मृत्यु का भय November 19, 2007
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एक-
एक व्यक्ति चाहकर भी अपने दुर्गुणों पर काबू नहीं कर पा रहा था. एक बार उसके गाँव में संत फरीद आये. उसने उनसे अपनी परेशानी बतायी. फरीद ने कहा, ‘द्ढ सकंल्प से ही दुर्गुण छूटते हैं. यदि तुम इच्छाशक्ति मजबूत कर लोगे तो तुम्हें अपने दोषों से मुक्ति मिल जाएगी’. वह व्यक्ति प्रयास करके थक गया मगर उसे सफलता नहीं मिली. वह फिर फरीद के पास गया. फरीद ने पहले उसके माथे रेखाएं देखने का नाटक किया, फिर बोले, ‘अरे तुम्हारी जिंदगी के चालीस दिन ही शेष हैं. अगर इन बचे दिनों में तुमने दुर्गुण त्याग दिये तो तुम्हें सद्गति मिल जाएगी’. यह सुनकर वह आदमी परेशान हो गया. वह किसी तरह घर पहुँचा और व्यसनों की बात तो दूर, खाना-पीना तक भूल गया. वह हर पल ईश्वर को याद करता रहा. उसने गलत कार्य नहीं किया. चालीस दिन बीतने पर वह फरीद के पास पहुँचा. उन्होंने पूछा,’इतने दिनों में तुमने कितने गलत कार्य किये?’ उस व्यक्ति ने जवाब दिया,’मैं क्या करता. मैं तो हर पल ईश्वर को याद करता रहा.’ संत फरीद मुस्कराते होए बोले,’जाओ अब तुम पूरी तरह सुरक्षित हो. तुम अच्छे इंसान बन गये हो. जो व्यक्ति हर समय मृत्यु को ध्यान रखकर जीवनयापन करता है वह भला इंसान बन जाता है.’
दो-
एक फकीर ने अपना अंत समय देख अपने शिष्यों से कहा,’मेरे पास जो भी धन-संपत्ति है उसे मैं सबसे गरीब व्यक्ति को दूंगा.’ अगले दिन उसकी कुटिया के आगे निर्धनों की भीड लग गयी पर फकीर ने उन्हें कुछ नहीं दिया. तभी उधर से अपने रथ पर राजा निकला. फकीर ने धन की थैली उसकी ओर फेंक दी. राजा ने हँसकर कहा,’तुम पागल हो गये हो क्या? मैं तो यहाँ का राजा हूँ’ फकीर बोला,’तुम्हारे पास अपार धन-दौलत है पर संतोष नहीं. तुम लालची हो इसलिये मैं तुम्हें सबसे ज्यादा गरीब मानता हूँ.’ राजा शर्मिंदा हो गया और उस दिन से प्रजा की भलाई में जुट गया.
साभारा : नवभारत टाइमस, दिनांक १९.११.२००७ में प्रकाशित
ऊँट की गर्दन क्यों मुडी है? (अकबर-बीरबल) November 19, 2007
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ऊँट की गर्दन क्यों मुडी है (अकबर-बीरबल)
अकबर बीरबल की हाज़िर जवाबी के बडे कायल थे. एक दिन दरबार में खुश होकर उन्होंने बीरबल को कुछ पुरस्कार देने की घोषणा की. लेकिन बहुत दिन गुजरने के बाद भी बीरबल को धनराशि (पुरस्कार) प्राप्त नहीं हुई. बीरबल बडी ही उलझन में थे कि महारज को याद दिलायें तो कैसे?
एक दिन महारजा अकबर यमुना नदी के किनारे शाम की सैर पर निकले. बीरबल उनके साथ था. अकबर ने वहाँ एक ऊँट को घुमते देखा. अकबर ने बीरबल से पूछा, “बीरबल बताओ, ऊँट की गर्दन मुडी क्यों होती है”?
बीरबल ने सोचा महाराज को उनका वादा याद दिलाने का यह सही समय है. उन्होंने जवाब दिया - महाराज यह ऊँट किसी से वादा करके भूल गया है, जिसके कारण ऊँट की गर्दन मुड गयी है. महाराज, कहते हैं कि जो भी अपना वादा भूल जाता है तो भगवान उनकी गर्दन ऊँट की तरह मोड देता है. यह एक तरह की सजा है.
तभी अकबर को ध्यान आता है कि वो भी तो बीरबल से किया अपना एक वादा भूल गये हैं. उन्होंने बीरबल से जल्दी से महल में चलने के लिये कहा. और महल में पहुँचते ही सबसे पहले बीरबल को पुरस्कार की धनराशी उसे सौंप दी, और बोले मेरी गर्दन तो ऊँट की तरह नहीं मुडेगी बीरबल. और यह कहकर अकबर अपनी हँसी नहीं रोक पाए.
और इस तरह बीरबल ने अपनी चतुराई से बिना माँगे अपना पुरस्कार राजा से प्राप्त किया.









