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ढाई आखर प्रेम का भेद न जाने कोय January 28, 2008

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कृष्ण गोकुल से मथुरा आ गए। उनको मथुरा में कुछ भी अच्छा नहीं लगता। वहां मथुरा में उद्धव भगवान कृष्ण के मित्र थे। बड़े भारी विद्वान चिंतक। पर अपने ज्ञान का अभिमान भी उतना ही था। कृष्ण ने उद्धव को कहा-

उधो ब्रज मोहि बिसरत नाहीं

लेकिन उद्धव को यह पीड़ा कहाँ समझ में आने वाली थी। वे तो ज्ञान-ध्यान की बातें करते थे। कृष्ण को माया-मोह को भुलाने की बात कहते थे।

कृष्ण ने उद्धव को अपना संदेशवाहक बनाकर मथुरा भेज दिया और एक पत्र भी ग्वाल बाल के नाम लिख भेजा। उधर उद्धव कृष्ण के सन्देशवाहक बनकर ब्रज पहुंचे और इधर ब्रज में कोहराम मच गया। जिसने जहां भी सुना वहीं अपना कामकाज छोड़कर उद्धव को मिलने पहुंच गया। यशोदानंदन के मित्र को सबने घेर लिया। उधो जी कृष्ण का क्या संदेश लाए हैं?

क्या लाए थे, उद्धव जी तो अपने ज्ञान की पोटली लेकर आए थे। कृष्ण का दिया हुआ तो बस एक पत्र ही था, सो हाथ का लिखा हुआ वह रुक्का बढ़ा दिया। सोचा, पढ़ लें, स्थिर चित्त हो जाएँ, तब समझाऊंगा इन्हें जीवन का तत्व भेद।

सो पत्र उनको दे दिया। लेकिन यह क्या, जिसके हाथ में पत्र आया, उसी के आँसुओं से वह भीगने लगा, कागज गल गया, स्याही फैल गई, पढ़ने को तो कुछ बचा ही नहीं। इसके बाद छीना-झपटी मच गई, जरा हम भी देखें, हम भी पढ़ें उनका संदेश। पत्र के टुकड़े-टुकड़े हो गया। छीना-झपटी में जिसके हाथ जितना छोटा टुकड़ा आया, उसी फटे हुए टुकड़े को वह लेकर रोने लगा। अपने माथे से लगाने लगा, छाती से लगाने लगा। कृष्ण की स्मृति में खो गया। पत्र पढ़ने की तो जरूरत ही नहीं रही।

सभी गोपी-ग्वाल बालकृष्ण की याद में रोते-सिसकते और आँसू बहाते रहे। उद्धव उनके प्रेमाश्रुओं की बहती हुई गंगा की धारा को पार नहीं कर सके। प्रेम भक्ति के इस हृदयस्पर्शी मार्मिक दृश्य में किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े रहे। बिलखते हुए गोपियों ने कहा- उधो, अँखियाँ हरिदर्शन की प्यासी।

उद्धव ने उन्हें आत्मतत्व का महत्व समझाया, ज्ञान-ध्यान का रस पिलाया किन्तु कौन सुनता है। किसी को इसमें कोई स्वाद नहीं आया। नीरस ज्ञान किसी के मन को नहीं भाया। फिर उन सब को भगवान की व्यापकता का परिचय दिया। योग का मूल सूत्र बताया। किन्तु गोपियाँ तो उस कृष्ण की याद में आँसू बहाती रहीं, जो उनके साथ खेलता था। कहा,

उधो! मन नाहीं दस-बीस, एकहुतो सो गयो श्याम संग, को आराधो ईश

महाराज, यह मन 10-20 तो हैं नहीं। हमारे पास हमारा एक ही मन था और वह कृष्ण के संग चला गया। तुम्हारे ज्ञान की बातें सुनने के लिए अब हमारे पास हमारा मन नहीं है।

गोपियों और ग्वाल बाल के प्रेम के सामने उद्धव निरुत्तर हो गए। ज्ञान की पोटली खुल कर बिखर गई, मूल्यहीन हो गई। उन्हें मथुरा वापस लौटना पड़ा। प्रेम का सम्बन्ध तर्क-वितर्क से नहीं होता, उसका सम्बन्ध तो हृदय से होता है।

प्रेम के रहस्य को कोई भी नहीं जान पाया। मीरा कृष्ण के प्रेम में व्याकुल होकर एक बार कहती हैं- मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई, जाको सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई। फिर अगले ही पल कहती थी, जो मैं ऐसा जानती प्रेम करे दुख होय। नगर ढिंढोरा पीटती, प्रेम करो मत कोय।

प्रेम शब्द का बड़ा व्यापक अर्थ है। यह प्रभु का ही अनन्त रूप है। यह निष्काम, नि:स्वार्थ, पावन पवित्र शब्द है। यह भगवान की महिमा का व्यापक रूप है। जिसने भी इस प्रेम शब्द को जान लिया-पहचान लिया, वह भगवानमय बन जाता है। जब भक्तगण भगवान को याद करते हैं, उनका मनन-चिन्तन-स्मरण करते हैं, भावविभोर होकर गुणगान करते हैं, भगवान के लिए करुण क्रंदन करते हैं, तो भगवान का हृदय भी उनकी भाव भक्ति से दवित हो जाता है। और भगवान भी अपने भक्तों को याद करते हैं। भक्ति भाव भी उसी प्रेम का एक रूप है।

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

शिमला पहुँच गये… मेरी शिमला यात्रा - २ January 26, 2008

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सुबह करीब ग्यारह बजे समर हिल स्टेशन पर टॉय-ट्रेन रूकी. यह स्टेशन बाकी स्टेशनों से थोडा सा बडा है. मुझे लगा शायद शिमला आ गया. मैंने अपने गैंग को कहा चलो आ गया शिमला. हम अपना लगेज ले कर उतर गये. मुझे शक हुआ. मैंने सुभाष को कहा शायद यह शिमला नहीं है. शिमला में तो कुली पीछे पड जाते हैं. ध्यान से देखा तो एक जगह समर हिल लिखा हुआ था. हम वापस ट्रेन में भागे. कुछ और लोग भी हमें देख कर ऊतर गये थे. वो भी भाग कर ट्रेन पर चढ गये और हमें घूर-घूर कर देख रहे थे. कुछ ही देर बाद हम शिमला पहुँच गये. शिमला पहुँचते ही बजरी वाली बर्फ (बिना बरसात के छोटे-छोटे ओले) गिरने लगी. दिल बल्लियों उछल रहा था.

ट्रेन से उतरते ही कुली पीछे पड गये. मैंने सब को पहले ही इनसे दूर रहने के लिये कह रखा था. अब हमारा पहला काम था होटल ढूँढना. मेरे एक मित्र ने कहा था कि होटल ड्रीमलैंड में ट्राई कर लेना. लेकिन वह होटल बहुत हाईट पर था. हमने एक ढाबा में नाश्ता किया और मैं और सुभाष नाश्ता करके होटल ढुँढने चल दिये. बस जैसे ही रिज पर पहुँचे और पलट कर देखा तो हमारे सुभाष जी एक कुली से बात कर रहे थे. बस मेरे माथा ठनका मैंने सुभाष पर चिखना शुरू कर दिया कि वह कुली से क्यों बात कर रहा है. उस कुली ने करीब हमारा ढाई घँटा खराब किया. इस बीच मेरा सुभाष से झगडा हो गया. वह न सिर्फ होटल बल्कि टैक्सी के बारे में भी कुली से बात कर रहा था. शिमला के कुली ऐसे चेप होते हैं की शायद कोई आत्महत्या करने पर भी मजबूर हो सकता है. मेरी आप लोगों से एक प्रार्थना है यदि आप शिमला जायें तो कुली से बिल्कुल साहयता ना माँगें और यदि वह आपको परेशान करे तो आप उसकी शिकायत टुरीस्ट केन्द्र में करदें.

बडी मुश्किल से कुली से पीछा छुडा कर हमने एक होटल ढुँढा. होटल डिप्लोमैट. उसने हमें फैमली रूम १००० रूपय में ऑफर किया. मैंने ऑफसीज़न डिसकाउन्ट पूछा तो वह बोला, “डिसकाउन्ट नहीं मिल सकता हमें कुली को कमिशन भी तो देना है”. मेरा माथा ठनका, मैंने देखा रिसैप्शन के साईड में वही कुली खडा मुस्कुरा रहा था. मैंने माथा पकड लिया, ये यहाँ कहाँ से आ गया?. मैंने होटल वाले को कहा कि हम इसके साथ नहीं हैं और यदि कोई डिसकाउन्ट है तो ठीक नहीं तो हम कहीं और ट्राई करेंगे. बात 750/- में तय हुई. चार लोगों के लिये एक दिन के लिये 750/- बहुत ही अच्छा रेट था.

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करीब तीन बज चुके थे. हम सीधे रूम में घुसे और चार चाय और नाश्ते का आर्डर दिया. रूम बहुत ही बढीया था. पूरे शिमला का नजार वहाँ से दिख रहा था.

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हमारे अलावा होटल में केवल एक फैमली और थी. जल्दी ही चाय और नाश्ता आ चुका था. ठँड इतनी अधिक थी की सुभाष जी तो बीमार पड गये और उन पर दो रजाईयाँ और एक कंबल डाला. तीन चार उबले अँडे और २ कॉफी पीने के बाद वे थोडा नार्मल हुये. उनकी ये हालत देखकर मैं, रमेश और महेन्द्र एक दूसरे की शक्ल देख रहे थे. इससे पहले की कोई कुछ कहता MacDowell की रम की बोतल खुल चुकी थी. दो-दो पैग मारने के बाद खाने का आर्डर किया.

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गर्मागर्म दाल-मक्खनी, कढाई-पनीर और तंदूरी रोटी खाने के बाद जान में जान आयी. होटल में अँडे की भुजीया बडी स्वादिष्ट थी. उसमें कसूरी मेथी डाली थी.

शाम के करीब 7 बजे हमने बाहर निकलने का प्रोगाम बनाया. हम चारों अपने होटल के पूल क्लब में पूल खेलेने चल दिये.

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महेन्द्र और सुभाष को पूल खेलेने का ज्यादा शौक चढ रखा था. हम पूल क्लब पहुँचे तो वहाँ महेन्द्र ने किसी के साथ के साथ बैटिंग लगा ली. मैं और रमेश वहाँ से रिज की तरफ खिसक लिये.

रिज पर हमने गर्म चिकन सूप (१० रूपय) और पॉप कार्न (१० रूपय) खाए. करीब दस बजे वापस होटल आकर हमने बटर-चिकन आर्डर किया. महेन्द्र आठसौ रूपय हार कर आया था, बोला, “भैया खाना-वाना बाद में पहले पैग बनाओ”. सुभाष तो पीते नहीं हैं, हम तीनों ने 2-3 पैग पीये और चिकन खा कर बिस्तर पकड लिया.

सुभाष, रमेश और महेन्द्र बिस्तर पर लेट गये और मैं अकेले फ्लोर बैड सो गया. रात को पता नहीं क्यों और कितने बजे महेन्द्र मेरे साथ रजाई में घुस गया. सुबह शेर के दहाडने की आवाज से मेरी नींद खुल गयी. चारों तरफ ध्यान से देखा तो शेर नहीं वह रमेश था और बडे ही भयानक तरीके से खर्राटे ले रहा था. उसे लात मारकर उठाया. और वेटर को चार चाय का आर्डर किया.

शेष अगले भाग में…

मेरी शिमला यात्रा - भाग - 1 January 26, 2008

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आज ठंड ज्यादा थी. शिमला के बारे में सोच कर और ज्यादा ठंड लग रही थी. मैं आज छुट्टी पर था और सुभाष, महेन्द्र और रमेश को मैंने शाम आठ बजे अपने घर आने के लिये कहा था. लेकिन वो तीनों करीब पौने नौ बजे आये. मैंने उन्हें झूठ बोला था कि हमारी ट्रेन साढे नौ बजे की है वरना वो और लेट आते. फटाफट हमेशा की तरह झगडा करके एक ऑटो किया. रास्ते से कढाई-पनीर और छह नान पैक करवा लिये. करीब पौने दस बजे ऑटो वाले ने हमें पुरानी दिल्ली के मैट्रो वाली तरफ उतार दिया. मैं देख कर हैरान था कि वहाँ कोई पुलिस वाल नहीं था. हमारे सामान की कोई तलाशी नहीं ली गयी. हम चार नम्बर प्लेटफार्म पर पहुँचे और ट्रेन का इंतज़ार करने लगे. भूख लग रही थी लेकिन खाना हमने ट्रेन में ही खाना था. वहाँ पूरी वाले से पूरीयाँ खा ही रहे थे कि तभी उदघोषणा हुई की हावडा-कालका ट्रेने डेढ घंटे लेट है और प्लेटफार्म न. 6 पर आयेगी. महेन्द्र बोल पडा भैया शिमला में बर्फ पिघल तो नहीं जायेगी और हम सभी हँस पडे.

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करीब रात ग्यारह बजे ट्रेन पर आ गयी और हम अपनी-अपनी बर्थों पर जम गये. हमारे पास २ लोअर, १ साईड और १ साईड अपर बर्थ थी. हमारे साथ बाकी बची चार बर्थों पर दो कपल थे और उन्होंने अपनी-अपनी पत्नीयों को बिना पूछे हमारी लोअर बर्थ पर सुला दिया. पन्द्र्ह मिनट बाद ट्रेन ने दो सीटियाँ मारी और पटरी पर दौडने लगी. मैं लोअर साईड बर्थ पर स्टेशन को पीछे छूटते हुए देख रहा था. स्टेशन पर लोग, लगेज, कैंटिन, चेन-ताले वाले, स्टेशन मास्टर का रूम, स्टेशन पर बने पुल के नीचे सोए हुए भिखारी, रात के अँधेर में प्लास्टिक की बोतल बीनते हुए छोटे-छोटे बच्चे सब पीछे छूट रहे थे. सब कुछ आँखों से ओझल होते देखना अच्छा लग रहा था. लेकिन वे सब छूट कहाँ रहे थे वो तो अपनी ही जगह थे हमेशा की तरह.

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मोबाईल में समय देखा बारह बज रहे थे. तभी रमेश की आवाज कानों में पडी, “भैया बाहर ही देखते रहोगे क्या चलो खाना खायें”. खाना ठँडा हो चुका था लेकिन भूख बहुत लग रही थी. ऐसे में कुछ भी मिल जाये बहुत स्वादिष्ट लगता है.

हमारे कोच में हिमाचल यूनीवर्सटी की लडकियाँ भी थीं जो हम चारों की बातों मे आनन्द ले रही थीं. करीब एक घँटे बाद हम सब सो चुके थे.

हमारी ट्रेन सुबह साढे पाँच बजे कालका स्टेशन पर पहुँच गयी. कालका स्टेशन पर ब्रौड गेज़ और नैरो गैज़ दोनों मिलते हैं.

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वहीं से टॉय-ट्रेन की रिजर्वेशन थी लेकिन विडँबना देखीये की 1, 2, 3 और 4 वेटिंग होने के बावजूद हमारी सीट कनफर्म नहीं हुई. जैसे-तैसे हमने चार सीटों पर कब्जा किया और जबतक उन सीटों का मालिक ना जाये उन पर बैठने का आनन्द लेना चाहा. लेकिन हमारी किस्मत अच्छी थी कि उन चारों सीटों पर कोई नहीं आया.

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ट्रेने निकल चुकी थी. सोलन-धर्मपुर-डिगशोई-बारोग स्टेशनों से होते हुए टॉय ट्रेन निकल चली अपने पाँच घँटों के शिमला के सफर पर.

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मेरे साथ एक सज्जन अपने परिवार के साथ बैठे थे. बातों-बातों में मुझसे पुछने लगे,”कब तक पहुँचेंगे शिमला”? मैने कहा ग्यारह बजे तक. तो महाशय कहते हैं,”हाँ-हाँ मुझे पता है कई बार आया हूँ”. मैं उनकी शक्ल देखने लगा. अच्छा वहाँ बर्फ मिलेगी क्या, वह बोले? मैंने कहा पता नहीं लेकिन कुफरी में तो मिलेगी. तो वह बोले हाँ-हाँ पता है कई बार आया हूँ. मैं समझ गया वह टाईम पास कर रहे हैं. तो मैंने उनसे पूछा ,”भाई साहब शिमला की राजधानी क्या है”? वह उछल पडे और बोले अरे नहीं…नहीं शिमला तो खुद हिमाचल की राजधानी है. मैंने हँसते हुआ कहा हाँ-हाँ पता है कई बार आया हूँ. साहब की शक्ल देखने लायक थी.

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ये थे वो सज्जन
शेष अगले भाग में…

शिमला-यात्रा की बडी सी पोस्ट का इंतज़ार किजीये January 20, 2008

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माँ संवेदना है तो पिता क्या है? ओम व्यास जी की कविता January 20, 2008

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Om Vyas Ji

पिता…पिता जीवन है, सम्बल है, शक्ति है,
पिता…पिता सृष्टी मे निर्माण की अभिव्यक्ती है,
पिता अँगुली पकडे बच्चे का सहारा है,
पिता कभी कुछ खट्टा कभी खारा है,
पिता…पिता पालन है, पोषण है, परिवार का अनुशासन है,
पिता…पिता धौंस से चलना वाला प्रेम का प्रशासन है,
पिता…पिता रोटी है, कपडा है, मकान है,
पिता…पिता छोटे से परिंदे का बडा आसमान है,
पिता…पिता अप्रदर्शित-अनंत प्यार है,
पिता है तो बच्चों को इंतज़ार है,
पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं,
पिता है तो बाज़ार के सब खिलौने अपने हैं,
पिता से परिवार में प्रतिपल राग है,
पिता से ही माँ की बिंदी और सुहाग है,
पिता परमात्मा की जगत के प्रति आसक्ती है,
पिता गृहस्थ आश्रम में उच्च स्थिती की भक्ती है,
पिता अपनी इच्छाओं का हनन और परिवार की पूर्ती है,
पिता…पिता रक्त निगले हुए संस्कारों की मूर्ती है,
पिता…पिता एक जीवन को जीवन का दान है,
पिता…पिता दुनिया दिखाने का एहसान है,
पिता…पिता सुरक्षा है, अगर सिर पर हाथ है,
पिता नहीं तो बचपन अनाथ है,
पिता नहीं तो बचपन अनाथ है,
तो पिता से बडा तुम अपना नाम करो,
पिता का अपमान नहीं उनपर अभिमान करो,
क्योंकि माँ-बाप की कमी को कोई बाँट नहीं सकता,
और ईश्वर भी इनके आशिषों को काट नहीं सकता,
विश्व में किसी भी देवता का स्थान दूजा है,
माँ-बाप की सेवा ही सबसे बडी पूजा है,
विश्व में किसी भी तिर्थ की यात्रा व्यर्थ हैं,
यदि बेटे के होते माँ-बाप असमर्थ हैं,
वो खुशनसीब हैं माँ-बाप जिनके साथ होते हैं,
क्योंकि माँ-बाप के आशिषों के हाथ हज़ारों हाथ होते हैं
क्योंकि माँ-बाप के आशिषों के हाथ हज़ारों हाथ होते हैं

माँ संवेदना है - ओम व्यास जी की कविता January 20, 2008

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Om Vyas Ji

माँ…माँ संवेदना है, भावना है अहसास है
माँ…माँ-माँ संवेदना है, भावना है अहसास है
माँ…माँ जीवन के फूलों में खुशबू का वास है,
माँ…माँ रोते हुए बच्चे का खुशनुमा पलना है,
माँ…माँ मरूथल में नदी या मीठा सा झरना है,
माँ…माँ लोरी है, गीत है, प्यारी सी थाप है,
माँ…माँ पूजा की थाली है, मंत्रों का जाप है,
माँ…माँ आँखों का सिसकता हुआ किनारा है,
माँ…माँ गालों पर पप्पी है, ममता की धारा है,
माँ…माँ झुलसते दिलों में कोयल की बोली है,
माँ…माँ मेहँदी है, कुमकुम है, सिंदूर है, रोली है,
माँ…माँ कलम है, दवात है, स्याही है,
माँ…माँ परामत्मा की स्वयँ एक गवाही है,
माँ…माँ त्याग है, तपस्या है, सेवा है,
माँ…माँ फूँक से ठँडा किया हुआ कलेवा है,
माँ…माँ अनुष्ठान है, साधना है, जीवन का हवन है,
माँ…माँ जिंदगी के मोहल्ले में आत्मा का भवन है,
माँ…माँ चूडी वाले हाथों के मजबूत कधों का नाम है,
माँ…माँ काशी है, काबा है और चारों धाम है,
माँ…माँ चिंता है, याद है, हिचकी है,
माँ…माँ बच्चे की चोट पर सिसकी है,
माँ…माँ चुल्हा-धुंआ-रोटी और हाथों का छाला है,
माँ…माँ ज़िंदगी की कडवाहट में अमृत का प्याला है,
माँ…माँ पृथ्वी है, जगत है, धूरी है,
माँ बिना इस सृष्टी की कलप्ना अधूरी है,
तो माँ की ये कथा अनादि है,
ये अध्याय नही है…
…और माँ का जीवन में कोई पर्याय नहीं है,
और माँ का जीवन में कोई पर्याय नहीं है,
तो माँ का महत्व दुनिया में कम हो नहीं सकता,
और माँ जैसा दुनिया में कुछ हो नहीं सकता,
और माँ जैसा दुनिया में कुछ हो नहीं सकता,
तो मैं कला की ये पंक्तियाँ माँ के नाम करता हूँ,
और दुनिया की सभी माताओं को प्रणाम करता हूँ.

बेटी होने का सुख या दुख - अनु सपन की एक गज़ल January 20, 2008

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मेरे घर में चहकती रही बेटीयाँ, शहर भर को खटकती रही बेटीयाँ
मेरे घर में चहकती रही बेटीयाँ, शहर भर को खटकती रही बेटीयाँ

ओढ कर स्वपन सारा शहर सो गया,
ओढ कर स्वपन सारा शहर सो गया,
राह पापा की तकती रही बेटीयाँ.

छोड माँ-बाप-बेटा-बहू चल दिये,
छोड माँ-बाप-बेटा-बहू चल दिये,
खुशबू बन के महकती रही बेटीयाँ.

मेरे घर में चहकती रही बेटीयाँ, शहर भर को खटकती रही बेटीयाँ

अब की तनख्वहा पे ये चीज़ लाना हमें,
अब की तनख्वहा पे ये चीज़ लाना हमें,
कहते-कहते झिझकती रही बेटीयाँ.

मेरे घर में चहकती रही बेटीयाँ, शहर भर को खटकती रही बेटीयाँ

इस जमाने ने शर्मो-हया बेच दी,
इस जमाने ने शर्मो-हया बेच दी,
राह चलते सहमती रही बेटीयाँ.

मेरे घर में चहकती रही बेटीयाँ, शहर भर को खटकती रही बेटीयाँ

विचार की पवित्रता January 17, 2008

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एक राजा और नगर सेठ में गहरी मित्रता थी। वे रोज एक दूसरे से मिले बिना नहीं रह पाते थे। नगर सेठ चंदन की लकड़ी का व्यापार करता था। एक दिन उसके मुनीम ने बताया कि लकड़ी की बिक्री कम हो गई है। तत्काल सेठ के मन में यह विचार कौंधा कि अगर राजा की मृत्यु हो जाए, तो मंत्रिगण चंदन की लकडि़यां उसी से खरीदेंगे। उसे कुछ तो मुनाफा होगा। शाम को सेठ हमेशा की तरह राजा से मिलने गया। उसे देख राजा ने सोचा कि इस नगर सेठ ने उससे दोस्ती करके न जाने कितनी दौलत जमा कर ली है, ऐसा कोई नियम बनाना होगा जिससे इसका सारा धन राज खजाने में जमा हो जाए।

दोनों इसी तरह मिलते रहे, लेकिन पहले वाली गर्मजोशी नहीं रही। एक दिन नगर सेठ ने पूछ ही लिया, ‘पिछले कुछ दिनों से हमारे रिश्तों में एक ठंडापन आ गया है। ऐसा क्यों?’ राजा ने कहा, ‘मुझे भी ऐसा लग रहा है। चलो, नगर के बाहर जो महात्मा रहते हैं, उनसे इसका हल पूछा जाए।’ उन्होंने महात्मा को सब कुछ बताया। महात्मा ने कहा, ‘सीधी सी बात है। आप दोनों पहले शुद्ध भाव से मिलते रहे होंगे, पर अब संभवत: एक दूसरे के प्रति आप लोगों के मन में कुछ बुरे विचार आ गए हैं इसलिए मित्रता में पहले जैसा सुख नहीं रह गया।’

नगर सेठ और राजा ने अपने-अपने मन की बातें कह सुनाईं। महात्मा ने सेठ से कहा,’ तुमने ऐसा क्यों नहीं सोचा कि राजा के मन में चंदन की लकड़ी का आलीशान महल बनवाने की बात आ जाए? इससे तुम्हारा चंदन भी बिक जाता। विचार की पवित्रता से ही संबंधों में मिठास आती है। तुमने राजा के लिए गलत सोचा इसलिए राजा के मन में भी तुम्हारे लिए अनुचित विचार आया। गलत सोच ने दोनों के बीच दूरी बढ़ा दी। अब तुम दोनों प्रायश्चित करके अपना मन शुद्ध कर लो, तो पहले जैसा सुख फिर से मिलने लगेगा।’

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

ब्लाइंड शिष्या का ब्लाइंड अध्यापक ने ब्लात्कार किया??? January 17, 2008

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तिमारपुर के संत नगर में नेत्रहीन लड़कियों के स्कूल में एक टीचर ने हॉस्टल में रहने वाली 20 साल की स्टूडेंट के साथ बलात्कार किया। आरोपी टीचर राजेंद्र प्रसाद गुप्ता (3 8) भी दृष्टिहीन हैं।

हमारे इस सभ्य समाज में जब भी हमारी माँओं, बहनों का ब्लातकार होता है तो टीवी में, पत्र-पत्रिकाओं में अनेकों-अनेक लेख, साक्षात्कार व बहस होती है और इसमें अधिकतर महिलाओं को उनके भडकाऊ और बदन दिखाऊ कपडों के लिये दोषी ठहराया जाता है.

लेकिन यदि एक ब्लाइंड अध्यापक अपनी ब्लाइंड शिष्या का ब्लात्कार करे तो क्या???

तो मतलब साफ है कि छोटी स्कर्ट, जींस, ट्राउज़र, बदन दिखाऊ कपडे, गोरा बदन इन सब शब्दों का इस्तेमाल हम मर्द लोग अपनी बेशर्मी छुपाने के लिये ही तो करते हैं.

इकत्तीसवीं पुतली - कौशल्या January 17, 2008

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इकत्तीसवीं पुतली जिसका नाम कौशल्या था, ने अपनी कथा इस प्रकार कही- राजा विक्रमादित्य वृद्ध हो गए थे तथा अपने योगबल से उन्होंने यह भी जान लिया कि उनका अन्त अब काफी निकट है। वे राज-काज और धर्म कार्य दोनों में अपने को लगाए रखते थे। उन्होंने वन में भी साधना के लिए एक आवास बना रखा था। एक दिन उसी आवास में एक रात उन्हें अलौकिक प्रकाश कहीं दूर से आता मालूम पड़ा। उन्होंने गौर से देखा तो पता चला कि सारा प्रकाश सामने वाली पहाड़ियों से आ रहा है। इस प्रकाश के बीच उन्हें एक दमकता हुआ सुन्दर भवन दिखाई पड़ा। उनके मन में भवन देखने की जिज्ञासा हुई और उन्होंने काली द्वारा प्रदत्त दोनों बेतालों का स्मरण किया। उनके आदेश पर बेताल उन्हें पहाड़ी पर ले आए और उनसे बोले कि वे इसके आगे नहीं जा सकते। कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि उस भवन के चारों ओर एक योगी ने तंत्र का घेरा डाल रखा है तथा उस भवन में उसका निवास है। उन घेरों के भीतर वही प्रवेश कर सकता है जिसका पुण्य उस योगी से अधिक हो।

विक्रम ने सच जानकर भवन की ओर कदम बढ़ा दिया । वे देखना चाहते थे कि उनका पुण्य उस योगी से अधिक है या नहीं। चलते-चलते वे भवन के प्रवेश द्वार तक आ गए। एकाएक कहीं से चलकर एक अग्नि पिण्ड आया और उनके पास स्थिर हो गया। उसी समय भीतर से किसी का आज्ञाभरा स्वर सुनाई पड़ा। वह अग्निपिण्ड सरककर पीछे चला गया और प्रवेश द्वार साफ़ हो गया। विक्रम अन्दर घुसे तो वही आवाज़ उनसे उनका परिचय पूछने लगी। उसने कहा कि सब कुछ साफ़-साफ़ बताया जाए नहीं तो वह आने वाले को श्राप से भस्म कर देगा।

विक्रम तब तक कक्ष में पहुँच चुके थे और उन्होंने देखा कि योगी उठ खड़ा हुआ। उन्होंने जब उसे बताया कि वे विक्रमादित्य हैं तो योगी ने अपने को भाग्यशाली बताया। उसने कहा कि विक्रमादित्य के दर्शन होंगे यह आशा उसे नहीं थी। योगी ने उनका खूब आदर-सत्कार किया तथा विक्रम से कुछ माँगने को बोला। राजा विक्रमादित्य ने उससे तमाम सुविधाओं सहित वह भवन माँग लिया।

विक्रम को वह भवन सौंपकर योगी उसी वन में कहीं चला गया। चलते-चलते वह काफी दूर पहुँचा तो उसकी भेंट अपने गुरु से हुई। उसके गुरु ने उससे इस तरह भटकने का कारण जानना चाहा तो वह बोला कि भवन उसने राजा विक्रमादित्य को दान कर दिया है। उसके गुरु को हँसी आ गई। उसने कहा कि इस पृथ्वी के सर्वश्रेष्ठ दानवीर को वह क्या दान करेगा और उसने उसे विक्रमादित्य के पास जाकर ब्राह्मण रुप में अपना भवन फिर से माँग लेने को कहा। वह वेश बदलकर उस कुटिया में विक्रम से मिला जिसमें वे साधना करते थे। उसने रहने की जगह की याचना की। विक्रम ने उससे अपनी इच्छित जगह माँगने को कहा तो उसने वह भवन माँगा। विक्रम ने मुस्कुराकर कहा कि वह भवन ज्यों का त्यों छोड़कर वे उसी समय आ गए थे। उन्होंने बस उसकी परीक्षा लेने के लिए उससे वह भवन लिया था।

इस कथा के बाद इकत्तीसवीं पुतली ने अपनी कथा खत्म नहीं की। वह बोली- राजा विक्रमादित्य भले ही देवताओं से बढ़कर गुण वाले थे और इन्द्रासन के अधिकारी माने जाते थे, वे थे तो मानव ही। मृत्युलोक में जन्म लिया था, इसलिए एक दिन उन्होंने इहलीला त्याग दी। उनके मरते ही सर्वत्र हाहाकार मच गया। उनकी प्रजा शोकाकुल होकर रोने लगी। जब उनकी चिता सजी तो उनकी सभी रानियाँ उस चिता पर सती होने को चढ़ गईं। उनकी चिता पर देवताओं ने फूलों की वर्षा की।

उनके बाद उनके सबसे बड़े पुत्र को राजा घोषित किया गया। उसका धूमधाम से तिलक हुआ। मगर वह उनके सिंहासन पर नहीं बैठ सका। उसको पता नहीं चला कि पिता के सिंहासन पर वह क्यों नहीं बैठ सकता है। वह उलझन में पड़ा था कि एक दिन स्वप्न में विक्रम खुद आए। उन्होंने पुत्र को उस सिंहासन पर बैठने के लिए पहले देवत्व प्राप्त करने को कहा। उन्होंने उसे कहा कि जिस दिन वह अपने पुण्य-प्रताप तथा यश से उस सिंहासन पर बैठने लायक होगा तो वे खुद उसे स्वप्न में आकर बता देंगे। मगर विक्रम उसके सपने में नहीं आए तो उसे नहीं सूझा कि सिंहासन का किया क्या जाए। पंडितों और विद्वानों के परामर्श पर वह एक दिन पिता का स्मरण करके सोया तो विक्रम सपने में आए। सपने में उन्होंने उससे उस सिंहासन को ज़मीन में गड़वा देने के लिए कहा तथा उसे उज्जैन छोड़कर अम्बावती में अपनी नई राजधानी बनाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि जब भी पृथ्वी पर सर्वगुण सम्पन्न कोई राजा कालान्तर में पैदा होगा, यह सिंहासन खुद-ब-खुद उसके अधिकार में चला जाएगा।

पिता के स्वप्न वाले आदेश को मानकर उसने सुबह में मजदूरों को बुलवाकर एक खूब गहरा गड्ढा खुदवाया तथा उस सिंहासन को उसमें दबवा दिया। वह खुद अम्बावती को नई राजधानी बनवाकर शासन करने लगा।

सौजन्य : इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र