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क्रोध का कलंक December 18, 2007

Posted by pryas in हितोपदेश.
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विश्वामित्र अत्यंत क्रोधी स्वभाव के थे। उन्हें इस बात का दुख सताता रहता था कि ऋषि वशिष्ठ उन्हें ब्रह्मार्षि नहीं मानते। एक दिन उन्होंने सोचा, ‘आज मैं वशिष्ठ को मारकर ही रहूंगा। तब फिर कोई मुझे ब्रह्मार्षि की जगह राजर्षि कहने वाला नहीं रहेगा।’ वह एक तलवार लेकर उस वृक्ष पर जा बैठे जिसके नीचे महर्षि वशिष्ठ अपने शिष्यों को पढ़ाते थे। थोड़ी देर के बाद वशिष्ठ अपने शिष्यों के साथ उस वृक्ष के नीचे आ बैठे। पूर्णिमा का चांद निकल आया। विश्वामित्र ने सोचा कि छात्रों के जाते ही वह वशिष्ठ को मार डालेंगे। तभी एक छात्र बोल उठा, ‘कितना सलोना चांद है। कितनी सुंदरता है उसके भीतर।’ वशिष्ठ बोले, ‘यदि तुम ऋषि विश्वामित्र को देखो तो इस चांद को भूल जाओगे। यह चांद सुंदर अवश्य है, पर ऋषि विश्वामित्र इससे भी ज्यादा सुंदर हैं। यदि उनके भीतर क्रोध न हो तो वह सूर्य की भांति चमक उठें।’

छात्र बोला, ‘गुरुदेव ऐसा आप कह रहे हैं, पर वह तो आपके शत्रु हैं। सदैव आपकी निंदा करते रहते हैं।’ वशिष्ठ ने कहा, ‘जानता हूं, मगर मैं इन बातों पर ध्यान नहीं देता। सच तो यह है कि वह मुझसे ज्यादा विद्वान हैं। उन्होंने मुझसे ज्यादा तप किया है। तुम्हें नहीं मालूम मैं उनका कितना सम्मान करता हूं।’

पेड़ पर बैठे विश्वामित्र यह सुनकर हैरान रह गए। वह पश्चाताप से भर उठे। वह वशिष्ठ को मारना चाहते थे पर वशिष्ठ तो उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे। वह उसी समय पेड़ से कूदे। उन्होंने तलवार फेंकी और वशिष्ठ के चरणों में गिरकर बोले, ‘मुझे क्षमा करें ऋषिवर।’ वशिष्ठ ने उन्हें उठाते हुए कहा, ‘उठिए ब्रह्मार्षि।’ विश्वामित्र ने आश्चर्य से कहा, ‘ब्रह्मार्षि! आपने मुझे ब्रह्मार्षि कहा? पर आप तो मुझे ब्रह्मार्षि का दर्जा देते नहीं। आप तो सदैव मुझे राजर्षि कहते हैं।’ वशिष्ठ ने कहा, ‘आज से आप ब्रह्मार्षि हुए। आप ने अपने क्रोध पर विजय पा ली है। आप में एकमात्र दोष यही था, अब उसे भी आपने दूर कर लिया।’ यह कहकर वशिष्ठ ने विश्वामित्र को गले लगा लिया।

नवभारत टाईम्स में प्रकाशित

Comments»

1. mehhekk - December 18, 2007

beautiful story,realy person who wins over anger wins the hearts.

2. balkishan - December 18, 2007

अच्छा प्रेरक प्रसंग है.
लेकिन एक संशय है कि राजर्षि तो स्वयं वशिष्ठ थे ( दशरथ के दरबार मे). और विश्वामित्र तो किसी राज कि शरण मे थे नही.
कृपया स्पष्ट करें.

3. pryas - December 18, 2007

बालकिशन जी,
आपकी शंका बिल्कुल सही है. मैंने अपनी अल्प बुद्धी के अनुसार उसका समाधान करने की कोशिश की है.

विश्वामित्र वैदिक काल के विख्यात ऋषि थे। ऋषि विश्वामित्र बड़े ही प्रतापी और तेजस्वी महापुरुष थे। ऋषि धर्म ग्रहण करने के पूर्व वे बड़े पराक्रमी और प्रजावत्सल नरेश थे। विश्वामित्र ने गायत्री मन्त्र की रचना की।

ज्यादा जानकारी के लिये यहाँ पढें

4. ज्ञानदत पाण्डेय - December 18, 2007

अत्युत्तम प्रसंग लिखा आपने।