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बेटी होने का सुख या दुख - अनु सपन की एक गज़ल January 20, 2008

Posted by pryas in Uncategorized.
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मेरे घर में चहकती रही बेटीयाँ, शहर भर को खटकती रही बेटीयाँ
मेरे घर में चहकती रही बेटीयाँ, शहर भर को खटकती रही बेटीयाँ

ओढ कर स्वपन सारा शहर सो गया,
ओढ कर स्वपन सारा शहर सो गया,
राह पापा की तकती रही बेटीयाँ.

छोड माँ-बाप-बेटा-बहू चल दिये,
छोड माँ-बाप-बेटा-बहू चल दिये,
खुशबू बन के महकती रही बेटीयाँ.

मेरे घर में चहकती रही बेटीयाँ, शहर भर को खटकती रही बेटीयाँ

अब की तनख्वहा पे ये चीज़ लाना हमें,
अब की तनख्वहा पे ये चीज़ लाना हमें,
कहते-कहते झिझकती रही बेटीयाँ.

मेरे घर में चहकती रही बेटीयाँ, शहर भर को खटकती रही बेटीयाँ

इस जमाने ने शर्मो-हया बेच दी,
इस जमाने ने शर्मो-हया बेच दी,
राह चलते सहमती रही बेटीयाँ.

मेरे घर में चहकती रही बेटीयाँ, शहर भर को खटकती रही बेटीयाँ

Comments»

1. mehhekk - January 20, 2008

sahi hai beti hone ka sukh bhi hai,bahut pyar milta hai,kuch dard bhi par guman hai ki hum beti hai.

2. ganesh - February 17, 2008

jindgi ka anmol khazana hai beti es kalyug me jisko beti nahi wo aaj ka badkismat hai