों के शिमला के सफर पर.
मेरे साथ एक सज्जन अपने परिवार के साथ बैठे थे. बातों-बातों में मुझसे पुछने लगे,”कब तक पहुँचेंगे शिमला”? मैने कहा ग्यारह बजे तक. तो महाशय कहते हैं,”हाँ-हाँ मुझे पता है कई बार आया हूँ”. मैं उनकी शक्ल देखने लगा. अच्छा वहाँ बर्फ मिलेगी क्या, वह बोले? मैंने कहा पता नहीं लेकिन कुफरी में तो मिलेगी. तो वह बोले हाँ-हाँ पता है कई बार आया हूँ. मैं समझ गया वह टाईम पास कर रहे हैं. तो मैंने उनसे पूछा ,”भाई साहब शिमला की राजधानी क्या है”? वह उछल पडे और बोले अरे नहीं…नहीं शिमला तो खुद हिमाचल की राजधानी है. मैंने हँसते हुआ कहा हाँ-हाँ पता है कई बार आया हूँ. साहब की शक्ल देखने लायक थी.
ये थे वो सज्जन
शेष अगले भाग में…




























